New Editorials of

Ram Kumar 'Sewak'

(Chief Editor, Pragatisheel Sahitya) {Former Editor, Sant Nirankari Hindi}

are available on :-

www.maanavta.com

 

 

 

 

 

इतिहास के पदचिन्ह

आज का यथार्थ

- राम कुमार सेवक

   13 मई 2016 अर्थात अब से लगभग 1 महीने पहले सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज इस दुनिया से विदा हो गए |  तबसे निरन्तर हम अपने आपसे यूँ जूझ रहे हैं जैसे हम कमरे में कुछ काम कर रहे हों और एकदम लाइट गुल हो जाए |फिर हम अंदर की रौशनी के सहारे आगे बढ़ते हैं और मोमबत्ती और दियासलाई ढूंढते हैं ताकि रौशनी की व्यवस्था हो सके |

    यथार्थ यह है कि हममें से 95% लोग इस मानसिक समस्या की चपेट में हैं लेकिन स्वीकार कोई नहीं करता क्यूंकि सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ने अपने प्रवचन में एक बार कहा था कि एक महात्मा अपनी ऊँगली से चाँद की और संकेत कर रहे थे | और शिष्य उनकी तरफ देख रहे थे |महात्मा ने पूछा-मेरा तात्पर्य समझे ?शिष्यों ने कहा कि आप अपनी ऊँगली देखने के लिए कह रहे हैं |महात्मा ने कहा-ऊँगली की तरफ नहीं चाँद की तरफ देखो जिधर ऊँगली इशारा कर रही है |यथार्थ यह है कि सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज पूरे 36 साल समझाते रहे कि निरंकार से जुडो |शरीर तो बदलता रहा है और बदलता रहेगा लेकिन हम शरीर को ही केंद्र बना कर चलते रहे | शायद यही कारण था कि सद्गुरु हमारे बीच से लुप्त हो गए |

 मैंने स्वयं देखा है कि बाबा जी जिस विज़न और गम्भीरता से बोलते थे हम लोग उसे पूजा के भाव से सुनते थे |यही कारण है कि बड़ी से बड़ी बात भी बिना पालन के रह जाती थी |इसके बावजूद बाबा जी हमें सहन करते रहे |कभी -कभी वे शिष्यों से मिल रही अपनी निराशा का संकेत भी कर देते थे लेकिन उन्हें भी हमसे गहरा प्रेम था और हमें भी इसलिए समझदारी की बजाय आनंद हावी था |यही समस्या अब सबको परेशान कर रही है कि अब किसके लिए ये गीत गाएंगे-रूह गद-गद हो गयी दातेया दर्शन करके तेरे |

    यह वैसे ही है जैसे माता -पिता शुरू में अपने बच्चे को खड़े होने और चलने के लिए सहारा देते हैं |फिर धीरे-धीरे उसे सहारा देना बंद कर देते हैं ताकि वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके |

     हमें सर्वव्यापक इस निरंकार प्रभु का एहसास रखते हुए ह्रदय से सुमिरन करना चाहिए ताकि हम वह मुकाम हासिल कर सकें जहाँ बाबा जी हमें पहुंचाना चाहते थे |मैंने यह करके देखा है और पाया है कि इससे आत्मविश्वास बढ़ता है ,आनंद आता है और राहत मिलने लगती है |इस प्रकार विषाद और संताप ख़त्म हो जाते हैं |पूज्य माता सविंदर जी (वर्तमान सतगुरु) ने स्वयं अपने विचारों में यह बात कही है कि सुमिरन से बहुत ताक़त मिलती है और हमसे सेवा,सुमिरन,सत्संग की निरंतरता बनाये रखने का आह्वान किया है| यहाँ भी हम उनके वचनो की तुलना मिनटों और घंटो से कर रहे हैं जबकि उनमें निहित सन्देश सम्पूर्ण है और बिलकुल स्पष्ट है |यह वही सन्देश है जो बाबा हरदेव सिंह जी विस्तार से देते रहे |अब इस संक्षिप्त सन्देश को गम्भीरता से सुनना और अपनाना चाहिए |

    संत निरंकारी मिशन वास्तव में निरंकार को जानकर मानने वालों का मिशन है |शरीर का हम सम्मान और रख-रखाव तो जरूर करते हैं लेकिन शरीर के प्रति आसक्त नहीं होते |जीवन शक्ति के रूप में आत्मा और परमात्मा को ही सम्मुख रखते हैं |13 अप्रैल 1980 को चंडीगढ़ में बाबा गुरबचन सिंह जी ने भी कहा था कि कभी भी अपने मन में लाना कि कोई शरीर ही हमारा सतगुरु है |शरीर आते-जाते रहते हैं लेकिन (ब्रह्म) ज्ञान दुनिया में हमेशा रहा है और रहेगा

    यह एक अकाट्य सत्य है कि निरंकार के ज्ञान के बावजूद हम शरीर के प्रति बहुत हद तक आसक्त रहे हैं |यह आसक्ति इतनी गहरी है कि उनकी बातों को  हमने उस गम्भीरता से नहीं लिया जितनी गम्भीरता से लेना चाहिए था |बाबा जी ने कोशिश बहुत की और अब पूज्य माता जी भी उस कोशिश को आगे बढ़ा रही हैं लेकिन लग यह रहा है कि हम पूज्य माता जी के साथ भी वही व्यवहार कर रहे हैं जो बाबा हरदेव सिंह जी के साथ किया था |पहली बात तो यह है कि हर सतगुरु की अपनी शैली रही है |महान कवि मान सिंह जी मान, अक्सर बाबा बूटा सिंह जी की शैली के बारे में बताते थे कि वे बिना किसी भूमिका के शुरू हो जाते थे और अपने संपर्क में आने वाले लगभग हर इंसान को ज्ञान प्रदान कर देते थे उसके बारे में कुछ नही जाने या जांचे बगैर |उनका भाव था कि ब्रह्मज्ञान का बीज कहीं तो उगेगा और इस प्रकार उनका लक्ष्य (मिशन) पूरा होगा |बाबा अवतार सिंह जी धर्मग्रंथों के माध्यम से लोगों को उसके बारे में समझाते भी थे तब ब्रह्मज्ञान प्रदान करते थे |उन्होंने मिशन को संगठनात्मक रूप दिया |

    बाबा गुरबचन सिंह जी ने मिशन के अनुयाईयों को सांसारिक तरक्की की भी प्रेरणा दी और सामाजिक कार्यों को भी मिशन का अंग बना दिया |वे मिशन को विश्व के अन्य भागों में भी ले गए |

    बाबा हरदेव सिंह जी का काम करने का तरीका बहुत अलग था |उन्होंने मिशन का बहुत विस्तार किया और दुनिया के सामने मिशन को बहुत मजबूती से पेश किया |

     मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि हर गुरु का काम करने का अपना तरीका होता है इसी प्रकार पूज्य माता सविंदर जी का अपना तरीका है हालांकि लक्ष्य उनका भी वही है लेकिन हमें उनकी प्रवचन शैली को भी सहजता से स्वीकार करना चाहिए |

   हर फूल की अपनी खुशबू होती है |इनकी अपनी खुशबू को महसूस करना चाहिए कि बाबा हरदेव सिंह जी महाराज की खुशबू से उनकी तुलना की जाए |बाबा जी ने बहुत विस्तार से हमें हमें समझाया जबकि माता जी कम बोलकर हमें वही ज्ञान समझा रही हैं |हमने बाबा हरदेव सिंह जी की बातों को तो नहीं माना ,बेहतर है कि इनकी बातों को मान लें |  

      मुझे 25 वर्षों तक मिशन की प्रमुख पत्रिका - संत निरंकारी के हिंदी संस्करण में काम करने का मौक़ा मिला है |इस लम्बे दौर में काफी चीज़ें पढ़ी सुनी और देखीं लेकिन  उनका विज़न (Vision)कहीं और से आता था और दिल को प्रसन्नता से भर जाता था | उन्होंने ही फरवरी 1986  में सन्त निरंकारी (हिंदी)   में कृपापूर्वक सेवा दी |जिसे मैंने उस समय तक सबसे ज्यादा वरीयता दी जब तक मुझे उस सेवा से प्रबंध तंत्र द्वारा अलग नहीं कर दिया गया |इसके बावजूद उसके बाद भी बाबा जी ने मुझे वही प्रेम दिया जो पहले देते थे | 

     हममें से कुछ यह भी सोचते हैं कि बाबा जी कहीं नहीं गए हैं क्यूंकि निराकार में वे पहले भी हमारे साथ थे और आगे भी रहेंगे |यह बात बिलकुल यथार्थ है लेकिन यह तर्क देने वालों से मैं हमेशा यह कहता हूँ कि जब हम बाबा जी कहते हैं तब हम निराकार नहीं साकार रूप की बात करते हैं और साकार का अंत हमेशा हुआ है |स्वयं सतगुरु बाबा जी ने हमें अनेक बार यह भाव समझाया की शरीर तो हमेशा जाता है, जैसे संतो-महात्माओं ने समझाया है कि

राम गया रावण गया जाका बहु परिवार

कहु नानक कुछ थिर नहीं सपने ज्यूँ संसार |

स्पष्ट है कि जिस प्रकार श्री राम जी का अंत हुआ इसी प्रकार बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के शरीर का अंत हो चुका है |इस अंत को हम सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं क्यूंकि वह शरीर भी सामान्य नहीं था |उस शरीर ने पिछले 36 वर्षों में आनंद के ऐसे दृश्य दिखाये जिनका मुक़ाबला नहीं है |हमें सतगुरु बाबा जी ने बिलकुल वही ज्ञान दिया जिनकी गवाही उपनिषदों सहित लगभग सभी धर्मग्रन्थ देते हैं और जो उनके सतगुरु से उन्हें मिला |इसके बावजूद हममें से शायद कोई भी उतनी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता जो उन्होंने की |उपलब्धियां हासिल करने के लिए तप-त्याग की जिस अग्नि में से गुजरना पड़ता है वह हर किसी के वश की बात नहीं है |

 

    इसके बावजूद अब वह शरीर इस दुनिया में नहीं है इसलिए उनसे अब प्रेरणा ही लेनी चाहिए कि पहले की तरह जुड़ना चाहिए |जुड़ने योग्य निराकार ही था ,निराकार ही है और निराकार ही रहेगा |सतगुरु सदैव से पथ प्रदर्शक रहे हैं इसलिए उनकी (वर्तमान सतगुरु) कही बातों को गम्भीरता से लेना चाहिए |मेरे ख्याल से तो हो चुके सतगुरुओं से उनकी तुलना भी नहीं करनी चाहिए और ही उन पर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास करना चाहिए |वह बचपना हम बहुत कर चुके हैं, उस आदत को अब छोड़ देना चाहिए और भक्ति की उपलब्धि हासिल करने में जुट जाना चाहिए |

   13 मई 2016 अर्थात अब से लगभग 1 महीने पहले सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज इस दुनिया से विदा हो गए |  तबसे निरन्तर हम अपने आपसे यूँ जूझ रहे हैं जैसे हम कमरे में कुछ काम कर रहे हों और एकदम लाइट गुल हो जाए |फिर हम अंदर की रौशनी के सहारे आगे बढ़ते हैं और मोमबत्ती और दियासलाई ढूंढते हैं ताकि रौशनी की व्यवस्था हो सके |

    यथार्थ यह है कि हममें से 95% लोग इस मानसिक समस्या की चपेट में हैं लेकिन स्वीकार कोई नहीं करता क्यूंकि सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ने अपने प्रवचन में एक बार कहा था कि एक महात्मा अपनी ऊँगली से चाँद की और संकेत कर रहे थे | और शिष्य उनकी तरफ देख रहे थे |महात्मा ने पूछा-मेरा तात्पर्य समझे ?शिष्यों ने कहा कि आप अपनी ऊँगली देखने के लिए कह रहे हैं |महात्मा ने कहा-ऊँगली की तरफ नहीं चाँद की तरफ देखो जिधर ऊँगली इशारा कर रही है |यथार्थ यह है कि सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज पूरे 36 साल समझाते रहे कि निरंकार से जुडो |शरीर तो बदलता रहा है और बदलता रहेगा लेकिन हम शरीर को ही केंद्र बना कर चलते रहे | शायद यही कारण था कि सद्गुरु हमारे बीच से लुप्त हो गए |

 मैंने स्वयं देखा है कि बाबा जी जिस विज़न और गम्भीरता से बोलते थे हम लोग उसे पूजा के भाव से सुनते थे |यही कारण है कि बड़ी से बड़ी बात भी बिना पालन के रह जाती थी |इसके बावजूद बाबा जी हमें सहन करते रहे |कभी -कभी वे शिष्यों से मिल रही अपनी निराशा का संकेत भी कर देते थे लेकिन उन्हें भी हमसे गहरा प्रेम था और हमें भी इसलिए समझदारी की बजाय आनंद हावी था |यही समस्या अब सबको परेशान कर रही है कि अब किसके लिए ये गीत गाएंगे-रूह गद-गद हो गयी दातेया दर्शन करके तेरे |

    यह वैसे ही है जैसे माता -पिता शुरू में अपने बच्चे को खड़े होने और चलने के लिए सहारा देते हैं |फिर धीरे-धीरे उसे सहारा देना बंद कर देते हैं ताकि वह खुद अपने पैरों पर खड़ा हो सके |

     हमें सर्वव्यापक इस निरंकार प्रभु का एहसास रखते हुए ह्रदय से सुमिरन करना चाहिए ताकि हम वह मुकाम हासिल कर सकें जहाँ बाबा जी हमें पहुंचाना चाहते थे |मैंने यह करके देखा है और पाया है कि इससे आत्मविश्वास बढ़ता है ,आनंद आता है और राहत मिलने लगती है |इस प्रकार विषाद और संताप ख़त्म हो जाते हैं |पूज्य माता सविंदर जी (वर्तमान सतगुरु ) ने स्वयं अपने विचारों में यह बात कही है कि सुमिरन से बहुत ताक़त मिलती है और हमसे सेवा,सुमिरन,सत्संग की निरंतरता बनाये रखने का आह्वान किया है| यहाँ भी हम उनके वचनो की तुलना मिनटों और घंटो से कर रहे हैं जबकि उनमें निहित सन्देश सम्पूर्ण है और बिलकुल स्पष्ट है |यह वही सन्देश है जो बाबा हरदेव सिंह जी विस्तार से देते रहे |अब इस संक्षिप्त सन्देश को गम्भीरता से सुनना और अपनाना चाहिए |

    संत निरंकारी मिशन वास्तव में निरंकार को जानकर मानने वालों का मिशन है |शरीर का हम सम्मान और रख-रखाव तो जरूर करते हैं लेकिन शरीर के प्रति आसक्त नहीं होते |जीवन शक्ति के रूप में आत्मा और परमात्मा को ही सम्मुख रखते हैं |13 अप्रैल 1980 को चंडीगढ़ में बाबा गुरबचन सिंह जी ने भी कहा था कि कभी भी अपने मन में लाना कि कोई शरीर ही हमारा सतगुरु है |शरीर आते-जाते रहते हैं लेकिन (ब्रह्म) ज्ञान दुनिया में हमेशा रहा है और रहेगा

    यह एक अकाट्य सत्य है कि निरंकार के ज्ञान के बावजूद हम शरीर के प्रति बहुत हद तक आसक्त रहे हैं |यह आसक्ति इतनी गहरी है कि उनकी बातों को  हमने उस गम्भीरता से नहीं लिया जितनी गम्भीरता से लेना चाहिए था |बाबा जी ने कोशिश बहुत की और अब पूज्य माता जी भी उस कोशिश को आगे बढ़ा रही हैं लेकिन लग यह रहा है कि हम पूज्य माता जी के साथ भी वही व्यवहार कर रहे हैं जो बाबा हरदेव सिंह जी के साथ किया था |पहली बात तो यह है कि हर सतगुरु की अपनी शैली रही है |महान कवि मान सिंह जी मान, अक्सर बाबा बूटा सिंह जी की शैली के बारे में बताते थे कि वे बिना किसी भूमिका के शुरू हो जाते थे और अपने संपर्क में आने वाले लगभग हर इंसान को ज्ञान प्रदान कर देते थे उसके बारे में कुछ नही जाने या जांचे बगैर |उनका भाव था कि ब्रह्मज्ञान का बीज कहीं तो उगेगा और इस प्रकार उनका लक्ष्य (मिशन) पूरा होगा |बाबा अवतार सिंह जी धर्मग्रंथों के माध्यम से लोगों को उसके बारे में समझाते भी थे तब ब्रह्मज्ञान प्रदान करते थे |उन्होंने मिशन को संगठनात्मक रूप दिया |

    बाबा गुरबचन सिंह जी ने मिशन के अनुयाईयों को सांसारिक तरक्की की भी प्रेरणा दी और सामाजिक कार्यों को भी मिशन का अंग बना दिया |वे मिशन को विश्व के अन्य भागों में भी ले गए |

    बाबा हरदेव सिंह जी का काम करने का तरीका बहुत अलग था |उन्होंने मिशन का बहुत विस्तार किया और दुनिया के सामने मिशन को बहुत मजबूती से पेश किया |

     मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि हर गुरु का काम करने का अपना तरीका होता है इसी प्रकार पूज्य माता सविंदर जी का अपना तरीका है हालांकि लक्ष्य उनका भी वही है लेकिन हमें उनकी प्रवचन शैली को भी सहजता से स्वीकार करना चाहिए |

   हर फूल की अपनी खुशबू होती है |इनकी अपनी खुशबू को महसूस करना चाहिए कि बाबा हरदेव सिंह जी महाराज की खुशबू से उनकी तुलना की जाए |बाबा जी ने बहुत विस्तार से हमें हमें समझाया जबकि माता जी कम बोलकर हमें वही ज्ञान समझा रही हैं |हमने बाबा हरदेव सिंह जी की बातों को तो नहीं माना ,बेहतर है कि इनकी बातों को मान लें |  

      मुझे 25 वर्षों तक मिशन की प्रमुख पत्रिका - संत निरंकारी के हिंदी संस्करण में काम करने का मौक़ा मिला है |इस लम्बे दौर में काफी चीज़ें पढ़ी सुनी और देखीं लेकिन  उनका विज़न (Vision)कहीं और से आता था और दिल को प्रसन्नता से भर जाता था | उन्होंने ही फरवरी 1986  में सन्त निरंकारी (हिंदी)   में कृपापूर्वक सेवा दी |जिसे मैंने उस समय तक सबसे ज्यादा वरीयता दी जब तक मुझे उस सेवा से प्रबंध तंत्र द्वारा अलग नहीं कर दिया गया |इसके बावजूद उसके बाद भी बाबा जी ने मुझे वही प्रेम दिया जो पहले देते थे | 

     हममें से कुछ यह भी सोचते हैं कि बाबा जी कहीं नहीं गए हैं क्यूंकि निराकार में वे पहले भी हमारे साथ थे और आगे भी रहेंगे |यह बात बिलकुल यथार्थ है लेकिन यह तर्क देने वालों से मैं हमेशा यह कहता हूँ कि जब हम बाबा जी कहते हैं तब हम निराकार नहीं साकार रूप की बात करते हैं और साकार का अंत हमेशा हुआ है |स्वयं सतगुरु बाबा जी ने हमें अनेक बार यह भाव समझाया की शरीर तो हमेशा जाता है, जैसे संतो-महात्माओं ने समझाया है कि

राम गया रावण गया जाका बहु परिवार

कहु नानक कुछ थिर नहीं सपने ज्यूँ संसार |

स्पष्ट है कि जिस प्रकार श्री राम जी का अंत हुआ इसी प्रकार बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के शरीर का अंत हो चुका है |इस अंत को हम सहजता से स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं क्यूंकि वह शरीर भी सामान्य नहीं था |उस शरीर ने पिछले 36 वर्षों में आनंद के ऐसे दृश्य दिखाये जिनका मुक़ाबला नहीं है |हमें सतगुरु बाबा जी ने बिलकुल वही ज्ञान दिया जिनकी गवाही उपनिषदों सहित लगभग सभी धर्मग्रन्थ देते हैं और जो उनके सतगुरु से उन्हें मिला |इसके बावजूद हममें से शायद कोई भी उतनी उपलब्धि हासिल नहीं कर सकता जो उन्होंने की |उपलब्धियां हासिल करने के लिए तप-त्याग की जिस अग्नि में से गुजरना पड़ता है वह हर किसी के वश की बात नहीं है |

 

    इसके बावजूद अब वह शरीर इस दुनिया में नहीं है इसलिए उनसे अब प्रेरणा ही लेनी चाहिए कि पहले की तरह जुड़ना चाहिए |जुड़ने योग्य निराकार ही था ,निराकार ही है और निराकार ही रहेगा |सतगुरु सदैव से पथ प्रदर्शक रहे हैं इसलिए उनकी (वर्तमान सतगुरु) कही बातों को गम्भीरता से लेना चाहिए |मेरे ख्याल से तो हो चुके सतगुरुओं से उनकी तुलना भी नहीं करनी चाहिए और ही उन पर अपनी इच्छा थोपने का प्रयास करना चाहिए |वह बचपना हम बहुत कर चुके हैं, उस आदत को अब छोड़ देना चाहिए और भक्ति की उपलब्धि हासिल करने में जुट जाना चाहिए|