सिर्फ पुतला जलता है हर साल ,रावण तो वैसे का वैसा है |

रामकुमार सेवक  

श्री गुरु गोबिंद सिंह जी की ये पंक्तियाँ मुझे शुरू से ही प्रभावित करती हैं - रहणी रहे सोइ सिख मेरा --जितना मैं समझ पाया हूँ ,उसके अनुसार ,अगली पंक्ति है-वो साहिब मैं उसका चेरा |

जहाँ तक मेरी समझ काम करती है,गुरु साहिब अपने शिष्यों को समझाते हुए कह रहे हैं कि-जो मेरे आदेशों के अनुसार ही जीवन जीता है,वही मेरा गुरसिख है |

गहराई से सोचें तो यह बहुत सख्त बात है,जिसके बाद और कुछ कहने की गुंजाईश नहीं बचती |भक्तिमय जीवन जीने वाले ऐसे गुरसिख को उन्होंने बहुत ऊंचा सम्मान दिया है |उसे वे साहिब कह रहे हैं - उसे इतना ज्यादा महत्वपूर्ण सम्मान देकर महान गुरु उसे प्रेरित कर रहे हैं कि वह ऐसा गुरसिख बने | 

रहणी रहे सोइ सिख मेरा --यह पंक्ति मैंने 13 अप्रैल 2003 को दिल्ली में सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी के श्रीमुख से सुनी तो मुझे ऐसा लगा जैसे कोई पिता अपनी संतान को कह रहा हो कि यदि तुम यह काम करते हो तो तुम मेरी संतान हो और अगर यह काम नहीं करते तो मेरी संतान नहीं हो | 

बाबा हरदेव सिंह जी ने अपने एक अन्य प्रवचन में कहा था कि गुरु अपना सब कुछ(जो उसे अपने गुरु से मिला ) शिष्य को दे देता है,यहाँ तक कि अपना आसन भी लेकिन गुरु की दृष्टि समदृष्टि होती है जबकि शिष्य भक्तों को उस दृष्टि से नहीं देख पाता |

मुझे इसका अर्थ यह नज़र आया कि हम लोग अपना लालच त्याग नहीं पाते |चाहे वह पैसे का लालच हो या यश का |हमारे लालच की पूर्ति में  जो सहायक हो,उसे देखकर हमारी दृष्टि बदल जाती है और पक्षपात करने में हमें फिर संकोच नहीं होता |   

निरंकारी मिशन से जुड़ने के बाद किसी भी इंसान की मुक्ति की संभावना बढ़ जाती है चूंकि उसे धन निरंकार कहकर सामने वाले इंसान के चरणों को स्पर्श करना पड़ता है |इस अवस्था में अहंकार उत्पन्न होने की गुंजाईश कम रहती है |

देखा यह जा रहा है कि चरण स्पर्श करने के बावजूद उसका अहंकार ख़त्म नहीं होता |यह वैसी ही बात है कि हर साल रावण का सिर्फ पुतला जलता है ,रावण तो वैसा का वैसा है,अहंकार के रूप में |

अहंकार रूपी रावण का विनाश हुए बिना लालच का विनाश संभव नहीं और लालच -इच्छा का विनाश हुए बिना मुक्ति संभव नहीं |

प्रार्थना करें कि हम योग्य सत्गुरु के योग्य शिष्य सिद्ध हों |हमारी रहणी अर्थात व्यवहार गुरसिख की शोभा कायम रखने वाला हो |      


फेल करना आसान है,पास करना कठिन-कैसे ?

रामकुमार सेवक

यह दौर भी अजीब ही है |कुछ साल पहले तक कोई महात्मा जब सरकारी सेवा से सेवानिवृत होता था तो हम बेहिचक कह देते थे कि सच्ची सरकार आपको कभी सेवानिवृत नहीं करेगी और सेवानिवृत हो रहे महात्मा को हिम्मत मिलती थी कि सेवा -सुमिरन-सत्संग से उसे कभी निवृत नहीं होना पड़ेगा लेकिन अब वक़्त बदल चुका है |

विजय चौक पर महात्मा बता रहे थे कि उनकी ब्रांच में साठ वर्ष से ज्यादा उम्र वाले सेवादारों को कल विदाई दी गयी |

वैसे तो घोषित तौर पर उनका सम्मान किया जा रहा था लेकिन उनके ज्ञान की परीक्षा भी ली जा रही थी |जबकि आध्यात्मिक परिपेक्ष्य में हम सब गुरुभाई हैं |इस दृष्टि से परीक्षा लेने का अधिकार सिर्फ सतगुरु को है |

बताया गया कि इस परीक्षा में उनमें से कुछ फेल घोषित कर दिए गए |महात्मा तो सरल सेवादार थे इसलिए किसी तनाव में नहीं आये लेकिन जो महात्मा सेवा करने की भावना रखता है और सेवा से कोई आर्थिक लाभ नहीं कमा रहा हो,उसे जब तक वह चाहे , सेवा करने देना चाहिए |

उसे सेवा से तो अलग किया ही जा रहा था ,साथ ही उसे टेस्ट भी किया जा रहा था तो उसे सम्मान कैसे माना जाए ?

वह सम्मान तो  नहीं हो सकता और ब्रह्मज्ञानी महात्मा का अपमान करने में बहुत खतरे हैं |ब्रह्मज्ञानी के अपमान की सजा तो स्वयं निरंकार देता है और निरंकार पर कोई पाबंदी लागू नहीं होती |

साथ ही यह बात भी साफ़ है कि किसी के फेल घोषित कर देने से कोई फेल नहीं हो जाता |              

किसी को असफल घोषित करना बहुत आसान है |मेरे एक दोस्त एक बार बता रहे थे कि कल मैं अपने बेटे को पढ़ा रहा था |बेटा तब चौथी कक्षा में पढ़ रहा था |उसने जो कुछ पूछा ,वो उसके पाठ्यक्रम का अंग नहीं था लेकिन दोस्त को उस समय उस प्रश्न का उत्तर याद नहीं आया इसलिए उन्होंने कहा-मुझे याद नहीं |

यह सुनकर दोस्त के चौथी कक्षा में पढ़ रहे बेटे ने दोस्त को फेल घोषित कर दिया जबकि दोस्त सफल वकील थे |

प्रश्न पूछने के लिए किसी योग्यता की ज़रुरत नहीं है इसलिए हर कोई प्रश्न पूछता रहता है |अनर्गल अथवा अप्रासंगिक प्रश्न करना आजकल बिलकुल आम बात है |अप्रासंगिक प्रश्न पूछना उतना ही आसान है जितना कि किसी बच्चे के द्वारा कपडे पर कैंची चला देना लेकिन उसका जवाब देना उतना ही जिम्मेदारी का काम है जितना कि फटे हुए कपडे की सिलाई करके उसे इस्तेमाल करने लायक बनाना |         

कल विजय चौक सत्संग में भाव प्रकट करते हुए मुझे यह बात याद आ गयी कि कोई शरारती व्यक्ति हमसे कुछ भी पूछ सकता है और हो सकता है हमें उसका उत्तर याद न हो |ऐसे वक़्त वो हमें आराम से फेल घोषित कर सकता है |यदि पूछे गए प्रश्न का आधार नादानी या चालाकी है तो उस असफलता को हमें गंभीरता से लेने की ज़रुरत नहीं है |

लेकिन दूसरी ओर यह भी संभव है कि प्रश्न हमारी कारगुजारियों से सम्बंधित हो और भेद खुलने के डर से हम उसे यूँ ही मुस्कुराकर टाल जाते हों |

इस परिस्थिति में प्रश्न पूछने वाले का कोई दोष नहीं है और हमें अपनी कारगुजारियों को ठीक करना ही होगा |

अंत में निरंकार-सतगुरु से यही प्रार्थना की कि प्रशासनिक सुधारों के नाम पर सेवादल से तो सेवानिवृत किया जा रहा है लेकिन किसी भी कारण से किसी को भी सत्संग में आने से नहीं रोका जाना चाहिए |वह यदि स्वयं रुकता है तो रुक जाए लेकिन परमार्थ के मिशन द्वारा ऐसा काम किसी भी हालत में नहीं किया जाना चाहिए,मेरा ख्याल भी है और प्रार्थना भी |   


ऐसे बढ़ा साधारण खिचड़ी का स्वाद 

रामकुमार सेवक  

अध्यात्म में भक्त  का भगवान   से सीधा सम्बन्ध होता है |सीधे संवाद के कारण भक्त कवियों की रचनाएँ अमर हैं |इसके अतिरिक्त कुछ और चीजें भी जुड़ गयी हैं जिनके कारण उन भक्तों की महिमा और बढ़ गयी है |जैसे बेर का सम्बन्ध शबरी के साथ है |भात का सम्बन्ध नरसी के साथ है |खीर का सम्बन्ध महात्मा बुद्ध के साथ है |केले के छिलके का सम्बन्ध विदुर जी की पत्नी पारसंवी जी के साथ है तो साग का सम्बन्ध स्वयं विदुर जी के साथ है |

जैसे रैदास जी की कठोती का अपना इतिहास है इसी प्रकार शबरी के बेर ,विदुर जी के साग और नरसी जी के भात का अपना विशिष्ट इतिहास है | 

इतिहास तो हर किसी ने अपनी-अपनी दृष्टि से लिखा है लेकिन मुझे इस विषय में दिलचस्पी अपने एक अनुभव से हुई |

उन दिनों अपनी सेवा के सिलसिले में मुझे पत्रिका विभाग में रात्रि में भी काफी समय तक बैठना होता था |अक्सर महात्मा लगातार आते थे और उनसे चर्चा करने में काफी समय बीत जाता था |वह चर्चा मेरी सोच का विस्तार करती थी इसलिए मुझे भी उस चर्चा में गहरी  रूचि थी जबकि संपादन के काम से उसका सीधा सम्बन्ध नहीं था लेकिन निरंकारी मिशन के सिद्धांतों की समझ और प्रचार-प्रसार से उसका गहरा सम्बन्ध था और संपादन की सेवा से न्याय करने के लिए यह संपर्क बहुत जरूरी था | 

2003  में जब मुझे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी की यात्रा में सम्मिलित होने का मौका मिला था तो तब अनेकों विद्वानों और जिम्मेदार महात्माओं से मेरा संपर्क बना था |इनमें झारखण्ड राज्य में कार्यरत एक क्षेत्रीय प्रभारी महात्मा भी थे |वे अंग्रेजी के विद्वान थे और बहुत अनुभवी थे जबकि मेरा अनुभव उनसे काफी कम था लेकिन विचार चूंकि मिलते थे तो उनसे विशेष प्रेम हो गया था |

एक दिन वे दिल्ली आये ,पत्रिका विभाग में मेरी-उनकी खूब चर्चा चली |समय रात्रि के दस बजे से ऊपर हो गया तो मुझे लगा कि महात्मा के भोजन की व्यवस्था होनी चाहिए चूंकि लंगर के बंद होने का समय पहले ही बीत चुका था |

मैंने उनसे स्पष्ट कहा कि भाई साहब ,लंगर का समय तो अब निकल चुका है|आज आपने खाना भी नहीं खाया |

संकोची स्वभाव के कारण मुझे हिचकिचाहट थी लेकिन हमारी मर्यादा है-करूँ मैं संतों का सत्कार (इसकी मांग हम निरंतर निरंकार से करते हैं ) इसलिए मैंने हिचक छोड़ी और उनसे कहा-भाई साहब ,

मैं आपको अपने साथ अपने घर ले चलता लेकिन आज हमारे घर में मूंग की दाल की खिचड़ी बनी है ,आपको शायद पसंद न आये ?

वे बोले-भाई साहब,मुझे तो खिचड़ी बहुत पसंद है,यदि थोड़ी ज्यादा बनी होगी,तो मैं वही खा लूँगा |

मैंने तुरंत घर फ़ोन मिलाया |बेटी बोली-पापा, आपको पहले बताना चाहिए था |

मैंने कहा-उन्हें खिचड़ी पसंद है |

हम दोनों घर आ गए |मुझे खिचड़ी बचपन से ही पसंद है और अब भी मैं गाहे-बगाहे खिचड़ी खाता रहता हूँ लेकिन वैसी खिचड़ी कभी नहीं खायी |महात्मा को भी पसंद आयी |

मैंने बेटी से पूछा-तूने आज खिचड़ी में  क्या जादू किया है ?

बेटी बोली -पापा ,मैंने बनाते समय खिचड़ी में चरणामृत मिला दिया था |

मुझे अपने ह्रदय में महसूस हुआ कि चरणामृत दुखभंजन है-यह भक्त का सदैव सहायक और रक्षक है |इसकी शक्ति इस तथ्य में निहित है कि निरंकार हर काम कर सकता है|

मन-जीवन का यह विश्वास ही हमारी वास्तविक शक्ति है |    


मन चंगा और कठोती में गंगा कैसे ? 

रामकुमार सेवक 

पिछले दिनों चंडीगढ़ से एक महात्मा फोन पर पूछ रहे थे कि - कठोती क्या होती है ?वास्तव में वे महात्मा रैदास जी को याद कर रहे थे, जिन्होंने कहा था - मन चंगा तो कठोती में गंगा |

विद्यार्थी जीवन में हमारे पाठ्यक्रम में, उत्तर प्रदेश में एक किताब होती थी - हमारे पूर्वज, वह 6th से 8th तक में तीन अलग-अलग भागों में पढ़ाई जाती थी | मुझे उसमें बहुत रूचि थी यद्यपि कक्षा उत्तीर्ण करने की दृष्टि से उसकी महत्ता सबसे कम थी लेकिन न जाने क्यों मुझे उसे पढ़कर अच्छा लगता था|

उसमें रैदास जी के बारे में जो पढ़ा वो मेरी शुरूआती जानकारी का आधार बना, बाद में तो सन्त निरंकारी (हिंदी) में आदरणीय अजायब सिंह जी के आदेश से मैंने एक स्तम्भ शुरू किया हुआ था - हमारे सन्त महापुरुष | उस स्तम्भ में हम सब सन्तों के बारे में - उनकी जीवन यात्रा और शिक्षाओं के बारे में लिखते थे | सन्त रैदास जी के बारे में भी उस स्तम्भ में लिखा था | महात्मा के पूछने के बाद वह सब विवरण मेरे दिल-ओ-दिमाग में पुनर्जीवित हो गया |

दरअसल ब्रह्मज्ञान ऐसे ही महात्माओं के लिए होता है जो ज्ञान की दौलत को ही सबसे ज्यादा महत्व देते हैं लेकिन संप्रदाय बनने पर जो लोग मुख्य भूमिका में होते हैं वे लोग ज्ञान की दौलत की चर्चा के माध्यम से ज्यादा भौतिक दौलत को सबसे ज्यादा महत्व देते हैं |

दरअसल रैदास जी सामाजिक दृष्टि से अति सामान्य प्राणी थे लेकिन मीराबाई ने अध्यात्म में जो ऊंचाई हासिल की,(पायो री मैंने राम रतन धन पायो )वो रैदास जी की कृपा से ही प्राप्त हुई थी इसलिए मीराबाई ने कुछ भी छिपाया नहीं |स्पष्ट कहा-वस्तु अमोलक दी मेरे सतगुरु कर किरपा अपनायो | 

यह सिद्ध है कि रैदास जी के पास जो उपलब्धि थी, वह असाधारण थी |वे चमड़े के जूते बनाने का काम करते थे |

इस व्यवसाय में चमड़ा भिगोने के लिए जो बर्तन इस्तेमाल किया जाता है, उसे कठोती कहते हैं | एक कर्मकांडी ब्राह्मण को राजा के क्रोध से बचाने के लिए उन्होंने अपनी कठोती में से ही एक स्वर्ण कंगन निकालकर दे दिया था | 

वास्तव में रैदास जी, कबीरदास जी के गुरुभाई थे, दोनों के गुरु रामानंद जी ही थे | ब्रह्मज्ञानी कर्मकांडी नहीं होते लेकिन एक ब्राह्मण धार्मिक व्यक्ति जो रैदास जी से चिढ़ते थे वे अक्सर ही उनसे कहते कि गंगा स्नान के लिए चलिए |रैदास मानते थे कि प्रभु के सामने कर्मकांडों की महत्ता नहीं अपितु मन की स्वच्छता की महत्ता ज्यादा है इसलिए वे कह देते कि-मन चंगा तो कठोती में गंगा |

कहने का अर्थ है कि मन यदि पवित्र है तो गंगाजल और कठोती के पानी में कोई फर्क नहीं है |

ब्राह्मण सज्जन को इस बात पर यकीन न होता था लेकिन सत्य तो सत्य है, कोई यकीन करे या न करे | इस प्रकार कठोती, जो चमड़ा भिगोने का बर्तन है, धार्मिक जगत में अमर हो गया|

 

(रैदास जी के जीवन की विस्तृत चर्चा प्रगतिशील साहित्य द्वारा प्रकाशित पुस्तक - हमारे सन्त महापुरुष (भाग-एक) में उपलब्ध है | इसमें 22 अन्य सन्तों के जीवन परिचय और शिक्षाएं उपलब्ध हैं|कृपया हमारी वेबसाइट पर विस्तृत विवरण देखें |)      


श्रद्धांजलि -

सुषमा स्वराज-कान तरसेंगे उनके विचार सुनने के लिए 

रामकुमार सेवक 

कल रात लगभग दस बजे श्रीमती सुषमा स्वराज चिर निद्रा में लीन हो गयीं |ऐसा कभी सोचा तो नहीं था कि शिष्या स्वयं गुरु से पहले ही विदाई ले लेगी |

ऐसी स्थिति में मुझे याद आता है कि निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी कहा करती थीं कि हम सब भगवान की खेती हैं -भगवान् अपनी खेती कच्ची काटे या पक्की ,कुछ नहीं कह सकते |इसके बावजूद  कुछ लोग ऐसे होते हैं,जिनके लिए किसी शायर की यह पंक्ति अनायास  याद आती है-

बड़े गौर से सुन रहा था ज़माना, तुम्हीं सो गए दास्ताँ कहते कहते |

कुछ ही समय पहले तो उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय न्यायलय में कुलभूषण जाधव की पैरवी कर रहे महान्यायवादी (सॉलिसिटर जनरल )से बात की थी और फिर जैसे ह्रदय ने उनका साथ देना बंद कर दिया और शेरनी की तरह दहाड़ने वाली उनकी वाणी चिर मौन में चली गयी |   

मुझे याद आता है 1977 का वर्ष ,जब इमरजेंसी के विरुद्ध जैसे जनमत संग्रह हुआ था और बांग्लादेश की स्थापना करने वाली महानायिका इंदिरा गाँधी की मजबूत सरकार धराशायी हो गयी थी |देश में जनता पार्टी की सरकार बनी |इस सरकार में उद्योग मंत्री थे समाजवादी नेता जॉर्ज फर्नांडीस |

जॉर्ज फर्नांडीस मुजफ्फरपुर से चुनाव जीते थे |

वे तो जीत के वक़्त भी तिहाड़ जेल में ही थे लेकिन मुजफ्फरपुर में जार्ज को चुनाव जिताने में सक्रिय थी सुषमा स्वराज और उनके पति स्वराज कौशल ,जो समाजवादी विचारक थे और जॉर्ज फर्नांडीस के मित्र थे |

जेल का फाटक टूटेगा और जॉर्ज हमारा छूटेगा के नारे ने जॉर्ज को मुजफ्फरपुर की जनता का नायक बना दिया था |यह था सुषमा स्वराज का कौशल |

1977 में ही हरियाणा में भी जनता पार्टी की सरकार बनी और सुषमा स्वराज सबसे कम आयु की कैबिनेट मंत्री बनी |उनका यह रिकॉर्ड इतिहास में दर्ज़ है |

मुझे वर्ष 1980  भी याद आता है -देश में मध्यावधि चुनाव हुए |जहाँ तक मुझे स्मरण है चुनाव 5 जनवरी को था |मैं तब ग्यारहवीं कक्षा में पढता था |राजनीति में मेरी गहरी रूचि थी लेकिन यह राजनीति सिद्धांतों की थी छल-प्रपंच की नहीं |

तब मैंने धर्मयुग पत्रिका खरीदी थी |उस चुनाव विशेषांक में पहली बार मैंने सुषमा जी के बारे में पढ़ा |वे एक तेजतर्रार नेता के रूप में प्रकट हुई थीं |

1990 के आस-पास की बात है,तब अटल जी का भाषण सुनने के लिए मैं पार्लियामेंट स्ट्रीट (नयी दिल्ली )गया था |दोपहर का समय था और गर्मी का मौसम था |उस दिन मैंने सुषमा जी के दर्शन भी किये और उन्हें सुना भी |उनके शब्दों में परिपक्वता की मजबूत पकड़ थी और जो श्रोताओं के मन पर सीधा प्रभाव छोड़ती थी |  

उनके विचार अनेक कार्यक्रमों में सुने और उनकी गहरी छाप महसूस की |उनकी भाषाई पकड़ उन्हें किसी भी राज्य के लोगों से अपनत्व की डोर में बांध देती थी |

बेल्लारी (कर्नाटक ) से उन्होंने श्रीमती सोनिया गाँधी के विरुद्ध चुनाव् लड़ा |ज्यादातर लोगों को लगता था कि वे चुनाव हार जाएंगी क्यूंकि वे हरियाणा में जन्मी हैं और दक्षिण भारतीय भाषा बोल पाना एक उत्तर भारतीय के लिए असंभव है |जनता से संवाद ही नहीं होगा तो जीतेंगी कैसे ?

लेकिन टी वी पर उन्हें फर्राटे से कन्नड़ बोलते देखा तो मैं आश्चर्यचकित रह गया |यह उनकी प्रतिभा का कमाल था |

1996  में श्री अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार  को विश्वास मत देने के पक्ष में संसद में बोलते हुए उन्होंने भारतीयता की जो परिभाषा दी वह आज भी कानो में गूंजती है,उन्होंने कहा था -  भंगड़े से भरतनाट्यम तक सारे नृत्य भारतवर्ष के हैं,यह है भारतीयता की परिभाषा |भारतीयता का अर्थ यह है कि जम्मू के राजमा-चावल,पंजाब की मक्के की रोटी से लेकर दक्षिण के इडली दोसे तक सारे आहार भारत के हैं |भारतीयता का अर्थ यही है कि अमरनाथ से रामेश्वरम तक सारे तीर्थ भारतवर्ष के तीर्थ हैं |एक संस्कृति के अर्थ यही हैं कि शिव का भक्त अमरनाथ का जल लेकर रामेश्वरम के पैर पखारता है |

उनकी हाजिरजवाबी का तब मैं कायल हो गया जब उन्होंने लोकसभाध्यक्ष श्री सोमनाथ चटर्जी को ही भारतीयता के उदाहरण के रूप में प्रस्तुत कर दिया-उन्होंने कहा-बंगाल के श्री एन सी चटर्जी अपने बेटे का नाम सोमनाथ रखते हैं,यह है भारत की एक संस्कृति ,यह है भारतीयता |

विदेशमंत्री के रूप में उनकी भूमिका को काफी सीमित कर दिया गया था लेकिन उन्होंने जनता के अनेकों आम लोगों को विदेशी सरकारों के चंगुल से आज़ाद करवाया ,वह उन्हें देश के शेष विदेशमंत्रियों से  अलग रूप में प्रकट करता है |उनकी स्मृति को प्रणाम            


सत्गुरु की वह दिव्य दृष्टि 

रामकुमार सेवक

 

शनिवार (27 /07 /2019 ) को प्रातःकालीन सत्संग में विचार करते हुए श्री जोगिन्दर सिंह जी खुराना (पूर्व मुख्य संचालक -सन्त निरंकारी सेवादल )ने बाबा अवतार सिंह जी और उनके युग को अपने शब्दों में,अपने दीर्घ अनुभवों के साथ श्रोताओं को बताया |उनके अनुभव ,जो मेरे व्यक्तिगत अनुभवों के आधार पर भी पुष्ट हुए ,मेरे ह्रदय पर अंकित हो गए |

जैसा कि उन्होंने बताया- विभाजन के बाद वे शाहबाद मारकंडा (हरियाणा ) में अपने बड़े भाई सन्त सिंह जी के साथ बसे | वहां बाबा अवतार सिंह जी के बारे में यह सुना कि दिल्ली में वे खुद गुरु बने बैठे हैं |यह सुनकर उनके बारे में विपरीत ख्याल आये |उन दिनों बाबा जी ब्रह्मज्ञान के बीज बिखेर रहे थे |अगर एक महात्मा भी होता तो भी बाबा जी स्वयं चले जाते थे | बाबा जी जब शाहबाद -मारकंडा आये तो हम दोनों भाई उनके दर्शन करने गए |

बिना किसी बिछावन की एक चारपाई पर बाबा जी बैठे थे,जिसके नीचे ज़मीन नज़र आ रही थी |गर्मी का मौसम था ,बिजली उन दिनों होती नहीं थी |

बाबा जी के सामने एक तरफ बहने बैठी थीं और दूसरी तरफ महापुरुष थे | बाबा जी जब दिल्ली चले गए तो मैंने अपने मन में कहा कि-मैं तो इन्हें तब गुरु मानूंगा जब ये मुझे दिल्ली बुला लेंगे |

यह सुनते समय मुझे(रामकुमार सेवक को ) अपनी पत्नी का ध्यान आ गया,जिसने 1993 में सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी से कलकत्ता में मन ही मन यह प्रार्थना की थी कि मैं तो आपको तब गुरु मानूंगी जब मुझे बेटा मिल जाएगा |

यह गुरु की ही दिव्यदृष्टि होती है ,जो शिष्यों के मनोभावों को पढ़ लेती है |इसका एहसास मुझे अगले दिन सुबह हुआ |रात को मुझे सपना आया था कि-हमारे घर में बेटे का जन्म हुआ है |

मैंने अपने सपने की बात पत्नी को बताई,उसने कहा-मुझे भी ऐसा ही सपना दिखा है |उसने तब कहा कि-कल जब पूज्य बाबा जी रैली में आ रहे थे तो मैंने मन ही मन बाबा जी से पुत्र प्रदान करने की प्रार्थना की थी |

बाबा जी ने रात को ही प्रार्थना के स्वीकार होने का सन्देश हम दोनों को दे दिया था |यह फरवरी 1993 की बात है और इसके ठीक नौ महीने बाद नवम्बर 1993 में बड़े पुत्र कुणाल का जन्म हुआ |

खुराना जी ने आगे बताया कि ससुराल दिल्ली में हो गयी और मेरे बड़े भाई,जो पहाड़गंज में हारमोनियम ठीक करते थे,निरंकारी सत्संग का हारमोनियम ठीक करने के बाद बाबा अवतार सिंह जी के संपर्क में आ गये और ब्रह्मज्ञान प्राप्त हो गया |

वो छठवां समागम था ,निरंकारी कॉलोनी में हुए ,उस समागम के बाद बाबा जी ने एक दिन मुझसे पूछा-यह दिल्ली है या कोई और जगह है ?

मुझे अपनी शर्त आ गयी जो मैंने अपने मन में सोची थी -खुराना जी ने बताया | 

मुझे(रामकुमार सेवक को ) याद आ गया कि बाबा हरदेव सिंह जी के पास भी वो दिव्यदृष्टि थी,जिसे मैंने अनेक बार तो प्रत्यक्ष महसूस किया था |

जब भी मैं उनके सामने जाता था तो मुझे लगता था कि मैं-X-ray मशीन के सामने से गुजर रहा हूँ |लोग उनकी मुस्कान चाहते थे लेकिन मेरी उनसे नज़र मिलाने की भी हिम्मत नहीं होती थी |कभी-कभी कुछ जरूरी बातें तो अवश्य उनसे बताई थीं लेकिन वो मेरी ड्यूटी मात्र थी |मेरे बताने से पहले भी वे सब जानते होते थे | 

अब उस दिव्यदृष्टि के एहसास की कमी मुझे लगातार महसूस होती रहती है और मैं निरंकार में उन्हें पकड़ने का आनंददायक खेल खेलता रहता हूँ-धन निरंकार जी           


कुत्ते की पूंछ अच्छी या दाढ़ी ?

रामकुमार सेवक 

 

मुझे निरंकारी राजमाता जी की यह बात अक्सर याद रहती है कि-अभी तो नाव समुद्र में ,न जाने क्या होय |

जब तक जीवन है तब तक गिरावट तो कभी भी और किसी भी स्तर तक आ सकती है इसलिए सिख इतिहास के वह महान गुरसिख याद आते हैं जिनसे किसी औरत ने व्यंग्य से पूछा था कि-मेरे कुत्ते की पूंछ अच्छी है या तेरी दाढ़ी अच्छी है ?                 

महात्मा ने कहा-समय आने पर इस प्रश्न का उत्तर दूंगा |

महात्मा सहज जीवन जीते रहे |कोशिश की कि कोई दाग न आये |

जब अंतिम समय के करीब पहुंचे तो उन्होंने उस औरत को याद किया |उनकी बात सुनकर निकट खड़े लोग आश्चर्यचकित हो गए क्यूंकि वह अच्छी या सम्मानित औरत नहीं थी |लेकिन उन्होंने उस औरत को बुलवा लिया |

वह जब आ गयी तो महात्मा बोले-तुमने सवाल पूछा था कि तुम्हारे कुत्ते की पूंछ अच्छी है या मेरी दाढ़ी ?

आज मैं उसका जवाब देता हूँ कि तुम्हारे कुत्ते की पूंछ से मेरी दाढ़ी बहुत अच्छी है |

उस औरत ने कहा-आपने उस दिन मुझे यह जवाब क्यों नहीं दिया था ?

महात्मा ने कहा-तब जीवन का बड़ा हिस्सा बचा हुआ था,दाग लग सकता था इसलिए सही  जवाब दिया नहीं जा सकता था |

अब कम समय बचा है,अब दाग लगने की संभावना नहीं है|तुम्हारा सवाल मुझ पर उधार था इसलिए आज तुम्हारा जवाब देकर उधार चुका दिया | अब कोई समस्या नहीं है |      

बुजुर्गों से सुना है कि कपूरथला के पुराने गुरमुख-सन्त रामचंद जी कहा करते थे कि गुरु घर में सेवा करना आसान नहीं है बल्कि यह बाल से भी बारीक और तलवार से भी तीखा मार्ग है |इस पर सावधानी से चलना होता है अन्यथा अनर्थ हो सकता है |वे कहा करते थे कि-गुरुघर को बेटी के घर की भांति समझना चाहिए |जिस प्रकार बेटी की ससुराल में इंसान मर्यादा का बहुत ध्यान रखता है इसी प्रकार गुरुघर में रहते हुए भक्ति की मर्यादा का शत- प्रतिशत पालन करना चाहिए |

दूसरी ओर बाबा गुरबचन सिंह जी के प्रति पूर्ण समर्पित महात्मा,अनेक कलाओं के माहिर पुराने गुरसिख मान सिंह जी कहते थे-गुरु घर की रोटियां-हड्ड गालन ,मत मारण,कम न करण देन-यह उनका अपना अनुभव था ,शायद इसीलिए विनय जोशी जी कहते थे -हम यदि मंडल के दफ्तर में एक कप चाय भी पीते हैं तो उसके लिए कम से कम उतनी तो सेवा करनी चाहिए |

मालिक की कृपा रही कि मैं भी इस सूत्र को अपने व्यवहार का अंग बना पाया |   

मैंने महात्मा रामचंद जी (कपूरथला )के कभी दर्शन नहीं किये इसलिए मैं उनके सम्बन्ध में कोई दावा नहीं कर सकता लेकिन पुराने बुजुर्गों द्वारा सुनाई गयी ये बातें मेरे लिए मील की पत्थर सिद्ध हुई हैं |

आज जब कि विपरीत बातें भी बहुत तेजी से बाहर आ रही हैं कि मैं आश्चर्यचकित रह जाता हूँ कि जिस आंदोलन के लिए इतनी कुर्बानियां दी गयीं ,समर्पित भक्तों के साथ मुझे भी लम्बे समय तक सक्रिय रहने का अवसर मिला ,क्या वहां इतना अँधेरा था ?

मुझे जो सेवा मिली वो प्रकाश फैलाने की सेवा थी और ब्रह्मवेत्ता सतगुरु के समर्थ नेतृत्व में अंधकार से बचकर निरंकार को साथ-साथ महसूस करते हुए जुलाई 2011 तक अपनी उस सेवा का निर्वाह करता रहा और जब दायित्व से मुक्त कर दिया गया तो सहज भाव से बाहर आ गया |मालिक अपनी भक्ति और व्यवहार में सहजता प्रदान किये रखे ताकि जब समय आये,उजले मुख के साथ इस दुनिया से जाऊं|

अब महसूस होता है कि ब्रह्मज्ञान होना सिर्फ उपलब्धि नहीं है बल्कि एक बड़ी जिम्मेदारी है |यदि अब भी मिशन वही है ,जैसा कि दावा किया जाता है तो हमारे पास  हर अर्थपूर्ण प्रश्न का सही-सच्चा जवाब होना ही चाहिए -धन निरंकार जी-


पैगम्बरों को पुजारी बहुत मिलते हैं लेकिन अनुयाई नहीं मिलते -न जाने क्यों 

रामकुमार सेवक   

कल(23 /07 /2019 ) बच्चे प्रतियोगिता परीक्षा देने के लिए नोएडा गए थे |उन्होंने बताया कि पेपर देने के लिए एक युवक आगरा से आया और केंद्र पर उसे प्रवेश नहीं दिया गया चूंकि वो पांच मिनट देरी से पहुँच पाया |आप सोच सकते हैं कि वह युवक कितना मायूस होगा |यदि उसकी आर्थिक स्थिति भी ख़राब हुई तो यह मायूसी और भी बढ़ जाएगी |

 मेरे बच्चों के साथ भी एक बार मेरठ में ऐसा ही हुआ था इसलिए यह एक सामान्य घटना है लेकिन वहां खड़े लोगों ने जो उस पर टिप्पणियां की,वे अशोभनीय तो थीं ही दर्दनाक भी थीं |मौसम चूंकि बारिश का था उन लोगों ने उस व्यंग्य करते हुए कहा |तुम्हारे आंसुओं का पता ही नहीं चल रहा है वे तो बारिश में घुल गए हैं |लोगों की ऐसी दर्दनाक दिप्पणियाँ मैंने काफी देखी हैं |

बच्चों के मुँह से यह वाक्य सुनकर मुझे बाबा हरदेव सिंह जी की याद आ गयी जो कि एक-एक शब्द बोलने से पहले कई-कई बार सोचते थे |वे किसी भी स्थिति में किसी को भी प्रताड़ित करने की बात सोचते भी नहीं थे |   

मुझे बाबा हरदेव सिंह जी का वह प्रवचन ध्यान में आ गया ,जिसमें उन्होंने यह तल्ख़ सच्चाई बयां की थी ,उन्हीं के शब्द लिख रहा हूँ-

अनेकों इंसान कैसी दानवता के रास्ते पर चलते हैं,एक इंसान जो चोट खाये हुए है,उसको कुछ राहत देने की बजाय ,उसका शोषण करेंगे |पहले ही वो नुक्सान उठा रहा है,पहले ही वह पीड़ा में है उसका दर्द कुछ कम करने की बजाय उसे पूरा -पूरा exploit करेंगे |उसे और ज्यादा पीड़ा देंगे |इस तरह से लोग इस धरती पर विचरण कर रहे है ,इस धरती पर जी रहे हैं | शायर का वो शेअर ध्यान में आता है,जिसमें कहा गया -

जब घर में मेरे आग लगी,कुछ माल बचा था जलने से ,

   वो भी उनके हाथ लगा,जो आग बुझाने आये थे |

जो थोड़ा -बहुत सामान बचा था ,उसे वे ही लूटकर ले गए ,जो अपने आपको कह रहे थे कि हम आग बुझाने आये हैं | इस प्रकार इंसानो के ऐसे कर्म बने हुए हैं |खुद तप-त्याग करके ,दूसरे को राहत तो क्या देनी है बल्कि दूसरे को पूरा-पूरा exploit (शोषण ) करना है | every situation,every person is exploiting.Man  has become so selfish.इस कदर इतना खुदगर्ज़ होकर रह गया है कि सिवाय अपने कुछ और नहीं सोचता |इस प्रकार के कर्म इंसान के बन गए हैं |

सज्जन-संतजन,गुरु-पीर -पैगम्बर-महात्मा क्या कहते हैं-वे कहते हैं-Things are to use& people are to love but what is man working ,He loving things & using people.

प्यार करना था इंसानो से और इस्तेमाल करनी थी वस्तुएं लेकिन वस्तुओं को प्यार करने लगा और इंसानो को इस्तेमाल |यह इंसान का कर्म बनकर रह गया है |पूरी की पूरी इसकी सोच,ख्याल  कैसी vipreet बनकर रह गयी है |इसकी चाल कैसी बनकर रह गयी है |जैसे कहा गया है- 

    न जाने आज के दरिंदे ,

कहाँ से ले आये चेहरा आदमी का |

देखने में तो इंसानो की शक्ल-ओ-सूरत है लेकिन जो उनके कर्म और फितरत है,वो इंसान वाली नहीं,दरिंदे वाली है |इंसानो की ऐसी गिरी हुई सोच देखकर बाबा जी याद आते हैं लेकिन पैगम्बरों को पुजारी बहुत मिलते हैं,अनुयाई नहीं मिलते और परमपावन गंगा मैली होती जाती है |यह विडंबना ही तो है कि स्वार्थ और लालच परोपकार को निगल जाता है |


अनुभूति से विचार बनते हैं और विचार ही विकास को जन्म देते हैं

-रामकुमार सेवक 

आज सन्त  निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में प्रातःकालीन सत्संग करने का अवसर मिला |  सतगुरु के आसन से विचार करते हुए महात्मा ने कई संस्मरण सुनाये |उन्होंने कहा सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के साथ नागपुर में था| रात को भोजन के बाद महाराज प्रायः घंटो सैर करते थे ,अक्सर भवन की छत पर,लेकिन  वहां भी अकेले नहीं होते थे लेकिन जैसे हज़ार काँटों के बीच भी गुलाब,गुलाब ही रहता है,इसी प्रकार ज्यादा या कम लोगों से घिरने के बावजूद सत्गुरु ,सत्गुरु ही होता है | 

रात के साढ़े बारह बजे तो मैंने महाराज को मैसेज लिखा-बचपन में स्कूल में पढ़ते थे-early to bed  & early  to rise ,makes a man  healthy , wealthy & wise .यह एक प्रकार का हास्य था जिसको  बाबा जी अवमानना नहीं मानते थे |

बाबा जी ने कहा -अच्छा ,आपका सोने का समय हो गया है-सो जाओ |

बाबा जी के यह कहने से मुझे पावन बाणी का यह भाव ध्यान में आ गया-पूरा संसार सोता है,तब भी सत्गुरु जागता है |  

उन्होंने बताया कि बाबा जी कहा करते थे कि गुलाब के पौधे में गुलाब तो एक-दो ही होते हैं लेकिन कांटे ज्यादा होते हैं |काँटों की संख्या ज्यादा होने के बावजूद उसे काँटों का पौधा नहीं कहते,गुलाब का पौधा ही कहते हैं| क्यूंकि गुलाब हमें खुश्बू देते हैं,इसी प्रकार हमें   हर इंसान में से गुण चुनने चाहिए |गुलाब के पौधे की पहचान काँटों से नहीं गुलाब से है इसी प्रकार मनुष्य की  पहचान गुणों से है |

महात्मा ने रामकृष्ण परमहंस जी के जीवन का प्रसंग सुनाते हुए कहा कि वे फूल मूर्ति पर चढाने से पहले खुद सूंघते थे |  भोजन का भोग देवता पर चढाने से पहले स्वयं उसे चख लेते थे |

परंपरागत भक्त इसे ख़राब मानते थे और रामकृष्ण परमहंस को पागल |  मंदिर के प्रबंधकों ने रामकृष्ण से कारण पूछा तो उन्होंने कहा -मेरी माँ खाना बनाने पर पहले खुद जांच करती थी तब मुझे खाना देती थी |मैं भी पहले जांच लेता हूँ कि भोजन प्रभु के खाने के लायक बना है या नहीं ?

इसे कहते हैं-महसूसियत या अनुभूति |

अनुभूति विचारों को जन्म देती है और उससे ही विकास होता है,भक्ति का भी |


अन्यथा वह सब नहीं होता ,जो आजकल आम है 

रामकुमार सेवक  

हम हजारों बार यह बात कह चुके हैं कि जैसे हमारा होना काल्पनिक नहीं है इसी प्रकार परमात्मा भी कल्पना नहीं है,हकीकत है |चंडीगढ़ से एक महात्मा बात कर रहे थे कि परमात्मा त्रिकाल सत्य है इस सत्य का आधार क्या है ?

उन्होंने एक रोचक प्रसंग सुनाया |वे बोले कि एक माँ ने अपने बच्चे के लिए सेब मेज पर रख दिए साथ ही यह परचा भी लिखकर लगा दिया कि एक ही सेब लेना,परमात्मा  देख रहा है |

दूसरी मेज पर मिठाई रख दी ,साथ ही वहां भी लिख दिया कि एक ही पीस लेना ,भगवान देख रहे हैं |बच्चे ने कई पीस उठा लिये और वहां लिख दिया कि भगवान अभी सेब की तरफ देख रहे हैं इसलिए मिठाई की कोई चिंता नहीं चाहे जितनी उठा लो |

बाबा हरदेव सिंह जी ने जब यह प्रसंग सुनाया तो हम खुलकर हँसे |हम बाबा जी की बात पर नहीं बच्चे की नादानी पर हँसे लेकिन हम स्वयं ये नादानियाँ अक्सर ही करते हैं |जब कोई अधिकारी सत्संग में हों तो हम कोशिश करते हैं कि हमसे कोई ऐसा काम न हो,जिसका उनके ऊपर नकारात्मक प्रभाव पड़े |उनके सामने यदि हमारे पास कोई आये तो हम बहुत तमीज से बात करते हैं अन्यथा अधिकारी सामने न हो तो हम उसे डाँट भी सकते हैं |

बाबा अवतार सिंह जी के ज़माने के बारे में सुना है कि तब रसीद बुक होती ही न थी और सब हिसाब-किताब बिलकुल सही आता था |सन्त जुगल किशोर जी,जिन्हें सम्मान से सब कबीर जी कहते थे सन्त निरंकारी मंडल के कोषाध्यक्ष थे |  वे बाबा जी के विश्वस्त थे और और उनके ज़माने में निरंकार की अनुभूति इतनी गहरी होती थी कि नैतिकता स्वतः ही प्रबल थी और ऑडिट की ज़रुरत नहीं पड़ती थी |मूल कारण यह था कि उस समय के प्रबंधक भी सन्त थे |

वे निरंकार को अपने अंग- संग मानते और महसूस करते थे |वह अनहद नाद का ज़माना था |सब कुछ ओरिजनल था ,डुप्लीकेट का ज़माना नहीं था |

धीरे -धीरे समय बदला और काम बढ़ गया लेकिन नादानियाँ भी बढ़ गयीं |डॉक्टर बढे तो रोग भी बढे इसलिए मुझे लगा कि बाबा हरदेव सिंह जी ने उपर्युक्त प्रसंग हमें हंसाने के लिए नहीं सुनाया बल्कि दर्पण दिखाया कि हम अपना चेहरा देख सकें कि हम नादान हैं या समझदार हैं |लग तो यह रहा है कि हम उस बच्चे से ज्यादा समझदार नहीं है अन्यथा वह सब नहीं होता जो आजकल आम है | 

कुछ काम ऐसे होते हैं जिन्हें हम अपने नौकर या सहायक के भरोसे नहीं छोड़ सकते |निरंकार की अनुभूति भी इसी प्रकार के कामो में से एक है |             


तुम्हारे हाथ में निवाला सिर्फ इसलिए है ,

विचारों के दर्पण में -बुजुर्ग - हमारी प्रेरणा ,हमारी विरासत 

रामकुमार सेवक

बाबा हरदेव सिंह जी प्रायः कहा करते थे-

जिस बूढ़ी माँ को तुमने घर से निकाला है,

उसी की दुआओं का असर है कि तुम्हारे हाथ में निवाला है |

बुजुर्गों को समझना हो तो हमें एक पेड़ को समझना होगा |एक पेड़ जो हमें हरियाली प्रदान करता है |हमें  धूप से ही नहीं बचाता बल्कि ठंडी छाँव और हवा भी प्रदान करता है |पेड़ ही है जो पर्यावरण का संतुलन करता है ,अंत तक वह हमें कुछ न कुछ प्रदान करता रहता है |इसी प्रकार बुजुर्ग भी हमें निरंतर अपना मार्गदर्शन प्रदान करते हैं |

अपने अनुभवों द्वारा हमें अनेक कठिनाइयों से बचा लेते हैं |इस सब के बावजूद हम प्रायः बुजुर्गों की अवहेलना किया करते हैं |

हमारे साहित्यिक मार्गदर्शक ,महान विद्वान  जे. आर. डी. सत्यार्थी जी अपनी  अवहेलना  की पीड़ा  को  प्रकट  करते  हुए  अक्सर  कहा  करते  थे -हमको   तो  अब चले  हुए  कारतूस मान लिया गया है | 

यह अवहेलना का रिवाज़ भी पुराना है लेकिन आदरणीय वासुदेव राय जी कहा करते थे कि हम बुजुर्गों को युवा होने का पूरा अनुभव होता है जबकि युवकों को बुजुर्ग होने का कोई अनुभव नहीं होता |

पिछले सप्ताह सत्संग में यह पुरानी कहानी भी सुनने को मिली |घटनाक्रम यूँ है कि किसी गांव से बारात दूसरे गांव में जानी थी |वधु पक्ष ने एक अजीब शर्त रख दी -उन्होंने कहा कि बारात में कोई बुजुर्ग नहीं होना चाहिए |

जवान पहले ही बुजुर्गों की टोका-टाकी से परेशान थे इसलिए वे बुजुर्गों को साथ नहीं ले जाना चाहते थे |उन्होंने तुरंत बात मान ली लेकिन बुजुर्ग समझ गए कि दाल में कुछ न कुछ काला जरूर है | लड़के के नाना जी ने आग्रह किया कि मैं बारात में जरूर जाऊंगा |नाना जी की बात माननी जरूरी थी इसलिए  चोरी - छिपे नाना जी को बारात में ले जाया गया |

वहां वधु पक्ष वालों ने एक नयी शर्त रख दी |गांव के पास एक नदी बहती थी |वधु पक्ष वालों ने कहा कि इस नदी में पानी की जगह दूध भर दो तब लड़की को विदा करेंगे |

यह बड़ी समस्या थी क्यूंकि समय कम था और नदी तो नदी ही थी ,किसी को कुछ सूझ नहीं रहा था |

किसी ने कहा-नाना जी  से पूछो - नाना जी  ने कहा-गांव वालों से कहो कि पहले नदी का पानी खाली करो तब हम दूध भर सकेंगे |

यह तर्क बिलकुल नया था |

वधु पक्ष वालों ने कहा-बारात में जरूर कोई बुजुर्ग है लेकिन लड़की उनको विदा करनी पडी क्यूंकि नदी को खाली वे नहीं कर सकते थे |     

जन-जीवन में हम देखते हैं कि परिवारों में प्रायः बुजुर्गों की उपेक्षा की जाती है क्यूंकि उनकी क्षमता अब पहले जैसी नहीं रही होती |इस सोच के साथ हम यह भूल जाते हैं कि जो आज बुजुर्ग और शरीर से कमजोर हैं ,कल वही मजबूत और युवा थे |उस समय उन्होंने जो उपलब्धियां हासिल की ,उन पर आज हम गर्व करते हैं और उनके कारण हमें सम्मान भी प्राप्त होता है | 

जिन उपलब्धियों के निशान हम अपने आस-पास देखते हैं ,उन्हें संरक्षण देने के लिए सरकार और प्रशासन अनेक उपाय करते हैं लेकिन परिवारों में बुजुर्गों को प्रायः बोझ समझा जाता है और बोझ समझने के कारण उनका अपमान अब आम हो चुका है |अपनी प्राथमिक ज़रूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें फिर न्यायालयों का सहारा लेना पड़ता है |

कानून प्रायः उनका दर्द समझता  है |इससे प्रमाणित होता है कि सरकार और प्रशासन तो बुजुर्गों को एक महत्वपूर्ण विरासत समझते हैं और उनका यथासंभव संरक्षण करते हैं लेकिन समाज बुजुर्गों का संरक्षण नहीं करता |

वे बुजुर्ग जो बड़े-छोटे पदों से सेवानिवृत हुए हैं,वे तो अपने हितों का संरक्षण करने के लिए संस्थाएं बना लेते  हैं लेकिन अशिक्षित अथवा अल्पशिक्षित बुजुर्ग अपने हितों की रक्षा नहीं कर पाते और कदम-कदम पर अपमान सहते हैं |

हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि जो आज बुजुर्ग हैं कल ये ही मजबूत युवा थे |आज जैसे ये कमजोर हैं हो सकता है कल हम स्वयं ऐसी हालत में हों |

 यह सोच हमें प्रेरित करेगी कि उनके साथ दुर्वव्हार नहीं किया जाए क्योंकि जैसा व्यव्हार हम दूसरों के साथ करते हैं वह बीज बन जाता है और अंततः हमारे सामने पेड़ बनकर आता है इसीलिए चेतनापूर्ण आचरण जरुरी है|         

जीवन में जो कुछ हम पुराना प्राप्त करते हैं वह हमारी विरासत होती है |उस विरासत को संभालना होता है क्यूंकि उसे अब बना पाना संभव नहीं है |इसी प्रकार जिन्होंने हमें जीवन दिया,पढ़ाया -लिखाया,भोजन और पालन-पोषण के अन्य साधन उपलब्ध करवाए ताकि हम समाज में एक उल्लेखनीय स्थान हासिल कर सकें तो इतनी देन देने वाले उन बुजुर्गों की संभाल करना भी तो जरूरी है |   


बाबा जी बुदबुदाए -अरे,ये तो अब भी शरीरों में ही उलझे हैं 

रामकुमार सेवक  

एक बार की बात है ,बाबा हरदेव सिंह जी निरंकारी मिशन के उन अनुयाइयों के बीच थे ,जो भारत से बाहर रहते हैं |बाबा जी जब भारत से बाहर जाते थे ,कोशिश करते कि सबके सुख -दुःख सुने जाएँ लेकिन बात करने वाले सैकड़ों में होते और सुनने वाले अकेले बाबा जी |

बातचीत में भी कोई आध्यात्मिक विषय नहीं उठाये जाते बल्कि वही भौतिक बातें |

बाबा जी की दिलचस्पी अध्यात्म और भक्ति में थी जबकि लोगों की रूचि अपनी भौतिक समस्याएं हल करने में थी |

ऐसी बातों का गुरु से सम्बन्ध होता ही नहीं जबकि आम इंसान गुरु के बारे में यही सोचता है कि वे सिर पर हाथ रख देंगे और सब कुछ ठीक हो जाएगा |बाबा हरदेव सिंह जी का स्वभाव चूंकि दयामय था और अपनी अरुचि वे कभी भी प्रकट नहीं करते थे |

किसी को भी आहत करना उनके स्वभाव में नहीं था |बाबा जी का आध्यात्मिक तेज और विनम्रता हर किसी को अपनी ओर खींचती थी लेकिन किसी भी शरीर की सीमा होती है और उस सीमा का अतिक्रमण किसी को भी कष्ट पहुंचाता है |

लोग उन्हें चमत्कारिक पुरुष मानते थे लेकिन बाबा जी  किसी को भी भरम में रखना नहीं चाहते थे बल्कि स्पष्ट कहते थे कि निरंकार सर्वत्र समायी हुई चेतन सत्ता है |इसको सामने देखकर हर कर्म करो |

निरंकारी मिशन की प्रतिनिधि पुस्तक सम्पूर्ण अवतार बाणी में कहा गया है-

रब नू हाज़र- नाज़र तकना,इस तों वड्डा धर्म नहीं

अर्थात परमात्मा को सर्वत्र देखने से बड़ा कोई धर्म नहीं है लेकिन इंसान की कमजोरी है कि वह सीधा रास्ता अपनाने की बजाय शार्टकट का सहारा लेता है |वह येन केन प्रकारेण अपना उल्लू सीधा करना चाहता है जबकि बाबा जी सदैव सीधा रास्ता अपनाने के पक्षधर थे |

कोई सज्जन जो इस यात्रा में बाबा जी के सहायक की भूमिका में थे ,ने दिल्ली में बताया कि इस प्रकार का वातावरण था और बाबा जी ने एक और मुँह करके धीरे से कहा-ये तो अब भी शरीरों के इर्द-गिर्द ही घूम रहे हैं |

वे सज्जन दिल्ली में बता रहे थे कि बाबा जी अपने प्रवचनो में कई आध्यात्मिक रहस्य खोलते थे और सत्कर्मो पर जोर देते थे जबकि हम लोग भौतिक ज़रूरतों के इर्द-गिर्द ही अपना जीवन व्यतीत करते हैं |

समय आया और बाबा जी ने अपना शरीर त्याग दिया |अब कान उनके महान वचन सुनने को तरसते हैं इसलिए जो कुछ हम सुन चुके हैं उन्हें व्यवहार में लाने का प्रयत्न करना चाहिए | धन निरंकार जी-

              


वो जो सतगुरु के दिल के सबसे ज्यादा करीब है 

रामकुमार सेवक 

 

अध्यात्म में क्षमा का अपना महत्व है |किसने किसको कितने बड़े अपराध के लिए क्षमा किया ,यह एक लम्बा इतिहास है |

जिन्होंने बड़े -बड़ों को क्षमा किया उन्होंने ही बहुतों को क्षमा नहीं भी किया | उन्हें दंड दिया,यह भी एक लम्बा इतिहास है |

इसका अर्थ है कि जो व्यक्ति क्षमाशील है वह ज़रुरत पड़ने पर दंड भी दे सकता है |स्पष्ट है कि क्षमा अनंत नहीं है |

 पिछले दिनों दिल्ली में बहन मोहिनी आहूजा जी (हैदराबाद )ने जो विचार किये,उनमें से दो मुद्दे तो लिखे जा चुके हैं ,तीसरा एक प्रश्न था जो उन्होंने बाबा अवतार सिंह जी के हवाले से उठाया था |

 उन्होंने कहा कि किसी भक्त ने बाबा जी से पूछा कि वे कैसे सन्त होते हैं जो आपके अर्थात सतगुरु के दिल के  करीब होते हैं ? 

बाबा जी ने कहा-जो क्षमाशील होते हैं |इसके साथ ही बाबा जी ने एक बात और जोड़ी जो मेरे लिए बहुत सारे आयाम खोल गयी |

आइये क्षमाशीलता पर विचार करें-हमारे सुमिरन में अंतिम पंक्ति है-मैनु बख्श लो अर्थात मुझे बख्श लो | यह पंक्ति सुमिरन की अविभाज्य अंग है और मुझे लगता है कि यह पंक्ति जाने-अनजाने में हुई गलतियों के लिए हम लोगों को बचा लेती है |

जहाँ तक मुझे स्मरण है, अपने सेवाकाल में किसी वर्ष में सन्त निरंकारी के अगस्त अंक को हमने क्षमा विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया था अथवा यह सोविनियर रहा होगा लेकिन उसमें जो सम्पादकीय लिखा था ,उसमें अंत में पाठकों के सामने एक प्रश्न किया गया था कि-किसी इंसान को कितनी बार क्षमा किया जाए ?उसका उत्तर था -जितनी बार स्वयं के लिए क्षमा चाहें |

हमारे सुमिरन (धुनि )में हम हमेशा गाते हैं-

मैं हाँ सदा भुल्लनहार ,तू है दाता बख़शणहार ,मेरे अवगुण न चितार |

इसे गाना हमारा रोजाना का क्रम है लेकिन न गलती स्थाई है न क्षमा स्थाई है इसलिए बाबा हरदेव सिंह जी ने एक वार्षिक समागम की जनरल बॉडी मीटिंग में कहा था कि-गलती करने वाले अगर नहीं रुके तो माफ़ करने वाले को रुकना होगा |

बाबा अवतार सिंह जी ने सबसे प्रिय शिष्य के बारे में यही कहा था कि समर्थ होने के बावजूद जो किसी की गलती क्षमा कर दे |

सतगुरु सदैव समर्थ हुआ करता है |शिष्यों में भी हो सकता है एक-आध समर्थ हों लेकिन जिसे वो दोषी समझते हैं ,उसे दण्डित करने की बजाय क्षमा कर दें यह असामान्य बात है |

इस सम्बन्ध में मुझे राष्ट्रकवि रामधारी सिंह जी दिनकर .की ये पंक्तियाँ याद आ रही हैं -

      क्षमा शोभती उस भुजंग को जिसके पास गरल हो 

      उसको क्या जो दंतहीन विषरहित, विनीत, सरल हो.

दिनकर कहते हैं कमजोर की क्षमाशीलता महत्वहीन है क्यूंकि जिसमें प्रतिरोध की ताक़त ही न हो, वो तो असमर्थ है,उसके पास क्षमा करने के अलावा अन्य कोई उपाय ही नहीं है इसलिए उन्हें वे क्षमाशील स्वीकार नहीं करते |

  इसके विपरीत जो समर्थ हैं,वे किसी का दोष  क्षमा कर दें ,यह महत्वपूर्ण हैं |

अपने उत्तर में बाबा अवतार सिंह जी ने अपने सबसे प्रिय शिष्य के बारे में कहा-ऐसे सन्त ,जो समर्ध होते हुए भी किसी को माफ़ कर दें ,सतगुरु के दिल के करीब होते हैं |

जो बार-बार  एक ही गलती करे और गुर्राए भी उसे उद्दंड कहते हैं |कोई उद्दंड कभी भी क्षमा का पात्र नहीं होता |  धन निरंकार जी     


ब्रह्मज्ञान तो निश्चय ही कृपासाध्य है लेकिन----

रामकुमार सेवक 

 

भोपाल से एक महात्मा ने फोन पर सहज अवस्था पर चर्चा की जिज्ञासा की |उन्होंने कहा कि-सुख-दुःख में एकसमान रहना ही क्या सहजता है ?

मुझे लगा कि जो सुख को महसूस कर चुका हो ,वो सदैव सुखी रहना चाहता है |जिसने दुःख को एक बार भी महसूस किया है ,वह कभी नहीं चाहेगा कि उसके जीवन में दुःख आये |दूसरी तरफ एक बच्चा है जो माँ की गोद में है |माँ के साथ यदि कुछ संकट हो तो भी वो बच्चा बिलकुल सहज रहेगा लेकिन यह सहजता हमारे काम नहीं आ सकती क्यूंकि वह नादानी के कारण है और हम उस उम्र को बरसों पहले पार कर चुके हैं |

हम लोग जो अनेकों विवाह समारोहों और जन्मदिवस के कार्यक्रमों में जा चुके हैं  और उनका आयोजन भी कर चुके हैं दोबारा बचपन में नहीं लौट सकते चूंकि गंगाजल ,गंगोत्री से नीचे गिर गया,वो आगे जाएगा ,पीछे लौटना उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं है |

सहज है निरंकार ,इसके साथ जितनी-जितनी घनिष्ठता बढ़ेगी उतनी-उतनी हमारे जीवन में सहजता आती जायेगी |प्रश्न यह है कि निरंकार के साथ घनिष्ठता कैसे स्थापित हो ?

प्रायः हम लोग निरंकार को अपने दोस्त,साथी और पिता के रूप में महसूस करते हैं |निरंकार से जब प्रार्थना करते हैं तब भी सोचते हैं कि-

यह हमें पिता की तरह छत्रछाया दे 

साथी की तरह मेरा साथ दे 

भाई की तरह मेरी जिम्मेदारियों में हिस्सेदारी करे 

ये तीनो ही सम्बन्ध अन्य (Other) वाले हैं |इनमें निरंकार का स्थान अन्य का है |पिता कभी छाया देगा लेकिन रोगी और वृद्धावस्था में छत्रछाया नहीं दे पायेगा चूंकि वह आत्मनिर्भर नहीं रहा |

साथी पर पिता जितना यकीन प्रायः नहीं किया जाता |

भाई का साथ भी इतना मजबूत नहीं होता इसीलिए निरंकार को परमात्मा के ही रूप में देखना चाहिए|शायद इसीलिए बाबा हरदेव सिंह जी ने अनन्य भक्ति की बात कही थी |

अनन्य भक्ति है निरंकार को इतनी गहराई से महसूस करना .जितना हम भूख-प्यास को महसूस करते हैं |जैसे प्यास लगने पर पानी हमसे अभिन्न हो जाता है इसी प्रकार मुझे अपनी हड्डी,रक्त,लिवर ,गुर्दे आदि में तो निरंकार की महसूसियत हो ही, आमने- सामने भी इसके होने का गहरा एहसास हो |

इस अवस्था के लिए प्रयास भी चाहिए और अभ्यास भी |  तब सदा के लिए इस एकत्व का एहसास हो पायेगा और सहजता के लिए कोई अतिरिक्त प्रयास नहीं पड़ेगा |

 ब्रह्मज्ञान तो निश्चय ही कृपासाध्य है लेकिन एकत्व के लिए तो प्रयास भी चाहिए और अभ्यास भी - धन निरंकार जी -     


लेकिन माँ ने अंतिम फैसला दिया कि तुम्हें वहीं रहना है |

रामकुमार सेवक  

 

कल महात्मा विजय चौक पर कुछ प्रसंग सुना रहे थे,जो मुझे बहुत अच्छे लगे |उन्होंने कहा-एक विवाहित बेटी ने अपनी माँ को फोन किया कि माँ ,मैं घर आ रही हूँ|यहाँ अब और रहना संभव नहीं है |माँ ने कहा-नहीं तुम मत आओ ,वहीं रहो |बेटी ने अपनी समस्याएं बताईं लेकिन माँ नहीं पिघली |

बेटी हैरान थी कि-माँ इतनी कठोर क्यों हो गयीं ?

माँ बोली -तुम्हारी बड़ी बहन भी कुछ साल इसी प्रकार लड़-झगड़कर चली आयी थी  और अब तक यहीं है |वह हम पर बहुत बड़ी जिम्मेदारी है और ऐसी जिम्मेदारी एक बड़े बोझ से कम नहीं होती |जिस माता-पिता ने बहुत मेहनत से ,अपना पेट काटकर तुम्हें बड़ा किया ,विवाह किया और इज्जत से ससुराल भेजा ,क्या वह बोझ दोबारा बढ़ाना सही है ?

बेटी ने फिर तर्क दिए लेकिन माँ ने अंतिम फैसला दिया कि तुम्हें वहीं रहना है |

अब बेटी को खुद अपनी समस्या का उपाय करना था |  

जब सरलता से किसी समस्या का समाधान न हो तो इंसान को अपनी शक्ति को ढूंढने,पहचानने और यह आकलन करने का मौका मिलता है कि वह खुद अपनी समस्या को हल करने का कितना उपाय कर सकता है |

उसने आत्मविश्लेषण करके विवाद के बिंदुओं पर विचार किया |कुछ मुद्दों पर पति गलत थे लेकिन कुछ बिंदुओं पर वह स्वयं भी गलत थी |साथ ही उसे यह भी एहसास हुआ कि इन विवादों का समाधान बहुत कठिन नहीं है |

उसने अपनी तरफ से पहल की |घर को सुव्यवस्थित करने का काम किया और रात के भोजन को नए तरीके से तय किया |

पति शाम को घर में आये तो काफी कुछ बदला हुआ पाया |भोजन भी उसकी रूचि का  था तो पति का आधा क्रोध तो बिना किसी खास कोशिश के ही शांत हो गया |

पति ने सोचा कि यह खाना बहुत बढ़िया बनाती है और आज तो घर भी बहुत अच्छा लग रहा है,शेविंग का पूरा सामान सही जगह तरतीब से रखा है |उसका शेष  क्रोध भी शांत हो गया-सबसे बड़ी बात तो यह हुई कि दोष देखने वाली दृष्टि ,गुण ढूंढ़ने और  ग्रहण करने वाली दृष्टि हो गयी |

मुझे निदा फ़ाज़ली साहब का यह शेअर याद आ रहा है-

अपना ग़म लेके कहीं ओर न जाया जाए 

घर में बिखरी हुई चीजों को संवारा जाए |

इस शेअर के महत्व को वही महसूस कर सकता है जो भीतरी व् बाहरी तौर से बिखराव को महसूस कर चुका हो |महात्मा कहते हैं कि -जो स्वयं अपनी सहायता करने को तत्पर है ,ईश्वर सिर्फ उसी की मदद करता है |घर में शांति रखने का अचूक हथियार तो यह है कि वाणी को कुछ मौन रखा जाए और आत्म विश्लेषण की आदत बना ली जाए तो जीवन संवर जाता है |

यह बात जितनी जल्दी समझ में आ जाए ,उतना ही बेहतर है |        


वे बोले -अरदास में यह भाव मत जोड़ना कि मैं स्वस्थ हो जाऊं |

रामकुमार सेवक 

आवारा मसीहा ,विष्णु प्रभाकर जी की एक प्रसिद्द किताब है |यह विख्यात बांग्ला उपन्यासकार श्री शरतचंद्र चट्टोपाध्याय के जीवन में लिखी गयी बताई जाती है लेकिन यह बहुत प्रसिद्द किताब है और विष्णु प्रभाकर जी की बहुत सारी कहानियां मैं पढ़ चुका हूँ लेकिन इस किताब को अभी तक  नहीं पढ़ पाया हूँ |

वास्तव में आज मुझे मान सिंह जी मान की बहुत याद आ रही है |उनके बारे में जब लिखने का ध्यान बना तो मन -बुद्धि में शब्द आया-आवारा मसीहा 

प्रकाशन विभाग में जब मेरी सेवा थी तो उस दौरान कितने ही लोग आये और गए |प्रतिभासम्पन्न चित्रकार दीपक बग्गा जी भी उन दिनों आते थे और सन्त निरंकारी प्रकाशन विभाग से छपने वाली पुस्तकों के मुखपृष्ठ (Titles )अपने हाथों से बनाते थे |बग्गा जी को हम सब संपादक पसंद करते थे |मान सिंह जी मान उनकी प्रतिभा के क़ायल थे और उन्हें दिशानिर्देश भी देते थे |

जहाँ तक मुझे स्मरण है,प्रकाशन विभाग का दफ्तर उन दिनों बैंक वाली बिल्डिंग में ऊपर की मंजिल पर था |अब यह बिल्डिंग मौजूद नहीं है |  

उस दफ्तर में मान सिंह जी मान एक सीट पर बैठे कुछ लिख रहे थे और बग्गा जी उनसे कुछ दूर एक सीट पर बैठे थे |बग्गा जी के भीतर के कलाकार को कुछ सूझा और उन्होंने एक साधारण कागज़ पर आडी -टेढ़ी रेखाएं खींचनी शुरू कर दी |बाद में हमने जब उन रेखाओं को देखा तो पता चला कि मान सिंह जी मान की फोटो है |

विशेष बात यह है कि आदरणीय जे आर डी सत्यार्थी जी भी गाहे-बगाहे उस दफ्तर में आकर बैठते रहते थे |वे जब ऊपर आये तो बग्गा जी से बोले-यार दीपक जी,फोटो तो तुमने ठीक बनाया है लेकिन यह मान सिंह का नहीं हो सकता |

फोटो देखकर लगता है कि यह ऊंचे दर्जे के किसी दार्शनिक का फोटो है |मान सिंह में जो एक शरारती सा बच्चा है उसके लक्षण इस फोटो में कहीं नज़र नहीं आते |

यह सुनकर हम सब बहुत हँसे |हंसने वालों में उस्ताद मान सिंह जी मान भी शामिल थे |अब मुझे लगता है कि वे कितने ऊंचे दर्जे के लोग थे,जिनका सान्निध्य मुझे मिला और जिन्होंने मेरा निर्माण किया |

मान सिंह जी मान के लिए आवारा मसीहा का अलंकार इस प्रकार मुझे बिलकुल सही लगता है |बाबा हरदेव सिंह जी ने उन्हें अनेकों दायित्व और पद दिये लेकिन  किसी कुर्सी का इतना साहस नहीं हुआ कि उनके ऊपर बैठ जाए |उनकी आवारगी किसी कुर्सी में सीमित हो  ही नहीं सकती थी लेकिन मेरे जैसे कुछ लोग जिन्हें वे अपना बच्चा ,साथी या दोस्त समझते थे ,के लिए वे मसीहा थे |  

मान सिंह जी मान की आवारगी का अपना स्तर था |वे हमारे दोस्त भी थे क्यूंकि बराबरी के स्तर पर उतरकर  बहस करते थे ,अपनी महानता से दबाते नहीं थे |

उनके काम कुछ अजीब भी होते थे जैसे वे एक बार बीमार थे और सन्त निरंकारी मंडल के हस्पताल में भर्ती थे |

उन्हें याद करते हुए राकेश खेड़ा जी ने एक बार बताया कि जब वे बीमार थे तो हमारे तत्कालीन प्रमुख और लोकप्रिय कवि ओम प्रकाश ओमी जी उनकी मिजाज़पुर्सी के लिए गए |

ओमी जी ने उनके स्वास्थ्य लाभ की प्रार्थना की |मान जी ने प्रमुख महात्मा को नमस्कार की | 

ओमी जी ने बताया कि उनके स्वास्थ्य लाभ के लिए संगत में अरदास करेंगे |

मान जी ने प्रमुख महात्मा से कहा कि अरदास करना तो ठीक है लेकिन यह भावना मत जोड़ना कि मैं स्वस्थ हो जाऊं |

यह कुछ अजीब बात थी क्यूंकि हम सब चाहते हैं कि निरंकार हमें स्वस्थ रखे |

ओमी जी ने पूछा कि अरदास में यह भाव क्यों न जोड़ा जाए कि जल्दी से जल्दी आप स्वस्थ हों ?

मान जी ने कहा-इससे निरंकार के विधान में बाधा उत्पन्न होगी |मेरा भाव यही है कि निरंकार के भाणे को स्वीकार किया जाए ,अपनी इच्छा को ऊपर रखने की बजाय |

इस विजन को जानकर हम सब मान  जी के प्रति नतमस्तक हुए बिना नहीं रह सके |

शायद इतनी ऊंची भावना ने ही अप्रत्यक्ष रूप से ,मुझे, उनके लिए आवारा मसीहा का सम्मानित शब्द प्रयुक्त करने को प्रेरित किया |         


या के  सागर -गुरुदेव हरदेव -एक संस्मरण 

रामकुमार सेवक 

 

मेरे पुराने मित्र गीतकार जगत जी एक बार बता रहे थे कि बाबा जी को नेपाल जाना था |

जगत जी शायद टीकापुर के रहने वाले  हैं और बाबा जी ने भी वहीं जाना था क्यूंकि टीकापुर नेपाल की संभवतः  सबसे बड़ी ब्रांच है या यह भी हो सकता है कि किसी प्रचार यात्रा के दौरान जगत जी ने ही बाबा जी से अपने गांव -घर में चरण डालने की प्रार्थना की हो | 

बहुत पुरानी बात है जब जगत जी ने इस प्रसंग का जिक्र किया था |

हुआ यह कि जगत जी के पास उतने पैसे तो थे नहीं लेकिन जोश ज़बरदस्त था |गीत लिखने और गाने में तो मास्टर है लेकिन पैसा कमाना एक अलग विधा है |

बाबा जी ने उसके गांव में जाना था तो खर्चा तो था |जगत भाई अपने मन से सेवा करनी चाहते थे तो कर्ज लेने की ज़रुरत थी |कर्जा देने वाला ऐसा इंसान चाहिए था , जो मदद भी कर दे ,वसूलने की जल्दी न करे और किसी से कहे भी नहीं |ऐसे लोग कम होते हैं जो पैसे वाले भी होते हैं और संवेदनशील भी |वे  क़र्ज़ लेने वाले की इज्जत को भी बचाने की कोशिश करते हैं |

गीतकारों की कुछ तय आमदनी भी तो नहीं होती ,कभी आ गए तो हजारों आ गए, और कभी-कभी  कुछ भी नहीं आता |

ऐसे आदमी को कर्ज देने वाले भी कम ही होते हैं | जगत भाई ने बहुत सोचा और फिर भूपेंद्र बेकल जी के पास चले गए |बेकल जी उन दिनों सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के निजी सचिव थे |

बेकल जी बहुत संतुलित महात्मा थे |जीवन जीने के उनके अपने नियम थे ,उन्हें क्रोध करते मैंने कभी नहीं देखा |यद्यपि वे पंजाबी परिवार में ही जन्मे थे लेकिन पंजाबी समुदाय में सीमित मानसिकता नहीं रखते थे अन्यथा निरंकारी मिशन में पंजाबी समुदाय के वर्चस्व से इंकार कर पाना संभव नहीं है |1986 से पहले मैंने कभी भी इस भावना को महसूस नहीं किया था ,बल्कि जो लोग ऐसा कहते थे मैं उन्हें दूसरे प्रण की महत्ता समझाने लगता था |बहुत बाद में मुझे महसूस हुआ कि यह एक कटु सत्य है | 

 स्वयं बाबा हरदेव सिंह जी ने एक से ज्यादा बार इस समुदाय को इस खतरे से प्रत्यक्ष रूप से आगाह किया था(एक बार तो वार्षिक समागम के प्रवचन में भी ) लेकिन जो स्थिति है उसे हर कोई जानता है l संतोष की बात यह है कि ज्यादातर लोगों पर सतगुरु की शिक्षाओं का असर है और वे अच्छे व्यक्ति है |

 बेकल साहब इसी प्रकार के अर्थात उदार मानसिकता के व्यक्ति थे |वे सबकी मदद करने को निःस्वार्थ भाव से तत्पर रहते थे |ऐसे स्वभाव वाले व्यक्तियों के पास बैठकर जाति-बिरादरी की संकीर्णता का एहसास होता ही नहीं |बेकल साहब इसी श्रेणी के महात्मा थे |

जगत भाई ने उनसे अपनी समस्या बताई और बेकल साहब ने उन्हें उनकी इच्छित धनराशि दे दी |

बाबा जी जगत जी के गांव में गए और सब कार्यक्रम अच्छी तरह संपन्न हो गए |जगत जी ने बताया कि कल्याण यात्रा से जब भी लौटता मैं आशीर्वाद स्वरुप प्राप्त धन बेकल साहब को जमा करवा देता था |

अंत में बेकल साहब ने वह धन बाबा जी के खाते में जमा कर दिया और जगत भाई को सच्चाई से अवगत करवाया कि बाबा जी ने बेकल साहब को कहा था कि जगत के गांव में जाना है ,उसे पैसे की ज़रुरत पड़ेगी ,यह धनराशि उसे दे देना |

जगत भाई यह देखकर कृतज्ञ भाव से भर गए कि बाबा जी ने किस प्रकार उनकी स्थिति को समझा और समस्या उत्पन्न होने से पहले ही उसका समाधान कर दिया था |गुरु का दिल ऐसा ही होता है |हमें

ऐसी शिक्षा मिली है कि गिरे हुए को उठाना चाहिए लेकिन गुरु गिरने ही नहीं देते इसीलिए परमेश्वर से भी ऊंचा दर्जा पाते हैं |बाबा हरदेव सिंह जी ऐसे ही गुरु थे |  


महात्मा की इस बात ने मुझे पुरानी याद दिला दी 

रामकुमार सेवक  

 

संत निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में आज(29 /96/2019 )को  सुबह की सत्संग में कुछ बहुत अच्छी बातें सुनने को मिली ,एक -आध तो पहली बार सुनने को मिली |

महात्मा ने कहा-बाबा काहन सिंह जी कहा करते थे कि जैसे सुई चुम्बक की तरफ खिंचती है उसी प्रकार आत्मा निरंकार की तरफ खिंचती है लेकिन सुई अगर पत्थर के नीचे दबी हो तो चुम्बक की तरफ नहीं बढ़ पाती ,सांसारिक आकर्षण पत्थर की भांति हैं जो आत्मा को परमात्मा की तरफ बढ़ने नहीं देते |

यह बात मैंने पहली बार सुनी |

समय की महत्ता बताते हुए महात्मा ने कहा कि अख़बार जब सुबह घर में आता है तो बहुत ध्यान से हम उसे पढ़ते हैं लेकिन शाम होते-होते वही अख़बार रद्दी कहलाता है |यह सुनकर मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गयी ,जिसमें पुराने और नए साल की तुलना करते हुए कहा गया था-

क्या कुछ झेला हमने यारो,क्या खोया था,क्या पाया था 

रद्दी का अख़बार बन गया,जो कि खुशफहमी लाया था |

आज नयी खुशफहमी पालें,इसमें कुछ भी कहाँ बुरा है | 

मीठी -कड़वी यादें देकर साल पुराना चला गया है,

नयी-नयी आशाएं लेकर ,आया देखो साल नया है --

स्पष्ट है कि समय बीतते ही नयी-नवेली चीजें भी रद्दी हो जाती हैं इसलिए समय की क़द्र करनी चाहिए |जीवन में ऐसा समय भी आता है तो जब यही शरीर निरंकार के ज्ञान को महसूस करने योग्य नहीं रहता, इसलिए समय रहते ब्रह्मज्ञान की प्राप्ति कर लेनी चाहिए |

एक बात यह भी सुनने को मिली कि ज़िन्दगी मौके बहुत देती है लेकिन यदि मौके को संभाला न जाए तो धोखे भी बहुत देती है |यह बात सुनकर मुझे अपना एक पुराना सम्पादकीय याद आ गया |जो कि,  सन्त निरंकारी (हिंदी )के जून 2002 अंक में प्रकाशित हुआ था ,उसका शीर्षक था -अवसरवादी बने |

यह एक क्रांतिकारी सम्पादकीय था क्यूंकि अवसरवादी बनने की हमेशा निंदा की जाती है |

मैंने लिखा था कि मानव जीवन स्वयं में एक अवसर है,मोक्षप्राप्ति का |इस अवसर को सम्भालिये -अवसरवादी बनिए |

आदरणीय मान सिंह जी मान उस समय पत्रिका विभाग के प्रभारी थे और उन्होंने मेरी कलम को पूरी आज़ादी दी |

मेरा कहना यह भी है कि अवसरवादी होना गलत इसलिए माना जाता है क्योंकि अक्सर इंसान  मौका निकलते ही उसे पहचानना बंद कर देता है जिसने मौके को सँभालने में उसकी मदद की |यह गलत आदत है| 

जिन्होंने हमारी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष सहायता की है हमें उनका कृतज्ञ होना ही चाहिए लेकिन यदि कोई व्यक्तिविशेष कृतज्ञ होने की बजाय अपने हितैषी को भूल जाता है तो यह उस व्यक्तिविशेष का दोष है |  इसके लिए हितैषी अथवा अवसर को दोष देना मूर्खता है |

यह तय है कि अवसर किसी की प्रतीक्षा नहीं करते ,हमने यदि उसका उपयोग नहीं किया तो कोई और करेगा |इसलिए मेरा आज भी यही कहना है-अवसरवादी बनो |यदि स्वभाव में कृतज्ञता भी हो तो सोने में सुहागा |महात्मा की इस बात ने मुझे पुरानी याद दिला दी -धन निरंकार जी          


लेकिन अरदास करने में मुझे क्यों संकोच हो ?   

रामकुमार सेवक 

 

उस दिन मजनू टीला क्षेत्र में संगत में जाना था |बस से मैं और मेरे पुराने साथी (हम दोनों )मॉल रोड के बस स्टैंड पर उतरे |

मजनू टीला एक झुग्गी -झोपड़ी जैसी कॉलोनी है |वहां रहने वाले अधिकांश धर्मप्रेमी सज्जन प्रायः आर्थिक रूप से कमजोर हैं इसलिए कोई प्रतिष्ठित प्रचारक वहां जाना पसंद नहीं करता |

वहां की छोटी-छोटी गलियां तंग तो मुझे भी करती हैं.गन्दगी भी दिखती है लेकिन बाबा हरदेव सिंह जी का जीवन मुझे प्रेरित करता है और अपनी असुविधा बहुत छोटी लगने लगती   है |

मैं प्रचारक के तौर पर अब तक भी स्वीकृत नहीं हूँ  इसके बावजूद काफी  सज्जन मुझे प्रेम करते हैं और आमंत्रित कर लेते हैं |

मालिक की कृपा है कि इस सम्बन्ध में मेरी कोई लालसा नहीं है |मेरा पहला प्रेम लेखन है |मैं अपने आपको प्रतिष्ठित नहीं मानता इसलिए यदि कोई भी प्रेम से बुलाये और संगत मंडल की मर्यादा के अंतर्गत हो रही  हो तो मैं वहां ख़ुशी -ख़ुशी चला जाता हूँ,सरल-सहज भाव से |

उस दिन मॉल रोड से आगे मजनू टीला जाना था |मेरे साथी ने कहा- रिक्शा ले लेते हैं |

रिक्शे वाले भाई को देखकर ऐसा लगता था कि शायद उसे भरपेट खाने को न मिलता होगा |

मन उस रिक्शे में बैठने को मानता न था क्यूंकि हम कुछ लेट भी थे इसलिए बैटरी रिक्शा ठीक रहता लेकिन ख्याल आया कि हो सकता है इसे पैसे की ज्यादा ज़रुरत हो |

न चाहते हुए भी हम दोनों रिक्शे में बैठ गए |जो पैसे उसने मांगे वो हमने दे दिए लेकिन उसकी लाचारी देखकर हमने दस रूपये और  दे दिए लेकिन यह अपर्याप्त था |

हमने निरंकार से अरदास की कि मालिक कृपा करो , भरपेट खाना तो हर किसी को मिलना चाहिए |बिना भरपेट खाये रिक्शा कैसे चला पायेगा ?            ,

हम प्रायः मंगलाचरण  पढ़ते हैं,जिसकी अंतिम पंक्ति है-भला करो सबका प्रभु सबका हो कल्याण |सत्संग समाप्ति के बाद जो धुनि पढ़ते हैं,उसमें भी यह अरदास मौजूद है -सबका भला करो करतार |

सबका  भला  कोई  कैसे  करे जबकि हित आपस में टकराते हैं | चोर मोटे दांव की फ़िराक में है जबकि सामान्य मनुष्य अपने पैसे को सुरक्षित रखना चाहता है |आम नागरिक और चोर की मनोकामना एक साथ कैसे पूरी हो ?इस मोड़ पर मैं रुक जाता हूँ |मैं अक्सर सोचता हूँ कि क्या चोर का हित मोटा दांव लगने  से  है ?

मेरा विवेक कहता है कि चोर का भला मोटा दांव लगने में नहीं है बल्कि जिन परिस्थितियों में उसे चोरी शुरू करनी पडी ,उन परिस्थितियों में सार्थक परिवर्तन होने से है |यदि चोर को कोई इज्जत का पेशा मिल जाए तो हो सकता है वह चोरी करना छोड़ दे |

इस निरंकार के लिए कुछ भी परिवर्तन करना असंभव नहीं है इसलिए जो निरंकार का वास्तविक एहसास रखते हैं वे सदा बेहिचक सबके भले की कामना करते हैं |यह यथार्थ है कि सबके भले की कामना  करने में कोई कठिनाई या टकराव नहीं है | इस सच्चाई को महसूस करके हम किसी के भी हित की प्रार्थना निःसंकोच कर लेते हैं | 

निरंकारी मिशन का सामान्य अनुयाई बहुत गहरा श्रद्धालु है |निरंकार के एहसास के साथ वह बड़े से बड़ी कुर्बानी दे सकता है | कुर्बानी से मेरा अभिप्राय यह है कि मिशन के लिए वह निज सुखों को त्याग सकता है |  

किसी पशु की कुर्बानी देना किसी के लिए भी आसान है -कुछ खर्चा करके पशु खरीदा और उसे काट दिया ,यह कोई भी कर सकता है लेकिन अपने अहंकार की कुर्बानी वही दे सकता है जिसे निरंकार पर यथार्थ और अटल विश्वास हो |

आज पंद्रह मिनट पहले निरंकारी कोठी के सामने से गुजर रहा था |सड़क के दूसरी तरफ से एक सज्जन सामान लेकर जा रहे थे |वे जरा ठहरे और धन निरंकार की ,मैंने भी उसी भाव से प्रत्युत्तर   दे दिया लेकिन महात्मा तो मेरी  तरफ बढ़ने लगे |अब मैं भी रुका और उसी भाव से उनकी तरफ बढ़ा लेकिन सड़क पर वाहन आ जा रहे थे तो यह करना थोड़ा खतरनाक था |इसके बावजूद मैंने महसूस किया कि उनके पास श्रद्धा और विश्वास मुझसे ज्यादा था  |

उन्होंने सड़क पर भी सर टेककर धन निरंकार की |मैंने उन्हें ह्रदय से लगाया और अनूठा आनंद पाया |

स्पष्ट हो गया कि हम जब भक्ति की समान ऊँचाई पर स्थित होते हैं तब ऐसा अनिर्वचनीय आनंद उपलब्ध होता है ,जिसके लिए कोई शब्द नहीं बने |

मैं उन महात्मा के बारे में कुछ नहीं जानता,उनकी श्रद्धा ही उनका परिचय है,मालिक उन्हें  सदा सुखी रखे ,यही प्रार्थना है |        

यही प्रार्थना अपनी तरफ से सबके लिए करने का भाव ही मंगलाचरण और धुनि में है|निरंकार को बेहतर पता है कि यह कैसे संभव होगा लेकिन अरदास करने में मुझे क्यों संकोच हो ?  


सुमिरन का अर्थ है-अपने सिर की गठरी ----

रामकुमार सेवक

 

कबीरदास जी सुमिरन के बारे में कहा करते थे-

सुमिरन की सुधि यूँ करो ,ज्यों गागर पनिहारी 

हाले-डोले सुरत में ,कहे कबीर विचार |

बाबा हरदेव सिंह जी सुमिरन की तरफ प्रेरित करते हुए उन बहनो का उल्लेख करते थे जो कुए से पानी भरकर,भरे घड़े के साथ अपने घर तक लौटती हैं|बाबा जी कहते थे कि आपस में बातचीत करने के बावजूद उनका ध्यान अपने घड़ों में भरे पानी की तरफ लगा रहता है |

बाबा जी कहते थे कि सब कर्तव्य निभाते हुए भी सुमिरन करते रहना है |निरंकार की तरफ ध्यान जोड़े रखना है |

एक और उद्धरण बाबा जी दिया करते थे-

माला तो कर में फिरे,जीभ फिरे मुख माही 

मनवा तो दह दिस फिरे,यह तो सुमिरन नाही | 

इन पंक्तियों में रटन की स्थिति पर प्रकाश डाला गया है |कहते हैं कि-हाथ में तो माला के मनके घूम रहे हैं और मुख में जीभ भी घूम रही है लेकिन मन तो न जाने कहाँ -कहाँ घूम रहा है,यह सुमिरन नहीं है |

सुमिरन का शिखर तो यही है कि-शत प्रतिशत ध्यान प्रभु में हो लेकिन रटन भी बहुत होता है |देखा यह भी गया है कि प्रभु की दया इसे भी स्वीकार कर लेती है,यह मेरा अपना अनुभव है |

लगभग पंद्रह साल पुरानी बात है ,तब मुझे पत्रिका विभाग में संपादक के तौर पर सेवा मिली हुई थी |वार्षिक समागम के दिन थे -सन्त निरंकारी पत्रिका के साथ-साथ समागम स्मारिका निकालने की भी ड्यूटी थी ,साथ ही निरंकारी प्रदर्शनी में भी सेवा थी |

प्रदर्शनी का बहुत दबाव था लेकिन स्मारिका का कार्य उससे ज्यादा जरूरी था इसलिए ग्राउंड में पहुँच पाना संभव नहीं था लेकिन प्रदर्शनी के प्रबंधक अभी पहुँचने का दबाव बना रहे थे |स्मारिका का काम आगे बढाकर मुझे अपने सरकारी दफ्तर जाना था |

मेरा इरादा था कि  शाम को दफ्तर से लौटकर प्रदर्शनी का काम करूँ इसलिए मैं किंग्सवे कैंप में बस लेकर आगे दफ्तर जा रहा था |साथ ही मन ही मन सुमिरन भी कर रहा था कि प्रदर्शनी से आये फोन पर किसी से झड़प न हो जाए |

मैं सुमिरन तो कर रहा था लेकिन ध्यान प्रदर्शनी की तरफ लगा था कि उनके आशय को निभा पाना इस समय संभव नहीं है |

मन उलझन में था कि प्रदर्शनी से फोन आ गया -मेरे कुछ कहने से पहले ही उधर से आवाज़ आयी -सेवक जी,अभी हमारा काम हो गया है,परन्तु शाम को जरूर आ जाना |

मेरा सुमिरन उस समय शत-प्रतिशत अर्थात पूरा नहीं था लेकिन अभी जो राहत मिली ,वो पूर्ण थी |यही तो मैं चाहता था कि इस समय वहां न जाना पड़े ताकि दफ्तर का काम भी चलता रहे और सेवा भी | 

 

भक्ति में हरि सुमिरण सबसे ज्यादा महत्वपूर्ण है लेकिन सुमिरन में न मिलावट चलती है और न दिखावा बल्कि ह्रदय से उसका गहरा सम्बन्ध ही सुमिरन को सबसे ज्यादा प्रभावी बनाता है |

कल(23 /06 /2019 )को  दिल्ली के ग्राउंड न.8में सत्संग में सतगुरु के मंच से आये आशीर्वचनो में भी यह भाव सुनने को मिला |

महात्मा का दिल्ली में एक रेस्टॉरेंट है |उनकी पत्नी उन्हें बार-बार टोकती कि-सुमिरन करते हो या नहीं ?महात्मा कहते -आज फोन करके आप याद दिला देना ,सुमिरन  कर  लूँगा  |

उन्होंने बताया-उस दिन सुमिरन लगातार कर रहा था क्यूंकि सेल हो ही नहीं रही थी | थोड़ी देर बाद  पत्नी  का  फोन आया  -सुमिरन कर रहे हो या  नहीं ? 

मैंने कहा-सुमिरन तो कर रहा हूँ लेकिन सेल नहीं हो रही |एक बजे यानी लंच टाइम में भी खाली है |   

वे बोलीं-आप सुमिरन करो ,मैंने कहा-मैं तो सुमिरन के साथ कह रहा हूँ-बाबा जी,सेल करवाओ |

उन्होंने कहा-सेल और सुमिरन को एक साथ मत जोड़ो |सेल अगर नहीं हो रही है तो इसमें भी कुछ बेहतर ही होगा |

बात करते -करते ही मुझे रेस्टॉरेंट में कुछ लोग आते दिखाई दिए ,मैंने यह बात कही और फोन रख दिया |

थोड़ी देर में वे लोग मेरे पास आये और बोले हम आपके रेस्टॉरेंट पर रेड (छापा )डाल रहे हैं |आपके रेस्टॉरेंट पर जितनी सेल होती है ,आप हमें उससे कम शो करते हैं |

आज हम खुद आपकी सेल का ज़ायज़ा लेंगे ,अगर फ़र्क़ आटे में  नमक जैसा यानी कम रहा तो छोड़ देंगे और फर्क अगर ज्यादा निकला तो भारी जुरमाना करेंगे |

मैंने कहा-आप खुद ही देख लीजिये |

वो रात बारह बजे तक रेस्टॉरेंट में ही रहे |इस बीच कुछ ग्राहक आये भी लेकिन हम आपस में गुरु की और भक्ति की  चर्चा ही  करते रहे |

बाद में मुझे पता चला कि जब हम सुमिरन करते हैं तो हम खुद को निरंकार -सतगुरु के हवाले कर देते हैं ,और यह सत्ता हर हालत में हमारे हितों की रक्षा करती है |सुमिरन का अर्थ है-अपने सिर की गठरी मालिक के चरणों में रख देना |   


इस रिवाज को बदलने की ज़रुरत है |         

रामकुमार सेवक 

 

जब मैं मिशन से जुड़ा ,उस समय किसी को रोग आदि से बचाने के लिए विश्वासी महात्मा प्रायः कहते थे-सेवादल की वर्दी पहन लो अर्थात तन की सेवा करो |चरणामृत का सेवन करो |सरोवर पर नहा लो |दिल्ली जाकर बाबा जी के दर्शन कर आओ आदि |

उस समय से भी पहले ऐसे आदेशों का चलन बिलकुल आम था |आदरणीय निर्मल जोशी जी बताते थे कि उस समय जब हम निरंकारी कोठी में आते थे ,महात्मा ऐसे ख़ुशी से मिलते थे कि मनोबल बढ़ जाता था और समस्या जैसे खत्म लगती थी |

गुरमुखों में प्रेम भी था और आज के सन्दर्भ में देखें तो वे अधिकारी भी जैसे किसी और ही धातु के बने लगते थे | इस प्रकार सहज भाव से आये ऐसे वचनो में असर भी था |

प्रायः महात्मा माया की दृष्टि से तो गरीब होते थे लेकिन उनमें भक्ति पूरी होती थी और भक्ति की दृष्टि से काफी अमीर होते थे |

भक्ति की अमीरी के कारण उपर्युक्त सरल फॉर्मूलों से ही उनके सब रोग ठीक हो जाते थे |

तब समझ आता था कि- सरब रोग का औषध नाम -का क्या अर्थ है |

 अपने संपादन काल के बाद के दौर  में हमने देखा कि वार्षिक समागम की जो विनतियाँ छपने के लिए आती थीं ,उनमें लिखा होता था कि बुजुर्गों ,गर्भवती महिलाओं रोगियों आदि को समागम में न लाएं |

तब हमें समझ में आने लगा था कि नियमो का संबंध भक्ति से खत्म होना शुरू हो गया है |

बाद में बाबा हरदेव सिंह जी ने (2014  में तो स्पष्ट )कह भी दिया कि शहंशाह जी वाला मिशन चाहिए |इसका मतलब है कि हमारी समझ अथवा निष्कर्ष सिर्फ कल्पना नहीं थे |बाद में जो कुछ हुआ वो हम सब जानते ही हैं |

बाबा जी ने जनरल बॉडी की विशेष मीटिंग में( मेरा ख्याल है वो 2005 में हुई थी,जिसमें मुझे भी विशेष आमंत्रित के तौर पर भाग लेने का मौका मिला था) बाबा जी ने राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं के साथ जुड़े प्रबंधक महानुभावों को समझा भी दिया था कि वे यदि अपने आपको नहीं बदल सकते तो इस पावन मिशन को छोड़ दें | 

जहाँ तक बुजुर्गों ,गर्भवती बहनो और रोगियों को समागम में न आने के निवेदन का सम्बन्ध है ,हो सकता है प्रबंधक महानुभावों के इस बारे में जायज़ कारण हों  लेकिन मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि निरंकार अथवा (हरि) नाम को जब हम अपना आधार बना लेते हैं तो कोई भी रोग हमें हरा नहीं सकता |

साथ ही यह भी सत्य है कि हमारी आस्था के अनुसार ही प्रभु का नाम औषधि का रूप धारण करता है ,इसके बावजूद विश्वास यदि मजबूत हो तो निरंकार हमें खुद आने -जाने और बाकी तरह की भी ताक़तें  देता है |

मुझे बाबा गुरबचन सिंह जी का एक प्रसंग याद आ रहा है-नब्बे के दशक में शायद एडवोकेट एच एस पाल साहब ने बताया था ,या कोई और महात्मा रहे होंगे |

उन्होंने कहा कि बाबा गुरबचन सिंह जी के पास वर्कशॉप में कोई गुरसिख आया |उसके शरीर में कोई रोग था लेकिन उनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी |गुरु यह सब नहीं देखता ,वह तो गुरसिख का भाव देखता है |

बाबा जी का वचन आया-सेवा -सुमिरन -संगत करते रहो,चरणामृत लेते रहो-सच्चा बादशाह ठीक करेगा |   

थोड़ी देर में कोई और सज्जन भी आशीर्वाद लेने आ गए |वे गाड़ी में आये थे तो उनकी वाणी और हाव-भाव  में भी धन का प्रभाव था लेकिन रोग किसी का लिहाज नहीं करता |

उन्हें भी वही रोग था जो निर्धन गुरसिख को था |बाबा जी ने उन्हें देखकर कहा-दवाई खाने से पहले यदि टेस्ट करवा लिए जाएँ तो इलाज ठीक-हो जाता है |

उन्होंने भी सहज ही बाबा जी को नमस्कार की और चले गए |

वर्कशॉप में अनेकों सेवादार होते थे- जो बाबा जी के हेल्पर होते थे,उनमें से किसी ने पूछ लिया -बाबा जी ,आपने दोनों महात्माओं को एक जैसा आशीर्वाद क्यों नहीं दिया जबकि रोग तो उन्हें एक जैसा था |

बाबा जी ने कहा-दोनों को रोग तो एक जैसा था लेकिन दोनों का निरंकार पर विश्वास एक जैसा नहीं था |इलाज तो निरंकार ने ही करना होता है,जिसका जैसा विश्वास होता है,वैसा ही उसको लाभ होता है |

यह था निरंकारी मिशन |

आज तो स्थिति ऐसी बनी हुई है कि निरंकार के तत्व का इस्तेमाल प्रायः नहीं किया जाता और निरंकारी होने का दावा खूब किया जाता है, इस रिवाज को बदलने की ज़रुरत है |         


ऐसा था शहंशाह का युग ---

सत्संग में आने वाले सन्त किसी की हंसी नहीं उड़ाते बल्कि 

दुःख कटने की अरदास करते हैं|

रामकुमार सेवक

 

कोई समय था जब सिर्फ पदाधिकरियों को ही महत्व नहीं दिया जाता था बल्कि सत्संग में सामान्य रूप से आने वालों को भी महत्व दिया जाता था |युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी के बारे में सुनते हैं कि वे सत्संग में आने वाले महात्माओं की बहुत कदर करते थे |

आज एक महात्मा बता रहे थे कि बाबा अवतार सिंह जी कहते थे कि अगर कोई महात्मा सत्संग में नहीं आ पाए तो जब तक मैं उसके दर्शन न कर लूँ   तब तक मुझे ऐसा महसूस होता है जैसे किसी चरवाहे की भेड़ ग़ुम हो गयी हो |जब तक वह भेड़ मिल नहीं जाती वह उसे ढूंढ़ता रहता है |

 

ऐसे कितने ही प्रसंग हैं जब वो अपने शिष्य से मिलने उसके घर तक पहुँच गए |पिछले रविवार को ग्राउंड न.8 में साध संगत को सम्बोधित करते हुए बहन मोहिनी आहूजा जी ने भी एक ऐसा ही प्रसंग सुनाया ,उन्होंने कहा-एक महात्मा थे,जो रोजाना सत्संग में आते थे |एक दिन वो सत्संग में नहीं आये तो बाबा जी ने एक महात्मा की ड्यूटी लगाई कि उनके घर जाकर पता करो कि महात्मा सत्संग में क्यों नहीं आ रहे ?

महात्मा उन सज्जन के घर गए और उनसे सत्संग न आने का कारण पूछा |

वे बोले कि मैं बहुत गरीब हूँ |मेरे पास एक ही जोड़ी कपडे हैं,जिन्हें मैं पहनकर आता हूँ |उन्हें रोज धोता हूँ ताकि अगले दिन सत्संग में आ सकूं |अब मेरे कड़े फटने लगे हैं तो उन्हें पहनकर सत्संग आने में मुझे शर्म आती है |

महात्मा ने सज्जन की बात बाबा जी से बताई |

बाबा जी ने उन सज्जन से कहा कि -उनसे कहो कि कपडे जैसे भी हों,उन्हें पहनकर सत्संग में आ जाया करो |

सत्संग में जो आते हैं वे दयालु महात्मा होते हैं |वे आपकी हंसी नहीं उड़ाएंगे बल्कि आपके लिए मन ही मन अरदास करेंगे इसलिए संकोच न करें |सत्संग में आने से सन्त-महात्माओं की दृष्टि पड़ेगी और उनके सब दुःख ख़त्म कर देगी |

इस सन्देश के साथ बाबा जी ने महात्मा को दोबारा उनके घर भेजा | महात्मा ने बाबा जी का सन्देश उन्हें सुनाया तो उनमें दोबारा हौसले ने जन्म लिया |

उनका आत्मबल बढ़ा और वे दोबारा सत्संग में आये और फिर आते रहे |हम लोग जो सत्संग से जुड़े हुए हैं,हमें यह ध्यान रखना चाहिए कि हममें अरदास करने की भावना हो न कि किसी की कमी का मज़ाक उड़ाने की |

मालिक कृपा करे मन में भक्ति की सहजता बनी रहे-धन निरंकार जी-          


इसीलिए तो मैंने कहा कि वे मेरे गुरसिख नहीं हैं |

रामकुमार सेवक 

 

युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी की अपनी ऊंचाई थी |मुझे उनके कभी दर्शन नहीं हुए लेकिन उनके बारे में पढ़ा-सुना बहुत है |उनके विचार बहुत सहज -सरल और व्यावहारिक हुआ करते थे |

सम्पूर्ण अवतार बाणी में  धर्म जैसे गूढ़ विषय को परिभाषित करते हुए उन्होंने कहा-

रब नू हाज़र- नाज़र तकना,इस तो वड्डा धर्म नहीं |  

यह पंक्ति स्पष्ट कर देती है कि इसे लिखने वाला धर्म की असलियत जानता है इसलिए शब्दजाल बुनने की बजाय सीधे मुद्दे की बात कर रहा है |

जन्म से वे बिलकुल आम इंसान थे लेकिन सत्यनिष्ठ थे और मेहनती भी |ईमानदारी इतनी थी कि मुफ्त में कुछ लेना पसंद नहीं करते थे |

इस रविवार को सत्संग में प्रवचन करते हुए बहन मोहिनी आहूजा जी ने उनका यह प्रसंग सुनाया -

उन्होंने कहा कि एक बार एक सज्जन सत्संग में आये और ए.बी.ए. अवतार सिंह जी से शिकायती लहज़े में बोले कि बाहर आपके तीन-चार गुरसिख लड़ रहे हैं |

बाबा जी ने यह सब सुना और बोले-वह मेरा गुरसिख नहीं हो सकता जो लड़ाई-झगडे में विश्वास रखता हो |

उस सज्जन ने कहा-आप स्वयं चलकर देख लीजिये |मैं उन सबको कई बार यहाँ आते हुए अच्छी तरह देख चुका हूँ |

बाबा जी ने सब कुछ पूरे धैर्य से सुना और बोले -आपने कभी सुना है कि निरंकारी संगत से कभी झगडे-फसाद की बात कही गयी हो ?

उस सज्जन ने कहा-नहीं,आपकी संगत में तो निरंकार को जानकर इसकी भक्ति करने की बात कही जाती है |काम-क्रोध -लोभ -मोह -अहंकार पर तो अंकुश ही लगाया जाता है |आपसी प्रेम व् सत्कर्म पर ही जोर दिया जाता है इसके बावजूद ये लोग तो एक-दुसरे को बेहिचक गालियां दे रहे थे |

बाबा जी ने कहा-जो मेरी बात मानता है वह निरंकार की रज़ा को ही सर्वोपरि मानता है |

 जो कुछ उसे मिला उसे  निरंकार की कृपा मानता है और यदि कुछ चला गया तो उसे भी निरंकार की मर्जी मानता है ,इस अवस्था में लड़ाई-झगड़ा करने की गुंजाईश ही नहीं बचती |

लेकिन बाबा जी.वे तो झगड़ा कर ही रहे हैं--वे सज्जन बोले

बाबा जी ने कहा-इसीलिए तो मैंने कहा कि वे मेरे गुरसिख नहीं हैं |जो मेरे वचन नहीं मानते उन्हें अपना गुरसिख कैसे कहूँ ?

अब उस सज्जन को बोलने के लिए कुछ बचा नहीं था इसलिए बाबा जी को नमस्कार करके वे अपने रस्ते चले गए | 

(बाबा गुरबचन सिंह जी व् निरंकारी राजमाता जी की सुपुत्री बहन मोहिनी आहूजा,हैदराबाद, द्वारा 09-06 -2019  को दिल्ली में प्रकट किये गए विचारों पर आधारित )

             


ब्रह्मज्ञान पाकर भी यदि कोई इंसान जीवन में उसका व्यवहार न करे तो 

रामकुमार सेवक  

 

एक महात्मा ,जो कि ज्ञान प्रचारक भी थे,ज्ञान प्रदान करते हुए अनूठा ढंग अपना रहे थे -उन्होंने एकत्रित जिज्ञासुओं को पहला प्रण बताया कि तन-मन-धन निरंकार प्रभु अर्थात परमेश्वर की देंन है इसलिए इसका अहंकार नहीं करना |

इसके बाद उन्होंने शेष चार प्रण भी बताये |विशेष बात यह थी कि जैसे ही प्रण बताते एकत्रित लोगों से कहते कि जिसे प्रण स्वीकार न हो,वह उठकर चला जाए |

पता नहीं यह काम ठीक था या गलत लेकिन यह बात सुनकर एक झटका लगता था कि अगर यह बात नहीं मानी तो ब्रह्मज्ञान नहीं मिलेगा |अप्रत्यक्ष रूप से प्रण की महत्ता सिद्ध होती थी |

शुरू में ही जिसे प्रण की महत्ता पता चल गयी वह भविष्य में भी कभी प्रण को हलके में नहीं लेगा |

प्रण सुनकर लोग चले जाते रहे होंगे लेकिन सब नहीं गए |

जिन लोगों ने पांच प्रणो को स्वीकार कर लिया उन्हें महात्मा ने ब्रह्मज्ञान प्रदान कर दिया |उनमें से एक इंसान जिसने पांच प्रण भी स्वीकार किये और ब्रह्मज्ञान भी पाया ,उसने बहुत अजीब बात कही |

वह बोला-  पांच प्रण ठीक हैं ,दिया गया ब्रह्मज्ञान भी ठीक है लेकिन मैं इस को जीवन में अपनाऊंगा नहीं |

यह बहुत हैरतअंगेज बात थी इसलिए उन्होंने कहा-यह तो वैसी ही बात हुई जैसे कोई कहे कि मैंने टिकट बेशक अमृतसर का लिया है लेकिन मैं पानीपत में ही उतर जाऊंगा |

अब उस इंसान को झटका लगा कि अमृतसर की टिकट ले ली ,ज्यादा पैसा खर्च कर दिया और उतर पानीपत में ही गए,इसमें टिकट देने वाले का तो कोई नुक्सान नहीं |

इसी प्रकार ब्रह्मज्ञान पाकर भी यदि कोई इंसान जीवन में उसका व्यवहार न करे तो हानि उसकी स्वयं की है ,सतगुरु तो फिर भी अजीम ही बना रहेगा ,शिष्य चाहे अयोग्य ही क्यों न हो |

(निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में प्रातःकालीन सत्संग में सुना गया एक प्रवचन)      


यह कोई तुगलकी फरमान नहीं है कि गुरु अमर्यादित आचरण की छूट ले ले  

रामकुमार सेवक   

 

दिनांक-08 /06 /2019  को महात्मा ने विचार करते हुए कहा-गुरु कहे वो कार कमाओ ,गुरु की करनी काहे धाओ अर्थात गुरु जो करता है वो नहीं बल्कि गुरु जो कहता है,वो करना है |

यह बात पहले भी सुनी है और संयोग की बात है कि इसके समर्थन में घटनाक्रम भी वही सुनने को मिला कि बाबा गुरबचन सिंह जी किसी यात्रा में कार से कहीं जा रहे थे |  

चालाक की सेवा कर रहे महात्मा मान सिंह जी को पता था कि कुछ बिस्कुट हैं जिन्हें खाया जा सकता है लेकिन गुरमत की मर्यादा थी कि बाबा जी से अनुमति ली जाए |

यही किया गया-उन्होंने बाबा जी से अनुमति मांगी लेकिन अनुमति नहीं मिली |

थोड़ी देर बाद उन्हें लगा कि बाबा जी कुछ खा रहे हैं,ये वही बिस्कुट थे जिन्हें खाने की अनुमति मान सिंह जी को नहीं मिली थी |

स्वाभाविक है कि सूक्ष्म रोष स्वभाव में आ जाए कि हमें तो खाने नहीं दिया और खुद खा रहे हैं |

मान सिंह जी का और बाबा जी का कृष्ण -सुदामा  वाला प्रेम था,रोज का साथ था तो उन्होंने पूछ लिया- जब हमारे लिए अनुमति नहीं है तो आप क्यों खा रहे हैं ?

बाबा जी ने कहा कि -गुरु कहे वो कार कमाओ,गुरु की करनी काहे धाओ |

बाबा जी का वचन आ गया और बात ख़त्म हो गयी लेकिन जब तक रोष कायम है बात सुलगती ही रहेगी मेरा निजी अनुभव है |

मुझे लगता है कि बाबा जी ने बिस्कुट खाने की अनुमति नहीं दी तो उसके कुछ जायज़ कारण रहे होंगे |

हो सकता है बिस्कुट कम हों लेकिन सोचने की बात यह है कि कोई  माँ अपने बच्चे को खिलाने से पहले खुद कभी नहीं खाती -पहल बच्चे की होती है|माँ तो कई बार बिना खाये भी रह जाती है|

 गुरु तो सब शिष्यों का माता-पिता है ,निराकार रूप में पूरी सृष्टि का स्वामी है इसलिए किसी सामान्य माता-पिता से कम महत्व वाला नहीं हो सकता |उसका मन अथवा भाव किसी आम  माता-पिता से कम नहीं हो सकता |

इस प्रसंग में बाबा गुरबचन सिंह जी की ऊंचाई कुछ कम नज़र आती है इसलिए थोड़ा और गहरा उतरना चाहिए |

हो सकता है बिस्कुट मान सिंह जी के स्वस्थ्य की दृष्टि से मुफीद न हों और यह बात बाबा जी को ज्ञात हो इसीलिए गुरु का आदेश मानने का हुक्म देकर उनके स्वास्थ्य रक्षा की हो |

मेरे ख्याल से बाबा जी कुछ आगे जाकर सही प्रकार से सबके लिए भोजन का प्रबंध करने वाले होंगे और बिस्किटों की मात्रा अपर्याप्त होगी इसलिए उन्हें ख़त्म करना जरूरी था ताकि बाकी गुरसिखों में यह भाव न जन्म ले सके कि बाबा जी ने अपने दोस्त का पक्ष लिया है |

एक और तथ्य यह भी हो सकता है कि भूख सभी को लगी हो और उसकी तृप्ति का कोई प्रबंध न हो तो श्री कृष्ण की भांति उन बिस्किटों का भोग लगाकर सबकी क्षुधा शांत कर दी हो |

आप जो चाहे सोच सकते हैं लेकिन मेरा मन बाबा जी के प्रति प्रत्यक्ष-अप्रत्यक्ष सूक्ष्म रोष को इस प्रकार स्वीकार नहीं कर सकता |

गुरु कहे वो कार कमाओ,गुरु की करनी काहे धाओ कोई तुगलकी फरमान नहीं है कि कोई गुरु उसकी आड़ में मनमाना और अमर्यादित आचरण करे | 

सच्चे गुरुओं के शिष्य भी सच्चे होते हैं इसलिए वे प्रश्न भी कर लेते हैं |सीता माता और लक्ष्मण जी के साथ किये गए कठोर व्यवहार के कारण आज तक राम जी की उदारता पर प्रश्न चिन्ह लगाया जाता है |

राम जी को मैंने देखा नहीं लेकिन बाबा गुरबचन सिंह जी को देखा है इसलिए मेरी श्रद्धा उनके प्रति किसी रोष को स्वीकार नहीं करती भले ही रोष अप्रत्यक्ष रूप से ही क्यों न हो |

धन निरंकार जी           



बाबा गुरबचन सिंह जी का वचन कैसे अटल सिद्ध हुआ 

रामकुमार सेवक

  

एक जून  2019 को सत्संग में भाव प्रकट करते हुए महात्मा ने कहा- बाबा गुरबचन सिंह जी ने मुझे आदेश दिया कि-श्रीनगर चले जाओ कल वहां भवन की रजिस्ट्री करवानी है |

यह सुनकर मेरे मन में एक सुन्दर कल्पना पैदा हो गयी कि वहां का सत्संग भवन कितना खूबसूरत होगा | लेकिन श्रीनगर था कश्मीर में और मैं था दिल्ली में |कल  सुबह 10 बजे तक श्रीनगर कैसे पहुँच पाऊंगा ,यह एक बड़ा सवाल था |

बाबा जी ने कहा -रेलवे स्टेशन चले जाओ-वहां से जम्मू तक रेल से जाना और वहां से कल सुबह फ्लाइट से  श्रीनगर चले जाना |

मैंने कहा कि-महाराज,पता चला है कि वहां से श्रीनगर तक कोई फ्लाइट उपलब्ध नहीं है |बाबा जी ने कहा-मैं जो कह रहा हूँ,इसका यकीन करो ,फ्लाइट मिलेगी |

बाबा जी के आदेशानुसार मैं   रेल से जम्मू चल दिया |रिजर्वेशन तो थी नहीं ,पूरी रात जागकर जम्मू पहुंचा |

वहां  से श्रीनगर की फ्लाइट लेनी थी |

मैंने श्रीनगर का टिकट माँगा | वे लोग हँसे लेकिन खिड़की के पीछे से उन्होंने मुझे मुबारकबाद दी |उन्होंने कहा-आप पहले शख्स हैं जिन्होंने श्रीनगर का टिकट माँगा है |

टिकट मुझे मिल भी गया |फ्लाइट में एयरकंडीशनिंग थी |रात भर का जागा था तो नींद आने लगी लेकिन उतनी ही देर में श्रीनगर आ गया और मुझे उतरना पड़ा |

 वहां चौधरी साहब मिल गए और काम हो गया |

मैं हैरान था कि बाबा गुरबचन सिंह जी के वचन किस प्रकार पूरे हुए क्यूंकि दिल्ली में तो यही सूचना थी कि जम्मू से श्रीनगर की कोई फ्लाइट नहीं है और बाबा गुरबचन सिंह जी ने कहा था-मैं जो कह रहा हूँ |जम्मू से हवाई जहाज़ द्वारा श्रीनगर पहुंचकर सब काम निबटा लेना |

सन्त निरंकारी मंडल के कोषाध्यक्ष श्री देसराज सिक्का जी ने आज यह प्रसंग सुनाया और  अन्य पुराने महात्माओं से भी ऐसी बातें सुन चुका हूँ जिनमें गुरु की ताक़त प्रकट होती है |

नामुंडा (समालखा,हरियाणा )की ब्रांच के इंचार्ज महात्मा बख्तावर लाल जी ने ग्राउंड न.8 में बाबा हरदेव सिंह जी की पावन उपस्थिति में एक बार यह प्रसंग सुनाया |

बाबा गुरबचन सिंह जी ने एक बार उनसे पूछा-खेत में क्या बोया है ?

उन्होंने कहा-मटर बोया है,बाबा जी |

बाबा जी ने कहा-बाकी में सरसों बो दो |

बख्तावर लाल जी ने बताया कि मैंने दो क्विंटल मटर बोया चूंकि बाबा जी ने सरसों बोने के लिए कहा था तो वचन तो मानना ही था इसलिए थोड़ी सी  सरसों भी खेत में बिखेर दी |

अब वचन पूरा होने की बारी थी |2 क्विंटल मटर बोई थी लेकिन मटर तीन पाव भी नहीं हुई और सरसों  थोड़ी सी बोई और पैदा हुई आठ क्विंटल |

यह थी गुरु के वचन की ताक़त |

बाबा गुरबचन सिंह जी के उत्तराधिकारी बाबा हरदेव सिंह जी इतने मुखर नहीं थे |वे बहुत विनम्र व्यक्तित्व के स्वामी थे केकिन ताक़त वैसी ही थी |

शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी तो शहंशाह ही थे और 1963 के बाद फिर गुरसिख हो गए लेकिन बाबा गुरबचन सिंह जी का अंदाज़ बिलकुल अलग था |वे गुरु वाली ताक़त दिखा देते थे |

बाबा गुरबचन सिंह जी खुलकर बोलते थे जबकि बाबा हरदेव सिंह जी शब्दों का प्रयोग कम करते थे |   बाबा हरदेव सिंह जी में जो ताक़त थी उसका उन्होंने प्रत्यक्ष  प्रदर्शन शायद कभी नहीं किया लेकिन जिन्हें इस ताक़त का पता था ,विश्वास था ,हम लोगों ने वह ताक़त प्रत्यक्ष देखी |

हर फूल की अपनी खुशबू होती है ,इस प्रकार हर गुरु की अपनी कार्यशैली होती है जबकि ताक़त का स्रोत सबका एक ही है |गुरु वर्तमान ,भूत और भविष्य सबको भली भांति जानता है  लेकिन अपनी इस क्षमता को प्रकट करे या न करे,इसकी मर्जी |       


एक गैरनिरंकारी भाई ने किया जब बाबा हरदेव सिंह जी का मर्मस्पर्शी अभिनन्दन  

रामकुमार सेवक  

 

वार्षिक सन्त समागम का वह चौथा या पांचवा दिन था |सन्त महात्मा अपने घरों को लौट रहे थे |मैरिज ग्राउंड में जो लंगर होता है,उसमें मुरादनगर के सेवादारों की ड्यूटी थी |मैं उन दिनों सन्त निरंकारी मंडल द्वारा दी गयी जगह में रहता था |जगह सन्त निरंकारी कॉलोनी की गली न.पांच में थी ,जिसमें तब पांच परिवार रहते थे |

समय सुबह लगभग ग्यारह बजे का था |बाबा हरदेव सिंह जी मैरिज ग्राउंड में सेवारत सेवादारों को दर्शन देने आएंगे,ऐसी संभावना थी |

बाबा जी की अपनी एक महक थी ,जो आस-पास के वातावरण में अनोखा खुमार भर देती थी और इंसान वह काम भी कर जाता था ,जिसे करने की उसकी क्षमता नहीं होती थी |

बाबा जी संभवतः बारह बजे के आस-पास मैरिज ग्राउंड में आये थे |मैरिज ग्राउंड छोटी सी जगह है लेकिन बाबा जी के आने के बाद किसी का भी मन काबू में नहीं रह पाता था | खुद मेरा मन भी कई बार नाचने का करता था जबकि मैं इस कला को बिलकुल नहीं जानता |

यही होता था कि बाबा जी को देखकर हर कोई दीवानगी में नाचने लगता था या कुछ बजाने लगता था |गाने वाला सुर की चिंता किये बिना गाता था और अनूठा आनंद   पाता था |बाबा जी भी खूब लीलाएं दिखाते थे |वे भक्तों को खुश करते थे और समय का पता भी न चलता था |

हम लोग अपने गेट पर खड़े थे कि बाबा जी की गाड़ियां आती दिखाई दीं | थोड़ी देर में बाबा जी के दर्शन हुए |वे गाड़ी से बाहर खड़े हुए थे  |

हम लोग जयघोष कर रहे थे कि सामने के मकान की दूसरी मंजिल से एक भाई साहब ने,जिनका नाम मैं अब तक नहीं जानता ,बाबा जी पर पुष्पवर्षा की |

ये भाई साहब निरंकारी नहीं हैं लेकिन बाबा जी का ऐसा अभिनन्दन किया कि हम तो सोचते ही रह गए |बाबा जी ने उन्हें जो मुस्कान दी उसके लिए शब्द काफी नहीं हैं |हम सब दिल से भाई साहब के साथ अभिनन्दन में शामिल हो गए थे |

वह औपचारिक स्वागत नहीं था लेकिन ऐसा मर्मस्पर्शी अभिनन्दन था, जिसे हम कभी नहीं भूल सकते |बाबा जी ने भी साबित कर दिया कि वे सबके हैं न कि सिर्फ हमारे |

वे तब हमारे ठीक सामने रहते थे इसलिए हम उन्हें अब तक पहचानते हैं |

लेकिन उन्हें देखकर हमें और कुछ याद नहीं आता ,सिर्फ वही दृश्य मन में तैरता है ,जिसमें खुशबू ही खुशबू है,आनंद ही आनंद है |  


जितना बड़ा दिल,उतना ही बड़ा तीर्थ  क्यों और कैसे ?

रामकुमार सेवक  

 

आज एक पौराणिक आख्यान सुना |महात्मा कह रहे थे -तीर्थयात्रियों का एक दल पूरे देश के तीर्थस्थलों में भ्रमण कर रहा था |

तीर्थयात्रा के अंतिम चरण में वे एक गांव से गुजर रहे थे |उन्होंने सोचा कि सारे तीर्थ तो हो गए हैं अब घर लौटने में थोड़ा ही समय शेष है |यदि यह समय भी पवित्रता के साथ व्यतीत हो तो कितना अच्छा हो |उन्होंने गांव वालों से कहा कि परमात्मा की कृपा से हमने पूरे तीर्थों का भ्रमण किया है |इस बीच हमने अन्न की पवित्रता का काफी ख्याल रखा |आपका गांव ज्यादा संपन्न तो नहीं है लेकिन हम अन्न की पवित्रता का नियम छोड़ नहीं सकते |हमारे लिए पवित्र अन्न का प्रबंध कर सकें तो कृपा होगी |

सीधे -साधे ग्रामीण अन्न की पवित्रता का आशय समझ नहीं सके |

उन्होंने तीर्थयात्रियों से कहा -हम तो गांव के लोग हैं,पवित्रता का मर्म हम नहीं जानते |गांव के पास एक सन्त रहते हैं | वे भी कृषि कार्य ही करते हैं लेकिन  उनकी बहुत महिमा है | काफी लोग उनके घर जाकर सत्संग करते हैं |

तीर्थयात्री उनके घर पहुँच गए |साधारण सा घर था ,न कोई मंदिर ,न कोई मूर्ति |भोजन भी बहुत साधारण था |

भोजन ग्रहण करने से पहले वे प्रार्थना करना चाहते थे इसलिए उन्होंने एक देवमूर्ति की मांग की |

वे यह देखकर बहुत निराश हुए कि उस संत के पास कोई मूर्ति नहीं थी |जो भोजन उन्हें मिला वही उन्होंने खाया लेकिन आज पहला दिन था कि मंदिर में प्रार्थना किये बिना उन्होंने भोजन किया |

वे अपराध बोध से ग्रस्त होकर दुखी मन से वहां सोये |

सुबह जब वे नींद में थे उन्होंने देखा कि काली गायें उस घर में घुसकर उसकी धूल   में  लोट-पोट हो रही हैं और सफ़ेद होकर वहां से निकल रही हैं |

तीर्थयात्री आश्चर्यचकित थे |कहानीकार लिखता है कि उन्होंने गायों से काली से सफ़ेद होने का रहस्य पूछा तो उन्होंने कहा -यह पूरा आश्रम बहुत पवित्र है क्यूंकि लोभ की गन्दगी से दूर है |

यह कालिख को सफ़ेद करने की क्षमता रखता है इसीलिए मैं रामेश्वरम से यहाँ आयी हूँ |  

बाकी गायें भी किसी न किसी तीर्थ का प्रतिनिधित्व करती हैं |

लोग अपने पापों को तीर्थ में छोड़ते हैं जिससे हमारा रंग-रूप बदल जाता है |मूर्तियों का रख-रखाव और श्रृंगार भी काले धन से होता है |तीर्थ की मैल  धोने की क्षमता इस पावन मिट्टी में है जिसमें काम-क्रोध-लोभ व् अहंकार का लेश भी नहीं है इसलिए गायों का वेश धारण करके हमें यहाँ आना पड़ा है |

यहाँ नीयत की पवित्रता है ,मन की विशालता है और संत जी के दिल में है सबकी भलाई की मंगलकामना |इसी से पाप का कालापन ख़त्म होता है |

तीर्थयात्री अब असमंजस से उबरकर इस सच्चाई को स्वीकार करने को विवश थे कि जिस मन में जितनी ज्यादा दूसरों के लिए जगह है वह उतना ही बड़ा तीर्थ है |            


दर्शनों का वह आनंद आज तक ताज़गी देता है |     

रामकुमार सेवक 

पिछले पैंतालीस सालों में कितने ही परिवर्तन देखे |बाबा गुरबचन सिंह जी और बाबा हरदेव सिंह जी   को अपनी नज़रों से दूर होते देखा |बाबा गुरबचन सिंह जी ने जब चोला बदला,वह हमारा बचपन था |बाबा हरदेव सिंह जी को मैंने बहुत करीब से देखा बल्कि शुरूआती दो वर्ष तो निरंकारी कोठी में ही  गुजरे | 

निर्मल जोशी जी का बाबा जी से बहुत स्नेह था |उन दिनों मेरे माता-पिता मुरादनगर में रहते थे |महीने में एक बार मैं मुरादनगर जरूर जाता था |

छोटी -छोटी बातें हैं लेकिन उन बातों की आज बहुत महत्ता है क्यूंकि गुरु से तब बहुत सहज सम्बन्ध था |वे दिन ऐसे ही थे ,कोठी का प्रांगण अपना ही घर लगता था |

बाबा जी लाखों के गुरु थे मगर अनूठे गुरु थे |शुरू के लगभग एक साल तो हमें बाबा गुरबचन सिंह जी ही याद आते रहे लेकिन जल्दी ही बाबा हरदेव सिंह जी से अपनापन गहरा हो गया |इस अपनेपन के कई छोटे-छोटे कारण थे |उस समय तक मेरी सरकारी नौकरी नहीं लगी थी इसलिए मेरा पूरा दिन या तो प्रकाशन विभाग में बीतता था या निरंकारी यूथ फोरम-युवा सत्संग की गतिविधियों में |

इन गतिविधियों के अंतर्गत हम नाटकों,परिचर्चा और प्रश्न मंच आदि कार्यक्रमों  के आयोजन करते |

एक बार सन्त निरंकारी पत्रिका के प्रचार-प्रसार की अखिल भारतीय प्रतियोगिता भी आयोजित की थी ,जिनके विजेताओं  को 1987  अथवा 1988  के मानव एकता दिवस पर बाबा  हरदेव  सिंह  जी ने सम्मानित भी किया था |

आज सोचता हूँ तो लगता है कि वे दिन किसी और ही प्रकार के थे | किसी फिल्म का वो गाना याद आ रहा है-

दिन जो पखेरू होते पिंजरे में मैं रख लेता 

पालता उनको जतन से ,मोती के दाने देता ,सीने से रहता लगाए --

उन दिनों मेरा मुज़फ्फरनगर आना-जाना बहुत होता था |पत्रिका विभाग उन दिनों अलग विभाग नहीं हुआ था ,प्रकाशन विभाग ही उस समय पत्रिका विभाग भी था |

प्रकाशन विभाग के हमारे प्रभारी आदरणीय देवराज बजाज जी थे लेकिन वे बेंगलुरु में रहते थे,इस प्रकार हमें रोज का  मार्गदर्शन निर्मल जोशी जी देते थे,जो कि प्रकाशन विभाग के मुख्य सम्पादक थे |मान सिंह जी मान,भूपेंद्र बेकल जी ,बेदिल सरहदी साहब और विनय जोशी जी का भी भरपूर मार्गदर्शनयुक्त स्नेह मिलता था |मुझे इस समय एक प्रसंग याद आ रहा है,जो था तो बहुत संक्षिप्त लेकिन मुझे आज भी बहुत मनभावन लगता है |

समागम से कुछ पहले की बात है,हमारा दफ्तर उस समय सन्त निवास के भूतल पर था |यह पुराना सन्त निवास  निरंकारी कोठी के भीतर स्थित था | मेरा कमरा इस जगह की ऊपरी मंज़िल पर था लेकिन उन समागम के दिनों में किसी भी हमारे साथी का घर जाने का समय निश्चित नहीं होता था |

उन दिनों हमारे ज़हन में सेवा कोई अलग कार्य नहीं था कि उसके लिए वक़्त निकालना पड़े बल्कि इतना सहज था जितना कि सांस लेना या भोजन करना |वह  हमारे लिए ऑक्सीजन जैसा था |   |

रात के लगभग बारह बजे थे ,बाबा हरदेव सिंह जी दफ्तर में आ गए |हम सब उस समय अपनी-अपनी सेवा में व्यस्त थे |बाबा जी को अपने बीच पाकर हम धन्य हो गए |उनकी मुस्कान ने पूरी ताज़गी भर दी |

बाबा जी थे भी इतने सहज कि उनसे भय नहीं बल्कि देखकर हर्ष महसूस होता था |निर्मल जोशी जी  बहुत मुखर स्वभाव के सन्त थे  ,बाबा जी के प्रति अपने सहज स्नेह को बेझिझक व्यक्त कर देते थे |  

बाबा जी की शारीरिक आयु जोशी जी की सन्तानो की आयु के लगभग थी तो उन्होंने बाबा जी से बुजुर्ग वाली आत्मीयता से कहा कि आपने बहुत तरक्की की है | नए-नए विचारों को प्रकट करके नए -नए कीर्तिमान बनाये हैं |पहले हमने आपकी मौलिक प्रतिभा के इतने विकास के बारे में नहीं सोचा था |   

शब्द शायद कुछ और रहे होंगे लेकिन भाव ऐसे ही थे और मैं उसी दिन मुज़फ्फर नगर से वापस आया था तो बाबा जी के वापस जाने के बाद जोशी जी ने कहा कि आज आपकी हाजिरी भी  लग गयी |बाबा जी यदि कल आये होते तो कल तो आप दिल्ली से बाहर थे |

जोशी जी ने यह बात बुजुर्ग के लहज़े कही जरूर लेकिन मुझे इससे किंचित भी भय नहीं महसूस हुआ  क्यूंकि मन में यह भावना गहराई से बैठी हुई थी कि गुरु और निरंकार एक सिक्के के दो पहलुओं के समान हैं |पावन बाणी में महात्मा कहते हैं-

गुरु परमेश्वर एको जान 

इस दृष्टि से गुरु की सत्ता को कुछ दिखाने की ज़रुरत नहीं है क्यूंकि सत्य इससे छिपाया नहीं जा सकता |

बहरहाल वो आनंद का वो समय आज तक ताजा है |         


जन-जन की अरदास कोई पूरी कर सकता है ?

रामकुमार सेवक  

 

उस दिन एक बच्ची गीत गा रही थी -जन जन की अरदास पूरी कर दाता

गीत बहुत अच्छा है इसलिए लोकप्रिय भी बहुत है |

जब माइक मुझे सौंपा गया तो मुझे छात्रावस्था में पढ़ी एक कहानी याद आ गयी -  एक पिता की दो पुत्रियां थीं |एक का पति माली का काम करता था और दूसरी का पति कुम्हार था,वह मिट्टी के बर्तन बनाता था |

उनका पिता एक दिन अपनी दोनों बेटियों से मिलने गया |

पिता ने अपनी बड़ी बेटी से पूछा कि तुम्हारे लिए भगवान से क्या प्रार्थना करूँ ?उसके पति माली थे तो उसने कहा-पिताजी-भगवान से प्रार्थना कीजिये कि इस साल खूब बरसात हो ताकि हमारे बगीचे हरे-भरे रहें |जब पिता ने अपनी छोटी बेटी से पूछा कि तुम्हारे लिए क्या प्रार्थना करूँ तो उसने कहा-पिताजी,धूप निकलेगी तो हमारे बर्तन सूखेंगे ,हमारी आमदनी बढ़ेगी |

जब हम कहते हैं कि-जन-जन की अरदास पूरी कर दाता तो दाता की स्थिति उस पिता की तरह हो जाती है ,जिसकी एक बेटी बरसात चाहती है और दूसरी बेटी धूप चाहती है |

ऐसे में दाता क्या करे ?यदि दाता हमारी तरह का इंसान रहा होता तो उसके सामने धर्मसंकट पैदा हो गया होता |

हम गहराई से सोचें कि हमारी अरदासें किस -किस प्रकार की होती हैं क्यूंकि इंसान अपनी भलाई से ज्यादा दूसरों का बुरा सोचता है |

यदि दाता सचमुच हमारी ही अरदास पूरी करने लगे तो दुनिया  की स्थिति उस रथ की तरह की हो जायेगी  जिसके  घोड़े  बेलगाम  हैं और अलग-अलग दिशाओं में आगे बढ़ने के लिए जोर लगा रहे हैं  |

इसलिए (संभवतः )आदि शंकराचार्य जी ने कहा-हे प्रभु -तू कण-कण में विद्यमान है,फिर भी मैं तुझे दूर समझता हूँ,यह मेरी पहली भूल है |

तू बिना बोले भी मेरी सब ज़रूरतें जानता है ,फिर भी मैं सोचता हूँ कि बिना मेरे बताये तुझे मेरी ज़रूरतों का पता नहीं चलेगा-यह मेरी दूसरी भूल है |

तू सब कुछ करने में समर्थ है तब भी अन्य साधनो की तरफ देखता रहता हूँ,तुझ पर पूरा भरोसा नहीं करता,यह मेरी तीसरी भूल है |

शायद इसीलिए बाबा अवतार सिंह जी ने हमें समझाया कि अपनी अरदास दो कानो वालों को मत सुनाओ बल्कि इस निरंकार में अरदास करके छोड़ दो ,यदि की गयी अरदास आपके हित में है तो वो जरूर पूरी हो जायेगी |  अध्यात्म का मार्ग तो यही है बाकी जो हैं वो हमारे मन की कमजोरियां हैं और उन पर काबू पाने का एकमात्र उपाय है-निरंकार का सुमिरण-धन निरंकार जी-               


चक्रवर्ती प्रधानमंत्री से दो बातें

रामकुमार सेवक

नयी लोकसभा के चुनावों के परिणाम चुके हैं |भाजपा के नेतागण पूरे जोश में हैं और उन्हें जोश में होना भी चाहिए क्यूंकि ख़ुशी तो मनाने के लिए ही होती है लेकिन यह सिर्फ ख़ुशी का अवसर नहीं है | यह एक बड़ी जिम्मेदारी है जो इस देश की जनता ने श्री नरेंद्र मोदी जी को दोबारा सौंपी है |

मैं एक छोटा सा लेखक अपने प्रधानमंत्री से अपनी आशा बताना चाहता हूँ -हो सकता है ये सिर्फ मेरी आशाएं होकर बल्कि देश के हर वंचित की आशाएं हों जिसने आपको अच्छे दिनों की उम्मीद में 2014 में  भी वोट दिया था और 2019 में भी |

प्रजातंत्र में प्रजा सर्वोपरि है और हम जानते हैं कि धरती पर जीवन शांति के कारण है,युद्ध के कारण नहीं है|

हम लोग सोचते हैं कि प्रजातंत्र में प्रजा अर्थात हम लोग सर्वोपरि हैं और हम चाहे जिसे चुनकर शासक बना दें लेकिन सत्ता की बिसात इतनी सीधी नहीं है |

कोई समय था जब राजनीति में लोग सेवा करने के इरादे से जाते थे |ऐसे लोगों ने ही हमें आज़ादी दिलवाई और जब शासक बने तो नवस्वतंत्र राष्ट्र की ज़रूरतों के हिसाब से शासन की संरचना का ढांचा बनाया |नाम का लालच और बाकी मानवीय कमजोरियां शायद उनमें भी रही होंगी लेकिन उन कमजोरियों ने राष्ट्र की रचना में दखल नहीं दिया | वह विज़न बड़ा था |वहां राष्ट्र सर्वोपरि था ,हिन्दू या मुस्लिम राष्ट्र का प्रश्न नहीं था |

मुझे श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी की वो कविता याद रही है-

घनी दुपहरी में अँधियारा,सूरज परछाई से हारा

अंतरतम का नेह निचोड़े,बुझी हुई बाती सुलगाएं

आओ फिर से दिया जलाएं ----

यह सोच उजाले की सोच है,किसी का परिवार जला देने की सोच नहीं है बल्कि पीड़ा से बचाने की सोच है |यही सोच एक अर्थपूर्ण राष्ट्र का निर्माण करती है |

राष्ट्र एक बड़ी संकल्पना है उसके सामने व्यक्ति गौण है |बेशक राष्ट्र निर्माण तो व्यक्ति के हाथों से ही होगा लेकिन व्यक्ति की सोच निर्माण की सोच होनी चाहिए ,विध्वंस की नहीं

भारतीय प्रजातंत्र की यह ख़ूबसूरती है कि यहाँ मतभेदों को खुले आम स्वीकार किया जाता है और अपनी बात कहने की आज़ादी है |इसी आधार पर हर राजनीतिक दल का अपना एजेंडा है |समाजवादी ,पूंजीवादी,राष्ट्रवादी ,धर्मवादी ,जातिवादी ,सम्प्रदायवादी आदि सब लोग इस देश के संविधान को आधार बनाकर और आज़ादी का लाभ लेकर अपनी-अपनी लड़ाई लड़ रहे हैं | भारतीय संविधान हर किसी को फलने-फूलने दे रहा है ,यह इस देश की ख़ूबसूरती है |

1952  में हुए पहले आम चुनावों से लेकर आज 2019  तक शांतिपूर्ण ढंग से सरकारें बदल रही हैं | लोकप्रियता के रथ पर सवार होकर अक्सर नेता को लगता है कि वह चक्रवर्ती है और कुछ भी कर सकता है लेकिन इस मुगालते को भी इस देश की जनता ने समय आने पर दूर कर दिया |1977  का दौर ज्यादा पुराना नहीं है |

सरकार के कदमो की सफलता-असफलता पर चुनाव में खूब चर्चा हुई |बोल-कुबोल खूब बोले गए लेकिन इसके बावजूद, अच्छे दिनों वाली सरकार ने अच्छे दिन दिखाने के बावजूद  रिकॉर्ड तोड़ सफलता हासिल की है |

श्री नरेंद्र मोदी जी की सफलता रिकॉर्ड तोड़ है लेकिन यह बहुत बड़ी जिम्मेदारी भी है |2014

में आपकी सफलता ने जो आशा के फूल खिलाये थे समय आने पर वो तबियत से मुरझाये |लेकिन चुनावों में आप लोगों को यह विश्वास दिलाने में सफल रहे कि आप मजबूत शासक हैं और आपको पुनः अवसर मिलना चाहिए |इस विश्वास के कारण  अब  वे फूल पुनः खिले हैं ,आपकी जिम्मेदारी और ज्यादा बढ़ चुकी है |

भारतीय प्रजातंत्र की संकल्पना के अनुसार आप हर भारतीय के प्रधानमंत्री हैं ,इस दृष्टि से अटल जी द्वारा दी गयी शिक्षा अर्थात राजधर्म के पालन को  आपको अपनाना ही चाहिए अन्यथा सरकारें उखाड़ने -बनाने का काम तो यह देश देख ही रहा है | आपके राजनीतिक कौशल में किसी को कोई संदेह नहीं है लेकिन वही कौशल राष्ट्र निर्माण में भी तो दिखना चाहिए |भुखमरी और बेकारी आप से बहुत उम्मीद बांधे हुए है |सबका साथ,सबका विकास भी हाथ बांधकर आपकी ओर देख रहा है कि शायद उनकी किस्मत का भी सूर्योदय हो |   राष्ट्र को विकास चाहिए, निर्माण चाहिए ,विध्वंस नहींएक छोटे से लेखक की अपने  प्रधानमंत्री को हार्दिक शुभकामनायें   -जय हिन्द 

          


गुरु वालों को यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए ------    

रामकुमार सेवक 

हो सकता है मैंने पहले भी इस मुद्दे को उठाया हो लेकिन फिर उठा रहा हूँ तो इसका अर्थ यह है कि अनुभव और गहरा हुआ है |अनुभव जितना गहरा होता है उसकी मजबूती उतनी ही ज्यादा होती है |मैं कहना चाहता हूँ कि निरंकारी होने से बाहरी तौर से हममें कोई परिवर्तन नहीं होता लेकिन एक जिम्मेदारी बढ़ जाती है कि हम गुरु वाले हैं |

गुरु वाले होने का तात्पर्य यह नहीं है कि हम किसी खास समूह के अंग हैं बल्कि इसका आशय यह है कि हमारा जीवन धर्म के दिव्य गुणों अर्थात महान गुरुओं द्वारा समय-समय पर दिए गए मार्गदर्शन से परिपूर्ण होना चाहिए |इसका अप्रत्यक्ष अर्थ यह भी  है कि हमारे गुरु का मार्गदर्शन क्या है ,कोई भी हमारे व्यवहार से समझेगा |

कुछ  दिनों पहले मैंने रिश्ते सँभालने के लिए समझदारी से व्यवहार पर बल देने के लिए अपना एक अनुभव लिखा था |जिसमें अपनी दो पुस्तकों का जिक्र किया था- जीने की राह और सुखी जीवन की ओर  |

उसके लगभग एक-डेढ़  सप्ताह बाद प्रगतिशील साहित्य के अकाउंट में कुछ धनराशि आने का सन्देश मिला |ज्ञात हुआ कि कोई पाठक मित्र ये दोनों पुस्तकें प्राप्त करना चाहते हैं |

पुस्तकें भेजना आसान तो नहीं है लेकिन पुस्तक पाठक को सही हालत में और यथासमय मिल जाए यह सुनिश्चित करने की मेहनत की अपेक्षा आसान है |  

बहरहाल हमने उन्हें रजिस्टर्ड बुक पोस्ट से दोनों किताबें भेज दीं |किताब भेजते ही बाहर निकलकर मैंने उन्हें फोन मिलाया |फ़ोन पर आवाज़ सुनते ही उन्होंने आशीर्वादों की झड़ी लगा दी |

मेरे पास तो सिर्फ कुछ शब्द थे,अपनी प्रसन्नता प्रकट करने के लिए लेकिन उनकी वाणी में बहुत ऊर्जा थी जिसने मुझे सिर से पैर तक भिगो दिया |   

बात समाप्त करने पर मुझे लगा कि यह प्रेम इसलिए प्रकट हुआ है कि हम दोनों को अपने गुरु से एक जैसा मार्गदर्शन प्राप्त हुआ है और उसका आधार है-एक निरंकार प्रभु की अनुभूति |

जब मैंने ये दोनों किताबें प्रकाशित करवाईं थी तो लोग पूछते थे कि आपकी बाकी किताबों से इनमें क्या विशेष है?

मैंने कहा-हमारी शेष किताबों में अध्यात्म की चर्चा है लेकिन अध्यात्म अपने जीवन पर लागु कैसे किया जाए ,इन किताबों में यह चर्चा है | 

कुछ साल पहले मैं भोपाल गया था | वापस दिल्ली लौटने पर निजामुद्दीन स्टेशन पर उतरा तो कोई ऑटो वाला मीटर से चलने के लिए राजी नहीं था |वहां बड़ी संख्या में ऑटो वाले खड़े रहते हैं लेकिन कोई भी नियम के अनुसार चलने को तैयार न था |

अंत में एक ऑटोवाला नियम से चलने को ख़ुशी-ख़ुशी राजी हो गया |उसने बहुत अच्छा असर छोड़ा |रास्ते भर गुरु की बातें कहीं |मुझे बहुत अच्छा लगा | वो बेशक किसी और गुरु का शिष्य था लेकिन उसकी ईमानदारी ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा |गुरु वालों को इसी प्रकार अपना अनूठा असर छोड़ना चाहिए |

बाबा हरदेव सिंह जी ने एक बार मसूरी में हम लोगों को सम्बोधित करते हुए कहा था कि आप कोई लेख लिखते हैं |उसे पढ़कर कोई हमारे नजदीक आता है तो उसे वो चीज यहाँ मिलनी चाहिए जिसके बारे में आपने अपने लेख में लिखा है |यदि उसे उससे अलग या उससे विपरीत कुछ देखने को मिलता है तो आपका लिखना और छापना निरर्थक सिद्ध हो जाता है |

गुरु वालों को यह जिम्मेदारी निभानी चाहिए |      


उसे मूर्ख न कहें तो क्या कहें ? 

रामकुमार सेवक    

 

अभी अवतार पार्क में सैर करके लौटा हूँ |पार्क में बाबा गुरबचन सिंह जी के कुछ प्रवचन याद आ रहे थे |1978  का सन्त समागम जो कि इंडिया गेट और नेशनल स्टेडियम के बीच के मैदानों में हुआ,याद आ रहा था |उसमें सम्मिलित होना आसान नहीं था लेकिन इस बात को आज यहीं रोककर आगे की बात करूंगा |

पार्क से निकला ही था,पीछे से एक पुराने सेवादार महात्मा ने आवाज़ लगायी -मैं वहीं रुक गया |महात्मा बोले-आज सुबह कोई महात्मा कह रहे थे कि मिशन पहले से दस प्रतिशत भी नहीं रह गया है | ऐसी बातें मैंने पहले भी सुनी हैं लेकिन मेरा विचार कुछ और है क्यूंकि मैं भीड़ को मिशन नहीं मानता बल्कि भीड़ के विचारों में ,दिमागों में जो सकारात्मक शिक्षाएं भरी हैं,उन्हें मिशन मानता हूँ |बहरहाल उनसे मैंने कुछ नहीं कहा |

वे बोले -बाबा अवतार सिंह जी कहा करते थे कि मुझसे नहीं बल्कि इस निरंकार से जुडो ,जिसका दर्शन मैंने आपको करवाया है |

जो बात कहनी है इससे कहो क्यूंकि मुझसे कहोगे तो मैंने भी इसी से अरदास करनी है |इस पर विश्वास करो |आपकी अरदास यदि वास्तव में आपके हित में होगी तो जरूर पूरी हो जाएगी |

आज तो लोग पूछते हैं कि चरणों में नमस्कार कब होगी,कहाँ होगी,कितने बजे होगी ?यहाँ मैंने महात्मा शब्द का इस्तेमाल जान-बूझकर नहीं किया क्यूंकि मेरी दृष्टि में तो नमस्कार सदा चरणों में ही होती है |जो चरणों में नमस्कार की लोकेशन और तारीख पूछता है,वो अन्य चाहे जो भी हो लेकिन महात्मा नहीं हो सकता |

लोगों के पास वैसे कर्म नहीं हैं जैसे प्रवचनों में सुनते हैं लेकिन पैसा खूब है इसलिए वे नमस्कार की गुल्लक अथवा बैग में पैसा डालकर सोचते हैं कि गुरु हमें बचा लेगा लेकिन यह संभव नहीं है क्यूंकि बाबा अवतार सिंह जी साफ़-साफ़ कहा करते थे कि किसी के साथ भी छल-कपट न करो नहीं तो मैं भी आपको बचा नहीं सकता |

हमारे प्रचारक यह बात किसी को नहीं कहते क्यूंकि इस पर वे कुछ सोचते ही नहीं |आज के प्रचारकों के बारे में कुछ न लिखना अच्छा है इसलिए निरर्थक क्या कहूँ ?

घर से जब पार्क में जा रहा था तो रास्ते में एक प्रचारक मिल गए |मुझे तो नहीं मिले लेकिन सामने से आ रहे थे | एक बहन जी ने उनसे समय पूछा |उन्होंने जो समय बताया वह गलत था |चूंकि मेरे हाथ में घड़ी थी तो मैंने सही समय बता दिया जबकि वो बहन संगत की बहुत नेमी है लेकिन मुझे ख्याल आया कि जो सही समय भी सत्य नहीं बता सकता वह सत्य सन्देश दे सकेगा इसमें मुझे संदेह है |

ऐसे प्रचारक सही मायनो में मिशन को नुकसान पहुंचा रहे हैं चूंकि सत्य की बजाय उनकी निष्ठां चापलूसी में है लेकिन बात तो उन महात्मा की हो रही थी जो मुझे पार्क के बाहर मिले थे |

उन्होंने आगे कहा-कोई सज्जन थे,ज्ञानवान थे ,वे किसी देवता की उपासना करने लगे |उससे पहले वे माता अर्थात शक्ति की उपासना भी करते थे |माता उनसे रुष्ट हो गयी और उनके परिवार में कई सदस्यों की अप्राकृतिक मौत हुई |

मैंने इस पर कुछ नहीं कहा लेकिन आगे उन्होंने जो कहा वह महत्वपूर्ण था |उन्होंने कहा-निरंकार सर्वोच्च है,इसमें शक की कोई गुंजाईश नहीं है लेकिन इसके बावजूद जो इधर-उधर की शक्तियों को खुश करने में लगे हैं वे नुकसान ही उठाते हैं | 

जो मेरे भीतर है,बाहर है सदैव आस-पास है ऐसे निरंकार को जो पूरी तरह स्वीकार न करे उसे मूर्ख न कहें तो क्या कहें ?    


सम्पादकीय

चुनावी प्रक्रिया में सामान्य शिष्टाचार का पालन जरूरी 

रामकुमार सेवक 

चुनावों का दौर है ,देश में अपशब्द बोलने का मुकाबला चलता लग रहा है |बड़े-बड़े पदों पर आसीन रह चुके लोग जब सामान्य शिष्टाचार को भी भूल चुके लग रहे हैं तो प्रश्न उठता है कि क्या चुनाव बुरी चीज हैं ?

साथ ही प्रश्न यह भी उठता है चुनाव क्या कोई जंग है कि सामने वाले प्रत्याशी अथवा दल को दुश्मन मानकर व्यवहार किया जाए ?

भारत में पहले चुनाव 1952  में हुए |15  अगस्त 1947 को मिली स्वतंत्रता के बाद पहली सरकार का कार्यकाल 1952  में पूरा हो रहा था तो चुनाव होना जरूरी था क्यूंकि हमारे संविधान में सत्ता परिवर्तन के लिए यही तरीका वैध था |एक प्रकार से यह परीक्षा की घड़ी थी |नव स्वतंत्र राष्ट्र को यह इम्तिहान पास करना था कि वह स्वतंत्रता की परिभाषा को समझता है और प्रजातंत्र के सिद्धांतो के प्रति आस्थावान है |इस सन्दर्भ में मुझे नवोदित राष्ट्र के पहले प्रधानमंत्री प.जवाहरलाल नेहरू की पंक्तियाँ याद आ रही है जो कि 22  नवम्बर 1951  को आकाशवाणी द्वारा राष्ट्र को सम्बोधित करते हुए कही थीं |उन्होंने कहा था -आज रात मैं आपसे देश में हो रहे आम चुनाव के बारे में बात कर रहा हूँ |आप भारतीय गणराज्य के नागरिक की हैसियत से इतिहास में हो रही अपनी तरह  की पहली लोकतान्त्रिक प्रक्रिया में भाग लें\ |यह जरूरी है कि लोग देश की समस्याओं में और दूसरे मामलों में और चुनाव में भागीदारी करें क्योंकि इससे सरकार बनती है और आपका भविष्य प्रभावित होता है |उन्होंने राजनैतिक लोगों को रोडमैप समझाते हुए कहा-जो लोग जीतते हैं वे ध्यान रखें कि जीत उनके सिर पर सवार न हो जाए और जो हारते हैं वे खुद को कटा हुआ न महसूस करें |

ये दो पंक्तियाँ प्रमाणित करती हैं कि उन्हें प्रजातंत्र की आत्मा की पूरी समझ थी | उन्होंने जीत को भी सिर पर न चढ़ने देने की बात कही और हार को भी हताशा न बनाने के प्रति सचेत किया |वास्तव में यही प्रजातंत्र की खूबसूरती है कि मुकाबले के बावजूद इसमें वैर के तत्व नहीं है |

उन्होंने चुनावों में भाग लेने वालों को सचेत किया कि हमारा प्रचार अभियान चाहे वह भाषण के माध्यम से हो या लेखन के माध्यम से निजी नहीं होना चाहिए |इसमें नीतियों और कार्यक्रमों की बात होनी चाहिए |

इस दृष्टि से आने वाली लोकसभा के ये चुनाव कोई अच्छा उदाहरण नहीं छोड़ रहे हैं |लगभग रोजाना ही पढ़ने को मिलता है कि विभिन्न नेताओं पर चुनाव आयोग ने चुनाव प्रचार करने पर पाबन्दी लगा दी है |

शासक बनने की इस होड़ में जो लोग  शामिल हैं उन्हें सत्यनिष्ठ और जिम्मेदार होना चाहिए लेकिन जिस बड़ी संख्या में लोगों के चुनाव प्रचार करने पर सांकेतिक रोक लगायी गयी है वह प्रमाणित करती है कि हमारे भावी शासक प्रजातंत्र की आत्मा से परिचित नहीं हैं l 

    इतिहास बताता है कि प्रजातंत्र का हमारा इतिहास गौरवपूर्ण है |एक ऐसा देश जहां औसतन हर 10 में बमुश्किल 2 लोग भी शिक्षित नहीं थे, वहां सफलतापूर्वक चुनाव कराना टेढ़ी खीर थी। 21 साल या उससे ऊपर के सभी महिला-पुरुषों को मताधिकार था। घर-घर जाकर 17.3 करोड़ वोटरों को पंजीकृत करना ही अपने आप में बेहद चुनौतीपूर्ण था। ऐसी भी महिलाएं थीं, जो नाम पूछने पर अपना परिचय फलां की पत्नी या फलां की मां के तौर पर देती थीं। 

इस चुनौती से निपटने के लिए चुनाव से पहले चुनाव आयोग की तरफ से बड़े पैमाने पर जनजागरूकता अभियान चलाया गया था। पोलिंग बूथ पर पार्टियों या स्वतंत्र उम्मीदवारों के चुनाव चिह्न वाले अलग-अलग बैलट बॉक्स रखे गए ताकि वोटर अपने मतपत्र को संबंधित बैलट बॉक्स में डाल सकें। लोहे के  2 करोड़ से ज्यादा बैलट बॉक्स बनाए गए और करीब 62 करोड़ बैलट पेपर छापे गए थे। पहला आम चुनाव 25 अक्टूबर 1951 से 21 फरवरी 1952 तक करीब 4 महीनों में और 68 चरणों में संपन्न हुआ।

चूंकि वे कुछ अच्छे उदहारण अथवा परम्पराएं स्थापित करना चाहते थे इसलिए अपने जीवन के दो अन्य आम चुनाव 1957 और 1962 में अपनी पूरी शक्ति लगाकर उन्होंने चुनाव प्रक्रिया को न सिर्फ़ और मज़बूत बनाया बल्कि अपने विपक्ष को भी पूरा सम्मान दिया|उन्होंने अपनी पार्टी के सदस्यों के विरोध के बावजूद 1963 में अपनी ही सरकार के ख़िलाफ़ विपक्ष की ओर से लाए गए पहले अविश्वास प्रस्ताव पर चर्चा कराना मंज़ूर किया और उसमें भाग लिया |.

आज की परिस्थितियों में आवश्यक है कि प्रजातंत्र की मर्यादाओं को नए सिरे से समझा जाए और इस तथ्य को महसूस किया जाए कि विभिन्न पार्टियों में होने के बावजूद हम प्रथमतः और अंततः भारतीय हैं |  


वहां तो बाबा हरदेव सिंह जी का फोटो लगाना ही न्यायोचित होगा

रामकुमार सेवक  

 

आज (11 /05 /2019 )को सत्संग में जाने का अवसर ,मिला |मंच पर आसीन महात्मा ने अवतार बाणी के एक शब्द की व्याख्या की |व्याख्या में कोई विशेष बात तो नहीं थी लेकिन अंतिम चरण में उन्होंने एक प्रसंग सुनाया जो दिल को बहुत अच्छा लगा |

दिव्य यात्रा संग्रहालय बाबा हरदेव सिंह जी की मानवता को एक बड़ी देन है |जिन्होंने दिव्य यात्रा संग्रहालय देखा नहीं है,उन भक्तों से मैं यह निवेदन करना कि बाबा जी ने अपने कार्यकाल में जो निर्माण करवाए उनमें से दिव्य यात्रा संग्रहालय बहुत महत्वपूर्ण है| इसमें जो सन्देश निहित है ,वह तो महत्वपूर्ण है ही लेकिन जिसने इसे बनवाया उस महान मार्गदर्शक के पवित्र प्रेम की खुशबू यहाँ के कण-कण में महसूस होती है |

इस संग्रहालय में निरंकारी मिशन के इतिहास और सिद्धांतों को बहुत कलापूर्ण ढंग से दर्शाया गया है |इसमें उस समय की नवीनतम तकनीक का इस्तेमाल किया गया है |निश्चय ही इस पर करोड़ों का खर्च आया होगा लेकिन यह संग्रहालय बाबा जी का एक सपना था जिस पर उन्होंने बहुत मेहनत की |

जहाँ से भी उन्हें कोई कारीगर मिला ,बिना उसका कोई विपरीत पक्ष देखे उन्होंने उसके गुण को महत्व दिया ताकि सन्तोख सरोवर के इस तट को ज्ञान की जीवंत रोशनी से सुसज्जित किया जा सके |

खर्च का जहाँ तक सवाल है,जहाँ बाबा हरदेव सिंह जी महाराज जैसे मसीहा के सपने का प्रश्न है वहां कोई भी खर्च अर्थपूर्ण हो जाता है चूंकि सतगुरु के सपने स्वयं से ज्यादा पूरे विश्व के इंसानो की भलाई के लिए हुआ करते हैं |

बाबा हरदेव सिंह जी का जीवन जहाँ बहुत सहज था वहां बहुत सरल भी था |

प्रसंग में बताया गया कि संग्रहालय के सिद्धांत खंड का निर्माण हो रहा था |जिन लोगों को वहां सेवा मिली हुई थी वे सज्जन और बाबा हरदेव सिंह जी स्वयं वहां मौजूद थे |

इस सग्रहालय में जहाँ ज्ञान को लेखन पक्ष द्वारा प्रस्तुत किया गया है वहीं उसे प्रकट करने के लिए चित्रों को भी माध्यम बनाया गया है ताकि अशिक्षित भी उन पवित्र भावनाओं को महसूस कर सके |

संग्रहालय  के  सैद्धांतिक पक्ष को दर्शकों के ह्रदय में उतारने के लिए ऐसी फोटो चाहिए थी जो उसके भी ह्रदय में उतर जाए जो कोई भाषा नहीं जानता |जो सेवादार वहां मौजूद थे ,उस टीम में एक-दो लोग ऐसे भी थे जिन्होंने ब्रह्मज्ञान नहीं लिया हुआ था अर्थात जो निरंकारी मिशन से जुड़े हुए नहीं थे |

सब लोग अपनी-अपनी बात कह रहे थे -बीच में ऐसे व्यक्तियों में से एक सज्जन ने बोलने की अनुमति मांगी |

उस सज्जन ने विनम्रतापूर्वक कहा-सिद्धांतो को प्रकट करने के लिए मेरे विवेक के अनुसार एक ही चेहरा है ,जिसका फोटो लगना चाहिए,वह है स्वयं बाबा जी का फोटो |बाबा जी की यात्राओं में मुझे साथ रहने का बहुत अवसर मिला है और उन्हें नजदीक से खूब देखा है |कभी भी उन्हें अपने सिद्धांतों से हटा हुआ नहीं देखा |    

 

अंततः वहां कौन सा और किसका फोटो लगाना फाइनल हुआ यह उन्होंने नहीं बताया लेकिन एक गैरनिरंकारी सज्जन ने भी यह महसूस किया कि सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के सबसे बड़े अनुयाई वे स्वयं ही थे |मुझे किसी महान गुरु के बारे में सुना गया यह शब्द याद आ रहा है-आपे गुरु चेला |यह भी लगता है कि हम लोग उनके बोले गए शब्दों को दोहराते ही रह गए लेकिन उनके सक्षम अथवा पूर्ण अनुयाई न बन पाए |     


भक्ति का शिखर

रामकुमार सेवक 

2 मई 2019  (वृहस्पतिवार )को मुझे सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के प्रातःकालीन सत्संग में मुख्य   मंच से विचार प्रकट करने का अवसर मिला |

ऐसे अवसर पर निरंकार प्रभु मुझे एक स्पष्ट सन्देश भेज देता है और वही मेरे वक्तव्य का केंद्रीय बिंदु होता है |आज जो सन्देश मिला ,वह था-अनन्य भक्ति |

अनन्य भक्ति बाबा हरदेव सिंह जी का मेरी दृष्टि में वह सर्वोच्च सन्देश था,जिसकी तरफ हम लोगों ने पर्याप्त ध्यान नहीं दिया |

कुछ समय पहले मालिक ने कृपा की और मुझे इसका करीब से एहसास करने का अवसर मिला ,जिसे मैंने अपने ब्लॉग पर पिछले दिनों लिखा भी था |

आज जो नयी बात कही गयी वह यह थी कि-तू ही निरंकार भक्ति की शुरूआत है लेकिन यह अंत नहीं है |अंत तो है-एकत्व और यदि दूसरा शब्द उपयोग में लाएं तो कहेंगे-अनन्य भक्ति |

अनन्य का अर्थ है कि निरंकार अब अन्य नहीं है |अनन्य भक्ति का अर्थ है कि मेरे हाथों से यह लिखता है|पैरों से यह चलता है और वाणी से यह  बोलता है |

इस अवस्था में अब यह तू नहीं रहा,बल्कि मैं हो गया है |अब यदि मैं स्वयं को निरंकार कहूँ तो यह संदेह पैदा कर सकता है इसलिए मेरा सुमिरन अब भी शब्दों में तो तू ही निरंकार ही रहेगा लेकिन एहसास के धरातल पर मैं और तू का भेद ख़त्म हो जाएगा |

इस बात को सन्त-महात्माओं तक सही तरह पहुंचा पाना एक चुनौती थी इसलिए अपनी तरफ से बात कहकर मैंने विदा ली |

पूरे दिन मुझे यह भय लगा रहा कि महापुरुष अगर इस एहसास तक नहीं पहुँच पाए और मेरे बारे में गलत राय बना बैठे तो क्या होगा ?

यदि किसी ने पूछ लिया कि भक्ति का अंतिम सत्य क्या है तो फिर क्या उत्तर दूंगा |रोज की तरह गहरी नींद सोया लेकिन जब जागा तो यह दोहा ज़हन में गूँज रहा था-

तू-तू करता तू भया,मुझमें रही न हू

आपा-परका मिट गया,जित देखूं तित तू |

शुरूआत हुई तू ही निरंकार से |तू -तू करते भीतर का मैं का भाव मिट गया |इसका परिणाम यह हुआ कि अपने -पराये का भाव समाप्त हो गया |यह है वह अवस्था,जो अनन्य भक्ति को प्रकट करती है और यही भक्ति का शिखर भी है |

यह शिखर ही वह सिंहासन है,जिस पर कबीर चढ़े थे ,तभी तो कह पाए-

अब तो जाइ चढ़े सिंहासन ,मिलबो सारंग पानी

राम-कबीरा एक भये हैं,कोई न सके पहचानी    


व्यवहार में समर्पण का विशिष्ट प्रसंग

रामकुमार सेवक 

वार्षिक संत समागम के कुछ दिन पहले की बात है ,बाबा गुरबचन सिंह जी के निकट सहयोगी ,निष्ठावान शिष्य और अनेक कलाओं में निपुण गुरमुख, महात्मा मान सिंह जी सरोवर में नहाने गए |जब वे नहा रहे थे ,उनसे  किसी ने कहा कि बाबा जी आये हैं |यह समय बाबा हरदेव सिंह जी के कार्यकाल  का था |

बाबा जी उन्हें अपने बचपन से ही जानते थे और सम्मान करते थे |बाबा जी  के आने की बात सुनकर मान सिंह जी तुरंत बाहर आ गए |मान सिंह जी ने भी बाबा जी को बचपन से ही देखा था |

जब उन्होंने बाबा जी को नमस्कार की तो बाबा जी ने कहा-चाचा जी,आपको तो मुंदरी (अंगूठी )पहनने  का बहुत शौक है |मुंदरी हाथ में दिख नहीं रही ?

बाबा हरदेव सिंह जी की यह व्यक्तिगत खूबी थी कि छोटी से छोटी बात  भी उनकी स्मृति से उपेक्षित नहीं होती थी | दूसरे की पसंद-नापसंद और भावनाओं को वे बहुत महत्व देते थे |

उस्ताद मान सिंह जी,जिन्हें आदरणीय निर्मल जोशी जी निरंकारी विश्वकर्मा कहा करते थे क्यूंकि वे ड्राइवर ,चिनाई मिस्त्री,मोटर मैकेनिक ,बढ़ई,फोटोग्राफर आदि अनेक काम जानते थे ,हाथ जोड़कर बोले-हुजूर सरोवर में नहा  रहा था |आपके आने की ख़ुशी में मुंदरी का ध्यान ही नहीं रहा लेकिन आपके सामने मुंदरी की क्या कीमत है ?

बाबा जी ने कहा-चिंता मत कीजिये ,समागम से पहले सरोवर की सफाई होनी है ,उस समय मुंदरी मिल जायेगी |

महात्मा ने कहा -कोई बात नहीं |जब वे वापस लौटने लगे तो बाबा जी ने अपनी उंगली की अंगूठी उतारकर उन्हें पहना दी |

कुछ समय बाद सरोवर की सफाई हुई तो मान सिंह जी की अंगूठी मिल गयी |उनकी अंगूठी उन तक पहुंचा दी गयी |

  कुछ दिनों बाद भूमि सेवा का अभियान चला |सब महात्मा सेवा कर रहे थे | सेवा का आदेश आया तो मान सिंह जी ने दोनों अंगूठियां सेवा में डाल दी |

बाबा हरदेव सिंह जी की पारखी नज़र से यह चीज छिपी न रही |संगत के बाद स्टेज के पीछे फिर महाराज ने कहा-एक अंगूठी तो उठा लो |

मान सिंह जी ने कहा-महाराज ,दी हुई सेवा वापस लेना मेरे हिसाब से ठीक नहीं है |

महाराज जानते थे कि महात्मा को अंगूठी पहनने का शौक है इसलिए बाबा जी ने ऐसे महात्मा के शौक को पूरा करना जरूरी समझा जिसने बाबा गुरबचन सिंह जी के साथ कंधे से कन्धा मिलाकर सेवा की लेकिन स्वयं सुदामा की तरह संतोषी ही बने रहे |शायद इसीलिए बाबा जी ने उनके समर्पण के बावजूद उनके शौक का भी ख्याल रखा |  उनकी भक्ति को बाबा जी ने फिर महत्ता दी और एक बार फिर अपनी अंगुली से अंगूठी  उतारकर उन्हें पहना दी |

महात्मा मान सिंह जी के छोटे बेटे गुरविंदर सिंह जी की शारीरिक आयु मेरे आस-पास की है |दिल्ली आने पर जब युवा सत्संग में मेरी सक्रियता बढ़ी तो उनसे दोस्ती हुई |पहली बार अर्थात 1994के आस-पास जब रक्तदान का ध्यान बना तो गुरविंदर जी मेरे साथ थे |इस बार भी जब 24अप्रैल को मैं रक्तदान की लाइन में लगा था तो  वे मुझसे आगे थे |एक बार फिर हम रक्तदान की पंक्ति में साथ थे |

पहली बार जब हम यह सेवा करने के इच्छुक थे तब स्कूल हॉल में रक्तदान शिविर लगा था और बाहर सत्संग हो रहा था |

हॉल पूरा भर गया तो सेवादल ने हॉल के गेट बंद कर दिए |हमारे एक सहयोगी और मित्र गुरदीप कोमल जी भी हमारे साथ थे |जवानी के जोश में हमने यह तय किया कि हॉल के अंदर घुस जाना है तब तो रक्तदान हो ही जाएगा |गुरदीप जी के एक मित्र सेवादल में हॉल में ड्यूटी पर थे |उन्होंने दोस्ती का लिहाज किया और मुझे पहली बार रक्तदान का अवसर मिला |

इस बार ऐसी नौबत नहीं आयी और सहजता से यह सेवा हो गयी |उस समय गुरविंदर जी ने अपने पिताजी को बाबा हरदेव सिंह जी द्वारा अंगूठी देने का यह पूरा प्रसंग सुनाया |इस प्रसंग ने हमें भक्तवत्सल सतगुरु की याद तो ताजा कराई ही पुराने भक्तों का समर्पण भाव भी हमें प्रेरित कर गया |   


रिश्तों की पिच पर बल्लेबाज़ी कैसे करनी चाहिए ?

रामकुमार सेवक

कई वर्षों के बाद इन दिनों मेरी,अपनी एक बहन से बात हुई |वे जन्म से मेरी बहन नहीं हैं लेकिन लगाव बहुत गहरा रहा है | कई साल यह फासला इसलिए रहा क्यूंकि मेरे पास उनका मोबाइल न.नहीं था | और यह भी कि वो शहर मुझसे वर्षों पहले छूट चुका है,जिसमें वे रहती हैं |

पिछले दिनों उनकी बेटी ने मुझे फोन किया तो मैंने पाया कि जिसे मैंने चौथी कक्षा में पढ़ाया था अब वह चालीस साल की परिपक्व गृहिणी है लेकिन मेरी दृष्टि चौथी कक्षा की मेधावी छात्रा पर ही रुकी हुई है |उसी ने बहन का मोबाइल न. मुझे एस एम् एस किया और हम बहन भाई को जोड़ दिया |

इस दृष्टि से वो बच्ची,जो अब परिपक्व गृहिणी है मुझसे ज्यादा व्यवहारकुशल है |  

जो फासला इतना लम्बा हो गया था,उसने एक कॉल करके उसे पाट दिया |

मैंने वर्ष 2008  में एक किताब लिखी थी -जीने की राह |वह मेरे एक बदजुबान अफसर की एक अपमानजनक टिप्पणी के जवाब में लिखी गयी थी |

किताब इतनी बढ़िया थी कि जो उसे हाथ में लेता था पढता ही चला जाता था |मेरे गैर निरंकारी दोस्तों को भी वह बहुत पसंद आयी थी | यह किताब सुबह से शाम तक का सफर है |स्वास्थ्य से लेकर मुक्ति से आनंद तक को दो खण्डों में समेटा गया है |पहले खंड में ग्यारह अध्याय हैं--1-धन्यवाद 2-स्वास्थ्य 3-कर्म 4-कर्तव्य 5-विश्व के प्रति 6-राष्ट्र के प्रति 7-समाज के प्रति 8.परिवार के प्रति (कर्तव्य की व्याख्या के बाद बारी आती है अधिकार की इसलिए नौवां अध्याय है-)अधिकार ,10-परखने की कला ग्यारहवां और इस खंड का अंतिम अध्याय है-सबसे बड़ा साथी-धैर्य

दूसरे खंड का नाम है-सुखी जीवन की ओर |इसमें कुल बारह अध्याय हैं ,जिनमें विश्वास से लेकर मुक्ति तक की यात्रा को समेटा गया है |

एक पाठिका ने तो मुझसे कहा कि मैं बच्चों की परवरिश पर भी उतनी ही आसान किताब लिखूं लेकिन कोई भी किताब पाठकों तक पहुँचाना बहुत कठिन काम है |मैंने काफी कोशिश की लेकिन मार्केटिंग की समस्या पर विजय न पा सका लेकिन मैं कहना चाहता हूँ कि उस बेटी ने मुझे एक नया सबक सिखाया है |यदि यह सबक मैंने 2008 के आस पास  तक सीखा होता तो जीने की राह पुस्तक के दोनों खण्डों में से किसी एक में एक नया अध्याय अवश्य जुड़ता |

इस नए सीखे अध्याय के बारे में मुझे यही कहना है कि सांसारिक जीवन का ताना -बाना वर्ग पहेली की तरह होता है जिसे धैर्यपूर्वक सुलझाना होता है |रिश्तों की पिच पर हम लोग खेल खेलते हैं |सबको पता है कि कोई रिश्ता स्थाई नहीं है लेकिन मृत्यु से पहले वह ख़त्म भी नहीं हो सकता |

एक पक्ष यदि इस दुनिया से चला भी जाए तब भी यादों में वह रिश्ता जीवित रहता है |वह हमें सुकून भी देता है और कभी -कभी तड़पाता भी है जिसका असर हम मन ही मन में यूँ पीते हैं जैसे शहद की बोतल में नीबू का रस भरा हो अर्थात -मिठास की जगह खटास |

ऐसा लगता है कि रिश्तों की पिच पर हम वो प्रवीणता नहीं दिखा पाते जो दिखलानी चाहिए थी |उस बेटी ने एक फ़ोन करके रिश्तों की सूखी नदी को हरा-भरा कर दिया जबकि  मुझमें  यह  दूरी  पाटने  का  साहस  न  था |एक प्रकार का भय था जिसका अस्तित्व मेरे मन के सिवा और कहीं न था जबकि भांजी के मन में ऐसा कोई भय न था इसलिए वह बिलकुल स्पष्ट थी  |इस प्रकार उसने अपने आपको जोड़ने वाला अर्थात धर्म का काम करने वाला सिद्ध किया क्यूंकि बाबा जी कहा करते थे-धर्म जोड़ता है,तोड़ता नहीं | उसने जोड़ने की कोशिश की और वह कामयाब हुई |

मैंने अनेक बार देखा है कि अपने संकोची स्वभाव के कारण हम जिस दूरी को पाटने की हिम्मत नहीं कर पाते यदि किसी चमत्कार के कारण या अन्य किसी मजबूरी के कारण हम उस फासले को फांदकर उस प्रियजन तक पहुंच जाते हैं तो वो अनुभव हमें ऐसी ख़ुशी प्रदान कर सकता है कि हम स्वयं हैरत में पड़ जाएँ |उस सरप्राइज के वक़्त हम उतनी मिठास का एहसास कर सकते हैं जितना कि संभव है |

इस परिपेक्ष्य में मुझे लगता है कि हमें रिश्तों की पिच पर भी उसी संकल्प शक्ति के साथ ,आनंद लेते  हुए  खेलना चाहिए जितना कि एक खिलाड़ी छक्का लगाने की संकल्प शक्ति के साथ खेलता है लेकिन खेल का पूरा आनंद लेते हुए |खेल का आनंद भी और उपलब्धि भी |

रिश्तों की मिठास अथवा कड़वाहट को खेल के उतार-चढ़ावों की तरह enjoy (आनंद) करना चाहिए |                                                                                                                                                                                      



साधु के बोल को सुनना और आगे सुना देना क्यों काफी नहीं है ?
रामकुमार सेवक

             

साधु का जो बोल भी आये  सुनना और सुनाना है ....दो बातें हैं- सुनना और सुनाना |एक कान से सुना और जुबान से सुना दिया ,क्या यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति है ?
मेरे ख्याल से यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति नहीं है क्यूंकि बहुत पहले एक कहानी पढ़ने को मिली थी |
एक राजा के दरबार में एक कारीगर आया |उसके पास तीन मूर्तियां थीं ,जो तीनो दिखने में एक जैसी थी |उसने राजा से एक-एक मूर्ति का  का मूल्य बताने को कहा-राजा ने तीनो का एक जैसा मूल्य बता दिया |
कारीगर ने इस पर यह आपत्ति की कि दिखने में मूर्तियां एक जैसी हैं लेकिन वास्तव में एक जैसी नहीं हैं |इनके गुणों के अनुसार इनकी कीमत तय होनी चाहिए |
राजा ने कारीगर से उनकी वास्तविक विशेषता बताने को कहा |कारीगर ने कहा-यह तो आपको खुद खोजनी होगी |
राजा तो आदेश देते हैं ,काम करना तो कर्मचारियों का काम है |राजा के आदेश से मंत्री को कीमत बताने का जिम्मा दिया गया |मंत्री ने एक तिनका लिया-पहली मूर्ति के कान में डाला तो वो दूसरे कान से निकल गया -उसकी कीमत सबसे कम आँकी गयी |
दूसरी मूर्ति के कान में जब तिनका डाला तो वह  उसके मुँह से निकल गया अर्थात सुन भी लिया और सुना भी दिया लेकिन यह सर्वश्रेष्ठ स्थिति नहीं है |
सर्वश्रेष्ठ स्थिति तो यह है-
मनिये जेकर बचन गुरु दा, उसतत  गुरु दी होवेगी
आपे सिमरन होवेगा ते दुरमत दूर खलोवेगी  |
बात फिर वहीं पहुँचती है जहाँ से शुरू हुई थी -सुनना और सुनाना
मुझे लगता है कि सुनने के बाद समझना जरूरी है |गुरु ने निरंकार का ज्ञान दिया लेकिन हमने इसे ब्रह्मज्ञानी की पदवी के अहंकार में परिवर्तित और सीमित कर दिया |
गुरु की बात सुनकर अर्थात गुरु से ज्ञान की बात सुनने के बाद अगला चरण है -निरंकार के ज्ञान को समझना  
पंजाबी भाषा के किसी कवि ने क्या खूब लिखा है-अक्ल मिली सी समझण दे लई लग पई समझावण |
 
यथार्थ को समझे बिना उपदेश देने शुरू कर देना ऐसा ही है जैसे नाव चलानी सीखे बिना लोगों को नदी से पार उतारने का धंधा शुरू कर देना
हमारी खुशकिस्मती है कि गुरु ने हमें परमात्मा का लिंक देकर ही नहीं छोड़ दिया जब कि ज्यादातर लोग लिंक ही बताते रहते हैं |पूरा दर्शन शास्त्र ,धर्म शास्त्र परमात्मा का लिंक ही  है लेकिन बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे -अनन्य भक्ति |
जैसे दूध को सिर्फ देखना नहीं होता बल्कि उसे पीना होता है इसी प्रकार परमात्मा के ज्ञान को अपने भीतर ले लेना |
यह सोऽहं अर्थात अहम ब्रह्मास्मि की अवस्था है |दिन के बाद रात है इसी प्रकार सुख के बाद दुःख हैं |लेकिन अनन्य भक्ति से ऊपर कुछ नहीं है इसलिए सतगुरु ने जो हमें ब्रह्मज्ञान प्रदान किया है इसे जितनी जल्दी समझ लिया जाए बेहतर है और परमात्मा ने हर किसी को यह तौफ़ीक़ दी है अर्थात वह यदि चाहे तो परमात्मा को समझ सकता है क्यूंकि इशारा हमें पता है और दिशा हमें लगातार मिलती रही है ,ज़रुरत बस सही दिशा में बढ़ने की है अर्थात अनन्य भक्ति की उपलब्धि हासिल करने की है |धन निरंकार जी           


यह विजन ही गुरु को भगवान से ऊंचा दर्ज़ा देता है 

रामकुमार सेवक

वातावरण कुछ ऐसा है कि मुस्लमान हिन्दू से डर रहा है और हिन्दू मुस्लमान से |गहराई से देखें तो इन दोनों के डर का कारण है -अज्ञानता |अज्ञानता के कारण ही उत्पन्न होता है- शक -संदेह |यह अज्ञानता ही है जो एक-दूसरे पर शक करने के लिए उकसाती है और इंसान प्रायः समदृष्टि की भावना को त्याग देता है |

भारत में आजकल चुनावों का दौर है |यह हमारे प्रजातंत्र की विशेषता है कि बिना खून बहाये सत्ता परिवर्तन हो जाता है लेकिन कुछ लोग हमें डरा भी रहे हैं कि फलां को वोट दो नहीं तो धर्म खतरे में आ जाएगा |

चुनावों के दौर में ऐसी चर्चाएं पहले भी होती रही हैं लेकिन बाबा गुरबचन सिंह जी (जिनका स्मृति दिवस 24  अप्रैल को हमने मनाया |कई वर्षों  के बाद मेरा ब्लड प्रेशर और हीमोग्लोबिन उस दिन सामान्य था और मैं बाबा गुरबचन सिंह जी की स्मृति में रक्तदान कर सका |यद्यपि दान शब्द मुझे शत प्रतिशत स्वीकार नहीं है ,इसकी चर्चा फिर कभी करेंगे ) 

बात हो रही थी धर्म के खतरे की ,यह बाबा गुरबचन सिंह जी का ही युग था जब हमने रामलीला मैदान दिल्ली में कहा-फिरकापरस्ती-तंगनज़री से हमारी जंग है तथा प्यार हमारा धर्म है इंसानियत इमान है |

बाबा गुरबचन सिंह जी और बाद में बाबा हरदेव सिंह जी ने हमें यह शिक्षा दी कि-मिलकर रहना ,प्यार करना धर्म है-ईमान है |

इन शिक्षाओं के बावजूद अक्सर हम चुनावी दौर में बह जाते हैं और पांच प्रण और गुरुओं की शिक्षाओं को भूलकर एक पक्ष बन जाते हैं |यहाँ सहज ही मेरे मन में प्रश्न उभरता है कि भक्त होने के दावों के बीच क्या किसी वर्ग विशेष के साथ खुद को बांध लेना जरूरी है ?(जो लोग किसी राजनीतिक पार्टी और विचारधारा से सम्बद्ध हैं ,उनकी बात और है )लेकिन एक मतदाता के रूप में ,|मुझे लगता है-नहीं |

 हमें किसी से डरकर अपने मताधिकार का प्रयोग नहीं करना चाहिए बल्कि सदैव अपने विवेक को जाग्रत रखना चाहिए | 

मताधिकार बहुत महत्वपूर्ण है इसलिए किसी के दबाव या प्रभाव में इसका उपयोग नहीं करना चाहिए बल्कि विवेकपूर्ण ढंग से इसका इस्तेमाल करना चाहिए |

निरंकारी मिशन पूर्णतः आध्यात्मिक मिशन है हमारे गुरु ने कभी भी एक मतदाता के रूप में प्राप्त हमारी स्वतंत्रता में हस्तक्षेप नहीं किया और अब भी हम इस पवित्र कर्तव्य और संवैधानिक अधिकार के प्रयोग हेतु स्वतंत्र हैं |

परिस्थितियों के अनुसार जीवन में उतार-चढ़ाव आते रहे हैं लेकिन शाश्वत शिक्षाएं सदैव से वही रही हैं |                           

अस्सी के दौर में जबकि निरंकारी मिशन बहुत गंभीर परिस्थितियों का सामना कर रहा था ,बाबा गुरबचन सिंह जी का बलिदान हो गया |लोगों के दिलों में क्षोभ था और रोष भी था जो कि जल्दी ही प्रतिशोध में बदल गया |

सैद्धांतिक रूप से यह ज्यादा गंभीर स्थिति थी क्यूंकि अध्यात्म मानता है जन्म-मृत्यु प्रभु द्वारा किया गया कार्य है |इस परिपेक्ष्य में प्रतिशोध की गुंजाइश बचती नहीं है |बाबा गुरबचन सिंह जी स्वयं हिंसा के ऊपर सहनशीलता को महत्व देते थे लेकिन जनसमूह हमेशा भावनाओं की भाषा बोलता और समझता है |सिद्धांतों की गहराई जनता नहीं समझती लेकिन समझनी चाहिए |हिंसा और तनाव से बचाकर अध्यात्म की पवित्रता सबके मनो में स्थापित करना एक बड़ी चुनौती थी ,जिसे बाबा हरदेव सिंह जी ने तप-त्याग और सूझ-बूझ से सुलझाया |  

संगतों को सम्बोधित करते हुए एक प्रवचन में उन्होंने कहा-हमारा कोई बच्चा भ्रमित हो जाता है तो कोई भी इंसान दुखी होगा लेकिन वह कभी भी उसके मर जाने की प्रार्थना नहीं करेगा |वह हमेशा यही प्रार्थना करता है कि मेरा बच्चा सही रास्ते पर आ जाए |

सन्त-महात्मा पूरे संसार को अपना ही परिवार मानते हैं,इस दृष्टि  से हम सब एक ही परिवार के सदस्य हैं |महात्मा कहते हैं-पहला सबक है,किताबे हिदा का ,मखलूक सारी है कुनबा खुदा का | हमें सदैव हर किसी का भला ही सोचना और करना है |

उन्होंने कहा कि बाबा गुबचन सिंह जी मेरे गुरु भी थे और पिता भी थे |सबसे पहले मेरे मन में बदला लेने का ख्याल आना चाहिए था लेकिन उनकी प्रेम व् सांझीवालता की शिक्षाओं ने बदले की भावना को दबा दिया |यह था उनका विजन अर्थात सोचने का आध्यात्मिक ढंग |

यह विजन ही गुरु को सर्वोच्च दर्ज़ा देता है |यदि किसी गुरु में इतनी विशालता नहीं है तो मानना चाहिए कि पूरी जय-जयकार के बावजूद वह गुरु नहीं है |बर्फ में यदि ठंडक न हो तो उसे बर्फ कहना न्यायोचित नहीं है | 

बहरहाल हमें सदैव सम्पूर्ण अवतार बाणी की ये पंक्तियाँ स्मरण रखनी चाहिए-

हिन्दू-मुस्लिम -सिख-ईसाई इक्को रब दे बन्दे ने 

बन्दे समझके प्यार है करना चंगे भावें मन्दे ने |  


फूल-कांटा और निरंकार 

रामकुमार सेवक 

फूलों को हम देखते हैं |उससे प्रेम उत्पन्न होता है |यह भी हो सकता है कि देखा बाद में हो,प्रेम पहले से ही हो |

यह बात कुछ अटपटी लगती है |सिद्धांत कहता है-देखोगे तो प्रेम होगा लेकिन अनुभव किसी सिद्धांत से निर्धारित नहीं होता |हाँ,लेकिन सिद्धांत भी अनुभवों की आधारशिला पर ही निर्धारित होते हैं | 

खैर,मैं सिद्धांत वैसा ही रहने देकर दोबारा फूल पर आता हूँ कि फूल हमने देखा ,उससे प्रेम हुआ |उस पर हमने कविता लिखी |

सिद्धांत है-तेरा रूप है यह संसार |इस सिद्धांत के अनुसार फूल भी परमेश्वर का रूप है ,साथ ही कांटा भी दिख रहा है |सिद्धांत के अनुसार यह भी परमेश्वर का ही रूप है लेकिन माला में हम फूल का उपयोग करते हैं कांटे का नहीं बल्कि कांटे को यथासंभव फूल से अलग करते हैं अन्यथा वह हमारे इष्ट को नाराज़ कर सकता है |माला पहनाने का उद्देश्य की पूर्ति खटाई में पड़ सकती है इसलिए परमेश्वर के एक रूप को स्वीकार कर लेते हैं,दुसरे को छोड़ देते हैं | चलिए ,हार बनाने की हमारी कोई मंशा नहीं है क्यूंकि हमें किसी की चाटुकारिता नहीं करनी ,इस स्थिति ममें फूल डाली पर ही तरोताज़ा रहता है 

सोचने की बात यह है कि खिले हुए फूल को देखकर एक भक्त का ध्यान कहाँ जाना चाहिए ?

फूल को देखकर मेरा ध्यान निरंकार की ओर जाना चाहिए  कि निरंकार के आधार पर ही इस प्राकृतिक सुषमा का निर्माण हुआ |

    जब मेरा ध्यान आधार तक चला गया तो फिर फूल भी मेरे लिए पूज्य हो गया ,सिद्धांत को देखें तो कांटा भी पूज्य है लेकिन न हम फूल की पूजा करते हैं न कांटे की |फूल का भी उपयोग करते हैं और कांटे का भी |

निष्कर्ष यही कि -मैं तो पुजारी हूँ रोशनी का -----|

मैं फूल या कांटे के स्थूल रूप को नहीं देखता ,इसका आधार जो विराट सत्ता है ,इसे देखता हूँ | इसे देखता हूँ तो सूक्ष्म स्तर पर मेरी पूजा शुरू हो जाती है |धन निरंकार जी


कब और कैसे हुआ अनन्य भक्ति का एहसास 

रामकुमार सेवक 

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज प्रायः अनन्य भक्ति का जिक्र किया करते थे |जब मैं यह सुनता तो यह शब्द एक कान से भीतर जाता और दूसरे कान से बाहर आ जाता था |व्यवहार के धरातल पर यह एक असंभव अवस्था लगती थी |इसके एहसास को मैं इस शाश्वत सत्ता की कृपा ही मानता हूँ |

शनिवार (13 /04 /2019 )की सुबह तीन बजकर बीस मिनट पर नींद खुल गयी |आसान उपाय था कि रोज की तरह भजन सुनता लेकिन यह घोर रात्रि का समय था ,इस समय कंप्यूटर पर भजन चलाना सभ्यता के विरुद्ध था इसलिए निरंकार में ध्यान लगाने की कोशिश की लेकिन ध्यान का मुझे उचित अथवा सही प्रकार का अभ्यास नहीं है इसलिए कंप्यूटर पर काम करने लगा |पांच बजे मैंने काम बंद किया और सो गया |

सुबह जब पांच बजे मैं उठा था और निरंकार से सम्बन्ध बनाया था तब मैंने अनन्य भक्ति की अवस्था का एहसास किया |

उस समय मेरे पास अन्य कोई उपाय ही नहीं था क्यूंकि सुमिरन जिन शब्दों द्वारा किया जाता है,वे पीछे छूट चुके थे |शरीर की नसें,गुर्दे ,फेफड़े आदि की सक्रियता निरंकार के अस्तित्व का प्रमाण हो चुकी थी |

अनन्य शब्द अन्य का विपरीत शब्द है |जब तक हम निरंकार को तू मानते हैं तब तक निरंकार दूसरा अथवा अन्य होता है |जब निरंकार मुझे अपनी नसों -फेफड़ों-गुर्दों-साँसों में महसूस होना शुरू हो जाता है तो फिर जो अवस्था बनती है जिसके लिए बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ने फ़रमाया था-

एको पढ़या ते एको डिट्ठा -कौन कहे तू दो है 

हस्ती छड़ के वेख बुल्लेशाह ,जिसका नाम जपे तू वो है |

यह एकत्व मुझे महसूस हो रहा था |

मुझे लगता है कि यह जीवन की सर्वोच्च अवस्था है |  

नींद खुली सुबह सात बजे जबकि रोज का नियम छः बजे का है लेकिन वायरल के कारण पिछले तीन दिनों से दवाइयां खाने की वजह से नींद का नियम बिगड़ गया था |

सुबह उठते ही शरीर ने कहा-हिम्मत नहीं है लेकिन मेरा नियम है कि शनिवार की सुबह की संगत में जाना है |

तू ही -तू ही निरंकार के सुमिरन के माध्यम से निरंकार से सम्बन्ध बनाया |मुझे कबीर जी की यह पंक्ति ध्यान में आ रही है-

तू तू करता तू भया, मुझमें रही न हूं।

बारी तेरे नाम पर, जित देखूं तित तूं।।

तू ही तू का एहसास जब गहरा होता है तो मैं अथवा शरीर होने का भाव जैसे विसर्जित हो जाता है |यह एक पवित्र भाव है जो हमारे अस्तित्व को तीर्थराज प्रयाग के रूप में परिवर्तित करने की क्षमता रखता है |एकत्व का सम्बन्ध जुड़ते ही शरीर खड़ा हो गया और आदेश-अनुदेश मिलने शुरू हो गए |उनका पालन करने की ताक़त भी मिलती गयी और सुबह आठ बजे मैं सत्संग में हाजिर हो चुका था |

यह आदर्श स्थिति तो नहीं थी लेकिन ख़राब भी नहीं थी |मैंने बचे हुए समय की सब गतिविधियों (प्रवचन श्रवण )का भरपूर आनंद लिया |धुनि के दौरान निरंकार ने बता दिया था कि मैं (शरीर अब )पूर्णतः स्वस्थ हूँ |

इस अवस्था का सत्यापन उस समय भी हो गया जब 14 /04 /2019 (रविवार )को साप्ताहिक सत्संग में महात्मा ने अपने विचारों के अन्त में कबीर साहब का यह प्रसंग सुनाते हुए कहा कि-किसी सज्जन ने कबीर जी की भक्ति के सम्बन्ध में उनसे कहा-आप किस प्रकार की भक्ति करते हैं क्यूंकि कुछ क्रियाविशेष तो करते दीखते नहीं | 

कबीर जी ने कहा-मैं जब भोजन करता हूँ तो भोग लग जाता है |जब मैं चलता-फिरता हूँ तो परिक्रमा हो जाती है और जब मैं विश्राम करता हूँ तो दंडवत प्रणाम हो जाता है |

महात्मा ने अपने प्रवचन में जब यह प्रसंग सुनाया तो ह्रदय को अत्यंत शांति का एहसास हुआ |

पता चल गया कि यह है अनन्य भक्ति जो कि मानव जीवन की सर्वोच्च अवस्था है |धन निरंकार जी | 


स्मृति- निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी

ऐसे थे वे 

-रामकुमार  सेवक

निरंकारी मिशन के तीसरे सत्गुरु बाबा गुरबचन सिंह जी महाराज(1930-1980) कहा करते थे कि किसी बोतल में यदि ज़हर भरा हो और उसके ऊपर जो लेवल चिपका हो,उस पर अमृत लिखा हो तो पीने वाला ज़रूर मरेगा |भले ही बोतल  पर लेबल अमृत का लगा है लेकिन यह लेबल किसी को मरने से नहीं बचा सकता |इसी प्रकार  लेबल यदि ज़हर का हो और अंदर अमृत हो तो पीने वाला मरेगा नहीं |इससे यह बात स्पष्ट हो जाती है कि महत्ता लेबल की नहीं बोतल में भरे पदार्थ की है |

बाबा जी ने कहा था कि किसी धर्म,जाति ,वर्ण आदि के लेबल मनुष्य की वास्तविक पहचान नहीं हैं |वास्तविक पहचान है मनुष्य की भावना |यदि उसमें मानवता,प्रेम,विशालता ,सहनशीलता आदि के गुण  हैं तो वह वास्तव में धरती के लिए वरदान है भले ही उस पर लेबल किसी भी विचारधारा या धर्म का क्यों लगा हो |

बाबा गुरबचन सिंह जी सात्विक जीवन जीने के हिमायती थे |अपने अनुयाइयों को उन्होंने प्रेम ,शांति व् विशालता का सन्देश दिया |निजी जीवन में भी वे दिखावेबाजी से दूर थे |वे धरती से जुड़े मेहनती इंसान की भांति कड़ी मेहनत करते थे |1948 में देश के विभाजन के बाद वे दिल्ली में आकर बसे और लोगों को मिलवर्तन ,प्रेम व् भाईचारे का सन्देश दिया |

कुछ लोग उन्हें पसंद नहीं करते थे लेकिन बाबा जी के मन में उनके लिए भी प्रेम था |उन्हें काले झंडे दिखाने  वालों के प्रति भी रोष नहीं था |उनके प्रति भी विशाल भाव प्रकट करते हुए उन्होंने  उन्होंने कहा- मुझे काली-पीली या नीली झंडियों से कभी दुःख महसूस नहीं हुआ पर जब किसी भी मनुष्य का खून बहता है तो मैं बहुत दुखी होता हूँ |चाहे वह मनुष्य हमारा साथी हो या विरोधी |मनुष्य का खून किसी भी हालत में नहीं बहना चाहिए |अगर किसी के विचार नहीं मिलते तो शांतिपूर्वक बैठकर उस पर विचार करना चाहिए |सन्तों का मार्ग हमेशा अहिंसा ही रहा है |

वे सिर्फ कुर्सी पर बैठकर उपदेश देने वाले सत्गुरु नहीं थे बल्कि खेतों और वर्कशॉप में मेहनत करके अपने व्यवहारिक जीवन से  अपना सन्देश देने वाले महामानव थे |

दिल्ली में बुराड़ी रोड पर स्थित निरंकारी सरोवर आज मनमोहक पर्यटनस्थल का रूप ले चुका है|साठ के दशक में यह एक बाढ़ प्रभावित क्षेत्र  था |हर साल ही बाढ़ जाती थी |जमीन कोई फसल भी देने में अक्षम लगती थी |लोग इसे बंजड़ ज़मीन मानते थे लेकिन बाबा गुरबचन सिंह जी संकल्पशक्ति के धनी महापुरुष थे |परमात्मा की कृपा और अपनी मेहनत पर उन्हें पूरा भरोसा था |उन्होंने उन फैक्टरियों के मालिकों से संपर्क किया जिनका पानी यमुना में गिरता था और आस-पास ही वे अपने काम करते थे |बाबा जी ने उस पानी को संतोख सरोवर के आस-पास स्थित अपने खेतों तक पहुँचाया और यह ज़मीन जिसे बंजड़ कहा जाता था, उपजाऊ हो गयी |

वर्कशॉप में उन्होंने पेट्रोल की गाड़ियों को डीजल की गाड़ियों में बदलने की तकनीक विकसित की |ये सब काम करते हुए भी वे लोगों को निरंकार प्रभु से जुड़ने का सन्देश देते थे |वे मानव मात्र से कहते थे-एक निराकार सर्वव्यापक को मानो लेकिन इसे जानकर |

परंपरागत रूप से भक्त यह मानते थे कि  भक्ति करने के लिए सांसारिक बंधनो को त्यागना पड़ता है |ऐसे सज्जनो को बाबा जी का सन्देश था- भक्ति भागने का नाम नहीं बल्कि अपने सब फ़र्ज़ अदा करते हुए जीवन जीने का नाम है |      

निरंकारी मिशन को उन्होंने दुनिया के लगभग हर देश में पहुंचाने का श्रमसाध्य कार्य किया लेकिन वे कोरे उपदेशक नहीं थे |वे जानते थे कि हमारा देश भारत धर्म अथवा दर्शन के तौर पर चाहे जितना भी विशाल भाव वाला क्यों न हो लेकिन हमारे देशवासी अन्धविश्वास और कुरीतियों के कारण अपने ही जीवन को आसान नहीं बना पा रहे हैं |

1973  में बाबा जी ने नशाबंदी और दिखावेबाजी से बचकर सादगीयुक्त शादियों का आदेश देकर अपने अनुयाइयों के जीवन में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने में सफलता प्राप्त की |

आज सुबह(19 /04 /2019 को ) महात्मा सत्संग में बता रहे थे कि मसूरी में जब कांफ्रेंस शुरू होनी थी ,उससे पहले तक शराब पीना एक आम बात थी |मसूरी चूंकि ठंडा स्थान है और पर्यटनस्थल भी है और वो मई का महीना था तो लोग बोतलें लेकर गए तो जब बाबा गुरबचन सिंह जी ने कहना शुरू किया - हमारा देश एक गरीब देश है |यहाँ की क्लाइमेट (जलवायु )गर्म है |हमारे देश का वातावरण शराब आदि नशे की चीजों के अनुकूल नहीं |वैसे भी नशे आदमी की सेहत पर ,आदमी की बुद्धि पर बुरा प्रभाव डालते हैं |नशे में आदमी को ठीक-गलत की पहचान नहीं रहती |वह बेमतलब लड़ाई-झगडे करता है |थोड़ी आमदनी वालों के घर में इसके कारण भुखमरी रहती है ,क्लेश पड़ा रहता है ,बच्चे आवारा हो जाते हैं |इसलिए मैं चाहता हूँ कि हम सभी प्रण करें कि शराब-अफीम-भांग-गांजा आदि नशीली चीजों का हम किसी भी हालत में इस्तेमाल नहीं करेंगे ,शिष्टाचार या बीमारी के बहाने से भी नहीं |  

यह सुनते ही बाजी उलट गयी और लोगों ने शराब की बोतलें फेंकनी शुरू कर दी |आज सुबह महात्मा बता रहे थे कि हम गुरदासपुर गए |जिनके घर में बैठे थे वहां बहन जी से हमने कहा कि बहन जी,घर में अब तो सुख की काफी चीजें टी.वी.फ्रिज आदि दिखाई दे रही हैं तो उन्होंने कहा,मसूरी में आदेश आया तो शराब बंद हो गयी और घर की माया घर में ही रहनी शुरू हो गयी और ये चीजें आ गयीं |इस प्रकार बाबा गुरबचन सिंह जी ने परिवारों में क्रांति पैदा कर दी |      मसूरी में उन्होंने निरंकारी मिशन की आंतरिक व्यवस्था को नया रूप दिया |वे प्रदर्शन की भक्ति के विरद्ध थे तथा विनम्रता के पक्षधर थे इसलिए उन्होंने स्पष्ट कहा-ये कोई ओहदे नहीं हैं इसलिए जो जिम्मेदारियां मिली हैं वे सेवा के लिए हैं|मन में यह ख्याल रहे कि सेवा भाव हमेशा रहे |सदा मन में विनम्रता बनाये रखनी है | 

इस परिपेक्ष्य में मुझे लगता है कि आज हमें इस बात पर विचार करने की ज़रुरत है कि लेबल चाहे मुखी का हो ,प्रमुख-संयोजक का हो,या क्षेत्रीय प्रभारी आदि का क्यों हो सवाल यह है कि भीतर गुरमत है या मनमत ?गुरु  के विचार हमारे दोहराने के लिए हैं या अपनाने के लिए हैं ? साध संगत से प्रेम करना चाहते हैं या शासन ?

यदि हमारे भीतर भक्ति वाले गुण हैं तो फिर कोई भी सेवा या पद मुबारक है ,कुछ मुश्किल नहीं लेकिन यदि सिर्फ पद ही पद है तो सिर्फ लेबल किसी का कुछ नहीं संवार सकते |जीवन संवारने के लिए तो भक्ति चाहिए ,गुरमत चाहिए,मुहब्बत चाहिए |धन्यवाद 


मानव एकता  दिवस हो -लेकिन मानवता और एकता के तत्व के साथ 

रामकुमार सेवक  

1978  की 13  अप्रैल को जो सन्त समागम बैसाखी के शुभ अवसर पर अमृतसर में आयोजित किया गया था मेरी जानकारी के अनुसार वह पहला सन्त समागम था,जिसे मानव एकता सम्मेलन का नाम दिया गया था |उससे पहले कभी भी मैंने यह शब्द न पढ़ा और ना ही सुना|

इस शब्द में ऐसा नयापन था कि छात्रावस्था के उन दिनों में मुझे गहराई तक छुआ लेकिन वह सन्त  समागम हिंसा और ज़ुल्म के दौर की शुरूआत सिद्ध हुआ और अंततः बाबा गुरबचन सिंह जी को अपना बलिदान देना पड़ा |

उस सारे घटनाक्रम को मैं दोहराना नहीं चाहता लेकिन इस शब्द की गहराई में आपके साथ उतरना चाहता हूँ |

एक सप्ताह बाद  मानव एकता दिवस है ,जिसकी शुरूआत 1981  में हुई |वह सन्त समागम जो कि बाबा गुरबचन सिंह जी की याद में और बाबा हरदेव सिंह जी के सान्निध्य में दिल्ली के रामलीला मैदान में आयोजित किया गया था |वह अलग ही माहौल था जिसमें अध्यात्म से ज्यादा दर्द शामिल था |तत्कालीन केंद्र सरकार के प्रति आक्रोश भी था जिसे बाबा हरदेव सिंह जी ने बहुत मेहनत और धैर्य से मिटाया और पूरी तरह अध्यात्म से जोड़ने की सफल चेष्टा की |  

इस हिसाब से यह 39  वां मानव एकता दिवस है |सोचने की बात यह है कि क्या मानव एकता संभव है ?सोचने की बात यह भी है कि पिछले 38  सालों में हम इस लक्ष्य की दिशा में कहाँ तक पहुंचे हैं ?

अभी मैं सोच रहा था कि दो गुरुओं को अपने बीच से जाते मैंने देखा |अब भी  मुझे याद आता है बाबा गुरबचन सिंह जी और चाचा प्रताप सिंह के निर्जीव शरीर जो सन्त निरंकारी कॉलोनी के सत्संग हॉल में रखे थे और उनके माध्यम से गुरु के संकल्पों को प्रणाम करने मैं मुराद नगर से अपने माता-पिता के साथ आया था |इस दिन जो संकल्प यात्रा शुरू हुई वह लगातार जारी है |

पिछले 38  सालों में इस दिन को खून का बदला खूनदान से लेने के संकल्प में परिवर्तित होते हुए देखा -यह एक क्रांति थी जिसे बाबा हरदेव सिंह जी ने पैदा किया और दुनिया को दिखा दिया कि बदला लेने का आध्यात्मिक ढंग क्या होता है लेकिन एकता का क्या बना ,यह सोचने की बात है |

एकता स्थूल नहीं सूक्ष्म तत्व है |भौतिक लक्ष्यों के लिए एकता उत्पन्न हो जाना कोई विशेष बात नहीं है |माल लूटने और उसे बांटने के मुद्दे पर चोर और डाकू भी एक होते देखे गए हैं |कुर्सी जब नज़र आती है तो वामपंथी,दक्षिणपंथी ,समाजवादी और पूंजीवादी सब एक होते देखे गए हैं लेकिन ऐसी एकता ने न तो देश का विकास किया है और न ही मानवता को कोई योगदान दिया है |इस प्रकार की एकता का कोई विशेष महत्व नज़र नहीं आता |मानव एकता दिवस में जो एकता का तत्व है वह है अध्यात्म के तत्व को समझने की एकता |निरंकार अथवा ब्रह्म का जो तत्व है उसका एहसास करना आसान नहीं है चूंकि नीयत को स्वच्छ करना पड़ता है |लालच को एक तरफ रखना पड़ता है |      

आज हमें इस मुद्दे पर  ईमानदारी से विचार करना चाहिए कि इतने वर्षों से हमने 24  अप्रैल को मानव एकता दिवस मनाये हैं या बाबा गुरबचन सिंह जी के शहीदी दिवस ?यदि मानव एकता दिवस मनाये हैं तो वर्तमान समय में एकता की क्या स्थिति है क्यूंकि भौतिक चीजों के लिए तो पूरी व्यवस्था का एकजुट हो जाना संभव है लेकिन न्याय अथवा सत्य के लिए एक होना बहुत मुश्किल है |

जो समर्थ हैं ,उनके हितों की रक्षा के लिए एकता होना आसान है लेकिन वंचितों के लिए अथवा मानवता का लक्ष्य हासिल करना है,यह सोचकर एक होना किसी युग में संभव नहीं हुआ |

आध्यात्मिक सतगुरु के लिए जहाँ तक शहीदी दिवस मनाने का सवाल है अध्यात्म में इसकी गुंजाइश नहीं है क्यूंकि अध्यात्म में आत्मा का अध्ययन होता है ,शरीर का नहीं |मानव एकता दिवस ही था ,है और रहना चाहिए लेकिन मानवता और एकता के तत्व के साथ -धन निरंकार जी 


गरीबी हटाने का उनका ज़ज़्बा यदि आगे फ़ैल जाता तो--

रामकुमार सेवक   

बाबा गुरबचन सिंह जी में दृढ निश्चय का गुण प्रचुर मात्रा में था ,जो एक बार वे ठान लते थे उसे करने से उन्हें कोई रोक  नहीं सकता था | आज भी वे मुझे इसलिए याद आते हैं क्यूंकि प्रायः लोग गरीबों से घोर नफरत करते हैं |इसके बावजूद उनके नाम से मिली सरकारी ज़मीने हड़पकर ,उनका अधिकार छीनकर ,उनका शोषण करके निःसंकोच अपनी गरीबी हटा लेते हैं |सत्तर के दशक में भी यह एक बड़ी समस्या थी और आज और भी बड़ी है |

समस्या का बड़ापन अथवा विकरालता तब ख़त्म हो जाती है जब मनो में दया हो,संवेदना हो |बाबा गुरबचन सिंह जी किसी भी समस्या को सरसरी तौर पर नहीं लेते थे बल्कि मूल तक जाकर उसका   समाधान करते थे |

हमारी समस्या यह है कि निरंकारी मिशन में भी अब उनकी तरह सोचने वाले लोग बहुत कम  बचे हैं |

कई वर्ष पुरानी बात है |मुझे ध्यान आ रहा है -संभवतः शनिवार का दिन था |सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के सत्संग हॉल से मैं नीचे उतर रहा था |

मैंने  अपने एक गुरुभाई को देखा |वे वहां प्रसाद के लालच में खड़े चार-पांच गरीब बच्चों को डांटकर भगा रहे थे |

उन बच्चों पर मुझे दया आयी लेकिन चाहकर भी मैं उन सज्जन को रोक नहीं पाया |

ऊपर से सत्संग सुनकर नीचे उतरा था लेकिन यह घटनाक्रम देखकर मेरा स्वाद बहुत ख़राब हो गया |मुझे क्रोध आ रहा था लेकिन उसे प्रकट करना उचित नहीं था |बहरहाल अपनी त्वरित प्रतिक्रिया मैंने अपने एक साथी को बताई कि आज ये बच्चे गरीब हैं लेकिन ये कल भी गरीब होंगे यह सोचना मूर्खता है |न गरीबी स्थाई है न अमीरी इसलिए विनम्रता व् विशालता के अपने सिद्धांतों को हमें कभी भी नहीं त्यागना चाहिए अन्यथा आज का दुर्व्यवहार इन बच्चों को भविष्य में हमारे मिशन के लिए समस्या बना सकता है |अपने साथी से मैंने कहा-यदि उस सज्जन ने विशालता को अपनाया होता तो यह स्थिति पैदा न होती क्यूंकि वहां वितरित होने वाला प्रसाद हम लोगों के लिए इतना महत्वपूर्ण नहीं है लेकिन किसी भी भूखे के लिए ज्यादा महत्वपूर्ण है | 

जब मैं प्रकाशन विभाग में सेवारत था और निरंकारी युवा सत्संग में भी काफी सक्रिय था ,उन दिनों कई ऐसे युवक मुझे मिलते थे जिन्होंने बाबा गुरबचन सिंह जी का संरक्षण पाया था |ऐसे युवकों में एक थे-श्री जगदम्मा प्रसाद सिंह ,उन्होंने एक बार मुझे बताया कि मेरे पिताजी सरोवर पर सेवा करते थे और मैं वहां बकरियां चराता था |

बाबा गुरबचन सिंह जी वहां लगभग रोज ही आते थे |उन्होंने मेरा दाखिला स्कूल में करवाया और जगदम्मा भाई ने शिक्षा में अच्छे अंक पाये और खेल-कूद में भी प्रतिभा दिखाई |उन्होंने खुद मुझे लिखकर दिया था कि बाबा जी किस प्रकार साधनहीन बच्चों को जिम्मेदार नागरिक बनाने के लिए पहल किया करते थे |

कुछ साल पहले भरतपुर निवासी राम प्रसाद विकल जी बृजभाषा के कवि के रूप में निरंकारी संगतों में अच्छी पहचान रखते थे |उन्होंने एक बार मुझे बताया कि गरीबी के कारण मैं संत निरंकारी मंडल में आ गया | मुझे अधिकारियों ने वर्कशॉप में लगा दिया था ,जबकि मैं बी ए पास कर चुका था |मैं वर्कशॉप में मामूली काम करने लगा |उन दिनों मुझे सोहना कॉलेज में घास काटने पर भी लगा दिया गया था |गरीबी क्या-क्या न करवाए लेकिन बाबा गुरबचन सिंह जी गरीबों का दर्द महसूस करते थे |वे जब नहीं रहे तब मैं फूट -फूट कर रोया क्यंकि मुझे लगा जैसे मेरे पिता का साया मेरे सर से हट गया हो |    

जब मैं वर्कशॉप में था तो बाबा गुरबचन सिंह जी वहां आते ही थे|उन्होंने मुझ गरीब का हाल पूछा और अधिकारियों से कहा कि यह बच्चा तो हिंदी अच्छी जानता है और पढ़ा भी ठीक हुआ है इसलिए इसे प्रकाशन विभाग में भेज दो |

बाबा जी ने जब आदेश दिया तो  मुझे प्रकाशन विभाग में भेज दिया गया |बाद में मेरी सरकारी नौकरी भी  लग गयी |

ऐसे बहुत सारे लोग हैं जिन्हें बाबा जी ने गरीबी से उबारा और जीवन में क्रांति ला दी लेकिन वे लोग अन्य गरीबों को उबार पाए या नहीं यह एक अलग प्रश्न है लेकिन बाबा जी ने तो गरीबों को अमीर बनाने का जैसे संकल्प ही कर लिया था |वे निःसंकोच उनके घर में चरण डाल देते थे ताकि उनका मनोबल मजबूत हो और अपनी समस्याएं स्वयं हल करने में सक्षम हो सकें |यह ज़ज़्बा यदि हम लोगों में भी रहा होता तो आज देश में कोई गरीब न होता |                      


इस प्रकार की क्रांति के मसीहा थे -बाबा गुरबचन सिंह जी 

रामकुमार सेवक 

 

तब मैं छठी कक्षा में था जब मुझे उनके दर्शन हुए,दिल्ली के रामलीला मैदान में|26 वें वार्षिक सन्त समागम में.13  अक्टूबर 1973  को  | उस समय सबकी नमस्कार चरणों में ही होती थी |उस क्षण को मैं भूल नहीं सकता जब उन्होंने मेरे सिर पर दो बार हाथ रखा |मैं अपने पिता(श्री चिरंजी लाल )जी के साथ मुराद नगर से आया था | 

उनके प्रति एक बालसुलभ श्रद्धा थी जो आकर्षित करती थी | बाद में उनके बारे में पर्याप्त गहराई से जानने का मौका मिला |

क्रान्तिकारी के नाम से लोग अक्सर घबराते हैं क्यूंकि गरीबों और अमीरों का फासला कम करने के लिए अक्सर अहिंसा को बलि चढ़ा दिया जाता है |

बाबा गुरबचन सिंह जी ने जीने का वह ढंग दिया जिससे गरीबी -अमीरी में कोई फासला नहीं रहा |बाबा जी ने भक्ति के साथ-साथ सादगी और ईमानदारी की शिक्षा दी जिससे, जो कभी गरीब होते थे वही अमीर हो गए |इस प्रकार उन्होंने आध्यात्मिक क्रांति की |   

बाबा गुरबचन सिंह जी-गरीबों के ऐसे  मसीहा थे ,जिन्होंने उनके जीवन में चहुमुखी क्रांति ला दी |

बाबा गुरबचन सिंह जी के व्यक्तित्व में सबसे बड़ी चीज जो मुझे नज़र आती है,वह है उनकी संकल्प शक्ति |एक बार उन्हें पता चल जाए कि वे सही रास्ते पर हैं तो उस रास्ते वे रत्ती भर भी हिलते नहीं थे |तभी मैंने (एक बार ,मानव एकता समागम में,बाबा हरदेव सिंह जी की हुजूरी में ) मूल कविता से पहले ये चार पंक्तियाँ पढ़ीं थी-

फौलादी संकल्पों का था नाम -बाबा गुरबचन |

एकता और प्रेम का था काम -बाबा गुरबचन |

प्रेम से ही वे जिये ,जब तक रहे संसार में 

ज़िंदा है हर इक सांस में पैग़ाम -बाबा गुरबचन |

इन पंक्तियों में मुझे कुछ विशेषता नहीं लगती क्यूंकि किताब या साहित्य तो छाया मात्र है वास्तविकता तो वह जीवन है ,जिसे देखकर ये शब्द लिखे गए |

आजकल बाबा गुरबचन सिंह जी की बहुत चर्चा हो रही है क्यूंकि उन का बलिदान दिवस करीब ही है |लेकिन मेरा लेखन इस कारण से नहीं है क्यूंकि एक प्रेरक व्यक्तित्व को जब हम किसी खास दिन से जोड़ देते हैं तो वह मात्र एक परंपरा अथवा कर्मकांड हो जाता है |

सिर्फ इसलिए उनके जीवन की चर्चा की जाए कि उनका बलिदान दिवस आने वाला है ,कर्मकांड के सिवा कुछ भी नहीं |

हाँ इसका एक सकारात्मक पक्ष यह हो सकता है कि कम से कम इसी बहाने उनके जीवन की चर्चा हो जाए लेकिन यह युग उन सिद्धांतों के अनुकरण का नहीं है क्यूंकि बाबा गुरबचन सिंह जी आम और गरीब आदमी की तकलीफ जानते थे और उन्हें समर्थ बनाना भी |लाखों का काम वे सैकड़ों में कर लेते थे चूंकि आधार से जुड़े थे और समस्या की जड़ को ही ख़त्म करते थे |अब तो भव्यता का दौर है,सादगी तो बीत चुका इतिहास हो चुकी है लेकिन यह तो ज़माने की रफ़्तार है जिसे मोड़ने की क्षमता शायद ही किसी में हो |  

बाबा गुरबचन सिंह जी के पिता और सतगुरु, बाबा अवतार सिंह जी किसी भी कर्मकांड से दूर थे इसलिए लाखों लोगों को अपने पीछे चला पाए |

युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी निरंकारी (पुस्तक) में लेखक पूर्ण प्रकाश साक़ी जी ने लिखा है कि 17  सितम्बर 1969  को जब बाबा अवतार सिंह जी ने शरीर छोड़ा तो कुछ परिजनों और अनुयाइयों का यह अप्रत्यक्ष ध्यान था कि बाबा अवतार सिंह जी के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार करने के लिए चन्दन की लकड़ियों का इस्तेमाल किया जाए |यह सब उन की शिक्षाओं से मेल नहीं खाता था क्योंकि बाबा अवतार सिंह जी अपने आपको किसी धर्म-सम्प्रदाय के बंधन में बांधने की बजाय एक ऐसी क्रिया का अनुकरण करना चाहते थे जो विशाल सोच को प्रदर्शित करे और उन्हें सबका अपना सिद्ध करे |

बाबा गुरबचन सिंह जी ने बाबा जी की इस इच्छा को पूर्ण करते हुए निर्णय किया कि बाबा अवतार सिंह जी का अंतिम संस्कार विद्युत् शव दाह गृह में किया जाए ताकि किसी धर्म के बंधन से बंधने की बजाय युगपुरुष का जीवन सबके सांझे गुरु-पीर-पैगम्बर का प्रतिनिधि-प्रतीक बन सके |      

बाबा गुरबचन सिंह जी अंदर-बाहर से प्रगतिशील थे इसीलिए एक ऐसा विज़न दे पाए जो गुरु वाला विज़न था |

13 अप्रैल 1978 को अमृतसर के रेलवे स्टेडियम के मैदान में हुए मानव एकता सम्मेलन (समागम) में हिंसा हो चुकी थी |कुछ लोग हमारे पक्ष के ख़त्म हो गए और कुछ विरोधी पक्ष के |जैसे कि आमतौर से पूछा जाता है कि आपके कितने मरे और विरोधी कितने ?

बाबा गुरबचन सिंह जी ने उत्तर में यह नहीं कहा कि उनके इतने थे और हमारे इतने बल्कि जो जवाब दिया वह एक इतिहास रच गया ,उन्होंने कहा-वे सब मेरे ही थे |

यह एक दृष्टिकोण है जो जोड़ने की क्षमता रखता है और अपने ऐसे दृष्टिकोण के कारण ही वे युगप्रवर्तक बन पाए |

चूंकि उनका जीवन हमारे दिलों में अंकित है इसलिए वे हमें सदैव याद आते रहेंगे |उनके जीवन के अन्य पक्ष भी मेरी स्मृतियों में घूम रहे हैं ,मालिक कृपा करे कि यथसमय उन्हें भी लिख सकूं -धन निरंकार जी |    


रोशनी की पूजा कर रहे हैं या दीपक की ?

रामकुमार सेवक  

जब बाबा गुरबचन सिंह जी का बलिदान हुआ तो पहली बार मैंने पढ़ा कि यह गुरु के शरीर की तो हत्या है लेकिन हमारा गुरु ब्रह्मज्ञान है जो आदिकाल से रहा है और सदैव रहेगा लेकिन उसके बाद भी हमने गुरु के ज्ञान से ज्यादा गुरु के शरीर को महत्व दिया और देते आ रहे हैं |ज्वलंत प्रश्न यह है कि शरीर को महत्व देना अनुचित अथवा पाप है ? 

   महान कवि पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब ने लिखा है-

मैं तो पुजारी हूँ रोशनी का,  

समझती है दुनिया दिया पूजता हूँ |

प्रश्न यह है कि क्या दिये के  बगैर रोशनी है ?

सोचने पर पाते हैं कि  स्थूल माध्यम  के बगैर भी रोशनी है |सर्वप्रथम तो सूरज की रोशनी है|उससे नीचे (कम स्तर पर )चाँद की रोशनी है- उसके बाद जाकर कहीं दीपक की बारी आती है |

अब प्रश्न थोड़ा और आगे बढ़ जाता है,कि क्या इनके बिना कोई रोशनी नहीं है ?

प्रश्न यह भी है कि नमस्कार तो सूरज को ही की जा रही है अथवा दीपक को ही की जा रही है फिर वह दीपक की पूजा क्यों नहीं है ?

वह दीपक की पूजा भी तो हो सकती है जैसे कि अब तक दुनिया में होता आया है,किसी भी महात्मा के संदेशों को एक तरफ रख दिया गया और चौराहे पर उनकी मूर्ति स्थापित कर दी गयी |

कोई शरारती आदमी रात के अँधेरे में यदि उसे तोड़ दे और शहर दंगों की चपेट में आ जाए तो फिर भी ,इस परिस्थिति में भी ,क्या यह महात्मा के दिए गए ज्ञान की पूजा हुई ? 

इसका उत्तर है-नहीं |यह न महात्मा की पूजा है और न उनके दिए गए ज्ञान की पूजा है अर्थात जब मूर्ति तोड़ने का ख्याल मन में आ गया तो फिर पूजा का विषय बिलकुल ख़त्म हो गया |

मैं अभी पार्क से लौटा हूँ |सुबह पार्क में जाने के भी अनेक कारण हैं लेकिन सबसे बड़ा कारण है-स्वास्थ्य की रक्षा |स्वास्थ्य की रक्षा अर्थात शरीर में जब तक प्राण हैं,जीवन है ,रोग न झेलने पड़ें |

यह दीपक (शरीर )की पूजा तो है ही मेरे ख्याल से यह रोशनी(ज्ञान ) की भी पूजा है क्यूंकि रोशनी ज्ञान की है और उससे भी ज्यादा उसके एहसास की है |

ज्ञान के एहसास के लिए शरीर को संभालना पड़ेगा |क्यूंकि मुझे नहीं लगता कि प्राण खोने के बाद ज्ञान का एहसास रहेगा क्यूंकि शरीर के बिना जीने का मेरा कोई अनुभव नहीं है |

इस स्थिति में रोशनी(ज्ञान) रहे,इसके लिए साधन (दीपक आदि )की संभाल भी करनी होगी लेकिन ध्यान रहे कि दीपक और रोशनी दोनों भिन्न हैं |दीपक की पूजा करते समय भी यह एहसास रहे कि मैं रोशनी का पुजारी हूँ |

इस एहसास के साथ जी रहे हैं तो सब बढ़िया है,फिर दुनिया चाहे जो समझती रहे,वास्तविकता पर फर्क नहीं पड़ता |     धन निरंकार जी-   


सम्पादकीय

देश के अभिभावक चुनने का फैसला-चेतना क्यों जरूरी?

रामकुमार सेवक

 

हमारा देश महान है यह हम बचपन से ही पढ़ते -सुनते आ रहे हैं लेकिन मैं इसके कारण तलाशना चाहता हूँ,जिसके कारण हमारा देश महान है |

इस दिशा में आगे बढ़ने पर पाता हूँ कि मेरी मातृभूमि इस देश में है इसलिए यह महान है|यदि मेरा जन्म किसी और देश में हुआ होता तो मैं उसे महान मान रहा होता |इससे लगता है कि मानव रूप में  जन्म होना बड़ी बात है |जहाँ जन्म हुआ तो वह मातृभूमि कहलाई |जितने भी लोग इस भूखंड पर जन्मे हैं उन सबकी यह मातृभूमि है |यह चूंकि काफी बड़ी संख्या है इसलिए हम सबकी जिम्मेदारी बनती है कि इसकी महानता को बनाये रखने में योगदान दें अर्थात ऐसा कोई काम न करे जो देश की प्रतिष्ठा पर धब्बा सिद्ध हो |

यहाँ खास बात यह है कि किसी भी देश के नागरिक निजी तौर पर जितने भी शालीन क्यों न हों अगर देश की सरकार में वह प्रतिबद्धता दिखाई न दे तो नागरिकों का निजी तौर पर शालीन होना वैश्विक रूप में निरर्थक हो जाता है |   

 भारत के महान होने का दूसरा कारण यह है कि यहाँ ऐसे महापुरुष जन्मे जिन्होंने हमें वसुधैव कुटुंबकम की शिक्षा दी |मनुर्भव का लक्ष्य हमें दिया |कहने का तात्पर्य है कि उन्होंने हमें विराट विजन दिया ,हमारी दृष्टि को फैलाया लेकिन अभी हम जिस दौर से गुजर रहे हैं यह दौर राष्ट्रप्रेम के साइनबोर्ड का है |राष्ट्रप्रेम से ज्यादा इस बात की महत्ता है कि हमारा साइनबोर्ड कौन से रंग का है ,उसका आकार कितना है |

हमारे ऋषियों-मनीषियों ने हमें जो विजन दिया ,वह मानवता पर केंद्रित था और सह अस्तित्व की शिक्षा प्रदान करता था लेकिन जाति-मज़हब आदि ने हमें सीमित कर दिया |विशालता को इन चीजों ने टुकड़े -टुकड़े कर दिया |सहनशीलता ख़त्म होती चली गयी |यह फासला इतना ज्यादा बढ़ा कि अपने ही देश के कुछ प्रान्त हमें पराये नज़र आने लगे अथवा उन प्रांतों को हम पराये नज़र आने लगे |

देखा यह गया कि ऐसा वातावरण निर्मित हुआ कि इंसान के मन में दूसरें इंसान के लिए जगह कम होती चली गयी इसके बावजूद देश की महानता वैसी की वैसी रही ?इस मुद्दे पर विचार किया जाना चाहिए |

वास्तविकता यह है कि हमारा देश इसलिए विश्वगुरु था क्यूंकि यह सबको स्वीकार कर लेता था | स्वयं स्वामी विवेकानंद ने शिकागो की धर्म सभा में इस तथ्य का खुलासा किया था |

हमारा देश ईसाई-मुस्लमान-पारसी -यहूदी आदि सबको इसलिए स्वीकार कर लेता था क्यूंकि सब में इसे अपनत्व नज़र आता था |दिल बड़ा था ,दादा से लेकर पोते तक एक ही परिवार में रहते थे |इन जीवन मूल्यों ने ही स्वतंत्रता के बाद देश में प्रजातंत्र की शासन पद्धति अंगीकार करने को प्रेरित किया लेकिन प्रजातंत्र के मर्म को समझने के लिए जो वातावरण चाहिए वह अब तक निर्मित नहीं हो पाया |

प्रजातंत्र तब तक पूरे परिणाम नहीं दे सकता जब तक कि मूल में सेवा भाव न हो |इस समय देश में सत्रहवीं लोकसभा के चुनावों का बिगुल बज चुका है |वाद -विवाद और दोषारोपण का दौर चल रहा है |कुर्सी हर किसी को ललचा रही है |सोलहवीं लोकसभा के चुनावों के समय भी वातावरण लगभग ऐसा ही था और हम लोगों ने अच्छे दिनों की उम्मीद में वोट दिया था  लेकिन वैसा कुछ नहीं हुआ जैसे सपने दिखाए गए थे बल्कि प्रजातंत्र की आधार स्तम्भ संस्थाएं लगातार कमजोर होती दिखीं हैं |

लोकप्रियता एक प्रकार के अहंकार में परिवर्तित हो गयी लगती है जो कि बड़े दिल का लक्षण नहीं है |समस्या इस प्रकार की है कि आशा की किरण कहीं नज़र नहीं आ रही |

राजनीति के पेशेवरों ने अपनी वाणी की निष्ठां ,मेधा -प्रतिभा तथा  चारित्रिक क्षमता  को खो दिया है |

ऐसे में हमारी आस्तिकता हमें बचाती है |इश्वर-अल्लाह,वाहेगुरु अथवा गॉड नामक अप्रत्यक्ष शक्ति हमारी आत्मा में यह उम्मीद जगाती है कि बेशक निहित स्वार्थी तत्वों ने प्रजातंत्र को अपनी लालसाओं का क़ैदी बनाकर देश की महानता को खतरे में डाल दिया है लेकिन इश्वर सर्वोच्च शक्ति है और यह हमारे हित को सुनिश्चित करेगा |इसके बावजूद हमें महान देश के जागरूक नागरिक होने का प्रमाण देना होगा |जिन्हें हम अपने ऊपर शासन करने के लिए चुन रहे हैं उनकी क्षमता और नीयत का सही-सही आकलन करना हमारी जिम्मेदारी है अन्यथा किसी विचारक का यह कथन हम पर शत प्रतिशत लागु होगा कि जिन्हें हम अपने बच्चों का अभिभावक बनाना पसंद नहीं करते उन्हें देश का अभिभावक बनाने का फैसला कैसे कर लेते हैं |    


निरंकारी मिशन की शिक्षाओं को उन्होंने इस प्रकार क्रियात्मक रूप से प्रकट किया | 

रामकुमार सेवक 

यह प्रतियोगिता का युग है |दौड़ लगी है, एक दूसरे से आगे निकलने की |इस प्रतियोगिता की थकन और तनाव में यदि राहत मिलती है तो केवल अध्यात्म में |

कठिनाई यह है कि धर्म में भी प्रतियोगिता शुरू हो गयी है |एक पूजास्थल की मीनार यदि दूसरे पूजास्थल की गुम्बद से थोड़ी नीचे रह जाए तो धर्म के अस्तित्व पर खतरा मंडराना शुरू हो जाता है और शहर की शांति खतरे में पड़ जाती है |

यह प्रतियोगिता  जब आध्यात्मिक कहलाने वाले लोगों के बीच  भी पैदा हो जाए तो आध्यात्मिकता नष्ट हो जाती है क्यूंकि आध्यात्मिकता तो आत्मा का विज्ञान है और प्रतियोगिता आत्मा के तल पर नहीं हो सकती |   

देखा यह जा रहा है कि आध्यात्मिक कहे जाने वाले लोगों में भी प्रतियोगिता शुरू हो चुकी है जबकि कुछ वर्ष पहले ऐसा नहीं था |भक्तों में कभी दूसरे को पछाड़ने की होड़ नहीं हुआ करती | 

प्रसंग इस प्रकार है -प. हरिमोहन शर्मा जी बाबा गुरबचन सिंह जी की एक कल्याण यात्रा के दौरान नैनीताल पहुंचे |उनका व्यक्तित्व ही कुछ ऐसा था कि आम आदमी उनकी तरफ आकर्षित होता था |शहर में जब वे घूम रहे थे तो एक व्यक्ति ने शर्मा जी से उनका परिचय पूछा |

शर्मा जी ने बताया कि निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी के साथ ब्रह्मज्ञान का प्रचार-प्रसार करने हेतु आये हैं |

उस सज्जन ने कहा कि फलां गुरु अथवा उनके प्रचारक भी हमारे शहर में आते रहते हैं |उनके बारे में कुछ बताइए कि  वे आपसे बेहतर हैं या आपसे कमतर हैं ?

आम तौर से हम लोगों के सामने यदि ऐसा प्रश्न उठे तो हम अपने गुरु और मिशन की प्रशंसा करनी शुरू कर देते हैं और दूसरे गुरु अथवा मिशन की आलोचना भी शुरू कर देते हैं ताकि हम उनसे बेहतर सिद्ध हों |लेकिन यह सही तरीका नहीं है क्यूंकि इससे ऐसा लगता है जैसे हम किसी की लकीर को काट रहे हों,अपनी लकीर बड़ी करने की बजाय |

शर्मा जी ने ऐसा नहीं किया इसीलिए उनका जवाब ऐतिहासिक महत्व का बन गया | 

उन्होंने कहा-भाई साहब,आपके प्रश्न ने हमें धर्मसंकट में डाल दिया है |हम अपने गुरु के बारे में तो अच्छी तरह जानते हैं कि वे जो कहते हैं वह सही है क्यूंकि हम उनके द्वारा दिए गए ज्ञान को प्राप्त कर चुके हैं |

लेकिन किसी अन्य गुरु का दावा कितना सच है,हमें पता नहीं |यह वैसे ही है जैसे  एक पत्नी अपने पति के बारे में तो काफी कुछ जानती होती है |वह उसके बारे में पूरे यकीन से कुछ भी कह सकती है लेकिन किसी और के पति के बारे में उसे क्या पता इसलिए किसी और के पति के बारे में पूर्ण विश्वास से वह उतना कुछ नहीं कह सकती |

यह सुनकर वे सज्जन बहुत खुश हुए ,उन्होंने कहा-हम कितने ही लोगों से यह प्रश्न कर चुके हैं और हर इंसान निःसंकोच अन्य गुरुओं की बुराई करने लगता है |आप पहले इंसान हैं जिन्होंने अपने गुरु की सच्चाई बताने के लिए किसी अन्य गुरु की निंदा नहीं की |

शर्मा जी ने निरंकारी मिशन की शिक्षाओं को इस प्रकार क्रियात्मक रूप से अभिव्यक्त करके प्रश्नकर्ता के मन में स्थायी प्रभाव अंकित किया | 


सकारात्मक  विचारों  की  चौकीदारी कौन करेगा ?

रामकुमार  सेवक    

आजकल चौकीदार शब्द की बहुत चर्चा है |प्रधानमंत्री जी ने जब से खुद को देश की जनता का चौकीदार बताया है,शासक दल में होड़ लग गयी है,खुद को चौकीदार घोषित करने की |

प्रधानमंत्री जी की बात पर लोग यकीन करते हैं ,भोले-भाले चौकीदारों ने भी प्रधानमंत्री जी को अपने स्तर का समझ लिया जबकि यह पहाड़ और राई जैसी तुलना है |

प्रधानमंत्री देश का मुकुट है तो चौकीदार समाज के सबसे निचले पायदानों में से एक है | उनकी स्थिति इतनी ख़राब है कि प्रायः आर्थिक स्तर पर वे अपनी बुनियादी ज़रूरतें भी पूरी नहीं कर पाते हैं |

उन्हें प्रधानमत्री जी और शासक दल के सम्मानित लोगों के अपने जैसे होने का भ्रम हो गया लगता है |यदि प्रधानमंत्री जी और शासक दल के शक्तिशाली लोग  चौकीदारों का आर्थिक व् सामाजिक स्तर कुछ बेहतर कर पाएं तो यह जुमला सेवा की पवित्र श्रेणी में आ जाएगा |

मुझे यह भी ध्यान आ रहा है कि कोई भी चौकीदार सिर्फ भौतिक सामानों की ही सुरक्षा कर सकता है |इंसान के विचारों और कार्यों की सुरक्षा कोई चौकीदार नहीं कर सकता |

 इंसान कब,कैसे और कहाँ चुपचाप जन्म लेता और ख़ामोशी से कब चला जाता है,उस पर किसी का भी नियंत्रण नहीं |

स्वयं चौकीदार के जीवन पर उसका पहरा नहीं |(हानि-लाभ-जीवन-मरण -यश-अपयश विधि हाथ) बहुत बड़ी मशीनरी द्वारा सुरक्षा करने के बावजूद बड़े-बड़े ताक़तवर शासक इस दुनिया से लाचार जाते देखे गए हैं |

   मुझे लगता है कि इंसान खुद अपना  चौकीदार है क्यूंकि यदि वह जागरूक न हो तो दया-करुणा-प्रेम व् भक्ति की दौलत कब लुट जाती है,पता भी नहीं चलता |

   अभी जो आदमी प्रेम व् भक्ति की बातें करता है,वातावरण बदल जाने पर वह उसके विपरीत भाषा बोलने लगता है |

   नकारात्मक विचारों का झोंका कब आंधी बन जाता है,पता भी नहीं चलता और भक्ति की दौलत तिनके की तरह उड़ जाती है |कई बार तो जीवन भी नष्ट हो जाता है |

बाहर का कोई चौकीदार किसी के विचारों को नकारात्मक होने से नहीं रोक सकता |इसके लिए तो स्वयं अपनी जाग्रति चाहिए |(Watch  yourself )

आज के समय में जागरूकता तो पूरी है परन्तु डर ओर लालच इंसान को कायर बनाये रखता है |जब वह सत्य व् झूठ का अंतर समझ रहा होता है तो खुद को भटकने से बचा सकता है यदि वह दृढ़निश्चयी हो |

यदि वह थोड़ा साहसी भी हो तो बाकी लोगों को भी बचा सकता है,बशर्ते वे लोग खुद उसकी (बचाने वाले की )जान के पीछे न पड़ जाएँ |    

आज मैं बाबा हरदेव सिंह जी  का एक  प्रवचन सुन रहा था जो कि संभवतः दस नवम्बर 2010  का था  |उसमें सम्पूर्ण अवतार बाणी के एक शब्द की व्याख्या थी |

बाबा जी गुरसिखो के लक्षण बताते हुए फ़रमा रहे थे कि गुरसिख निरंकार को सर्वोपरि मानता है इसलिए अहंकार से बचा रहता है,इस प्रकार  विनम्र होता है |

सम्पूर्ण अवतार बाणी की वह पंक्ति थी-ओहो कार कमावे गुरसिख जो जो सतगुरु कहंदा ए |

बाबा जी कह रहे थे कि गुरसिख का अर्थ ही है कि वह गुरु के हर आदेश को प्राथनिकता देता है |उसे पूरी निष्ठां से मानता है |

बाबा जी ने कहा कि इस बात को सुनकर हिटलर और मुसोलिनी की भी याद आती है क्यूंकि वे ऐसे ही अनुयाई चाहते थे |  वे ऐसे ही अनुयाई चाहते थे,जो उन्हीं के आदेश को सर्वोच्च   और  सर्वोत्तम

 माने लेकिन गुरु का भाव कभी भी सत्ता प्राप्त करने का नहीं होता |वह सदा दूसरों की भलाई सोचता और करता है |

गुरु के आदेश हमेशा परोपकार को ही समर्पित रहे हैं |गुरु का हुकम मानने का अर्थ है- परोपकार के प्रति ज्यादा समर्पित होना |  

मुझे आश्चर्य इस बात का है बाबा हरदेव सिंह जी के जीवन मूल्य आज देखने को नहीं मिल रहे जबकि आम श्रद्धालु आज भी पूर्णतः सत्यनिष्ठ लगता है|वह अपनी मूल जरूरतों के भी ऊपर सेवा-सुमिरन व् सत्संग को महत्ता देता है जबकि मिशन के संगठन में ऊपरी तल पर भक्ति की यह ऊंचाई दिखाई नहीं देती | सत्गुरु की बात इसलिए मानने योग्य है कि क्यूंकि वह विशाल और भौतिक लालसाओं से ऊपर होना चाहिए ,बाबा हरदेव सिंह जी ऐसे ही थे |वे आज भी हमारे आधार और प्रेरक नज़र आते हैं-किसी भी प्रश्न से ऊपर -जिसके ऊपर नहीं विचार -जैसे हमारी भक्ति के निर्विवाद चौकीदार |   


रोशनमीनार-मात्र एक अलंकरण है या अवस्था ?

रामकुमार सेवक

  

रोशन मीनार अथवा लाइट हाउस का अलंकरण मैंने पहली बार तब प्रयोग किया था जब संत निरंकारी कॉलोनी के युवा सत्संग में युवाओं के लिए नवांकुर नाम से एक कवि सम्मेलन का सञ्चालन किया था |युवाओं को आशीर्वाद देने के लिए मेरी प्रार्थना पर आदरणीय निर्मल जोशी जी,मान सिंह जी मान,बेदिल सरहदी साहब कार्यक्रम में आये थे |मेरा ख्याल है भूपेंद्र बेकल जी,विनय जोशी जी व् अविनाश फितरत जी भी इस कार्यक्रम में मौजूद थे |

मेरे समेत नौजवानो ने तो वैसी ही टेढ़ी -मेढ़ी कवितायेँ पढ़ीं जिन्हें हम अब किसी गिनती में नहीं रखते |बेकल जी ने अपनी कविता पढ़ने से पहले हम सबको प्यार से निशाने पर लिया था ,खासकर मुझे क्यूंकि सन्त निरंकारी (हिंदी )में मैं उनका सहायक संपादक था |मुझे पता चला कि उन्होंने ही डॉ.हरभजन सिंह जी से युवाओं की गतिविधियों में मेरी सेवाएं लेने की पैरवी की थी |

उस कवि सम्मेलन में जब बेदिल सरहदी साहब को बारी देने लगा तब मैंने उर्दू शायरी के उस्ताद के रूप में युवा कवियों के लिए उन्हें लाइट हाउस कहा था |

ये 1986 -87 के दिन थे लेकिन 2018  में   इस शब्द का इतना इस्तेमाल हुआ कि लगने लगा कि बाबा अवतार सिंह जी के समय में किसी का लाइट हाउस या रोशन मीनार होना कितना कठिन था और अब इतना आसान है कि दो -चार रोशन मीनार तो बिना किसी कोशिश के सहज ही कॉलोनी में घूमते-फिरते दिखाई दे जाते हैं |

वे रोशन मीनार कहलाते हैं जबकि उन्हें दिव्य अनुभव व् सर्वोच्च सम्मान उपलब्ध नहीं है |

मेरे ख्याल में रोशनमीनार का अर्थ है ऐसा व्यक्ति ,जिसका कोई प्रश्न शेष नहीं है अर्थात वे डिवाइन लाइट को उपलब्ध हो चुके हैं |सब प्रश्नो के उत्तर उनके पास हैं |

पिछले वार्षिक सन्त समागम में नौ लोगों को उनके पद से सेवानिवृत्त कर दिया गया |अगर तुलना करें तो पाएंगे कि सन्त निरंकारी मंडल के प्रबंधकों की हैसियत और प्रतिष्ठा किसी आई ए एस से कम  नहीं है और नौ प्रबंधकों को सब प्रतिष्ठाओं से वंचित कर दिया जाए तो निश्चित ही उन्हें बुरा लगेगा ,इस चुभन को कम करने के लिए उन्हें रोशनमीनार का अलंकरण दे दिया गया |ऐसी कूटनीति राजनीति में तो चलती है लेकिन अध्यात्म में यह भद्दे मज़ाक की तरह है क्यूंकि निरंकार दिखावे की चीजों को स्वीकार नहीं करता |चूंकि यह परम पवित्र और परम शुद्ध सत्ता है इसलिए इसके सामने किसी भी छल -कपट -कूटनीति का इस्तेमाल स्वयं की मूर्खता अथवा 

ब्रह्म की अनभिज्ञता को प्रमाणित करना है |

सुबह एक मित्र मुझसे कह रहे थे कि -सेवक जी,सोच रहा हूँ अपना नाम भारत रत्न रख लूँ |

मैंने कहा-इससे क्या आप भारत रत्न हो जाएंगे ?इन चीजों में कुछ सार नहीं है |जो सचमुच भारतरत्न हैं उन्हें ही अलंकृत होने दें |

वे बोले -फिर अपना नाम रोशनमीनार रख लेता हूँ | 

मैंने कहा-यह तो और भी बुरा होगा क्यूंकि यदि आपके पास सचमुच हर प्रश्न का उत्तर है तो किसी के भी प्रश्न का संतोषजनक जवाब दे सकते हैं |उस स्थिति में बिना नाम बदले भी आप रोशन मीनार होंगे |

बात उन्होंने मज़ाक में शुरू की थी लेकिन मामला गंभीर हो गया था |मैंने कहा-मेरा अनुभव तो कहता है कि हर प्रश्न किसी के भी दिमाग में निरंकार पैदा करता है और जवाब भी यह ही भेजता है | जिसे निरंकार से ज्यादा किताबों में यकीन है उसे जवाब किताबों के द्वारा मिलता है  लेकिन भेजता निरंकार ही है |

अनेक बार ऐसी जगहों पर सत्संग करने का मौका मिला है जहाँ ज्ञान लिए हुए महापुरुषों से ज्यादा अन्य सज्जनो की उपस्थिति थी |वहां बातचीत में प्रश्न उठ गया अध्यात्म के उस मार्ग का,जिसका हमें ज्ञान नहीं था |वहां हम निरंकारी मिशन का प्रतिधित्व कर रहे थे इसलिए जवाब  न देना हमारे गुरु की सर्वोच्चता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा कर देता इसलिए निरंकार से प्रार्थना की ,प्रार्थना होते ही जवाब आ गया और सामने वाले सज्जन की तसल्ली हो गयी | 

निरंकार के रथ में जो सुमिरन के द्वारा बैठ जाता है वह मीनार हो जाता है |चूंकि उसमें ज्ञान का प्रकाश होता है इसलिए बिना किसी के घोषित किये भी वह रोशनमीनार होता है |  


तू ही निरंकार 

कल 21 मार्च 2019 (वीरवार ) को सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के मैरिज ग्राउंड में होली के उपलक्ष्य में आयोजित सत्संग समारोह में काव्य पाठ करने का अवसर प्राप्त हुआ ,यह एक हास्य -व्यंग्य रचना थी |दयालु श्रोताओं ने रचना का भरपूर आनंद लिया | पाठकों के लाभार्थ रचना यहाँ प्रस्तुत है-  

 

कविता 

जूते की बजाय-बदला मन और जीवन   

रामकुमार सेवक 

मिस्टर खड़ूस श्रीमान 

करने अपना उल्लू सीधा - बनने महान-

लेने सत्य का ज्ञान -पहुंचे सत्संग -- 

सत्संग वो नल है ,जिसमें से निकलता है-प्रेम का पानी 

बख्शता है-नयी ज़िंदगानी 

हर किसी की प्यास बुझाता है-लेकिन प्यास वास्तविक होनी चाहिए |

 

मिस्टर खड़ूस ने सोचा 

यह तो हो गया धोखा |

इन्होने कोई नयी बात तो कही नहीं 

सब बातें वही दोहराईं ,जो सदियों से हमने  सुनी-सुनाईं |

बेहतर हैं- गंवाए हुए वक़्त का कुछ लाभ उठालें 

पुराने जूते को यहीं छोड़कर 

किसी का नया जूता हथिया लें-

न खाता-न बही -भागते भूत की लंगोटी ही सही      

सत्संग से लौटते हुए 

जूते लेने गया तो सेवकों ने टोकन माँगा 

खड़ूस जी ने टोकन को जेब में छिपाया 

और किसी के नए जूते की तरफ हाथ बढ़ाया |

भक्त सेवादार -भांप गए,श्रीमान खड़ूस की चालाकी 

-हाथ जोड़कर कहा-दे दो माफ़ी -

चालाकी के सामने भी भक्ति दिखाई -नम्रता अपनाई -लेकिन -

सबक भी तो सिखाना था इसलिए सही तथ्य समझाना था 

उन्होंने खड़ूस जी से प्यार से पूछा-

श्रीमान यह नहीं   है आपका  जूता ?  

आप अपना टोकन दीजिये 

और आपका वही जूता लीजिये -

जिसे पहनकर आप तशरीफ़ लाये थे-सत्संग में आये थे |

जब खड़ूस जी की खुलने लगी पोल -तो प्लानिंग में आ गया झोल 

वे बोले -मैंने तो सुना था-इस दर से कोई खाली नहीं जाता -

इस बैंक में हर किसी का-खुल जाता खाता 

पर हमारे कुछ आया नहीं हाथ ,हमें तो जाना होगा उसी पुराने जूते के साथ  |  

खड़ूस जी बिलकुल नहीं घबराये,बेशर्मी पर उतर आये  

लेकिन क्रोध नहीं कर पाए -

बेशर्मी से बोले -      

मेरा जूता था पुराना-पर मैं चाहता था नया 

पुरानी आदत थी -कीर्तन में जाकर -अपना पुण्य दिखाने की  

लेकिन साथ-साथ -टूटे हुए जूते को वहीं छोड़कर , नया जूता पाने की

इसी तरह चल रहा था सिलसिला 

रेक्सोना की हवाई चप्पल के बदले -बाटा का नया जूता मिला 

लेकिन यहाँ जो हैं सेवादार -निष्ठां से करते हैं सेवा 

ह्रदय से निभाते हैं-अपना किरदार 

लेकिन -हम हैं आदत से मजबूर 

यहाँ तो गली नहीं हमारी दाल -लेकिन 

किसी और कीर्तन से -पुराने के बदले-

नया जूता लाएंगे जरूर -हम हैं आदत से मजबूर -

महात्मा भी थे प्रेम के ज़ज़्बे से  भरपूर -बोले हुज़ूर 

आखिर कब तक जूतों के चक्कर में पड़े रहोगे-

सत्संग में आये हो तो-सत्य से जुडो-

सत्य है परमात्मा -जो करता है,भटकन का खात्मा

जाग जाती है आत्मा -

परमात्मा तो है वही पुराना,फिर भी कहलाता है -नित नया 

पुराने जूतों की बजाय-करो पुराने विकारों का त्याग.

मन में जलाओ -ज्ञान की रोशनी ,ज़ज़्बे की आग 

ब्रह्म की ज्योत में अहंकार का ईंधन जलाओ 

और नित नए के ज्ञान के साथ -निज घर को जाओ ,

रहमत पाओ-खुशियां लो,प्रेम बरसाओ 

खड़ूस जी ने जब सुना यह प्रवचन ,उन्होंने पायी -नयी दिशा ,नया जीवन 

पाया प्रभु का ज्ञान |

त्यागा अभिमान तो बन गए -सच्चे विद्वान -गुणों की खान 

प्रभु ज्ञान की रोशनी से ईमान का संकट टल गया-    

जूते की बजाय मन बदल गया

जीवन बदल गया-जीवन बदल गया |  


आपस में प्रेम हो तो अच्छा है लेकिन अगर प्रेम न हो तो भी ----

रामकुमार सेवक 

रविवार के साप्ताहिक सत्संग के पुराने दिनों की यह बात आज  इसलिए भी याद आयी क्योंकि उन दिनों बाबा जी ने एक सुन्दर प्रसंग सुनाया था |उसे उन दिनों मैंने  सन्त निरंकारी (हिंदी) में लिखा भी था | बाबा हरदेव सिंह जी के  लगभग हर प्रवचन में एक न एक नुक्ता छिपा होता था, जो मुझे कहता रहता था -मुझे लिखो और जैसे ही अवसर मिलता उसे लिखकर मैं अपने आपको हल्का करता रहता था |

बाबा जी का अप्रत्यक्ष प्रेम खूब मिला और अब तक मिल रहा है इसलिए निरंकार मेरे लिए शून्य नहीं है ,जीवंत सत्ता है और यह तब भी थी जब बाबा जी शरीर में थे |उन दिनों मैंने एक सम्पादकीय भी लिखा था-शून्य से निराकार तक |जिसके लिए हमारे तत्कालीन प्रभारी आदरणीय निर्मल जोशी जी ने आदेश दिया था |उन दिनों वे अस्वस्थ थे और निन्यानवें प्रतिशत  मौकों पर सन्त निरंकारी (हिंदी)में उन्हीं का लिखा सम्पादकीय छपता था |

उन दिनों मैं सह संपादक होता था,संपादक लाल सिंह जी लाल थे | खैर वह असामान्य परिस्थिति थी ,और मेरे माध्यम से सम्पादकीय लिखा गया-शून्य से निराकार तक |उसे पढ़कर जोशी जी ने क्या कहा था ,उसकी चर्चा फिर कभी करेंगे |आइये अब बाबा जी के प्रवचन पर आते हैं | 

  एक दिन बाबा जी ने अपने प्रवचन में कहा-कुछ लोग नाव में बैठे था |आनंद का दौर था | 

लोग नौका विहार का आनंद ले रहे थे |

जब कई लोग बैठे हों तो प्रायः दो संभावनाएं बनती हैं ,या तो आनंद आएगा और यदि किसी बात पर कुछ नकारात्मक चर्चा चल पडी तो विवाद होगा या झगड़ा होगा |

पहले गीत -ग़ज़ल का दौर चल रहा  था |यात्री भी आनंद ले रहे थे और नाविक भी |अचानक सिलसिला बदला ,गीतों की जगह विवाद ने ले ली , फलतः शोर-ओ- गुल का दौर चल पड़ा |धीरे -धीरे झगड़ा बढ़ने लगा |नाविक का ध्यान भी भंग हो गया |

वह सवारियों की तरफ पलटकर बोला-यह आप लोगों को क्या हुआ |नौका विहार का हम सब आनंद ले रहे थे लेकिन किसी का अहम् शायद आड़े आ गया और विवाद शुरू हो गया |इस विवाद को रोको अन्यथा नाव डूब सकती है |

अहम् बीच में आया तो प्रतिस्पर्धा बीच में आ गयी |प्रतिस्पर्धा में तो विवाद होता है,विषाद होता है | 

जब शोर-ओ-गुल बढ़ गया तो नाव ऊपर-नीचे होने लगी |नाविक बोला-इसी तरह चलता रहेगा तो नाव डूब जायेगी इसलिए शांति से बैठो |

नाव डूबने की चेतावनी सुनकर लोगों ने विवाद ख़त्म कर दिया |अब सब शांति से बैठे थे ,नाव भी सही चल रही थी लेकिन आनंद नहीं था |

यह भी एक पक्ष हो सकता है,कि नाव भी चल रही है और शोरगुल भी नहीं है इसका मतलन है कि शांति है लेकिन इस शांति में सहजता नहीं थी ,तनाव था |

इसलिए यह शांति उतनी श्रेष्ठ नहीं है - शुरू में जो ग़ज़लों और गीतों का दौर चल रहा था ,वह आनंद का दौर ही सर्वश्रेष्ठ है |

बाबा जी ने समझाया कि-अगर आनंद नहीं ले पा रहे हो तो तो उन कारणों को खोजो जो आनंद में रुकावट हैं और उन्हें अपने जीवन में से हटाने की कोशिश करो -यदि उन्हें हटा नहीं पा रहे हों तो कम से कम दूसरों के आनंद में बाधा तो मत बनो |झगड़ा तो मत करो |

  सहयोग करना बहुत अच्छी बात   है लेकिन यदि यह गुण हममें नहीं है तो उतनी देर कम से कम बाधा तो मत बनो,असहयोग तो मत करो |आपस में प्रेम हो तो अच्छा है लेकिन अगर प्रेम न हो तो भी किसी के सन्मार्ग की रुकावट तो मत बनो |


अनुशासन और अमृत-किसकी ज़रुरत ज्यादा है ?

रामकुमार सेवक  

उन  दिनों रविवार का साप्ताहिक सत्संग सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के स्कूल हॉल में हुआ करता था |बाबा हरदेव सिंह जी,निरंकारी राजमाता जी और पूज्य माता जी उसमें आसीन होते थे |

संगत का समय सुबह 9 से 12 बजे तक और सर्दियों में 10बजे से एक बजे तक होता था लेकिन वह संगत बहुत सहज तबियत से चलती थी |

आनंद के क्षणो में शायद ही किसी का घड़ी की तरफ ध्यान जाता हो |उस समय के गुरुदेव (हरदेव जी )भी शत -प्रतिशत गुरु ही थे,हमारे माता-पिता जैसे या उससे भी ज्यादा थे ,बल्कि हमारे माता-पिता भी उन्हें अपने माता- पिता मानते थे |) उन्हें वैश्विक मानव (Global  Human )माना जाना चाहिए क्यूंकि उनका विज़न बहुत विशाल था |

सन्त निरंकारी  मंडल के ढाँचे में सीमित ,संचालक -प्रशासक वे  नहीं थे |संस्था की मर्यादा को सुरक्षित रखने के बावजूद वे उसके बंधन में नहीं थे |जहाँ तक मोबाइल का प्रश्न है,भक्ति में इसका कोई स्थान नहीं है |जब हम किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति से मिलने जाते हैं तो अपने मोबाइल को पहले ही मौन कर देते हैं ताकि व्यवधान न पड़े |पहले भी सत्संग में मोबाइल को ऑफ कर देते थे ताकि आनंद में बाधा न पड़े लेकिन पिछले कुछ महीनो से मोबाइल का दर्ज़ा इतना महत्वपूर्ण बना दिया गया कि ऐसा लगने लगा है जैसे -यदि भक्ति करनी है तो मोबाइल का त्याग करना होगा जबकि भक्ति में अहंकार त्यागने पर जोर लगाया जाता है ताकि कठिन आदेशों को भी सहजता से माना जा सके |  

प्रबंध तंत्र महसूस करता था कि उन्हें(गुरुदेव हरदेव जी को ) सख्त प्रशासक भी होना चाहिए लेकिन वे घर के बुजुर्ग की तरह सहज-सरल प्रशासक (भी) थे |वे मर्यादित जीवन के महान शिक्षक थे और जन-जन के प्रिय थे | 

यही कारण था कि दिन ब दिन हाजिरी बढ़ती रहती थे | जितने लोग हॉल के भीतर होते थे उससे कहीं ज्यादा बाहर होते थे |हर सप्ताह यही होता था |

जैसे ही काम ख़त्म होता हम भी प्रकाशन विभाग से संगत के लिए निकल लेते थे |प्रकाशन विभाग का यह दफ्तर रविवार को भी खुलता था क्यूंकि जो वास्तविक सेवादार होते हैं वे छुट्टी  के दिन को भी सेवा के आनंद का दिवस बना लेते हैं ,सेवा की खोज में रहते हैं|

मुझे भी वहां बैठने की लत थी क्यूंकि वहां ज्वलंत मुद्दों पर खुली चर्चा होती थी |उस दफ्तर में गुरु के समर्पित शिष्य,बुद्धिजीवी संपादक बैठते थे और शाम चार बजे भी वहां कोई न कोई होता था क्यूंकि वह प्रेम का प्रशासन था |

तब खतरे अब से ज्यादा थे लेकिन सुरक्षा अब से काफी कम थी क्यूंकि ताम-झाम कम थे अन्यथा निरंकार की पूरी सुरक्षा थी और हम जरा भी असुरक्षित महसूस नहीं करते थे |

धीरे -धीरे परिवर्तन हुए |ऐसे-ऐसे प्रशासक आये जो  अपने आपको गुरु से भी महत्वपूर्ण और समझदार समझते थे |

13  मई 2016  को  ,बाबा हरदेव सिंह जी का शरीर हमारे बीच नहीं रहा |

सर्वत्र उन्हीं की चर्चा हो रही थी |उस दिन मेरे एक पुराने साथी ने  कहा-सेवक जी,उस दफ्तर को में कभी भूल नहीं सकता | वह मिशन का अघोषित जन संपर्क कार्यालय था |कोई जिज्ञासु हमारे पास आता तो हम उसे बेखटके प्रकाशन विभाग (बाद में नाम-पत्रिका विभाग )में ले जाते थे और वहां कोई न कोई संपादक हमें बैठे हुए मिल जाते थे और जिज्ञासु मिशन की सही परिभाषा समझ जाता था |   

खैर-आगे बात करते हैं |

कई साल पुरानी बात है |संगत स्कूल के हॉल में ही थी लेकिन  एक दिन समय का पालन हो गया |ऐसा लगा जैसे संगत की लम्बाई कुछ छोटी हो गयी हो |धुनि के मध्य भी काफी संगत शेष थी नमस्कार के लिए |

धुनि को फिर दोहराया गया पर समय पालन का अनुशासन भंग हो गया इसलिए अगली बार फिर पुराना क्रम शुरू हो गया |

अब आजकल के वातावरण पर नज़र डालते हैं |24  फरवरी (रविवार )को गुरु पूजा दिवस का समागम दिल्ली के बुराड़ी रोड पर आयोजित किया गया |समय 11  बजे से तीन बजे तक का था | संगत यथासमय संपन्न हुई लेकिन बाद में एक घंटा और चली |

तीन बजे अर्थात धुनि के बाद जो संगत चली उसमें श्रोता पहले से आधे भी नहीं थे |

इस हिसाब से संगत का देर तक चलना भी ठीक ही था |

निष्कर्ष यह निकलता है कि अनुशासन का पालन होना चाहिए लेकिन उससे पहले वचनो में अमृत सुनिश्चित होना चाहिए |सख्त अनुशासन -प्रशासन तो प्रबंध तंत्र में ही ठीक है |

संगत में तो सहजता ही मिशन का फैलाव बढ़ा सकती है |

 


सत्य के साथ हेरा फेरी नहीं चल सकती क्यूंकि---  

रामकुमार सेवक 

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के सारगर्भित विचारों की सच्चाई का एहसास हमेशा होता रहता  है |एक बार उन्होंने चेतना और चालाकी का बहुत सुन्दर विश्लेषण किया था |उन्होंने एकदम नया विचार प्रकट किया ,जिस पर उन दिनों एक सम्पादकीय भी लिखा था लेकिन उसे छाप नहीं पाया |

आज मुझे वह विचार इसलिए याद आ गया क्यूंकि कुछ समय पहले मुझे चालाकी पर कुछ सुनने का मौका मिला |संकट की बात यह है कि आज के समय में जो जितना चालाक है उसे उतना ही चेतन माना जाता है जबकि चेतना पूरी तरह सकारात्मक (Positive ) तत्व है और चालाकी नकारात्मक (Negative ) |   

आदमी सत्य के साथ किस प्रकार पैंतरेबाजी करता है अथवा परम पिता परमात्मा को भी किस प्रकार भ्रमित करना चाहता है,इस मुद्दे पर बहुत सारे घटनाक्रम सुनने -पढ़ने को मिलते हैं |यह घटनाक्रम भी आदमी की इसी चालाकी को प्रकट करता है | 

हुआ यह कि एक आदमी के वार से कोई गाय मर गयी |किसी ने कहा -यह हत्या आपने क्यों कर दी ?वह बोला-मैंने तो सिर्फ डंडा मारा था,गाय मर गयी तो मेरा क्या कसूर ?

ऐसी स्थिति में आदमी को बेक़सूर होने के लिए बहुत सारे तर्क मिल जाते हैं ,वह बोला -हानि-लाभ-जीवन-मरण ,यश- अपयश विधि हाथ |जीवन-मरण तो भगवान के हाथ में है ,मेरा क्या दोष |

समाज में जो वातावरण है उसमें धर्म भी भय का एक कारण है |गोहत्या के पाप से बचने के लिए उसने किसी पुरोहित से संपर्क किया -उसे पाप से छुटकारे का उपाय मिल गया |

दक्षिणा देने से क्या नहीं हो सकता |दक्षिणा के लालच ने ही तो भ्रष्टाचार को जन्म दिया है |दक्षिणा के लालच में कर्मचारी फाइल गुम कर देता है और अपने काम को सही सिद्ध करने के उसके पास बहुत तर्क हैं |ये तर्क अब इतने ज्यादा चल चुके हैं कि भाई लोगों ने ईमानदारी की परिभाषा ही बदल दी है |मेरे एक मित्र एक बार कह रहे थे कि रिश्वत लेकर भी काम न करना और न पैसे लौटाना तो बेईमानी है |जिसने पैसे लेकर काम कर दिया वह तो ईमानदार है |ध्यान से देखें तो ईमान कितना सस्ता कर दिया है इस तर्क ने ?उसने तो रिश्वत  को  जायज़ बना दिया |

इस चलन को बदलना मेरे हाथ में नहीं है इसलिए दक्षिणा से आगे चलकर बात पूरी करते हैं |   

पुरोहित के बताये उपाय के अनुसार उसने काफी धन व्यय करके लंगर का आयोजन किया और उससे पहले अखंड पाठ करवा लिया |

उस आदमी ने,जिसने गाय को मरते देखा था ,ने  भी यह सब देखा ,वह बोला- यह लंगर किस महापुरुष ने करवाया है ?

वह तपाक से बोला-मैंने करवाया है |यह कहते हुए उसका मस्तक दर्प से चमक रहा  था |वह आदमी जिसने उसे गाय पर वार करते देखा था,बोला- अच्छा लंगर आपने कराया है,फिर तो गाय की हत्या भी आप ही ने की है |यह सुनकर वह घबरा गया |

उस व्यक्ति अपनी बात आगे बढ़ाते हुए कहा-यह तो बिलकुल स्पष्ट है अन्यथा आप तो अपना दोष परमात्मा पर मढ़ ही चुके थे |लंगर करवाने वाले आप और हत्या करने वाला प्रभु ,यह दोहरा मापदंड परमात्मा के न्यायालय में टिक नहीं सकता |  

सत्य के साथ हेरा फेरी नहीं चल सकती क्यूंकि परमात्मा सब कुछ जानता है और किसी के बहकावे में आने वाला नहीं है |


व्यवस्था भक्ति में इसलिए सहायक होनी चाहिए----- 

रामकुमार सेवक  

बहुत से प्रसंग ऐसे होते हैं जो हम तक पहुँचते हैं लेकिन वो हमें प्रभावित नहीं कर पाते |उन्हें हम महत्व नहीं देते लेकिन जो आज की परिस्थितियों को सरल बनाने में हमारी मदद करते हैं ,मुझे लगता है कि उन्हें महत्वपूर्ण मानकर लिखा जाना चाहिए क्यूंकि आज की समस्याओं का सामना करने के लिए वे हमारी मदद कर सकते हैं |

इस प्रसंग को मेरे एक मित्र ने प्रतिभागी द्वारा बताये गए तथ्यों के आधार पर मुझे बताया |

हमारी बहुत सी समस्याओं के समाधान हमारे अतीत में छिपे होते हैं |सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी एक बार अपनी माता (निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी )को याद करते हुए बता रहे थे कि माता जी हालात को सँभालने में मदद करती थीं |यद्यपि वे उन्हें(बाबा हरदेव सिंह जी को ) सदा गुरु का ही सम्मान और स्थान देती थीं लेकिन यदि कभी ज़रुरत महसूस करती तो सहजता से बता देती थीं कि  वे(बाबा गुरबचन सिंह जी ) तो ऐसा करते थे |

इस प्रकार की जानकारी से परिस्थितियों का सामना करने में मदद मिल जाती थी |

इस दृष्टिकोण से जब हम इतिहास का अध्ययन करते हैं तो वह हमारी सफलता का नक्शा सिद्ध होता है |

प्रसंग जो बताया गया ,वह यह है कि सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली की निरंकारी वर्कशॉप में सत्संग हो रहा था |

बाबा गुरबचन सिंह जी मंच पर विराजमान थे |एक गुरसिख बहन सेवादल की वर्दी में वहां सेवा कर रही थी |(अब यह बहन निरंकारी मिशन में ऊंचे पद पर आसीन हैं |बाबा गुरबचन सिंह जी से उनका रक्त सम्बन्ध है,लेकिन नाम लिखना उचित नहीं  होगा )

मेरा ख्याल है कि बिना नाम लिखे भी यह प्रसंग आज के वातावरण को समझने में बहुत सहायक होगा      इसलिए उसे लिखने से मैं अपने आपको रोक नहीं पा रहा हूँ | जो कुछ मुझे बताया गया वह मुझे वैसा आनंद दे गया जैसे मैं उसमें सीधे शामिल रहा होऊं लेकिन जब हम निरंकार के प्रभाव क्षेत्र में स्वयं को समर्पित कर देते हैं तो उस गतिविधि में हमारी  भागीदारी सुनिश्चित हो जाती है |

हुआ यह कि सत्संग के दौरान एक बुजुर्ग माता बाबा जी के आसन तक  जब सीधे आने लगी  तो सेवादार बहन ने उन्हें विनम्रता से रोक दिया और लाइनों में आने के लिए कहा |

माता चूंकि बुजुर्ग थी इसलिए लाइन में लगना उनके  लिए सहज नहीं था ,उन्होंने बहन से दोबारा अपनी बात कही लेकिन उनकी अपनी मजबूरी थी क्यूंकि सेवादल की सदस्य होने के नाते अनुशासन की रक्षा करना उनका कर्तव्य था |

इसके बावजूद यह भी तथ्य है कि व्यवस्था इसलिए की जाती है कि संगतों को असुविधा न हो  |बाबा जी बुजुर्ग माता की मुश्किल समझ रहे थे और सेवादल की बहन की मजबूरी को भी इसलिए उन्होंने उस बहन को इशारा कर दिया कि उन्हें उनके पास तक आने दिया जाए |

उनके संकेत करते ही माता जी को आगे भेज दिया गया और सेवादार बहन की मजबूरी भी दूर हो गयी |

बाद में जब वह बहन घर पहुंची और बाबा जी भी संगत के बाद घर पहुँच गए तो उन्होंने सेवादार बहन को समझाया कि सब व्यवस्थाएं आने वाली संगतों की सुविधा के लिए की जाती हैं इसलिए हर ड्यूटी में यह ध्यान रखना चाहिए कि उसे पत्थर की लकीर अथवा कठोर न बनाया जाए बल्कि सहज और स्वाभाविक रखा जाए |सेवादार को सदा आशीर्वाद प्राप्ति का ध्यान रहना चाहिए |सन्त-महात्मा खुश होकर जाएँ इस भाव से की गयी सेवा हमें सदा ऊंचाई प्रदान करती है,खुशी प्रदान करती है |

यह प्रसंग मुझे यह सोचने पर विवश कर गया कि हमारी  हानि सदा अहंकार ही करता है इसलिए हमें स्वाभाविक नियमो को अहम् का सवाल नहीं बनने देना चाहिए |

वार्षिक समागम के दौरान लगभग पच्चीस वर्ष समागम की रिपोर्ट लिखने का मौका मिला है |हम लोगों की टेबल जहाँ लगी होती है,वहां तक पहुँचने के लिए सुरक्षा के लगभग सारे चक्र पार करने होते हैं,कुछ सेवादार अब तक सहयोग देते आये हैं और कुछ शौचालय तक जाने और फिर लौटने में  भी अवरोध पैदा कर देते थे |व्यवस्था बहुत हद तक हमारे अपने दृष्टिकोण पर निर्भर करती है इसीलिए शायद बाबा गुरबचन सिंह जी ने उस बहन को सेवा का मर्म समझते हुए आशीर्वाद प्राप्ति के भाव को नियमो अथवा अनुशासन से ऊपर रखने की बात कही और यह बात आज भी उतनी ही सारगर्भित है |

भक्ति को बीच में रखकर जो व्यवस्था की जाती है वह हमें उत्साह भी देती है और सुकून भी प्रदान करती है |       


कच्चा तेरा मकान है ,कुछ तो ख्याल कर 

रामकुमार सेवक 

कल किसी मित्र ने एक वीडियो भेजी ,शायद पाकिस्तान से आयी ,उस वीडियो में वहां की एक बच्ची वहां के प्रसिद्द शायर फ़राज़ साहब का यह शेअर मासूम स्वर में कह रही थी-

बारिशों से दोस्ती अच्छी नहीं फ़राज़ 

कच्चा तेरा मकान है ,कुछ तो ख्याल कर |

शेअर सीधे दिल में जाकर बैठ गया |कच्चे मकान के लिए बारिश जानलेवा है और शायर उसे सबसे ज्यादा महत्ता दे रहा है |इसलिए शायर ने खुद ही खुद से कहा-कच्चा तेरा मकान है ,कुछ तो ख्याल कर | 

मुझे ख्याल आ गया कि हम भी तो अहंकार को ही सबसे ज्यादा महत्व देते हैं ,निरंकार की बजाय,जबकि अहंकार समस्या है और निरंकार-समाधान |समस्या आतंरिक है तो समाधान भी अंतर में ही होना चाहिए | 

बाबा हरदेव सिंह जी महाराज फरमाते थे-

मान मुनी-मुनीवर गले,मान सभी को खाये -तथा -हरजी को हंकार न भावै 

बाबा जी की दोनों बातें बहुत यथार्थ लगी क्यूंकि इतिहास साक्षी है कि अभिमान ने महर्षि विश्वामित्र और दुर्वासा आदि को भी नहीं छोड़ा |आज तक क्रोध व् प्रतिशोध की भावना उनकी पहली पहचान बानी हुई है |

बाबा जी ने कहा-जलता हुआ कोयला यदि कोई हथेली पर रख ले तो उसे रखने वाला चाहे जो भी हो,हथेली जलेगी ही |इसी प्रकार अभिमान भी किसी का लिहाज नहीं करता और इंसान को पतन की ओर ले जाता है |  इस दृष्टि से अभिमान हमारे जीवन के लिए वैसे ही जानलेवा है जैसे कच्चे मकान के लिए बारिश लेकिन हम जैसे छोटी-छोटी चीजों को तूल देते हैं अपने खुद के अहंकार पर नियंत्रण पाने की बजाय |

हम भी क्या करें,जो कभी शत प्रतिशत समाधान हुआ करता था वहां भी नयी-नयी समस्याएं आती रहती हैं |उतना मजबूत सुनने को नहीं,मिलता जितना मजबूत भाव चाहिए |

समस्या यह भी है कि आजकल अध्यात्म चर्चा के लिए निर्धारित वक़्त का बड़ा हिस्सा मोबाइल से भिड़ने में ही बीत जाता है जबकि बाबा हरदेव सिंह जी के समय से ही मोबाइल पर अंकुश लगा दिया गया था क्यूंकि उनके विचारों को ध्यानपूर्वक सुनना हमारी सबसे बड़ी ज़रुरत बन गयी थी इसलिए मोबाइल को खामोश करना ही पड़ता था |यह स्वाभाविक प्रतिबन्ध जैसा था |

 अब उस अंकुश को प्रबल बनाया जा रहा है तो वह कुछ गलत भी नहीं है लेकिन हमारी जंग मोबाइल से नहीं अभिमान से है चूंकि अभिमान हमारे लोक -परलोक को धूमिल करता है जबकि मोबाइल हमारे लिए आपसी मिलवर्तन,संपर्क और उससे प्राप्त  सुख का एक साधन है|

साधन और साध्य को हमें अलग-अलग ही रखना होगा |साध्य ,साधन से ज्यादा महत्वपूर्ण है और रहेगा |

निरंकारी विचारधारा की सीमा रेखा है-पांच प्रण और ये प्रण हमें तन-मन-धन,जाति-पाँति,खान-पान,शिक्षा-दीक्षा,रुतबे आदि के अहंकार से बचाने के लिए हैं |   

हमें सचेत रहना होगा कि सत्संग में हम अपना अध्यात्म.अपनी आस्था मजबूत करने के लिए जाते हैं न कि किसी के विरुद्ध कोई अभियान चलाने के लिए |      

      निरंकारी विचारधारा जीवन को जाग्रत,सहज और सरल बनाने का नाम है |यदि यह जटिल और पाबंदियों से भरी होती तो निरंकारी अनुयाइयों की संख्या काफी सीमित होती |इसे सदैव की तरह सहज और सरल रहना चाहिए न कि अस्वाभाविक और जटिल |सत्संग में सत्य पर ही ध्यान केंद्रित करना चाहिए क्यूंकि यह जीवन कच्चे मकान से भी ज्यादा क्षणिक है -सिर्फ पानी का बुलबुला |

अहंकार से दोस्ती को कमजोर करने का लक्ष्य कब तक टालते रहोगे ?शायद उस बच्ची की मासूमियत ने यही मुझसे कहा-धन निरंकार जी-     


क्या प्रसाद में अब प्रभु की कृपा निहित नहीं रह गयी है ? 

रामकुमार सेवक  

मैंने सुना है कि कोई आदमी मदिर-मस्जिद,चर्च -गुरुद्वारे  आदि के सामने खड़ा होकर भीख माँगा करता था |हर जगह कुछ न कुछ मिल ही जाता था लेकिन एक दिन कई घंटे वहां खड़े होकर भी उसे कुछ नहीं मिला |

रात भी गहराने लगी थी |वह निराश होकर लौटने लगा तो उसने एक जगह भीड़ देखी |वह उधर ही चल दिया |

वह एक मयखाना था |वहां भी उसने नारा लगाया-दे दे अल्लाह के नाम पर |दे दे भगवान के नाम पर |और भी नामो से पुकारा मगर कुछ मिला नहीं |  

वह लौटने को ही था कि एक नशेबाज़ पास से निकला |  उसने सौ रूपये का नोट निकाला और उसके कटोरे में डाल दिया |

भिखारी खुश होकर जोर से बोला-या अल्लाह, लगता है तूने अब अपना ठिकाना बदल दिया है |  

यह पुराना लतीफा  आज सुबह याद आ गया |कारण भी कुछ अजीब ही था |

बहुत वर्षों से मैं एक जगह सत्संग के लिए लगातार  जाता हूँ |पिछले रविवार भी सत्संग में गया था |एक बजे के लगभग मैंने श्रद्धापूर्वक प्रसाद लिया और खाया |यह कोई विशेष बात नहीं थी लेकिन  मेरे  दांत  में दर्द शुरू हो गया |सत्संग के बाद वापस आकर मैंने डॉक्टर से संपर्क करने की कोशिश की लेकिन उस दिन उनकी छुट्टी होने के कारण उपचार हो नहीं पाया |

उस दिन रात को भी दांत साफ़ करने का नियम मैंने अपने ऊपर लागू किया(स्वस्थ रहने की अरदास के साथ ) और सुबह मैं बिलकुल स्वस्थ था |

तब से अभी तक स्वस्थ हूँ और मालिक का शुक्रगुजार हूँ |मैं सोच रहा हूँ कि क्या प्रसाद में अब प्रभु की कृपा निहित नहीं रह गयी है ? 

मैंने अनेक बार यह तथ्य महसूस किया है कि कुछ लोग दवा  खाने के बावजूद भी बीमार रहते हैं और कुछ लोग ,विशेषकर आर्थिक रूप से  मजबूर लोग ,दवा  न  खाने या सही दवा न खाने के बावजूद स्वस्थ हो जाते हैं |इसका अर्थ है कि दवा सिर्फ माध्यम है रोग का उपचार तो प्रभु की कृपा से ही होता है |  

प्रसाद के बारे में मेरी मान्यता रही है कि-एक ओमकार ,सतनाम,कर्ता पुरख,निरभउ,निर्वैर ,अकाल मूरत,अजूनि ,सैभं -सतगुरु प्रसाद अर्थात यह निरंकार प्रभु ,इसका ज्ञान ही सतगुरु का शाश्वत प्रसाद है |

वर्षों पहले मुझे इस तत्व पर विचार निरंकारी कॉलोनी की प्रातःकालीन सत्संग में ,प्रकट  करने का अवसर मिला था |

तब जहाँ मैं रहता था उसके प्रांगण में रोजाना प्रातःकालीन सत्संग के लिए प्रसाद बनता था |सेवादार महापुरुष घी,चीनी,सूजी आदि के संयोग से उसे बनाते थे | मैंने सत्संग में कहा था कि सूजी-चीनी -घी आदि को मिलाकर ही हर जगह हलवा बनाया जाता है लेकिन हर हलवा प्रसाद नहीं होता |

अंत में जब सेवादार महात्मा सामूहिक रूप में,समर्पित भाव से सुमिरन करते हैं-,और सत्संग में सतगुरु के आसन पर बैठे महात्मा उसे उसी भाव से स्वीकार करते हैं तब वह प्रसाद बनता है और किसी भी रोग को दूर करने में सक्षम होता है |

यहाँ उस प्रसाद को खाकर मेरे दांत में दर्द शुरू हो गया,इसका अर्थ है कि या तो बनाने वाले सेवादारों ने उसमें सुमिरन द्वारा निरंकार को सम्मिलित नहीं किया था या उसे सतगुरु के आसन पर बैठे महात्मा ने उस भाव से स्वीकार नहीं किया था अन्यथा प्रसाद रोग पैदा नहीं कर सकता क्यूंकि दुखभंजन रोग का निदान किया करता है उसे जन्म नहीं दिया करता |

आइये इन मुद्दों पर तत्व की दृष्टि से विचार करें ताकि निरंकारी मिशन में निरंकार स्थापित रहे-धन निरंकार जी     


कुटिया के भाग्य तब जागे

रघुवीर खड़े जब आगे ----कब और कैसे ?

रामकुमार सेवक  

कोई भी संस्कार आसानी से हमारी आदतों में सम्मिलित नहीं होते,उसके लिए अंतर्मन की स्वीकार्यता चाहिए होती है |

आज सुबह मैं एक भजन गुनगुना रहा था -

हे साहिब ,हे मालिक मेरी प्रीत निभा देना 

अपने इन चरणों के मंदिर में जगह देना |

जब यह गीत गुनगुना रहा था मुझे बाबा हरदेव सिंह जी का ध्यान आ रहा था |मेरी संवेदना अब भी यह अनुभव करती है कि उनका स्थूल शरीर तो लगभग दो साल पहले हमारे बीच से ओझल  हो गया लेकिन सूक्ष्म शरीर इस निराकार में अब भी महसूस होता रहता है |

9 जनवरी 1989  को बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ,निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी,जे आर डी सत्यार्थी जी,निर्मल जोशी जी और मेजर जे डी शर्मा जी आदि को साथ लेकर पहली बार मुरादनगर पधारे |  सत्संग नयी गुड़ मंडी में हुआ |

कार्यक्रम के बाद बाबा जी ने कृपापूर्वक रावली रोड पर हमारे घर में दर्शन दिए |मेरे माता-पिताजी भी तब शरीर में थे | मेरी माता जी ने मुझे बताया कि बाबा जी जैसे ही घर के भीतर आये उन्होंने भजन गाया-

आज मेरी कुटिया के भाग्य जागे खड़े रघुवीर देखो मेरे आगे 

दे दूँ प्राण कहते हुए राम राम जी-चरणों में जिनके चारों धाम जी --

भीलनी के झूठे बेर खाये राम जी -चरणों में इनके चारो धाम जी--

माता जी बताती थीं कि बाबा जी मुस्कुराये और घर के भीतर चले गए |

इस भजन को मैं अपनी माताजी के श्रीमुख से बचपन से ही सुनता आया हूँ |मैंने इस गीत को कभी नहीं गाया |लेकिन आज उन्हें याद करते हुए इस गीत को गाया भी और सुना भी |यह भीतर की अवस्था है और कहीं भी ,कभी भी मुझे आनंद में भिगो देती है |

उस दिन उन्होंने जो गीत गाया,वो निरंकारी गीत नहीं है लेकिन किसी के लिखे हुए को माता जी ने कितने सही अवसर पर प्रस्तुत किया |बाबा जी सामने खड़े और वो गा रहीं-खड़े रघुवीर देखो मेरे आगे--कोई बुद्धिजीवी इसकी वास्तविकता को अनुभव नहीं कर सकता -क्योंकि यह अवस्था है भावलोक की |इसे ह्रदय अनुभव करता है |बुद्धि केवल शब्द पकड़ती है जबकि ह्रदय भाव पकड़ता है |

 माता जी का स्थूल शरीर भी वर्ष 2002  में हमारे बीच से लुप्त हो गया |

माता जी बिलकुल अनपढ़ थीं लेकिन गीतों की किताबें लेकर मुझे देतीं ,मुझसे गीत सुनतीं ,उन्हें याद करतीं और संगत में गातीं |

ह्रदय की भाषा सिर्फ सतगुरु ही समझते और स्वीकारते हैं |इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जो ह्रदय की अवस्था को उसी स्तर पर समझता और स्वीकारता है,वही सतगुरु होता है |

शब्द तो वर्षों से फूट रहे थे लेकिन उस दिन  निराकार का साकार स्वरुप सामने था, जो ह्रदय की,भाव की भाषा समझने में सक्षम था |

स्थूल और सूक्ष्म दोनों जीवंत थे इसलिए वह दिन ऐतिहासिक हो गया |शब्द और स्रोत दोनों सामने थे|बूँद भी सागर भी और उन्होंने उस अवस्था को अनिर्वचनीय भाव से स्वीकार किया | आज मैं भाव द्वारा उसी दिन की अवस्था को महसूस कर पाया |भक्ति का यह कौन सा प्रकार है,मैं सोचता हूँ लेकिन फिर उसी भावलोक में लौट जाता हूँ |प्रकार ढूंढना बुद्धि का विषय है और आनंद भाव का |अभी आनंद लेते हैं प्रकार कभी बाद में ढूंढ लेंगे | धन निरंकार जी-     


युद्ध के बाद भी तो शांति ही चाहिए 

रामकुमार सेवक 

 

जो भरा नहीं है भावों से बहती जिसमें रसधार नहीं 

ह्रदय नहीं वो पत्थर है,जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं |

ये पंक्तियाँ आजकल बहुत याद आ रही हैं क्यूंकि सीमा पर हमारे जवान शहादत दे रहे हैं |कल जो वीर जवान पड़ोसी देश में फंस गया उसके लिए हमारे ह्रदय में सहानुभूति है |उसके माता-पिता ,परिजनों के प्रति संवेदना है |यह संवेदना हम सबकी प्रार्थनाओं का रूप ले चुकी है और इसके सार्थक परिणाम भी सामने आये हैं 

जिस प्रकार की हवा है,ऐसे वातावरण में युद्ध का विरोध करना उचित नहीं लेकिन युद्ध कभी भी अच्छे नहीं होते अर्थात शुभ नहीं होते |

जब 1971  का युद्ध हुआ तब मैं बच्चा था |तीसरी कक्षा में पढता था |सर्दी के दिन थे |सुबह जब  हम स्कूल जा रहे होते थे तब लोग दैनिक हिंदुस्तान के ऊपर यूँ झुके  होते  थे, जैसे कोई नयी और ख़ास खबर मिलेगी |इंदिरा गाँधी जी के पीछे देश जैसे एकजुट था |

लोगों में आज की तरह ही जोश था लेकिन डर भी था | मुज़फ्फर नगर,जहाँ मैं उन दिनों रहता था, पाकिस्तान के आक्रमण से लोग डरे रहते थे |आकाश में उड़ते हवाई ज़हाज़ शहर की पहचान न कर सकें उसके कारण रात को ब्लैकआउट होता था |बाहर की तरफ रोशनी नहीं की जाती थी | छोटा-मोटा बल्ब भीतर जलता था और आवश्यक  काम किये जाते थे |

मेरा एक दोस्त था ,उसने बताया कि वो उन दिनों दौराला में रहता था ,जो कि मेरठ ज़िले में है |उससे पता चला कि उस युद्ध में बंदरों की भी भूमिका थी |वे हमारी सेनाओं की सहायता कर रहे थे |उसके पिताजी ने उन बंदरों के लिए रेलवे स्टेशन पर चाय पिलाने की सेवा की थी और उन बंदरों ने कप-प्लेट  तोड़ दिए थे,वह बताया करता था |

वह तब मुझसे भी कुछ छोटा रहा होगा लेकिन उससे मुझे नयी जानकारी मिली |

उन दिनों एक पोस्टर लगा दिखता था -करेंगे बंगला देश आज़ाद ,होगा याह्या खां बर्बाद |

समय के साथ  पाकिस्तान के दो टुकड़े हो गए ,बांग्ला देश आज़ाद हो गया |

हमारे देश की आर्थिक स्थिति इतनी बढ़िया न थी इसलिए टैक्स भी लगे |मेरे पिताजी इससे परेशान रहते थे कि चीजें महँगी हो गयी थी |

 बांग्ला देश की मुक्ति वाहिनी के लोग भारत के कृतज्ञ हुए क्यूंकि उन्हें सहारा और सहायता मिली और वे पाकिस्तान की तत्कालीन व्यवस्था के ज़ुल्मो से बच गए लेकिन एक देश के तौर पर हमने क्या पाया ,यह विचारणीय प्रश्न है |  

मुझे लगता है कि देश की परिभाषा को यथार्थ में तय करने की ज़रुरत है |एक मनुष्य होने के नाते हम इस पर विचार कर सकते हैं जबकि पशु-पक्षी यह तय नहीं कर सकते क्यूंकि उनकी सोच सीमित है |

देशभक्ति पर केंद्रित उपर्युक्त पंक्तियाँ मैने विद्यार्थी जीवन में पढ़ी थीं |  इसमें पहली पंक्ति में लिखा है कि जिसमें स्वदेश का प्यार नहीं |

इसे परिभाषित करते समय हम कश्मीर से कन्याकुमारी तक का भौगोलिक क्षेत्र ध्यान में रखते हैं लेकिन प.जवाहरलाल नेहरू ने भारतमाता के अर्थ बताते हुए भारत -एक खोज में कहा था -भारत है इस भूमण्डल पर रहने वाले लोग |यह परिभाषा भौगोलिक परिभाषा से ज्यादा जीवंत है |भौगोलिक क्षेत्र और लोग दोनों की रक्षा जरूरी है |रक्षा का दायित्व भारत की सत्ता का,सरकार का है,जिसे वह निभा भी  रही है |

परिस्थितियां अब भी असामान्य हैं लेकिन कल शाम को मैं संसद भवन के निकट -केंद्रीय टर्मिनल बस स्टैंड पर वहां की गयी सजावट को देख रहा था ,ऐसा लगता था जैसे चुनाव हो रहे हैं |

यह दुखद है ,मूल समस्या यह है कि खूब खर्चा करने और हज़ारों-लाखों सैनिकों की शहादत के बावजूद कश्मीर की हवाओं में एक परायापन आज भी मौजूद है |

लेह और जम्मू में तो अपनापन है लेकिन कश्मीर में वो सहजता नहीं है और वो सहजता युद्ध से आ भी नहीं सकती |कश्मीर को दिया गया विशेष प्रावधान धारा-370  या 35A,इस सहजता में गतिरोध पैदा करती हैं लेकिन वर्षों से हम देखते आ रहे हैं कि राजनीतिक भूख इस स्थिति को सहज नहीं होने देती |

समाधान की दिशा में जाता हूँ तो मुझे भाई कन्हैया जी की याद आती है |वे गुरु गोबिन्द सिंह जी के शिष्य थे और सैनिकों को पानी पिलाते थे |

उनकी शिकायत आयी कि वे दुश्मन सैनिकों को भी पानी पिलाते हैं |गुरु साहब ने उनसे पूछा कि-क्या यह सच है तो उन्होंने विनम्रता से कहा-गुरु जी,आपकी शिक्षाएं साथ रखता हूँ तो मुझे कोई दुश्मन नज़र आता ही नहीं |

गुरु जी नाराज़ नहीं हुए बल्कि खुश हुए क्यूंकि वे सत्ता से पहले सत्य के पोषक थे |मानवता के मसीहा थे |

सत्ता की भूख मन में क्या और कैसा परिवर्तन लाती है,इस बारे में हम देखते हैं कि आदमी सेवा के नाम पर पेशेवर हो जाता है |

सच के नाम पर वह बेझिझक झूठ बोलता है और लोगों की आँखों में धूल झोंकने को अपना सर्वोच्च ध्येय बना लेता है |

  परसों वाटस अप्प पर उपर्युक्त काव्यांश में किसी जोशीले आदमी ने लिख दिया -ह्रदय नहीं वो पत्थर है जिसमें हिंदुत्व का प्यार नहीं |

कवि ने लिखा स्वदेश ,धर्मांध ने उसे बना दिया-हिंदुत्व 

धर्मांध यह नहीं सोचते कि हिंदुत्व इतना भी संकीर्ण  भी नहीं है |वह तो कहता है-मनुर्भव अर्थात मनुष्य बनो |

जिसने स्वदेश को हिंदुत्व में बदला उसे शायद पता नहीं है कि कवि द्वारा लिखे शब्दों को बदलने का अधिकार किसी को नहीं है |शब्द निर्जीव नहीं होते,उनकी भी आत्मा होती है |वही उनका अर्थ भी निर्धारित करती है |इस धरातल पर सोचेंगे तो पाएंगे कि हिंदुत्व स्वदेश से बेहतर शब्द नहीं है |यदि वह कवि जीवित  होते तो आज उन्हें निश्चित ही पीड़ा होती |

  उन्हें ,जो शब्दों को चोट पहुंचाते हैं,यह सोचना चाहिए कि हमारे धर्मग्रंथों में चार पुरुषार्थ बताये गए हैं-धर्म-अर्थ -काम और मोक्ष |इनमें सबसे महत्वपूर्ण है मोक्ष |

मोक्ष के लिए सब आकारों से ऊपर उठना और अहंकार का त्याग करना होता है |मोक्ष का तत्व यह है कि जो स्थूल के ऊपर सूक्ष्म को महत्व देता है और माया का प्रयोग करके भी माया जाल में फंसता नहीं  वह मोक्ष का वास्तविक पात्र होता है |

ऐसा मनुष्य भाई कन्हैया की भांति सही अर्थों में धार्मिक सिद्ध होता है क्यूंकि मानवता उसकी दृष्टि से कभी ओझल नहीं होती |  

सत्ता को चाहिए कि मानवता के इस ध्रर्म को निभाने में सहायक हो |यही राजधर्म है जिसकी प्रेरणा श्री अटल बिहारी वाजपेयी जी ने कभी दी थी |जो संकीर्ण दृष्टि को त्याग नहीं सकते तो उन्हें सत्ता प्राप्त करने का कोई नैतिक अधिकार नहीं क्यूंकि युद्ध कोई स्थायी भाव नहीं है |हिरोशिमा और नागासाकी के लोगों की पीड़ा साठ साल से भी ज्यादा पुरानी है ,वह हमें युद्ध के चुनाव से रोकती है |

युद्ध हमारा स्वभाव नहीं है,जब हम अशांत होते हैं तब असंतुलित होते हैं और पुनः शांति और संतुलन चाहते हैं इसलिए स्थायी भाव है-शांति और वह बातचीत से हल होगी |भाई कन्हैया जी की अवस्था में होगी |

यह स्थायी शांति ही सबको चाहिए |         

 


जो सिद्धांतवादी  हैं उनका झूठ से तालमेल बैठना असंभव क्यों है ? 

रामकुमार सेवक  

जब भी मैं मध्य मार्ग के बारे में सोचता हूँ तो मुझे बुद्ध याद आते हैं,जिन्होंने मध्य मार्ग का प्रतिपादन किया कि निर्वाण के मार्ग में शरीर कोई बाधा नहीं है |शरीर को इतना मत सुखाओ की अस्तित्व ही खतरे में पड़ जाए |अति की तरफ मत जाओ |तभी उन्होंने सुजाता की खीर को स्वीकार किया |

फिर याद आते हैं कबीर,जिन्होंने कहा-

अति का भला न बोलना,अति का भला न चुप 

अति का भला न बरसना अति की भली न धुप |

अर्थ आपको पता ही होंगे इसलिए मुद्दे की बात पर आता हूँ कि कबीर साहब ने भी मध्य मार्ग का ही समर्थन किया |

कल सुबह कोई मित्र मेरे किसी अन्य मित्र के बारे में  कह रहे थे कि -वे सबके साथ संतुलन साध लेते हैं ,मध्य मार्गी हैं इसलिए अब भी उसी पद पर हैं जहाँ वे कुछ वर्ष पहले तक थे |

जिस व्यक्ति के बारे में वे कह रहे थे मेरा -उनका बहुत प्रेम रहा है लेकिन अब वह दफ्तर ही ख़त्म हो गया है जहाँ हम और हमारे मार्गदर्शक - प्रेरक बैठा करते थे |

2005  के करीब उस दफ्तर का प्रबंध ऐसे लोगों के हाथों में आ गया था जिनकी कारगुजारियों ने उस दफ्तर का विशाल -आध्यात्मिक पारिवारिक स्वरुप और मैत्री भाव ख़त्म कर दिया |

समय  के साथ सिद्धांतवादी लोग वहां से गायब होते चले गए क्यूंकि वे चाटुकारिता को अपनी जीवन शैली नहीं बना सके |सच को सच कहने की आदत से बाज नहीं आये |

मैं सोचता हूँ कि -क्या वे लोग असंतुलित थे ,जिन्होंने अपने सिद्धांतों से समझौता नहीं किया ?अपना दींन -ईमान नहीं बेचा,चाटुकारिता को गले नहीं लगाया ?

मैंने स्पष्ट कह दिया-कल मैं फलां विचारक को सुन रहा था और इस नतीजे पर पहुंचा हूँ कि बेईमान लोग किसी के भी साथ संतुलन साध लेते हैं |  सत्ता में होते हैं तो पूंजीवादी हो जाते हैं|सत्ता के बाहर हों तो समाजवादी और साम्यवादी हो जाते हैं |गिरगिट की तरह रंग बदलने वाले ये लोग .कभी वामपंथी तो कभी दक्षिणपंथी बनकर सिद्धांतों का खूब मज़ाक उड़ाते हैं  |इन लोगों ने प्रजातंत्र का खूब व्यवसाय किया है |

मैं सोचता हूँ कि एक ही मार्ग पर डटे रहने वाले सिद्धांतवादी क्या बुद्ध और कबीर के खिलाफ हैं ?    

यहाँ भी मुझे कबीर दास जी का एक दोहा ध्यान आता है-प्रेम  गली अति सांकरी ,जामें दो न समाई  |अर्थात प्रेम अथवा इश्क़ भी ऐसा स्नान है जिसमें एक ही बचता है|

नमक  या चीनी यदि पानी का संग करें तो   एक ही बचता है |वो अलग बात है कि वे अपने निशान छोड़ जाते  हैं लेकिन अपना पुराना स्वरुप खो देते हैं|बाबा हरदेव सिंह जी के शब्दों में-ज्ञान सरोवर में जो डूबा,वही हुआ भवसागर पार | 

परमेश्वर  में डूब जाना भक्ति की अति है,यहाँ मध्य  मार्ग  नहीं  चलता |

आपने संसार में भी रहना है और भक्ति भी करनी है तो यह कुछ कठिन है क्योंकि दोनों में ही ऊपर-ऊपर तैरना होगा |संतुलन साधना होगा लेकिन भाव सागर के पार जाना है तो ज्ञान के,प्रभु के सरोवर में डूबना होगा |जो दो के बीच में हैं वे संतुलन बैठा सकते हैं लेकिन जिन्होंने एक को चुन लिया वे फिर दुसरे को नहीं जानते जैसे प्रकाश अँधेरे को नहीं जानता |


उनका जीवन बहुत बड़ा था,अगर लम्बा भी रहा होता बेहतर होता 

रामकुमार सेवक  

आज 23 फरवरी है,यदि बाबा हरदेव सिंह जी आज शरीर में रहे होते तो पैंसठ साल के हो चुके होते |यह कोई लम्बी उम्र नहीं है लेकिन नायकों को यह दुनिया प्रायः लम्बे समय तक सहन नहीं कर पाती जबकि नायक जो कुछ करते हैं,इस दुनिया को बेहतर बनाने के लिए ही करते हैं |

इस हिसाब से उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए ताकि उनका कोई काम अधूरा न रहे |

बाबा हरदेव सिंह जी अध्यात्म पुरुष थे |उनका अध्यात्म उन्हें दुनिया के हर जीव से जोड़ता था |वे किसी का बुरा सोच भी नहीं सकते थे क्योंकि उनकी मान्यता थी कि कोई भी युद्ध ज़मीन पर उतरने से पहले मन-बुद्धि के स्तर पर लड़ा जाता है |

युद्ध के करीब का एक शब्द है-जेहाद |इस शब्द की चर्चा सुनकर भी डर लगने लगता है |बाबा जी ने इस शब्द की अनूठी  व्याख्या की | उन्होंने कहा-यह बाहर के किसी व्यक्ति से लड़ने का नाम नहीं है बल्कि अपने भीतर की कमजोरियों से संघर्ष करने और उन पर विजय पाने का नाम है |

जब निरंकारी मिशन के बारे में लोग अनेक प्रकार के प्रश्न चिन्ह लगाते थे तब उन्होंने कहा था-मिशन का अर्थ है-उद्देश्य या लक्ष्य |

सबके अपने-अपने लक्ष्य होते हैं जैसे-पहाड़ पर चढ़ना या तैरकर समुद्र पार करना अथवा खिलाड़ी,कलाकार या अधिकारी आदि कुछ बनना ,कुछ उपलब्धि हासिल करना |

हमारा मिशन है-सबका भला करना अर्थात पूरी दुनिया का भला करना हमारा मिशन है |

इसके लिए वे लगातार जगाते रहे |उन्होंने स्पष्ट कहा-भक्ति भागने  का नाम नहीं जागने का नाम है |  जागने का भाव कि हम सब एक निरंकार के प्रति जाग्रत हों |यह  एहसास रहे कि यह मालिक हमें हर समय देख रहा है |

वे प्रायः साधारण शब्दों में बड़ी -बड़ी गुत्थियों का रहस्य उजागर कर देते थे |उनके प्रवचन आज भी हमारी समस्याओं का समाधान आसानी से कर देते है |आज सुबह एक प्रवचन में वे बता रहे थे -भक्ति में अपने ऊपर भी मेहनत करनी पड़ती है और दूसरों के ऊपर भी ,दोधारी तलवार की तरह |इसे इस रूप में देखें कि तलवार तो काटती है लेकिन सन्त  -महात्मा-सतगुरु मानव को मानव से जोड़ते हैं |खुद भी निरंकार के प्रति  मजबूत रहते हैं और औरों को भी कमजोर नहीं होने देते |उन्हें मजबूती प्रदान करते हैं |

वे जब तक शरीर में रहे,यह काम करते रहे और निराकार में से आज भी मेरे जैसे लोगों को आत्मविश्वास और जीवन जीने का बोध प्रदान कर रहे हैं |

आनंद के  नायक ने बरसों पहले एक संवाद बोला था -बाबू मोशाय ,ज़िन्दगी बड़ी होनी चाहिए लम्बी नहीं |

बाबा हरदेव सिंह जी का जीवन बहुत बड़ा था ,अगर लम्बा भी रहा होता तो सोने में सुहागे वाली बात होती |उनके जन्मदिवस पर उन्हें कोटि-कोटि नमन  


 जॉर्ज फर्नांडीज़ की दुर्लभ विशेषताएं तथा कन्फ्यूसियस के न्याय का तर्क 

रामकुमार सेवक 

कल एक आदमी की साइकिल चोरी हो गयी |मुझे कन्फ्यूसियस की याद आ गयी |

सुना है कि एक बार किसी आदमी के घर में चोरी हो गयी |हर आदमी की सहानुभूति उस आदमी के साथ थी,जिसके घर में चोरी हुई थी |कहते हैं कि चोर पकड़ लिया गया और मामला कन्फ्यूसियस के न्यायालय में पहुंचा | 

कन्फ्यूसियस  ने पूरा मामला देखा | उन्होंने चोर पर जुर्माना लगाया |

यह प्रसंग मुझे अब तक इसलिए याद है कि कन्फ्यूसियस ने चोर के साथ-साथ उस व्यक्ति पर भी जुर्माना किया जिसके घर में चोरी हुई थी |

लोगों ने कन्फ्यूसियस से स्पष्टीकरण पूछा |उन्होंने कहा-चोर के हालात अच्छे नहीं |उसकी न्यूनतम ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रहीं और इस आदमी के पास उसकी ज़रुरत से कई गुना ज्यादा पैसा है |इसका अर्थ है कि इसने कई ज़रूरतमंदों का धन इकठ्ठा कर रखा है |

इससे जुर्माना वसूल करके उन में से किसी एक को दिया जाना चाहिए जिनकी न्यूनतम ज़रूरतें भी पूरी नहीं हो पा रही हैं |

कन्फ्यूसियस की सोच चाहे जितनी भी आदर्श क्यों न हो लेकिन वर्तमान व्यवस्था में यदि इसे अपनाया जाए तो अराजकता पैदा हो सकती है |जिसने चोरी की है वह प्रत्यक्ष चोर है और जो पकड़ में नहीं आया लेकिन संपत्ति बेहिसाब है,वह अप्रत्यक्ष चोर है|

जॉर्ज फर्नांडीज़ समाजवाद के प्रेरक थे |किसी ज़माने में वे भी उग्र हो गए थे,रेल की पटरियां उखाड़ने की सोचते थे इसलिए मैं उनका समर्थक नहीं रहा लेकिन उनके घर में वंचितों के लिए छत उपलब्ध रहती थी |जब वे रेलमंत्री थे तो उन्होंने रेलों में चाय कुल्हड़ों में देने का चलन शुरू किया |वे समानता का सिर्फ भाषण नहीं देते थे बल्कि उनका ड्राइवर उनके साथ बैठकर खाना खा सकता था ,वे उससे फासला नहीं रखते थे |जबकि मैंने अनेकों बार देखा है कि जो अध्यात्म के प्रचारक हैं,शांति के संदेशवाहक कहलाते है,उनका ड्राइवर उंनके साथ बैठकर खाना नहीं खा सकता जबकि उसके पास भी वही ज्ञान है जो प्रचारक महोदय के पास है |

ये प्रचारक मेरे साथी रहे हैं लेकिन उन प्रचारकों कुलीनजनों के निकलते ही चालक सेवादार मुझसे अपना असंतोष खुलकर व्यक्त कर लेते थे क्यूंकि मुझसे वे सहजता महसूस करते थे लेकिन जॉर्ज फर्नांडीज़ आध्यात्मिक होने का दावा नहीं करते थे फिर भी किसी से नफरत नहीं करते थे |

अपने वस्त्र खुद धोते थे |ईसाई के घर जन्म लेने पर भी गीता पढ़ते और समझते थे |

 उनके व्यक्तित्व का यह  पक्ष मुझे गहराई से प्रभावित करता है |लगभग नौ भाषाओँ पर उनका एकाधिकार था |उन्होंने मजदूरों के लिए बैंक की स्थापना की ,जो अब भी सक्रिय है |उन्होंने 1972  में मुंबई में एक ऐसे ताकतवर मंत्री को हराया जो कहता था कि भगवान भी यदि उसके विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे तो हार जाएंगे | वे कर्नाटक में  जन्मे और बिहार से चुनाव लड़े और तब भी जीते जब जेल में बंद थे |

वे नेता थे,आंदोलनकारी थे लेकिन विचारक भी थे -सबसे बड़ी बात-वे ईमानदार थे |

अब उस विषय पर लौटते हैं जहाँ से हम शुरू हुए थे |हम इस व्यवस्था में देखते हैं कि      

प्रत्यक्ष चोर दंड पाता है अप्रत्यक्ष चोर सम्मान पाता है |यह विकृति असंतोष को जन्म देती है |

यह असंतोष जब हिंसक हो जाता है तो क्रांति हो जाती है -यह क्रांति बेहिसाब दर्द और बर्बादी लेकर आती है इसलिए कोशिश करनी चाहिए कि अमीर और गरीब का फासला कम हो ताकि शांति कायम रह सके |    

कन्फ्यूसियस के विचार का एक पक्ष यह भी है कि यदि धनी और निर्धन का अनुपात जीरे और ऊँट के अनुपात में ही रहा तो हालात ऐसे हो सकते हैं कि कानून और व्यवस्था का प्रबंध करने वाली संस्थाएं भी अप्रभावी रह जाएँ |वह स्थिति ऐसी होगी कि सम्पन्न लोगों का सम्मान के साथ रह पाना मुश्किल हो जाएगा |इस आलोक में कन्फ्यूसियस का न्याय समझ में आता है |   

 


इन्द्रियों पर विवेक का पहरा क्यों जरूरी है ?

रामकुमार सेवक  

मैं किसी की भी वकालत करना नहीं चाहता क्यूंकि न्यायाधीश निरंकार है और निरंकार सब कुछ जानता है इसलिए इसे किसी दलील या अपील की ज़रुरत नहीं होती |मेरा विवेक मुझे जहाँ तक लिखने की इज़ाज़त देता है,उतना मैं लिखता हूँ |

बाबा हरदेव सिंह जी महाराज वाणी के अनावश्यक उपयोग से बचते थे |मैंने अनेक बार उन्हें यह कहते हुए  सुना है कि जुबान मिली है तो इसका मतलब यह नहीं है कि कुछ भी बोलते चले जाओ |वे इस सम्बन्ध में यह दोहा बोलते थे-

वाणी तो अनमोल है,जो कोई बोले बोल , 

ह्रदय तराजू तोल के फिर मुख बाहिर खोल | 

उनका एक और प्रवचन मुझे याद आ रहा है | 1981 के कुछ वर्ष बाद की बात है|15 अगस्त को मुक्ति पर्व का समागम ,संतोख सरोवर पर हो रहा था |

समय आजकल भी थोड़ा कठिन है लेकिन उन दिनों निरंकारी संतों पर आजकल से काफी ज्यादा कठिन समय चल रहा था क्यूंकि पंजाब के किसी न किसी शहर में  लगभग रोज किसी न किसी महात्मा का बलिदान हो जाता था |उन दिनों बाहरी शक्तियों से तो अड़चन पैदा होती रहती थी लेकिन निरंकारी मिशन की जो प्रतिष्ठा सार्वजानिक तौर पर ,बाबा गुरबचन सिंह जी के बलिदान के बाद निर्मित हुई थी,वह लगातार तरक्की पर थी |

प्रबंध के स्तर पर तो आंतरिक दिक्कतें होती रही होंगी लेकिन  बाबा हरदेव सिंह जी अपनी सहनशीलता,सूझ-बूझ , भक्ति और निरंकारी राजमाता जी  के तजुर्बे और सहयोग से उन पर नियंत्रण पा लेते होंगे क्यूंकि बाहरी हमलों के बावजूद भीतर से हम स्वयं को पूरी तरह सुरक्षित महसूस करते थे |हमें भीतर से यह यकीन था-चौगिर्द हमारे रामकार ,दुःख लगे न भाई |

उस समागम में बाबा जी ने कहा था-कोई गन्दगी पडी हो और हम कहें कि इसे ख़त्म करने के लिए इसे फैला देते हैं तो गन्दगी फैलाने से गन्दगी कम होने की बजाय चारों तरफ बदबू ही बदबू फ़ैल जायेगी |यदि गन्दगी को कम करना है तो उस पर धूल-मिट्टी आदि डालनी होगी |

आज यह बात मुझे इसलिए याद आयी किस किसी की भूलों का ढिंढोरा पीटना आम चलन हो गया है |

यह तब है जबकि हम जानते हैं कि भूल सबसे होती है |बड़े की भूल का  असर ज्यादा दूर तक होता है इसलिए धर्म सिंह जी शौक़ हम लोगों को बड़े बनने से बचने  की सीख अपने अनुभव से दिया करते थे |उन्हीं दिनों संत निरंकारी पत्रिका में कुछ पंक्तियाँ छपी थीं,शीर्षक था -शौक़ साहिब के नुक्ते |उनमें से एक नुक्ता यह भी था-कुछ बन न बैठना ,जिम्मेदारी ही बढ़ेगी |

अपने बच्चे या बड़े की भूल को हम यथासंभव छिपाते हैं |प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से उसे समझाते हैं अन्यथा निरंकार से अरदास करते हैं कि उसे विवेक -बुद्धि प्रदान कर ताकि  भूल का  दोहराव न हो |

मैंने व्यक्तिगत रूप से महसूस किया है कि यह साधन काम करता है और निःस्वार्थ भाव से की गयी अरदास चमत्कार करने की क्षमता रखती है |

सत्संग में जाने से विवेक होता है,हमने सुना भी है,पढ़ा भी है और महसूस भी किया है लेकिन सत्संग छोड़ने  से किसी  की विवेक -बुद्धि जागी हो,इसका कोई प्रमाण नहीं है |अंततः यही निष्कर्ष निकलता है कि संतुलित जीवन जीने के लिए इन्द्रियों पर विवेक का पहरा जरूरी है |  


इस हालत में हम भक्त या गुरसिख नहीं हो सकते 

रामकुमार सेवक  

वर्षों पहले मैंने सन्त निरंकारी पत्रिका में दो सम्पादकीय अलग-अलग महीनो में लिखे थे-भक्त और भिखारी २-सन्त एवं शिकारी -आज इस श्रृंखला को आगे बढ़ाते हुए मैं शायद नया सम्पादकीय लिखता-भक्ति एवं गुलामी -बेशक ब्रह्मलीन महात्मा और महान कवि  धर्म सिंह जी शौक़ ने गुलामे गुरबचन शब्द अपनी शायरी में लिखा है लेकिन श्रद्धा के वशीभूत होकर स्वयं को गुलाम बताना और बात है लेकिन किसी इंसान का गुलाम होना बिलकुल अलग अनुभव है |बंधुआ मजदूरी गुलामी ही तो है |इस आलोक में महसूस करने पर पाते हैं कि सतगुरु का सच्चा अनुयाई होना तो सही रूप में स्वतंत्रता है क्यूंकि उसमें संयम साथ समाहित है और सतगुरु मुक्ति के प्रदाता हैं,न कि गुलामी के |

इसके बावजूद कोई अपने आपको सतगुरु का गुलाम मानता है तो यह वैसा ही है जैसे एक महात्मा किसी पिलर से चिपके हुए थे और आवाज़ लगा रहे थे कि-अरे यह खम्भा मुझे नहीं छोड़ रहा |

किसी ने कहा-महात्मा जी खम्भे ने कहाँ आपको पकड़ रखा है बल्कि आपने खुद खम्भे को पकड़ रखा है |आप खुद खम्भे को छोड़ दीजिये |

यह उसका अपना चयन है ,अपना सुख है |और कोई होशमंद इंसान विपरीत का चयन नहीं करता |इस आधार पर शौक़ साहब एक अनूठे अनुभव से गुजर चुके महसूस होते हैं | 

सच्ची बात यह कि इंसान अपने क्षुद्र स्वार्थों और असीम लालच का गुलाम है |सतगुरु अनेक स्थानों पर माया के जाल से बचने की बात कहते हैं और सन्तों की संगति नित्यप्रति करने के लाभ बताते हैं |सबसे बड़ी बात विवेक को जाग्रत रखने की बात कहते हैं लेकिन अपने ही संकीर्ण स्वार्थों को केंद्र बनाकर दौड़ रहा मानव सतगुरु के वचनो पर ध्यान देने की बजाय अपने ही लालच के वशीभूत होकर  विभिन्न अधिकारियों की गुलामी करने में लगा रहता है और अपनी इस आदत पर सेवा के पावन नाम का लेबल लगा लेता है |

लोग उसकी जय-जयकार करते हैं लेकिन सत्य किसी जय-जयकार के भुलावे में नहीं आता और अपनी लालसाओं के गुलाम से मुक्ति की पावन उपलब्धि उतनी ही दूर रहती है जितनी कि कीकर के पत्तों से आमों की मिठास |

फिर इंसान सतगुरु को मुक्ति का आनंद प्राप्त न हो पाने के ताने देता है तो सतगुरु कहता है कि विभिन्न लोगों की गुलामी करने की बजाय यदि सत्यनिष्ठा से निरंकार को अपने जीवन का आधार बनाया होता ,तत्वदर्शी मनीषियों के अनुभव्युक्त  प्रवचनों को गंभीरता से लिया होता तो आज ये दिन न देखने पड़ते |अभी तो चौरासी लाख योनियों के महाचक्र को भोगो |

फोटो के ऊपर ब्रह्मलीन सन्त का शीर्षक छपा होने के बावजूद ऐसा व्यक्ति कभी ब्रह्म में लीन नहीं हो सकता |

ऐसा लगता है कि इंसान मुक्ति-मुक्ति का जाप करने को ज्यादा महत्व देता है मुक्ति के तत्व पर गंभीरतापूर्वक चिंतन करने की  बजाय |    

होता यह भी है कि इंसान अपने लालच के वशीभूत होकर सेवा के नाम पर विभिन्न अधिकारियों को खुश करने में लगा रहता है |इस काम में वह तन-मन -धन व्यय भी करता है लेकिन लक्ष्य पवित्र न होने की स्थिति में साधन भी अपवित्र हो जाते हैं |साधन यदि पवित्र हैं तो उनका लक्ष्य भी तो पवित्र होना चाहिए |दूसरी स्थिति यह है कि लक्ष्य यदि पवित्र हैं तो उसे पूरा करने के लिए साधन भी पवित्र होने चाहिए |जैसा कि बाबा हरदेव सिंह जी ने  दर्पण पुस्तक में प्रकाशित एक प्रवचन में हम लोगों को सचेत किया कि साधन और लक्ष्य दोनों का पवित्र होना जरूरी है अन्यथा यह भी है कि भ्रष्टाचार से अर्जित धन का दस प्रतिशत सेवा व् परोपकार में खर्च करके अर्जित धन को सदाचार से अर्जित मान लिया जाता है |

यह वैसी ही बात है कि हरिद्वार के  गंगाजल में स्नान करके मान लिया जाए कि पाप धुल गए यह तो वैसा ही है जैसे  कंकड़ को ही कंचन मान लिया जाए या धूप को छांव मान लिया  जाए  |झूठ को सच मान लिया जाए और सच को झूठ -और आगे से हाथ जोड़कर कह दिया जाए-सतवचन  

हमारे यहाँ परिस्थितियां ऐसी ही संगीन बनी हुई हैं |यह जैसे समुद्र मंथन का दौर है |इस दौर में अपने विवेक को अपना आधार बनाये रखना और उसी के अनुसार आचरण करना बहुत जरूरी है |जो राह हमने चुनी है ,जिसे हमारा विवेक सत्य मानता है उस पर मजबूती से टिके रहना जरूरी है |

बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे कि शिखर से यदि बाएं होंगें तो भी गिरावट और दाएं होंगे तो भी गिरावट इसलिए शिखर पर तो टिकना जरूरी है |

मुझे लगता है कि शिखर है -निरंकार पर सर्वोपरि विश्वास |यह विश्वास ही हमें षड्यंत्रों से बचाता है |यह किसी भी अति से बचाकर हमें संतुलित जीवन का आनंद  प्रदान करता है |     

जिसका आधार यह निरंकार अथवा ब्रह्म हो वह असहनशील अथवा  संकीर्ण कभी नहीं हो सकता |वह तो निरंकार को ही अपनी दृष्टि में बसाता है और निरंकार को सामने देखकर प्रेममय व्यवहार करता है |एक ही व्यक्ति द्वारा किसी से घोर नफरत और किसी से घोर प्रेम, यह विरोधाभास अच्छे संकेत नहीं देता |यह हमें जाग्रत होने का प्रमाण पत्र नहीं देता |

   मानव एकता दिवस मनाने वाले मिशन में हर एक के लिए जगह होनी चाहिए अन्यथा वह हमारे सत्गुरुओं और उनके उन सच्चे अनुयाइयों की सांझीवालता  की भावना का उपहास होगा जिन्होंने एक -एक इंसान को निरंकारी मिशन से जोड़ने अर्थात उसमें मानवता के गुण भरने के लिए कठिन तपस्या की |  उनकी तपस्या को भूल कर अर्थात विशालता के स्थान पर संकीर्णता अपनाकर हम सही अर्थों में भक्त या गुरसिख नहीं हो सकते |


लगता है यही था बाबा हरदेव सिंह जी का विजन 

रामकुमार सेवक 

शायर ने न जाने किसके लिए लिखा था-

जाने के बाद जिनको ढूंढता रहता है फिर ज़माना ऐसे भी ज़माने में कुछ इंसान हुए हैं 

ऐसा व्यक्ति हमारे बीच रहा |हमने उन्हें,बोलते,चलते-फिरते हुए ,रोते-हँसते हुए देखा लेकिन उनकी मर्यादा ,परमात्मा से उनका एकत्व मुझे उन्हें इंसान कहने की इज़ाज़त नहीं देता |

लेकिन उनके जाने के तीसरे वर्ष में भी हम उन्हें ढूँढ़ते फिरते हैं |

इस बहाने उनके द्वारा स्थापित मर्यादाओं ,उनके दुर्लभ आध्यात्मिक अनुभवों और मानव मूल्यों को ढूंढते हैं |इस बहाने उनके वास्तविक विजन तक पहुँचने की कोशिश करते हैं |

इस क्रम में थोड़ी देर पहले अपने मित्र और प्रसिद्द गीतकार जगत जी का अनुभव सुनने को मिला |जगत जी बता रहे थे -यह 1985 की बात है |बाबा हरदेव सिंह जी की प्रचार यात्रा में आदरणीय जे. आर. डी. सत्यार्थी जी,हरिमोहन शर्मा जी,जे. डी. शर्मा जी,गीतकार बाबू जी के साथ दास को भी   सम्मिलित होने का सौभाग्य प्राप्त हुआ था |कार्यक्रम हल्द्वानी के आर्य समाज मंदिर में समयानुसार संपन्न हो गया था |अगला गंतव्य स्थल नैनीताल था |

      जब हम नैनीताल के लिए रवाना होने वाले थे तो सत्यार्थी जी ने कहा कि बच्चों,आज तुमने ऐसे गीत नहीं गाये जिनकी मंदिर में ज़रुरत होती है |

यह इस बात का संकेत था कि हमें अपने गीतों में कुछ सुधार करने होंगे |ये सुधार कैसे हों,यह भी  जल्दी ही समझ में आ गया |

यात्रा के दौरान कार में बाबा जी के साथ सत्यार्थी जी बैठते थे |जे डी शर्मा जी भी उसी गाड़ी में होते थे |सत्यार्थी जी ने आदेश दिया कि तुम बाबा जी वाली गाड़ी में बैठना |

मैं डरते-डरते बाबा जी के पास बैठ गया |

बाबा जी ने कहा-क्या कोई ऐसा गीत नहीं बनाया जा सकता जिसे किसी मंदिर या किसी अन्य धर्मस्थल  में भी सहजता से गाया जा सके |

क्यूंकि घबराहट थी इसलिए बाबा जी के कहने के बावजूद कुछ समझ में बात नहीं आयी  |बाबा जी ने अपनी बात फिर दोहराई |

अब जे डी शर्मा जी ने कहा-जगत जी,बाबा जी आपसे कह रहे हैं कि क्या ऐसा गीत नहीं बनाया जा सकता जो हर किसी को अपना लगे |किसी भी धर्मस्थान में गाया जा सके |   

अब मुझे हिम्मत हुई और मैंने कहा-हुज़ूर ,आपकी कृपा से क्या नहीं हो सकता ,सब कुछ हो सकता है |

बाबा जी की कृपा ने कार्य किया और यह गीत अस्तित्व में आया-रंग दे प्रभु ,नाम के रंग में काया ,

रंग न ले इस पापी मन को अपने रंग में माया |

फिर ऐसे कुछ और गीत भी बने-प्रभु ,चैन की बजा दो बंसी रे,कहीं वैर न रहे,नफरत न रहे आदि | 

इस प्रकार के गीतों में एक सामूहिक प्रार्थना थी जो लोगों को आकर्षित करती थी और लोग सहज भाव से इससे  मिशन के करीब होते जाते थे |

ऐसी विशाल सोच  के  स्वामी  थे बाबा हरदेव सिंह जी ,जिन्होंने निरंकारी मिशन को दीवार नहीं बनाया बल्कि लोगों का अपना मिशन बनाया |

वे कहा करते थे -निरंकारी होना,कुछ होना नहीं है,इसमें पाना ही पाना है,खोना नहीं है |

इस प्रकार उन्होंने निरंकारी मिशन को धर्म-जाति व् मज़हब नहीं बनने दिया |यह था बाबा हरदेव सिंह जी का विजन कि हम सबके अपने हैं और सब हमारे अपने इस प्रकार वे जन-जन का शुभ सोचते थे |   


निवेदन 

मुक्ति या मोक्ष मानव जीवन का सर्वोपरि लक्ष्य है |कल 10 -02 -2019 (रविवार )को दिल्ली के मैदान न.8 में आयोजित साप्ताहिक सत्संग समारोह में मुक्ति विषय पर एक कविता पढ़ने का अवसर मिला |इस कविता में मुक्ति विषय का व्यावहारिक विश्लेषण करने का प्रयास किया गया था |दयालु पाठकों के अवलोकनार्थ कविता यहाँ भी प्रस्तुत की जा रही है -धन निरंकार जी-

 

कविता 

 

मुक्ति

 

रामकुमार सेवक 

 

हम चाहते हैं ,तुम चाहते हो,

सब चाहते हैं-मुक्ति |

काम से मुक्ति,क्रोध से मुक्ति 

लोभ से मुक्ति,मोह से मुक्ति 

पर नहीं जानते इसकी युक्ति 

क्या होती है-जीवन मुक्ति ?

 

घर से मुक्ति,द्वार से मुक्ति,

जीत से मुक्ति,हार से मुक्ति ,

द्वेष से मुक्ति,प्यार से मुक्ति ,

आखिर इस संसार से मुक्ति ?

 

आखिर किसका नाम है मुक्ति ?

जिससे होती पूरण भक्ति 

सोच रहा हूँ ,कई सालों से 

क्या त्याग का नाम है मुक्ति ?

 

दुश्मन छोडो ,अच्छे छोडो 

बीवी छोडो,बच्चे छोडो 

छोडो सारे रिश्ते-नाते 

झूठे छोडो ,सच्चे छोडो |

 

सब कुछ त्यागा,सब कुछ छोड़ा 

दुनिया का हर रिश्ता तोडा 

फिर भी मुक्त नहीं हो पाया 

है यह कैसी प्रभु की माया ?

 

सोच रहा हूँ.कई सालों से,

नहीं त्याग का नाम है मुक्ति |

 

बीवी छोड़ी ,बच्चे  छोड़े 

दुनिया के सब रिश्ते तोड़े 

लेकिन अहंकार न छोड़ा 

उसे बिछाया ,उसको ओढ़ा 

आँखों में है उसे बसाया 

और मस्तक पर उसे बिठाया 

 

आखिर किसका त्याग किया है?

जड़ तो ज्यूँ की त्यूं पडी है -फूंग को लेकिन काट रहा हूँ  

मैं अधिकारी ,मैं प्रचारक ,मैं प्रबंधक ,मैं संपादक 

लेबल बदल -बदलकर अपने -मन की रिक्ति पाट रहा हूँ  -खुद ही खुद को काट रहा हूँ |

 

भीतर से आवाज़ है आती,बार-बार यह ही समझाती-सबसे पहले अहम् को त्यागो ,

शेष नहीं कुछ त्यागने लायक -सच्चाई से दूर न भागो 

-निरंकार का ज्ञान है मुक्ति 

हरदम इसका ध्यान है मुक्ति 

जीवन का वरदान है मुक्ति 

सतगुरु का वरदान है मुक्ति |

 


मेरे मन का वो भाव पूरा कर गए बाबा हरदेव सिंह जी ----

रामकुमार सेवक 

 

बात उस समय की है जब मुझे  सन्त निरंकारी कॉलोनी में रहते कुछ ही वर्ष हुए थे |यह 1996 के थोड़ा बाद की बात है |सन्त निरंकारी सत्संग भवन के ऊपरी हॉल में बुधवार रात्रि को सत्संग हो रहा था |उन दिनों बाबा हरदेव सिंह जी बुधवार रात्रि के सत्संग में भी (कभी -कभी) विराजमान होते थे |

उस दिन बाबा जी के  दिव्य मुखमण्डल से मेरा  ध्यान हटा ही नहीं |

ऐसा लगता है कि उस दिन शायद मैं  प्रकाशन विभाग के दफ्तर से उठकर ,सीधा सत्संग में जाकर बैठ गया होऊंगा ,घर जाने की बजाय |

बाबा हरदेव सिंह जी किसी भी विषय का इतना सुन्दर विश्लेषण करते थे कि जैसे हम अमृत रस का पान कर रहे हों |इस प्रकार सतगुरु के महान प्रवचनों  में लिप्त होने का तो मेरा पुराना अनुभव है 

लेकिन उस दिन मैंने विचार सुनी या नहीं सुनी कुछ याद नहीं लेकिन उनके दिव्य मुखमंडल के सात्विक प्रेम में जैसे पूर्णतः लिप्त हो गया |

उनके दिव्य मुखमंडल को देखकर मेरे भीतर उस दिन एक कविता फूट रही थी ,ग़ज़ल के रूप में थी और मैं दिल ही दिल में जैसे वह ग़ज़ल ही लिखता रहा |

उसका सौंदर्य मुझे आज भी ताज़गी देता है-आज भी बाबा जी का नूरानी चेहरा मन में स्फूर्ति भर देता है-और जुबां से  ये  बोल  फूटने  लगते  हैं-

नाज़ुक है फूल से भी मगर वज्र से भी सख्त 

मुश्किल है मगर ,लगता है,आसान यह चेहरा |

 

आँखों के रास्ते से जो दिल में उतर गया 

है दींन और ,ईमान की पहचान यह चेहरा |

 

ग़ज़लों के शेर आते हैं जब बोलता है बोल .

कोयल को बख्शता है ,मीठी तान यह चेहरा |

 

फूलों की पंखुड़ी पे हो ज्यूँ बूँद ओस की,

है पाक जैसे ,ज़िन्दगी की जान यह चेहरा |

 

चाकरी कर पाऊं ,दिन और रात ,सुबह-शाम 

सेवक की ज़िन्दगी पे है एहसान यह चेहरा |

 

यह ग़ज़ल आज भी मेरे दिल के बहुत करीब है |यह  मेरे दिल की आवाज़ है |बाबा जी के जन्मदिन पर मेरी तरफ से यह एक विनम्र उपहार हो सकता था लेकिन उस समय जन्मदिन का विशेष समागम आयोजित नहीं होता था |एक नितांत निजी कार्यक्रम कोठी के भीतर होता था ,जिसमें जाने की न मेरी हिम्मत थी और न औक़ात |

वर्षों तक इस ग़ज़ल को प्रस्तुत करने का मेरा अरमान मेरे दिल के भीतर ही दबा रहा |फिर बड़े-बड़े कार्यक्रम भी बाबा जी के जन्मदिन पर होने लगे | 

हंसराज हंस,वडाली बन्धु,देव दिलदार आदि बड़े नाम जन्मदिन की शोभा बढ़ाने लगे |यह बाबा जी के पचासवें जन्मदिन की बात है |

फिर तो बाबा जी के जन्मदिन पर गुरु पूजा का दो दिनों में विस्तृत कार्यक्रम होने लगा |

अपनी इस ग़ज़ल में भी मैं बाबा जी के दिव्य मुखमण्डल में निराकार का ही सत्य,शिव और सौंदर्य देख रहा था |

बाबा जी से अनेकों बार मिलना हुआ ,कभी -कभी बातें भी हुईं लेकिन अधिक महत्वपूर्ण मामलों के बीच कविता एक तरफ छिपी रह जाती थी लेकिन दिल में आकांक्षा जीवित थी |

एक लेखक-संपादक होने के नाते सतगुरु का जन्मदिन मुझे शाश्वत सिद्धांतों और निरंकारी परम्पराओं के विरुद्ध लगता था,कुछ अन्य सज्जन भी मेरे इस भाव की सच्चाई को महसूस करते थे  लेकिन खुलकर कोई कुछ न कहता था |प्रबंध ने अध्यात्म को जैसे मौन कर दिया था लेकिन लेखक धर्म ने जोर मारा  और फरवरी 2005  के अंक में मैंने वो सम्पादकीय लिख दिया जिसे लिखकर लाभ से अधिक हानि होने की संभावना थी लेकिन सतगुरु -निरंकार ने स्वयं मेरी रक्षा की क्योंकि जो इसने  मुझसे लिखवाया वह शाश्वत सत्य था |

समय गुजरा बाबा हरदेव सिंह जी हमारे बीच से चले गए |आनंद का वह प्रवाह अवरुद्ध हो गया |अब लगता है कि काश ,वे दिन वैसे ही चलते रहते |वे नादानियाँ भी कितने आनंद से भरी थीं |

ग़ज़ल की बात निरंकार और मेरे बीच की बात थी लेकिन साकार सतगुरु जी ने मेरा वह अरमान 28-02-2016 को अर्थात अपने अंतिम जन्मदिवस के तुरंत बाद रविवार के सत्संग में पूरा किया |

 इस दिन सतगुरु बाबा जी व् पूज्य माता जी की पावन उपस्थिति में यह  बहुप्रतीक्षित अवसर प्राप्त हुआ |

साकार ने निराकार में किये ध्यान को पूरा किया और सिद्ध हो गया कि-निराकार और साकार ,बर्फ  और जल की तरह एक सत्ता के दो नाम हैं | 


सत्संग में वक्ता और श्रोता की फ्रेक्वेंसी एक होनी क्यों जरूरी है ? 

रामकुमार सेवक  

बोलने और सुनने वाले का मानसिक स्तर यदि समान हो तो बीच में विरोधाभास अथवा गफलत की गुंजाईश कम रहती है |नहीं तो हालात ऐसे होते हैं ,शायर के शब्दों में-

हम वफ़ा लिखते रहे और वो  दगा पढ़ते रहे,एक नुक्ते ने हमें महरम से मुजरिम कर दिया |

कहते हैं कि उर्दू लिपि में जो नुक्ते आदि लगाए जाते हैं उनमें शब्दों की बनावट जो होती है , उसकी बारीकी की जिसे समझ नहीं है वहां इस प्रकार  की संचारहीनता पैदा हो जाती है |

वर्षों पहले एक दिन जब मुझे निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के सत्संग हॉल में प्रातःकालीन सत्संग को सम्बोधित करना था तो विचार करते हुए ख्याल आया कि मेरी घड़ी का समय वहां लगी घड़ी से पूरी तरह मेल नहीं खा रहा |घर में लगी घड़ी का समय भी कई बार हाथ की घड़ी से मेल नहीं खाता |

इस स्थिति में अपनी हाथ घड़ी का समय ठीक करना आवश्यक होता है लेकिन हम हर घड़ी के समय को देखकर अपनी घड़ी का समय नहीं बदलते बल्कि घड़ी का समय ठीक करने के लिए बिलकुल सही घड़ी से उसका मिलान करते हैं |

यही बात हमारे मन के साथ भी होती है | 

ब्रह्मवेत्ता सतगुरु जिस ऊंचाई से बात कह रहे होते हैं प्रायः हमारा मन उस ऊंचाई से उसे सुन  नहीं रहा होता |यही कारण है कि बात कुछ और कही जा रही होती है |उसे समझा किसी और रूप में जा रहा होता है |कहा कुछ और गया उसे समझा कुछ और गया तो निश्चय ही जीवन में वो रूप तो प्रकट नहीं होगा जो अपनाने के लिए कहा गया |

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने एक बार नववर्ष के दिन मैदान न. 8 में आयोजित कार्यक्रम में इस बात को हंसी-हंसी में इस प्रकार समझाया - 

उन्होंने कहा कि घर में कोई इंसान बहुत ज्यादा गुड़ खा रहा था |बड़ों ने पूछा कि इतना ज्यादा गुड़ खाना स्वास्थ्य के लिए अच्छा नहीं है |उसने कहा कि आप संगत में सुनी बात भी मानने नहीं देते |

बुजुर्गों ने कहा-संगत में गुड़ खाने की शिक्षा कब और किस महात्मा ने दी ?

वह बोला -फलां महात्मा ने अपने गीत में कहा था-गुड़ खावां सुबह शाम |घर के बड़ों ने उस सज्जन से पूछा तो वो भी हैरान हो गए |उन्होंने कहा-मैंने तो गाया था-गुण गावां सुबह -शाम |

बाबा जी कहा करते थे कि सत्संग में वक्ता और श्रोता की फ्रेक्वेंसी एक होनी जरूरी है अन्यथा आनंद नहीं आएगा |वे एक और दोहा सुनाया करते थे -पापी भगत न भावै ,हर पूजा न सुहाय |इसका कारण बताते हुए उन्होंने कहा कि यहाँ कहने और सुनने वाले ,दोनों की फ्रीक्वेंसी (frequency) मिली होती है इसलिए यहाँ दोनों को  ही आनंद आता है |

यदि फ्रीक्वेंसी एक जैसी नहीं मिली हो तो गुण और गुड़ में फर्क पता नहीं चलता   इसलिए सत्संग में बैठकर बोलने और सुनने वाले की मानसिक दिशा एक होनी चाहिए |  

  


आध्यात्मिक स्वास्थ्य क्या है ?

रामकुमार सेवक 

1 जनवरी 2017  (रविवार )को तत्कालीन  नव वर्ष की पहली संगत थी |दिल्ली में सतगुरु माता सविंदर जी ने आशीर्वाद देते हुए जो कहा उनमें ये दो शब्द भी शामिल थे - wisdom(विवेक) तथा Health(स्वास्थ्य)

संतो-महात्माओं के लिए विवेक हासिल करना कठिन नहीं है क्योंकि यदि सत्संग में आने के पीछे कोई मायावी लालच नहीं है तो जीवन में विवेक ज़रूर होगा इसलिए अगले शब्द की तरफ चलते हैं-  

मुझे लगता है कि स्वास्थ्य  दो प्रकार का होता है-1-भौतिक स्वास्थ्य 2-आध्यात्मिक स्वास्थ्य 

भौतिक स्वास्थ्य के बारे में मुझे कुछ नहीं कहना क्योंकि भारत में लगभग हर आदमी स्वास्थ्य पर ऐसे बात करता है जैसे जन्मजात वैद्य या डॉक्टर हो |

अब बचता है-आध्यात्मिक स्वास्थ्य |उस पर विचार करना बहुत ज़रूरी है क्योंकि जो बहुत धार्मिक है वह भी बिल्ली के रास्ता काट देने से घबरा जाता है जबकि बेचारी बिल्ली को पता ही नहीं कि उसे किसी का अहित भी करना है |

महात्मा रामचंद जी (कपूरथला )का एक संस्मरण सुना था |बिल्ली के रास्ता काट देने के कारण घर लौट गए सज्जन को  उन्होंने समझाया-बिल्ली और तुम्हारे बीच क्या निरंकार नहीं था ?

इससे पता चलता है कि भगत रामचंद जी का आध्यात्मिक स्वास्थ्य कितना बढ़िया था जबकि जिससे उन्होंने सवाल किया ,ब्रह्मज्ञान लेने  और संगत से जुड़े होने के बावजूद वह सज्जन आध्यात्मिक   तौर पर अस्वस्थ था |   

सार की बात यह है कि हमें संगत के समय संगत ही करनी चाहिए न कि अन्य गतिविधियां क्योंकि अन्य गतिविधियां चाहे जितनी भी ज़रूरी हों लेकिन विवेक को जन्म नहीं दे सकती |विवेक के बिना मर्यादित व्यवहार नहीं ,  मर्यादित व्यवहार के बिना भक्ति नहीं और भक्ति के बिना मुक्ति नहीं |फिर ब्रह्मज्ञान होना और न होना बराबर है क्योंकि-इंतज़ाम तो मर्यादित व्यवहार और भक्ति के बिना  भी हो जाते हैं लेकिन मुक्ति मर्यादित व्यवहार और भक्ति के बिना संभव नहीं है-धन निरंकार जी-  


प्रश्न यह है कि धर्म का कारण अज्ञात भय है या  श्रद्धा  ?

रामकुमार सेवक

किसी सम्बन्धी के बारे में पत्नी का कहना था कि वे फलां गांव के पीर पर जाते है और समृद्ध हैं |वे पीर पर जाते हैं और हम सत्संग  में ,दोनों में फ़र्क़ क्या है ?

हर इंसान की आस्था कहीं न कहीं जुडी है और उस आस्था के वशीभूत होकर वह किसी न किसी धर्मस्थान पर जाता ही है |इसमें कुछ भी हानि नहीं है लेकिन विचारणीय  प्रश्न यह है कि धार्मिक क्रियाकलापों का कारण मन में समाया अज्ञात भय है या  श्रद्धा  ?

महात्मा कहते हैं -तुलसी भरोसे राम के,निर्भय होके सोय, अनहोनी होनी नहीं,होनी होय सो होय लेकिन इंसान को इस सच्चाई पर यकीन ही नहीं है |वह सोचता है कि कोई ज्योतिषी,गुरु या तांत्रिक मेरे भाग्य में क्रांति ला सकता है |इस आस में कुछ भी करना उसे न करने योग्य नहीं लगता |

सुबह दफ्तर में जाते समय सड़क पर बने फुटपाथ पर आटा -सरसों का तेल,बताशे-हल्दी-जलता हुआ दिया आदि मैंने बहुत बार देखे हैं और जब भी यह सब देखा इंसान की बुद्धि पर तरस आया है कि परमात्मा ने इसे क्या बनाया-दस इन्द्रियां दी,मन-चित-बुद्धि -अहंकार दिए और वो अपने विवेक का इस्तेमाल ही नहीं करता और इस प्रकार के कर्मकांडों में लिप्त रहता है |

बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहा करते थे कि कोई पशु-पक्षी किसी दूसरे पशु-पक्षी का बुरा नहीं चाहता लेकिन इंसान किसी अन्य का बुरा करने में बहुत दिलचस्पी लेता है |यह भाव उसके ऊंचे रुतबे को धूमिल करता है इसलिए इंसान को परम पिता परमात्मा को ही अपने जीवन का आधार बनाना चाहिए और सबके भले के काम करने चाहिए |

देखा यह जा रहा है कि बहुत सारे  तांत्रिक -ज्योतिषी आदि इसी डर की मानसिकता का लाभ उठाने में लगे हैं और पैसा इकठ्ठा कर रहे हैं |         

प्रश्न यह था  कि धर्म या आस्था का कारण भय है या श्रद्धा ?उपर्युक्त परिपेक्ष्य में देखें तो धर्म और इससे सम्बंधित क्रियाकलापों का कारण आम तौर पर मन का अज्ञात भय नज़र आता है |

प्रश्न था कि कोई व्यक्ति किसी पीर पर जा रहा है और मैं सत्संग में -फ़र्क़ क्या है ?

 आत्मनिरीक्षण किया तो पाया कि मेरे सत्संग जाने का मूल कारण श्रद्धा है और अपने विवेक को जाग्रत करने का भाव है,भय तो बिलकुल ही नहीं है |

  पिछले पैंतालीस सालों से हम सत्संग में जा रहे हैं-इसका कारण है कि वहां आने वाले प्रभु प्रेमियों के दर्शन की चाहत |आपसी वार्तालाप सुनकर ज्ञानार्जन और आध्यात्मिक मर्यादा का प्रभाव ग्रहण करना |?

 

देखा यह जाता है कि हर इंसान किसी न किसी से भयभीत है |कर्म करते समय उसे भय नहीं लगता लेकिन उनके परिणाम से उसे भय लगता है लेकिन हमारा इष्ट हमारे साथ है इसलिए इसका एहसास करके जब कर्म होते हैं तो सहज अवस्था बनी रहती है,हम तो चाहते हैं हर इंसान इस परमेश्वर का एहसास करे और जाग्रत-सहज जीवन जिए |


परिस्थिति चाहे जैसी भी हो,सत्संग का कोई विकल्प नहीं 

रामकुमार सेवक 

जैसे परमात्मा की सीमा नहीं होती इसी प्रकार अध्यात्म की भी कोई सीमा नहीं होती लेकिन चाहे-अनचाहे संगठन बन ही जाता है और फिर अध्यात्म भी जैसे पिंजरे का पंछी हो जाता है |आध्यात्मिक लोगों का यही दर्द है |      

बाबा हरदेव सिंह जी के शरीरांत के बाद सत्संग के प्रति निष्ठां कम हुई थी जरूर ख़त्म नहीं हुई  | सत्संग के प्रति अविश्वसनीयता खतरनाक संकेत है क्यूंकि निरंकारी मिशन की संस्कृति और सिद्धांत सत्संग में ही उजागर होते हैं |आध्यात्मिक सभ्यता भी सत्संग में ही सीखने को मिलती है |विनम्रता,सहनशीलता और सेवा जैसे दिव्य संस्कार सत्संग से ही मिलते हैं |

पिछले कुछ वर्षों में महसूस हुआ कि हमारे प्यारे निरंकारी  मिशन में खर-पतवार की तरह भ्रष्टाचार बढ़ा है |बाबा हरदेव सिंह जी अच्छी तरह इस यथार्थ से परिचित थे और इसे ईमानदारी से हटाना चाहते थे लेकिन उनके शरीरांत के बाद यह बहुत बड़ा मुद्दा बन गया और हमारे कुछ गुरुभाई आंदोलन की मुद्रा में आ गए |अपनी भक्ति दांव पर लगाकर सत्संग से भी दूर हुए और अपयश के भी पात्र बने |

उनके मुद्दे तो यथार्थ ही थे लेकिन भ्रष्टाचार कोई नया मुद्दा नहीं है,यह राष्ट्रव्यापी और  विश्वव्यापी मुद्दा है लेकिन मिशन में भ्रष्टाचार का आगमन ऐसा ही है जैसे पानी में गन्दगी मिली हो |इसके बावजूद इन आंदोलनकारी मिज़ाज़ के हमारे गुरुभाईयों ने जिस गति से भ्रष्टाचार को उजागर किया उसने बहुत सारे महापुरुषों को सत्संग से दूर कर दिया |

ये आंदोलनकारी  ईमानदार,निष्ठावान और साहसी तो जरूर निकले लेकिन इस प्रकार अनेकों को सत्संग से दूर कर देने के कारण अनचाहे ही अविवेक के प्रतिनिधि और पाप के भागीदार भी हो गए क्यूंकि एक व्यक्ति को  ब्रह्म से जोड़ने में  कितने ही महात्माओं की मेहनत खर्च होती है |बाबा हरदेव सिंह जी ने खुद भी हमें  जोड़े रखने के लिए बहुत मेहनत की थी इसलिए हर शिष्य को सचेत रहना होगा कि वो किसी को सत्संग से दूर करने का कारण न बने | 

शनिवार(26 -01 -2019 ) सुबह सत्संग के बाद अचानक ही ध्यान आया कि सत्संग में जो भक्ति  के व्यवहारिक अनुभव सुनने को मिलते हैं उन्हें सुनकर सच्चाई और अच्छाई पर यकीन मजबूत होता है |विपरीत प्रभाव में बहने से बच जाते  हैं |

आज महात्मा सत्संग में सुना रहे थे कि मेरे मामा जी को पुराने समय में ब्रह्मज्ञान प्रदान किया गया लेकिन वह इसे खाली ही मानते रहे,परमात्मा मानने की बजाय |

इतने सालों  के बाद कुछ महीने  पहले उनका फोन आया कि बहुत बीमार हूँ |जीवन कितने दिन का है कुछ पता नहीं,दोबारा ज्ञान लेना चाहता हूँ | 

मैं अपनी माताजी को साथ लेकर उनके घर गया |मैंने मामा जी से कहा कि मेरी माता जी आपकी छोटी बहन हैं लेकिन अभी आप इनमें सत्गुरु का रूप देखो ताकि प्रभु को प्रभु ही स्वीकार कर सको |

सच्चे पातशाह की कृपा हुई उन्हें ब्रह्मज्ञान प्रदान कर दिया गया |

मामा जी तो भाव विभोर हो गए |  उन्होंने कृतज्ञतापूर्वक कहा कि वर्षों पहले मुझे ब्रह्मज्ञान दिया गया था और मैं इसे न जाने क्यों खाली ही समझता रहा |इतने वर्षों में कहाँ-कहाँ नहीं ढूँढा लेकिन इतने प्रयास और मेहनत के बावजूद उलझनों में जकड़ा हूँ |घर में कभी-कभी यहाँ-वहां खून के धब्बे भी नज़र आते रहे हैं |

अगले दिन मामा जी देर तक सोये,गहरी नींद आयी ,जैसे पथिक को मंज़िल मिल जाए |

इस प्रसंग को सुनकर मुझे अवतार बाणी में कहा गया बाबा अवतार सिंह जी का यह वचन याद आ गया-

कहे अवतार एह आप जे चाहे तां कोई इस नू वेख सके |  

दुनिया में सिर्फ सत्संग ही तो है जहाँ ऐसे गूढ़ विषयों पर चर्चा होती है |

मुझे तो अक्सर पहला प्रण भी याद आता है कि-तन -मन-धन प्रभु की देंन हैं और इन्हें प्रभु का ही मानना है |यह तथ्य याद रहता है तो फिर न सदाचार याद रहता है और न भ्रष्टाचार |सिर्फ कबीर याद आते हैं ,जिन्होंने लगभग सात सौ साल पहले कहा-

 कबीरा तेरी झोपड़ी ,गल कटियन के पास 

जो करेगा सो भरेगा,तू क्यों भया उदास |

निरंकारी प्रबंधतत्र सचमुच वैसा नहीं है जैसा उसे बनाया गया था या जैसी इससे उम्मीदें की गयी थीं लेकिन बाकी व्यवस्थाओं की तुलना में अब भी बेहतर लगता है |

ग्राउंड न.आठ की सुंदरता और व्यवस्था को देखकर उपर्युक्त तथ्य प्रमाणित होता है |बाबा हरदेव सिंह जी के भाव ध्यान आते हैं जिन्होंने इस मैदान को इतनी सुन्दर व्यवस्था दी |इस परिपेक्ष्य में   आंदोलनकारी मिजाज के सज्जन तो भक्ति से बिलकुल ही दूर चले गए लगते हैं,बाबा हरदेव सिंह जी ने ऐसा भी तो नहीं सोचा था |जो बाबा हरदेव सिंह जी के जीवन मूल्यों को स्वीकार करता है वह किसी से भी नफरत नहीं कर सकता |       


सम्पादकीय (प्रगतिशील साहित्य ,जनवरी 2019 )

70  वां गणतंत्र दिवस और गरीब-अमीर के बीच बढ़ती असमानता-

उत्सव की ख़ुशी और गंभीर चुनौती -एक साथ  

रामकुमार सेवक  

कल (22 /01 /2019 ) को पूरे दिन बरसात रही |मैंने देखा कि एक बच्ची , जिसने अपने कन्धों पर कबाड़ रखा हुआ था ,अपने घर की ओर जा रही थी ,मुझे सिर्फ एक बात ने हैरान किया कि उसके पैरों में जूते या चप्पल नहीं थे |कपडे भी सर्दी व् बरसात की दृष्टि से अपर्याप्त थे |

आकाश से तो बरसात हो ही रही थी और सर्दी इतनी ज्यादा थी कि दरवाजे के साथ परदे बंद करने पर भी ठंड महसूस हो रही थी | एक ओर  इतनी ज्यादा ठण्ड,दूसरी तरफ नंगे पैर वो  बच्ची -मैं उसे बहुत दूर तक देखता रहा और मैंने अपनी पत्नी से कहा कि ये लोग कठिन परिश्रम करते हैं और इनके काम के  घंटे  भी निर्धारित नहीं हैं |भूख रोज  लगती है इसलिए काम भी रोज करना पड़ता है |कोई अवकाश नहीं है | 

भारत को गणतंत्र हुए 69  वर्ष पूर्ण हो चुके हैं |देश विभिन्न क्षेत्रों में विकास के  नए-नए आयाम भी स्पर्श कर चुका है फिर भी इन लोगों को हमारा गणतंत्र बुनियादी जरूरत की चीजें भी नहीं दे पाया है |इनके घरों तक विकास की किरणे पहुँचने में अभी और कितने वर्ष लगेंगे ,यही आज का ज्वलंत प्रश्न है   ?

दुनिया में बढ़ती असमानता की तस्वीर भयानक है |यह भय इस तथ्य से और भी गहरा हो जाता है कि दुनिया के 26  अमीरों की संपत्ति उतनी ही है जितनी कि दुनिया के आधे गरीबों की | गरीबों की यह संख्या 3.8 अरब है जबकि अमीरों की संख्या मात्र 26 अर्थात ऊँट के मुँह में जीरे वाला मुहावरा चरितार्थ हो गया |अगर खरबपतियों की संपत्ति 39  प्रतिशत की दर से बढ़ी है तो गरीबों की मात्र तीन प्रतिशत की दर से |भारत की आर्थिक तरक्की की तस्वीर खींचने वाली जेम्स क्रैबट्री की पुस्तक THE

 BILLIONAIRE  RAJ  कहती है कि गरीबों और झुग्गी वालों की तादाद लगातार बढ़ेगी |इसे रोकने के लिए अमीरी कर लगाए जाने का सुझाव दिया गया  है | 

भारत के कुल 9 अमीरों की संपत्ति देश के पचास प्रतिशत गरीबों से ज्यादा है |यह असमानता की भयावह स्थिति है जिसमें सुधार के कोई  आसार फ़िलहाल नज़र नहीं आते |

हर राजनीतिक दल गरीबों के उद्धार की बात तो वर्षों से करता आ रहा है ,गरीबी हटाओ के नारे ने कभी यहाँ सत्ता परिवर्तित कर दी थी लेकिन गरीब लगभग वैसे का वैसा है |इसका एक कारण तो यह है कि जनसँख्या जिस अनुपात में बढ़ती है उस अनुपात में संसाधन नहीं बढ़ते |

भारत के गणतंत्र होने का यह 70 वां पर्व है |इसकी ख़ुशी तो हर देशप्रेमी को होगी ही लेकिन इस ख़ुशी में भारत के हर नागरिक को सम्मिलित करने के लिए जरूरी है कि हर नागरिक की कम से कम  बुनियादी जरूरतें तो पूरी हों |साथ ही ज़रुरत इस बात की भी है कि हर नागरिक अपने कर्तव्यों के बारे में भी सोचें ताकि संविधान में लिखित राज्य के नीति निर्देशांक तत्व भी  नागरिकों के आकर्षण  के केंद्र बन सकें ,यही प्रजातंत्र के स्थायित्व की मांग है |

गरीब भी भारत के वैसे ही नागरिक हैं जैसे कि अमीर ,दोनों के वोट की कीमत बराबर है लेकिन दोनों की परिस्थितियों में इतनी असमानता है ,जैसे एक तरफ ऊँट को खड़ा कर दें और दूसरी तरफ जीरे का एक दाना |

 भय-भूख -गरीबी वास्तव में ख़त्म हो ,इसके लिए खरबपति अमीरों पर एक प्रतिशत कर लगाने की सलाह समझ में आती है लेकिन यह न हो कि कर लग भी जाए और वसूल भी हो जाए लेकिन पूरा पैसा भ्रष्टाचार के पेट में चला जाए |

यह देखभाल तो सरकार  को ही करनी होगी |यदि भय -भूख और भ्रष्टाचार ख़त्म हो जाए -तब हर कोई गणतंत्र दिवस की महत्ता को महसूस कर सकेगा अन्यथा शायर ने बरसों पहले लिख दिया था- 

माना कि   अभी  तेरे  मेरे  अरमानो  की  कीमत  कुछ भी नहीं 

मिट्टी  का  भी  हैं  कुछ  मोल  मगर 

इंसानो  की  कीमत  कुछ  भी  नहीं 

इंसानो  की  इज्जत  जब  ,झूठे  सिक्कों  में  ना  तोली  जाएगी 

वो  सुबह  कभी  तो  आएगी ---- 

यह आशावाद अच्छा है,लेकिन उस सुबह के आने की संभावना तो पैदा -सुखद सुबह की संभावना पैदा करना -हमारे शासकों के लिए सबसे बड़ी चुनौती है |

 


सब मेरा है और कुछ भी मेरा नहीं  -दोनों  तरीकों  का परिणाम एक---मगर कैसे ?

रामकुमार सेवक  

भारत त्योहारों का देश है ,यह तथ्य हमारे दिल में ख़ुशी भरता है और हमारा उत्साह बढ़ा देता है |कल  (13 -01 -2018  को )भक्ति  पर्व का समागम था |समागम में काफी अच्छी चीजें सुनने को मिली और अच्छा लगा लेकिन फगवाड़ा (पंजाब )से आये युवाओं की प्रस्तुति वाकई सूफ़ियत की झलक दिखला गयी |सत्संग निर्धारित समय से आधे घंटे बाद तक चली |

सत्संग आधा घंटा ज्यादा चलना कोई तल्ख़ अनुभव नहीं लगा क्यूंकि इस मामले में हमारी परंपरा काफी पुरानी है |कई-कई घंटे का विलम्ब हमने काफी देखा है लेकिन यह दौर समय पालन का है |पिछले दिनों प्रबंध से जुड़े एक मित्र बता रहे थे कि ऐसा आदेश है कि पांच मिनट का विलम्ब तो चल  सकता  है लेकिन यह विलम्ब दस मिनट तक नहीं बढ़ना  चाहिए | 

चूंकि विचार की सामग्री अच्छी थी इसलिए आधे घंटे के विस्तार से मायूसी नहीं हुई | 

आज ही लोहड़ी का त्यौहार भी था |इस  त्यौहार की पारम्परिकता के बारे में  जानने का मौका मिला |मेरा जन्म और परवरिश उत्तर प्रदेश में हुई है लेकिन बचपन से ही निरंकारी मिशन से जुड़ने के कारण कोई भी राज्य ,परंपरा और त्यौहार पराया नहीं लगता जबकि आम तौर से भारत में जातियों ,धर्मो के कारण अपनापन और परायापन बिलकुल आम है |आईए इस मुद्दे पर विचार करते हैं- 

जीवन को जीने के दो तरीके हैं-एक तरीका तो यह है कि कुछ भी हमारा नहीं है |वह गीत याद आता है,जिसे बचपन से सुनते आये-

हमारा न कोई ,न हम हैं किसी के ,ये नाते फ़क़त हैं,यहाँ जीते जी के |

यह एकांगी दृष्टिकोण हमें दुनिया भर से अलग  कर देता है |यदि व्यक्ति आध्यात्मिक है तो वह इसे ही मुक्ति का मार्ग बना लेता है क्यूंकि वह समझ लेता है कि जब मैं दुनिया में आया था तो बिलकुल अकेला था |सब कुछ यहीं मिला और जब यहाँ से वापसी होगी तब भी कोई साथ नहीं होगा,अकेले ही जाना होगा 

 इसलिए आसक्ति अथवा मोह से जितना बचा जाए ,बढ़िया है |

वह सोच लेता है कि कोई अपना है ही नहीं ,मेरे साथ कुछ जाने वाला है ही नहीं तो किसको पत्थर मारें ?क्यों किसी से मुकदमेबाजी करनी है ,जो मेरे साथ नहीं जाएगा वह उसके साथ भी जाने वाला नहीं है |वह पृथ्वी पर विचरण तो करता है लेकिन यात्री की तरह |

अब दूसरे दृष्टिकोण की चर्चा करें- सब कुछ मेरा है|जो व्यक्ति आध्यात्मिक है वह इसे भी मुक्ति का मार्ग बना लेगा |दोनों मार्ग ऊपर से बिलकुल अलग दीखते हैं लेकिन दोनों का अंत बिलकुल एक सा -कैसे ?आध्यात्मिक कहता है -सारे इंसान तो एक ही परमेश्वर द्वारा बनाये गए हैं -इंसान ही क्या पशु-पक्षी,पर्वत,पेड़,समुद्र,झील,मरूस्थल और जंगल भी तो एक परमात्मा की ही रचना है |जब  सब कुछ मेरे पिता ने बनाया है तो सब कुछ तो अपना ही है,अपनी रचना को नुक्सान पहुँचाना तो अपने ही पैरों पर कुल्हाड़ी मारने के समान है अर्थात मूर्खता है |

कुछ भी मेरा नहीं इसलिए किसी को क्यों नुक्सान पहुँचाना -दूसरा पक्ष-सब कुछ तो मेरा है फिर किसी को क्यों नुक्सान पहुँचाना |

एक समान सच्चाई यह है कि -इनमें से कुछ भी ,किसी के भी साथ नहीं जाएगा इसलिए इन्हें परमात्मा की अमानत मानकर इस्तेमाल करना है ,बिना किसी आसक्ति के |

अब लोहड़ी के त्यौहार की बात करें -यह मेरी संस्कृति का त्यौहार नहीं है लेकिन बगल में जो मकान है उसके सामने अग्नि के इर्द-गिर्द लोग मूंगफली और रेवड़ियां खा रहे हैं |कुछ लोग नृत्य भी कर रहे हैं अब मैं इनकी ख़ुशी में शामिल हो जाऊं तो फिर लोहड़ी मेरा भी त्यौहार हो जाता है |इसके विपरीत यदि मैं सोचूँ कि यह मेरी संस्कृति का त्यौहार नहीं है तो फिर परायापन पैदा  हो जाएगा |ईंधन उनका जल रहा और खून  मेरा सूखेगा |जिसका ऐसा दृष्टिकोण है वह आध्यात्मिक व्यक्ति नहीं हो सकता |

हमने दिन में भक्ति पर्व मनाया और रात को लोहड़ी के त्यौहार का आनंद लिया -मुझे लगता है कि यह दृष्टिकोण ही सही है |       


घर में यदि चूहे बढ़ जाएँ तो क्या घर को छोड़ दिया जाए ?

रामकुमार सेवक 

29 /12 /2018  को मैं फरीदाबाद में एक बच्चे के  जन्मोत्सव  में सम्मिलित था,चूंकि परिजनों ने वहां सत्संग का आयोजन किया था और उसमें विजय चौक साध संगत के नए-पुराने साथी सम्मिलित थे |सत्संग के बाद हम लोग एक साथ बैठकर अपने अनुभव सांझे कर रहे थे,कई बातें हुईं जो जीवन की दिशा तय करने में सहायक थीं |

किसी मित्र ने मुझसे कहा-आँखें बंद करके संगत में कैसे जाया जाए ?

मैंने कहा-बाबा हरदेव सिंह जी के  विचारों में हर सवाल का जवाब मौजूद है क्यूंकि गुरु का शरीर तो  हमेशा जाता ही है लेकिन जो सचमुच गुरु है उसके विचार हमेशा अमर रहते हैं |

रही संगत में जाने की बात तो संगत तो हमारा घर है |मेरे माता-पिता ने मुझे बचपन में ही संगत से जोड़ दिया था इसलिए संगत को माँ  कहा जाता है|माँ का दिल इतना बड़ा होता है कि कभी भी अपनी सन्तानो को घर आने से नहीं रोक सकती ,यह सनातन सत्य  है |

आप कहते हैं कि सत्य घटनाक्रम हमारी आँखें खोलने वाले हैं उन्हें  अनदेखा  कैसे किया जाए ?

मैं कहता हूँ -जो कुछ अप्रिय हो रहा है उसे अनदेखा करने की ज़रुरत नहीं है लेकिन उसमें उलझने की भी जरूरत नहीं है,अन्यथा भक्ति का अमूल्य हीरा हम गंवा बैठेंगे |अपने विवेक को जाग्रत रखें |सत्संग में जो जीवन संवारने वाले वचन सुनने को मिलते हैं ,उन्हें आचरण हिस्सा बनाएं शेष जो अनर्गल चीजें नज़र आती हैं उन्हें उतनी तवज्जो न दें जितनी गुरु के वचनो को देते हैं |

मुझे बाबा जी की एक विचार याद आ गयी जिसमें उन्होंने कहा था कि पलंग पर हम चादर तो बिछाते हैं लेकिन जलती हुई अंगीठी को तो वहां नहीं रख देते | 

सार की बात यह है कि  हमारे घर में यदि चूहे बढ़ जाएँ तो हम उनसे बचाव का उपाय करते हैं,उनके कारण घर को नहीं त्याग देते |    


सम्पादकीय 

(प्रगतिशील साहित्य-दिसम्बर 2018

सुरक्षित वातावरण की ज़रुरत 

- रामकुमार सेवक 

  पिछले दिनों बुलंदशहर (उत्तर प्रदेश) के स्याना में एक पुलिस अधिकारी की हत्या उन लोगों ने कर दी जो गाय के सम्मान के लिए आंदोलन चला रहे हैं |

  गाय हमारी माता है ,यह हमने बचपन से ही पढ़ा और सुना है और गाय के लिए हमारे घर में नियमित रूप से रोटियां बनायी जाती रही हैं लेकिन आज गाय के प्रति श्रद्धा कुछ कम हो गयी लगती है क्योंकि गायों को कूड़े के ढेर पर पॉलीथीन की थैलियां चरते अक्सर ही देखा है |इस  अवस्था में गाय के पुराने स्थान को बहाल करना जरूरी लगता है |वास्तव में पिछले कुछ वर्षों में धर्म के वास्तविक स्वरुप का ह्रास हुआ है क्योंकि धर्म का दुरूपयोग बहुत हुआ है |

  घर में बुजुर्गों के लिए ही अन्न न  बचे तो गाय के लिए अन्न की व्यवस्था करवाना आम नागरिक के लिए एक बड़ी समस्या है |

  प्रश्न यह भी है कि एक पुलिस अधिकारी की हत्या से गाय के सम्मान को बचाने में किस प्रकार की मदद मिलेगी ?यह सवाल उठना चाहिए लेकिन वर्तमान भारत में राजनीति का स्थान सर्वोच्च है |किसी अधिकारी की जान चले जाना चर्चा में नहीं आता बल्कि चर्चा उन सवालों पर होती है,जिससे राजनीतिक लाभ हो सकता है |राष्ट्रप्रेम की यह परिभाषा मेरी समझ से परे है | 

  ऐसे बहुत लोग हो सकते हैं जो मेरी इस उलझन से सहमत नहीं होंगे क्यूंकि गाय ने आज तक किसी से नहीं कहा कि मेरे सम्मान का ख्याल करो या उन लोगों को ख़त्म कर दो जो मेरा सम्मान नहीं करते |

  गाय तो निरीह पशु है,वह अपनी हत्या का विरोध नहीं कर सकती लेकिन राजनीति में बहुत कुछ कहा और सुना जाता है |उसमें किसी को भी बलि चढ़ाया जा सकता है |

  भीड़ की हिंसा इन दिनों एक आम चलन हो चुका है |किसी को भी भीड़ की हिंसा से डर लगेगा लेकिन पुलिस और न्यायिक संस्थाओं के भरोसे आदमी  अपने दायित्वों का निर्वाह करता है |उसे उम्मीद होती है कि सरकार और उसकी मशीनरी उसे बचाएगी लेकिन पुलिस अधिकारी ही जब मार दिया जाए तो आम आदमी के सामने डरने के अलावा और क्या उपाय बचता है |

  यह डर नसीरुद्दीन शाह को भी है तो इसमें गलत क्या है ?किसी को भी अपने परिवार की चिंता होगी ही  इसमें कुछ भी गलत नहीं है और हमारे संविधान में अपनी बात कहने की सबको आज़ादी है लेकिन ताक़तवर लोग हमेशा से चाहते हैं कि वही बोला जाए जितना बोलने की इजाजत वे दें |

  1975  में आपातकाल में लगी सेंसरशिप से लोगों की अभिव्यक्ति पर अंकुश लगाया गया था जिसकी आलोचना अब तक होती है लेकिन सत्ता का स्वभाव सदा से एक सा ही रहा है|यह सरकार जो पिछले साढ़े चार साल से शासन कर रही है,उन लोगों के आशीर्वाद से बनी सरकार है जिन्होंने आपातकाल की सेंसरशिप की पीड़ा झेली थी लेकिन उनके अनुयाई अब लोगों से सिर्फ वही सुनना  चाहते हैं ,जो उनके अनुकूल हो | 

  यह अधिनायकवादी प्रवृत्ति स्वतंत्रता की रक्षा के बारे में सबको आश्वस्त नहीं करती और लोगों का अपना भय प्रकट हो ही जाता है |मैं हमेशा ही ऐसी आशंकाओं से सहमत नहीं होता लेकिन वर्तमान दौर आशंकाएं पैदा कर रहा है |

  राजनीतिक ताक़तें नसीरुद्दीन शाह के भय की चर्चा तो कर लेती हैं लेकिन उस निरीह पुलिस अफसर की मौत पर उसके परिवार ने जो प्रश्न उठाये,उन पर मौन रह जाती हैं |

  भीड़ की हिंसा पिछले कुछ वर्षों में यथार्थ साबित हुई हैं फिर नसीरुद्दीन शाह की आशंका भी यथार्थ माननी चाहिए क्यूंकि जिस सरकार के शासनकाल में पुलिस अफसर भी सुरक्षित नहीं हैं तो नसीरुद्दीन शाह के भय को हिन्दू-मुसलमान के दायरे से ऊपर उठकर नागरिक अधिकार के परिपेक्ष्य में रखकर देखना चाहिए |     

  भारत सरकार को भारत के नागरिकों को सुरक्षित वातावरण देने की अपनी जिम्मेदारी किसी संगठन की दया पर नहीं छोड़नी चाहिए,मेरा ख्याल है |