ताकि विवेक जागा रहे और न करने योग्य कर्म न हों 

रामकुमार सेवक 

कल 21-07-2018 (शनिवार )को प्रातः सन्त निरंकारी सत्संग भवन ,पटेल नगर में साध संगत को सम्बोधित करने का अवसर मिला ,जिसमें कुछ मुद्दों पर विचार  अनायास ही सांझे हो गए |इन विचारों का आधार तो सम्पूर्ण अवतार बाणी का यह शब्द था-सतगुरु आउँदै जग दे अंदर सारे ही संसार लई |ध्यान आया कि-सतगुरु का संसार कुछ देशों तक सीमित नहीं है बल्कि जिन देशों का हमें मालूम भी नहीं है अर्थात आकाशमण्डल में स्थित ग्रह-  उपग्रह भी सतगुरु के संसार के हिस्से हैं क्यूंकि सतगुरु का ह्रदय सबके लिए खुला है |इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जिसका ह्रदय सबके लिए खुला है,वही हमारा सतगुरु है |

बाबा हरदेव सिंह जी एक बार विश्व कल्याण यात्रा पर किसी देश में गए हुए थे |उन दिनों मेरे पास संत निरंकारी पत्रिका में छापने के लिए एक फोटो आया था जिसमें बाबा जी एक बुजुर्ग सज्जन से संवाद कर रहे थे |मुझे किसी प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि ये जो बुजुर्ग सज्जन हैं ये निरंकारी नहीं हैं |बाबा जी के नाम से भी ये परिचित नहीं हैं |इनकी भाषा हिंदी ,अंग्रेजी आदि से भिन्न है |अज़नबी देश और भाषा वाले सज्जनो के साथ भी सतगुरु का संवाद हो जाता है क्यूंकि प्रेम की भाषा का इस्तेमाल होता है |

मुझे यह भी ध्यान आ गया कि सतगुरु ने कभी भी हमें अपने शरीर के साथ नहीं जोड़ा |जैसे कि श्री गुरु नानक देव जी ने कहा-

एको सिमरो  नानका जो जल -थल रहा समाय 

दूजा काहे सिमरिये जो जम्मे ते मर जाए |

स्पष्ट है कि कोई भी शरीर परमात्मा का स्थान नहीं ले सकता लेकिन कोई भी आत्मा शरीर के माध्यम से ही संसार में विचरण करती है इसलिए हम शरीर का खंडन भी नहीं करते लेकिन हमारे सतगुरु ने हमें निराकार प्रभु के साथ ही जोड़ा है |

मुझे वर्षों   पुराना वाकया याद आ गया जब बाबा अवतार सिंह जी से कुछ महापुरुषों ने पूछा था कि क्यों न धन निरंकार के स्थान पर धन अवतार कहें क्योकि निरंकार का ज्ञान आपने ही हमें दिया है लेकिन सतगुरु का विजन बहुत स्पष्ट होता है वे व्यक्तिवादी नहीं होते |बाबा जी ने कहा कि निरंकार को ही धन्यता देनी है |मेरा शरीर भी आप की ही तरह पांच तत्वों का है लेकिन निरंकार सदैव रहा है और रहेगा |

ऐसे सतगुरु का हमें सदैव शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने हमें इस निरंकार से जोड़ा और शरीरों की कमजोरियों से बचा लिया |जो लोग निरंकार को खाली समझते हैं वे भूल में हैं क्यूंकि श्री कृष्ण तथा अन्य तत्वदर्शियों ने जिस विराट सत्ता का ज्ञान दिया वह निराकार था .है और रहेगा  |इस निराकार के एहसास को मन-बुद्धि में सदैव बनाये रखने की ज़रुरत है ताकि विवेक जागा रहे और न करने योग्य कर्म न हों |             

साध संगत  की झूठी कसम नहीं खानी--- 

रामकुमार सेवक  

विद्वानों का कहना है-कभी कसम मत खाओ क्यूंकि तुम्हारे दुश्मन को तब भी यकीन नहीं आएगा और दोस्त को पहले से ही यकीन होता है |इस दृष्टि से कसम का महत्व कुछ भी नहीं है लेकिन दुनिया में कसम का चलन बहुत पुराना है| 

बात लगभग 35-40 साल पुरानी है |मैं तब मुरादनगर (उत्तर प्रदेश )(आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत )में पढता था |मेरी पैदाइश भी वहीं की है और 1973 में ब्रह्मज्ञान भी वहीं मिला ,महात्मा बलवंत सिंह जी के माध्यम से और मेरे प्रोत्साहनकर्ता डॉ.शक्ति सिंह जी की कृपा से |

1977 के आस-पास मुरादनगर में एक महात्मा निवास किया करते थे,हरबंसलाल जी |गुरमत की प्रारंभिक शिक्षा मुझे उन्हीं के माध्यम से मिली है |

साध संगत अथवा सत्संग की महत्ता बतलाते हुए हरबंसलाल जी ने एक बार कहा कि- गुरु जी अपनी गद्दी पर विराजमान थे |शिष्य अपनी श्रद्धानुसार उन्हें कुछ न कुछ पदार्थ भेंट कर रहे थे ,यह रोज का क्रम था जो उस दिन भी चल रहा था |एक शिष्य गुरु जी की सेवा में गुरु जी के पीछे खड़ा होकर पंखा झल रहा था |

मुझे यह घटनाक्रम इसलिए याद है क्यूंकि मैं  स्वयं उस दिन मंच पर आसीन महात्मा को पंखा झल रहा था |इस प्रकार की सेवाएं मालिक ने कृपापूर्वक मुझे निरंतर दी है |

हरबंसलाल जी ने कहा कि जो सेवादार उस दिन पंखा झल रहा था ,चढ़ावे की चीजें देखकर उसके मन में लालच आ गया |उसने कुछ चीजें चढ़ावे में से चुरा लीं |

पूरा गुरु तो निराकार का साकार रूप होता है |यह चोरी गुरु साहब से छिपी न रही |गुरु साहब ने उस सेवादार से पूछा -तुमने वो चीजें चुराई हैं ?

सेवादार ने कहा-नहीं महाराज,मैंने नहीं चुराईं |

गुरु साहब को सच्चाई को पता था |उन्होंने कहा-निरंकार की कसम खा कि चीजें आपने नहीं लीं |

सेवादार ने निःसंकोच निरंकार की कसम खा ली |

निरंकार के प्रति उसकी अवहेलना देखकर गुरु साहब दंग रह गए |उन्होंने कहा-खा मेरी कसम ?

सेवादार ने निःसंकोच उनकी भी कसम खा ली |

गुरु साहब हैरान तो थे ही |उन्होंने उससे कहा-साध संगत की कसम खा कि चीजें तुमने नहीं लीं |

वो नतमस्तक हो गया और बोला -जी गुरु जी चीजें मैंने ही चुराई हैं |

यह उदाहरण अब मुझे लगातार याद आता है हालांकि उस समय किसी सेवादार द्वारा अमानत में खयानत करने और गुरु के साथ विश्वासघात करने की बात मुझे असंभव लगी थी |हरबंसलाल जी द्वारा सुनाई गयी यह कहानी मुझे निजी तौर पर अच्छी नहीं लगी थी क्यूंकि साध संगत से जुड़ा सेवादार चोरी जैसा जघन्य काम करेगा ,मेरी कल्पना से परे था लेकिन उस सेवादार को कम से कम साध संगत का तो भय था लेकिन आज तो साध संगत की मर्यादा को भी बचाये रखने की ज़रुरत है |निरंकार को जब खाली जगह मान लिया जाए तो खतरा पैदा हो जाता है |मेरा स्पष्ट मत है कि निरंकार को कभी खाली नहीं मानना चाहिए और सतगुरु को कभी शरीर नहीं मानना चाहिए |निरंकार  प्रभु कृपा करे कि यह जीवन अमृत साध संगत अपनी ऊंचाई पर स्थित रहे ताकि पीने को पानी मिलता रहे और जीवन चलता रहे |     

अध्यात्म में हर किसी के लिए राहत

रामकुमार सेवक

भक्ति मार्ग में दो परम्पराएं लम्बे समय से अस्तित्व में हैं-एक वो जो अद्वैतवादी हैं और इस सिद्धांत पर यकीन रखते हैं सृष्टि में सर्वत्र प्रभु ही है |वे कहते हैं-ब्रह्म सत्यम ,जगन्मिथ्या -केवल ब्रह्म ही सत्य है ,शेष सब मिथ्या है |इसे यूँ भी कह सकते हैं -तीन काल है सत्य तू मिथ्या है संसार

इस्लाम में एक शब्द है-बका यानी कि जो बाकी रहता है- इश्वर |कल सत्संग में हम एक बच्चे का जन्मदिन मना रहे थे |  बहुत ख़ुशी का वातावरण था |ऐसे ही ध्यान चला गया कि क्या वह बच्चा ,उसके दादा -दादी या हम सब जो आनंद ले रहे हैं ,मिथ्या है ?

मन इस सब को मिथ्या मानने को राज़ी नहीं हुआ |इस विरोधाभास से बचने के लिए यह वाक्य समाधान सुझाता है-

तेरा रूप है ये संसार

सबका भला करो करतार

मेरी मांग यही दातार --एक तू ही निरंकार

यानी कि वह बच्चा ,उसके दादा -दादी और हम सब प्रभु के रूप हैं |इस धरातल पर खड़े होकर सोचते हैं तो मिथ्या होने का डर ख़त्म हो जाता है -हालांकि सब शरीर मिथ्या ही हैं लेकिन जब इश्वर का रूप होने का विचार सामने आता है तो फिर असुरक्षा का भय ख़त्म हो जाता है और हम प्रभु की छत्रछाया में स्वयं को संतुष्ट अनुभव करने लगते हैं |हम माया को मिथ्या मानकर फ़ेंक नहीं देते बल्कि यथासंभव उसका सदुपयोग करते हैं | 

 

स्पष्ट है कि अध्यात्म के सिद्धांत हर परिस्थिति में राहत देते हैं |

वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं |

रामकुमार सेवक 

1985  के आस-पास की बात है |अक्टूबर -नवम्बर का महीना था |मैं उन दिनों मुज़फ्फर नगर में रहता था |सन्त निरंकारी सेवादल के स्थानीय महात्माओं के साथ मैं सीढ़ी पर चढ़कर वार्षिक सन्त समागम का  पोस्टर चिपका रहा था |

उन दिनों निरंकारी मिशन के विरुद्ध एक सुनियोजित अभियान विशेषकर पंजाब में चल रहा था |लगभग रोज ही किसी न किसी  निरंकारी श्रद्धालु की कहीं न कहीं हत्या हो जाती थी लेकिन निरंकार को सर्वव्यापक मानने के दृढ़निश्चय के चलते हम लोग सक्रिय रहते थे |इस निश्चय के बावजूद ,समय की पुकार सुनते हुए,सक्रिय रहने के साथ यथासंभव हम चेतन भी रहते थे |

मुज़फ्फर नगर शहर में जिला अस्पताल के पास पूरब दिशा में ,एक सड़क है जो आगे जाकर अंसारी रोड में मिल जाती है के किनारे पर हम लोग पोस्टर चिपका रहे थे |रात के ग्यारह बजे के आस-पास का समय था |हलकी सर्दी शुरू हो चुकी थी तो सड़क लगभग सुनसान थी | एक महात्मा जो रिक्शा चलाते थे ,के रिक्शे में पोस्टर और चिपकाने का साधन रखा हुआ था |

नीचे से दो-तीन लोग आये और पोस्टर पढ़ने लगे -निरंकारी सन्त समागम |नीचे खड़े साथियों से उन्होंने प्रश्न करने शुरू किये |वे सीधे-सादे महात्मा थे क्या कहते |मैंने सीढ़ी पर चढ़े -चढ़े ही प्रश्न हल करने की कोशिश की |

भीतर से मुझे लग रहा था कि परिस्थितियां आसान नहीं हैं ,ये कोई जिज्ञासु नहीं हैं बल्कि शरारती तत्व हैं और शरारती को कोई नहीं समझा सकता |

बहरहाल निरंकार का सुमिरन करते हुए काम करता रहा |सीढ़ी से नीचे उतरकर आया तो उन्होंने पूछा-निरंकारी मिशन किस धर्म का प्रचार करता है ?

मैंने कहा -यह तो हर धर्म का सार है और सब धर्मो का समन्वय करता है |

यह सुनकर वे धीरे -धीरे अपने रास्ते चले गए |मुझे बहुत संतुष्टि हुई कि मालिक ने हालात बिगड़ने नहीं दिए |आज भी वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं |वह एक विशेष दिन लगता है जिसने हमें यह निष्कर्ष दिया कि-हालात चाहे जैसे भी हों सुमिरन हमेशा हमें संतुलित करता है |यह ढाल की भाँति हमें बचा लेता है | 

बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे कि सुमिरन की जब बात चलती है तो हम कहते हैं कि हम किसी समय या वार में बंधे हुए नहीं हैं |हम कभी भी सुमिरन कर लेते हैं लेकिन पूरा दिन गुजर जाता है और हमें निरंकार का ध्यान भी नहीं आता |देखा जा रहा है कि सेवा के भी उत्साह हैं,सत्संग में भी खूब आते हैं लेकिन सुमिरन की कमी है तो सुबह-शाम परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर सुमिरन करने में कोई हर्ज़ नहीं है |यह कोई बंधन नहीं है |जब मोबाइल फोन आये तो उससे पहले लैंडलाइन फोन थे |यदि मोबाइल फोन पर बात नहीं हो पाए तो लैंडलाइन फोन का सहारा लेना पड़ता है |हम कहते तो हैं-सांस -सांस सुमिरन लेकिन हर सांस में सुमिरन कहाँ हो पा रहा है तो इस प्रकार घर के सब लोग मिलकर सुमिरन करें |यह कोई बंधन नहीं है बल्कि भक्ति का अंग है |(स्मृति के आधार पर लिखा )

 

सम्पादकीय (जुलाई 2018 ) 

काश ,हम  लोग वास्तविक धार्मिक होते----

--रामकुमार सेवक  

भारत की अंतर्राष्ट्रीय पहचान धर्मप्रधान देश के रूप में है |श्री राम,श्रीकृष्ण,महात्मा बुद्ध ,भगवान महावीर ,श्री गुरु नानक देव जी सहित दस गुरु साहेबान  ने जनमानस को प्रेम-शांति-सहनशक्ति-सहजता के ही सन्देश दिए हैं लेकिन धर्म के नाम पर जो कुछ हमें देखने को मिल रहा है वह इन महापुरुषों की शिक्षाओं को प्रतिबिंबित नहीं करता |

पिछले दिनों दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में एक ही परिवार के ग्यारह लोग अपने ही घर में मृत मिले |मामले की तह में पहुँचने की कोशिश निरंतर हो रही है लेकिन प्रथमदृष्टया यह मामला सामूहिक आत्महत्या का माना जा रहा है |ज्ञात हुआ है कि परिवार के इन सब लोगों ने मोक्ष या मुक्ति के लिए यह हृदयविदारक कदम उठाया |परिवार  के इन ग्यारह लोगों में एक युवा बेटी थी ,जिसका विवाह शीघ्र ही होने वाला था |एक बुजुर्ग माता थी |दो बच्चे भी शामिल थे जिन्होंने अभी अपने सपनो को पूरा करना था |बाकी लोग भी युवा और अधेड़ आयु के थे |

युवा लोगों से यह आशा की जाती है कि वे कुछ नया सोचेंगे और नया करेंगे |जॉर्ज बर्नार्ड शॉ कहते हैं कि-

सभी बुद्धिमान लोग अपने आपको दुनिया के अनुरूप ढाल लेते हैं |सिर्फ कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया को अपने अनुरूप बनाने में लगे रहते हैं |दुनिया की सारी तरक्की इन दूसरी तरह के लोगों पर  निर्भर होती है |

इस घटना में जो केंद्रबिंदु है ,बताया जा रहा है कि वह परिवार का अथवा बुजुर्ग माता का सबसे छोटा बेटा है |अफ़सोस की बात यह है सबसे कम उम्र और युवा होने के बावजूद वह तंत्र -मंत्र आदि में आस्था रखता था और वह नकारात्मक सोच के लोगों के बहकावे में आ गया और पूरे परिवार को अपने साथ मिलाने में सफल हो गया |

इस घटना को घटित हुए दस दिन बीत चुके हैं लेकिन अफ़सोस अभी तक क़ायम है कि अज्ञान और भ्रम के कारण एक हँसता-खेलता परिवार उजड़ गया |

धर्म कहता है-मांगोगे मिलेगा ,खटखटाओगे द्वार खुलेगा |सोचने की बात है कि कोई भी देख सकने में सक्षम इंसान किसी नेत्रहीन को राह दिखा सकता है लेकिन कोई इंसान यदि स्वयं भी नेत्रहीन हो तो कैसे किसी नेत्रहीन इंसान को मंज़िल पर पहुंचा सकेगा |इस घटना में यही तथ्य प्रमाणित हुआ है कि यदि भक्ति और मुक्ति की जिज्ञासा रखते हो तो किसी तत्वदर्शी ब्रह्मवेत्ता महात्मा की शरण में जाओ जिसे स्वयं भी सत्य का ज्ञान हो |

यह जिज्ञासा सदैव स्वागतयोग्य है |श्रीकृष्ण ने गीता में भक्तों को जिन चार किस्मो में चिन्हित किया है उनमें से आर्त,अर्थार्थी के बाद इनसे ऊंची श्रेणी में जिज्ञासु को रखा जाता है |जिज्ञासु जब किसी तत्वदर्शी महात्मा का शिष्यत्व ग्रहण कर लेता है तो वह ज्ञानी हो जाता है |भक्तों का यह सर्वश्रेष्ठ प्रकार है |

निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी से उनकी विदेश यात्रा के दौरान एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने पूछा-आपका देश इतना धार्मिक है फिर वहां भुखमरी और गरीबी क्यों है ?

बाबा जी ने कहा- हमारे देश के लोग यदि महात्माओं,अवतारों,गुरुओं की शिक्षा को अपनाकर धर्म के वास्तविक अनुयाई होते तो हमारा देश दुनिया के आगे हाथ फैलाने की बजाय दुनिया को खाना बाँट रहा होता |

बाबा जी ने सत्तर के दशक में यह बात कही थी लेकिन इस इक्कीसवीं सदी में भी हालातों में बहुत परिवर्तन नहीं हुआ है ,उपर्युक्त घटना ने यह साबित कर दिया है |                

निरंकारी मिशन क्या है ?

रामकुमार सेवक 

लोग सोचते हैं कि निरंकारी मिशन भीड़ के विशाल समूह का नाम है जबकि निरंकारी मिशन भीड़ का नाम नहीं है बल्कि भीड़ के रूप में जो लोग हैं उनके दिमागों में जो भरा है वह किसी व्यक्ति का निरंकारी होना या नहीं होना प्रकट करता है |

निरंकारी मिशन किस चीज का नाम है इस पर चिंतन करता हूँ तो  मुझे एक प्रवचन याद आ जाता है |मार्च 2017 में किये गए उन विचारों में महात्मा ने कहा था -   

१-मैं किसी के बच्चे का विवाह नहीं कर सकता लेकिन-विवाह होने के लिए  अरदास तो कर सकता हूँ |

(प्रेरक प्रसंग)-भगत राम जी बरनाला वालों की बेटी विवाहयोग्य थी |भगत राम चन्द जी ,कपूरथला वालों ने उस बेटी का रिश्ता तय कर दिया और विवाह की तारीख भी तय कर दी |भगत राम जी को जब यह बताया गया तो उन्होंने कहा-आपने जो किया ,ठीक ही किया होगा लेकिन मेरे पास पैसे की बहुत समस्या है |फिर बेटी को कुछ देना भी तो होता है |वे पैसे वाले लोग हैं,उनकी आवभगत कैसे कर पाऊंगा?

भगत जी बोले-बाबा अवतार सिंह जी हैं न -सब हो जायेगा |

बाबा जी ने किसी ज्वेलर महात्मा को कहा-भगत राम जी की बेटी की शादी है,कुछ जेवर बना देना |कपडे वाले को कहा -कुछ कपडे बना देना |विवाह बहुत अच्छा हो गया |उन महात्माओं ने अपनी सेवा कर दी लेकिन भगत राम जी ने भी धीरे -धीरे उनका दाम चुकाया |

निरंकारी मिशन की शुरूआत ऐसे प्रेम से हुई है |

प्रेरक प्रसंग -2-बाबा गुरबचन सिंह जी ने किसी महात्मा ,जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ,से कहा-कल आपके घर खाना खाने आऊंगा | यह सुनकर वह महात्मा घबरा गए|वे सोचने लगे-खुद के खाने का प्रबंध तो है नहीं,बाबा जी के खाने का प्रबंध कैसे होगा ?

बाबा जी ने खुद कहा था इसलिए वे ऐसा अवसर छोड़ना भी नहीं चाहते थे |शुक्र हुआ -तकिये के नीचे बीस रूपये रखे हुए मिल गए |

वे खुश भी हुए और हैरान भी कि ये बीस रूपये कहाँ से आ गये ?

पुराना वक्त था,सस्ता ज़माना था इसलिए बीस रूपये में पूरा प्रबंध हो गया |

सच्चाई यह है कि जब बाबा जी ने खाने के लिए कहा था ,उसी समय महात्मा के तकिये के नीचे बीस रूपये रखवा दिए थे |

यह था गुरु और गुरसिख का प्रेम और साथ ही अपने निर्धन शिष्य को भी समान अवसर देना और हीनभावना से बचा देना ,दूसरी और पैसे वाले शिष्यों को अभिमान से बचाना |

३-बाबा जी से एक बार किसी बच्चे ने पूछा-क्या बाबा जी आपको क्रोध नहीं आता ?बाबा जी ने कहा-क्रोध आता तो है लेकिन करता नहीं हूँ |

४-कमल जी से एक बार किसी निर्धन महात्मा ने कहा-कि घर में टी.वी. नहीं है,आशीर्वाद दीजिये कि बच्चों की यह इच्छा पूरी हो सके |

जोगिन्दर सिंह जी कमल ऐसे महात्मा थे ,जो निरंकारी मिशन के सबसे लोकप्रिय महात्माओं में से एक थे |लोग मानते थे कि उनका आशीर्वाद हमेशा पूरा होता है इसलिए उनके आस-पास भीड़ लगी होती थी |

कमल जी ने प्रभु से अरदास कर दी और महात्मा अपने घर चला गया |

कमल जी ने एक धनाढ्य महात्मा से कहा-एक टी.वी.की सेवा करो |वे महात्मा बहुत खुश हुए कि कमल जी ने खुद उन्हें सेवा दी है |उन्होंने इसे खुशकिस्मती माना और टी.वी खरीदकर कमल जी के घर पहुंचा आये |

कमल जी ने अगले दिन उस निर्धन महात्मा के घर टी.वी पहुंचा दिया -यह है परोपकार ,जो निरंकारी मिशन की विशेषता रहा है |  

ऐसे निरंकारी तो घर- घर में होने चाहिए 

रामकुमार सेवक 

सम्पूर्ण अवतार बाणी में बाबा अवतार सिंह जी कहते हैं-

सन्तजना दी संगत करके रब दी सोच-विचार करो 

रब बोले एहना दे अंदर एहना नू नमस्कार करो |

यह निरंकारी मिशन का आधार है इसी कारण हम धुनि में गाते हैं-

मेरा डोले ना ऐतबार 

बख्शो श्रद्धा-भक्ति -प्यार 

करूँ मैं सन्तों का सत्कार |

अर्थात सन्त सत्कार करने के योग्य हैं |अभी थोड़ी देर पहले इस शब्द की व्याख्या करते हुए महात्मा कह रहे थे कि -

सेवा को दोऊ भले एक  सन्त इक राम 

राम है दाता जगत का सन्त जपावे नाम |

राम (निरंकार) और सन्त को एक ही पंक्ति में रखा गया है |

उपर्युक्त पंक्तियों से यह बात स्पष्ट है कि सत्संग में सन्त आते हैं |वे विशाल ह्रदय के स्वामी होते हैं ,निरंकार को अंग-संग जानते और मानते हैं |पवित्र जीवन जीते हैं लेकिन सत्संग तो बदस्तूर हो रहे हैं लेकिन ये विशेषताएं वहां दिखाई नहीं देतीं फिर भी सत्संग में जाना, न जाने से बेहतर है |

आज निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में महात्मा एक प्रसंग सुना रहे थे कि एक महात्मा,जो मामूली सा काम करके अपने परिवार का गुजारा करते हैं को रास्ते में एक पर्स पड़ा हुआ मिला |उन्होंने पर्स उठा लिया |उन्होंने सोचा कि उस पर्स को उसके मालिक तक पहुंचा दिया जाए |वे मेरे पास आये |मैंने ढूँढा तो पर्स में एक नंबर मिला |हमने उस न.पर संपर्क किया तो पता चला कि वह रोपड़ जिले का न,था |उनसे बात हुई |पर्स के बारे में सुनकर उन्हें जो राहत मिली उसे शब्दों में बयान करना कठिन है |

हमने उनके पूछने पर बताया कि हम निरंकारी मिशन से जुड़े हैं |वो बोले कि-मेरी निरंकारियों के बारे में इसके विपरीत धारणा थी लेकिन आपके उस महात्मा ने जो गरीब होने के बावजूद पूरी तरह ईमानदार है,(उसने) मेरी मिथ्या धारणा बदल दी है |मुझे लगता है कि ऐसे निरंकारी तो घर- घर में होने चाहिए |

महात्मा के ये विचार सुनकर मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गयी ,जिसके अंत में कहा गया था -शक्ल -ओ-सूरत पर मत जाईये ,

निर्धन भी दानी हो सकता है 

और-सतगुरु की शिक्षा को अपनाकर

मूर्ख भी ज्ञानी हो सकता है |

सेवा करने का जब ध्यान बने तो सिर्फ किसी अधिकारी की तलाश में मत घूमिये बल्कि ऐसे सरल-सादगीयुक्त भक्त के माध्यम से सतगुरु-निरंकार की सेवा कीजिये क्यूंकि ऐसे ही महात्मा हैं,जिनके कारण निरंकारी मिशन जीवित है और जब तक यह ईमान क़ायम है विश्वास रखिये निरंकारी मिशन को कोई खतरा नहीं है |             

           

हम शुद्ध जल कहाँ से पिएंगे ?   

रामकुमार सेवक 

बरसों पहले सम्पूर्ण अवतार बाणी में  बाबा अवतार सिंह जी ने लिखा -

गुरसिखों का रूप धार के सतगुरु परगट होंदा ए |

सतगुरु अपना आप सदा गुरसिक्खां विच समोंदा ए |

10 जून 2018   की बात है |ग्राउंड न.8 में सत्संग हो रहा था | मंच पर समर्पित गुरसिख और केंद्रीय पदाधिकारियों में से एक सुन्दर लाल खुराना जी विराजमान थे |सुन्दर लाल जी को गुरमत का भी बहुत अनुभव है जो कि मेरे विचारों  को समृद्ध करने में सदैव योगदान देता है इसलिए मन में बहुत शुभ आशाएं थीं कि कुछ नया सुनने को मिलेगा |

नमस्कार करके दर्शकों में बैठकर सत्संग सुन रहा था लेकिन सत्संग में सुन्दर लाल जी को बोलने का अवसर ही  नहीं दिया गया |

साढ़े बारह बजे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के विचारों की चार साल से भी पुरानी सी.डी.चला दी गयी और सत्संग समाप्त कर दी गयी | सुन्दर लाल जी के दीर्घ अनुभवों को सुनने से मैं वंचित ही रह गया |

ध्यान आया कि निरंकारी सत्संग में सी.डी. से प्रवचन सुनने की परंपरा नहीं है |हम मंच पर विराजमान महात्मा को गुरु का रूप समझकर उन्हें नमस्कार करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं |

यदि उस मंच पर विराजमान सज्जन के बारे में हमारी जानकारी में कोई  विपरीत सूचना हो तो भी हम उन्हें नमस्कार करते हैं क्यूंकि वे उस समय सतगुरु के स्थान पर विद्यमान होते हैं |अपना ध्यान निरंकार से जोड़कर हम बेहिचक नमस्कार कर लेते हैं |

सी.डी. के माध्यम से जो शब्द मुझ तक पहुंचे उन्हें  मैं पहली बार नहीं सुन रहा था |बाबा हरदेव सिंह जी के सुलझे हुए प्रवचन सुनने का मेरा रोज का क्रम है तो सी.डी.के प्रवचन के लिए ग्राउंड न.8 ,में आने की ज़रुरत नहीं थी ,उन्हें तो मैं घर में ही सुन सकता था |

प्रश्न यह भी है कि वह सी.डी.सम्पादित थी अर्थात उसमें  संक्षिप्त करने के लिए निश्चित हीकाट-छाँट की गयी होगी जबकि मंच पर विराजमान गुरसिख के प्रवचन में मौलिकता होती है |  

शायद इसीलिए निरंकारी सत्संगों में सी.डी.से प्रवचन सुनने की परंपरा नहीं रही  है लेकिन पिछले ढाई साल में लगभग तीन बार मैंने इस पीड़ा को झेला है |

बाबा जी ने जो कुछ कहा उससे किसी को भी कोई दिक्कत नहीं हो सकती लेकिन चार वक्ता कम करके तय समय में ही सी.डी.को भी आराम से समाहित किया जा सकता था फिर  मंचासीन महात्मा का सम्मान और मर्यादा भी क़ायम रहती |

तथ्य तो यह भी है कि सतगुरु के स्थान पर जब भी बैठने का अवसर मिलता है तो मेरी सोच यही होती है कि अपने आपको पूर्णतः निरंकार को सौंप दिया जाए |इस समर्पण के बाद जो विचार आते हैं उन्हें सुनकर हम खुद भी हैरान होते हैं कि सच्चे बादशाह ने कितना कुछ कहलवा दिया |दिल से की गयी विचार दिल तक जाती है लेकिन सी.डी.में दिल नहीं होता |सी डी केवल एक instrument (यंत्र )है |वह इंसान की रचना है जबकि इंसान परमात्मा की रचना है |इंसान की रचना पर परमात्मा की रचना को ही वरीयता (Preference )दी जानी चाहिए |     

मेरे कहने का अर्थ यह है कि सत्संग की गतिविधि को जो विभाग नियंत्रित करता है उसे इस बारे में निर्णय करते समय अध्यात्म और एक गुरसिख के सम्मान का भी ध्यान रखना चाहिए अन्यथा सत्संग सिर्फ एक मीटिंग बनकर रह जाएगा |निरंकारी इतिहास की गरिमामय परम्पराओं का ख्याल करना जरूरी है |

ऐसा लगता है कि मिशन का प्रबंध तंत्र जिनके हाथों में है इनमें से अधिकांश  लोगों में आम श्रद्धालु की अपेक्षा आधी भी आस्था और विश्वास  नहीं है जो कि  इनकी ऐसी गरिमाहीन कारगुजारियों से ज़ाहिर हो जाता है | ज्यादातर सत्संग अब भी पुरानी और गरिमामय पद्धति से चल रहे हैं लेकिन दिल्ली के ग्राउंड न.8 में जो कुछ दिनों से लगभग लगातार चल रहा है वह सपूर्ण अवतार बाणी की उपर्युक्त पंक्तियों के अनुकूल नहीं लग रहा |यहाँ उस गुरसिख पर भी यकीन नहीं किया जा रहा है ,जिसकी ड्यूटी स्वयं प्रबंधतंत्र ने ही लगायी है |

ढाई वर्ष तक मैं इस दर्द को दबाये रहा लेकिन जब यह सिलसिला परंपरा ही बनने लगा तो भीतर की पीड़ा बाहर आ गयी |सत्संग हमारा आधार है,यदि यह भी प्रदूषित हो गया तो हम शुद्ध जल कहाँ से पिएंगे ?

इस पीड़ा को कई ऐसे सज्जनो को भी बताया जो प्रबंध तंत्र तक इसे पहुंचा सकने में सक्षम हैं लेकिन सब जैसे मौन हैं| मगर लेखक के धर्म ने मुझे इस मामले में मौन नहीं रहने दिया |यह सब लिखने के लिए  कुछ अंधविश्वासी भक्तों से माफ़ी चाहता हूँ |   मालिक हम सबको सद्बुद्धि और वास्तविक भक्ति प्रदान करे-धन निरंकार जी-

            

न्याय चाहिए या  कृपा ?

रामकुमार सेवक 

न्याय की दुनिया में बहुत महत्ता है |अमृतसर कांड के दिनों में हमने स्वयं न्याय की प्राप्ति के लिए जुलूस निकाला था |न्याय जनवरी 1980  में मिला भी जबकि हमारे निर्दोष लगभग 60  महापुरुषों को बाइज्जत बरी कर दिया गया था | 

अध्यात्म में ईश्वरीय न्याय को ही सर्वोच्च माना गया है क्यूंकि सांसारिक न्याय में तो सबसे बड़ा दंड मृत्युदंड है (चाहे किसी ने एक खून किया हो या पांच) | पैसे वालों को प्रायः मृत्युदंड मिलने की कोई संभावना नहीं होती  इसलिए इश्वर ही उनके साथ न्याय करता है |पांच हत्याओं का सही दंड तो इश्वर अथवा निरंकार ही दे सकता है |इसे दलील या वकील की ज़रुरत नहीं पड़ती क्यूंकि यह तो अँधेरे में भी स्पष्ट देख लेता है |

एक भक्त मानता है कि मैं गलतियों का पुतला हूँ क्यूंकि कदम-कदम पर हमसे गलतियां होती रहती हैं हालांकि वह तो प्रेम ही करना जानता है और प्रेम ही करता है लेकिन-

भुल-भुलेखे वी जे भुल्ले साह उसदा सुक जांदा ए |

  इसलिए वह हमेशा क्षमा याचना करता रहता है |उसके शब्दकोष में न्याय से ऊपर बख्शिश (क्षमा )का स्थान होता है |  

कहते  हैं कि किसी  शिलाखंड  पर किसी  ने बहुत वर्षों  तक  तप  किया |जब  उसका  तप  पूरा  हुआ  तो प्रभु  ने पूछा  कि तुमको  कृपा  चाहिए या  न्याय चाहिए ?

चूंकि  तप  का  मार्ग   कठिन  है इसलिए  कुछ  लोगों  को अभिमान  हो  जाता  है कि हमसे  बढ़कर  कौन  है ?यही  उस तपस्वी  के साथ भी हुआ - उसने  कहा कि मैं तो अपने  कर्म  में विश्वास रखने  वाला इंसान हूँ और मुफ्त में कुछ नहीं लेता |

यह तो प्रभु की दया ही थी जो ऐसा पूछ लिया नहीं तो जिसमें ज़रा भी अकड़ हो तो कृपा कहाँ होती है ?

खैर उसे न्याय दे दिया गया - जो भी उसकी तपस्या का फल बनता था |

कहते हैं कि वह अभी अपनी तपस्या के फल मिलने की ख़ुशी भी न मना पाया था कि वह शिला जिस पर बैठकर उसने तपस्या की थी ,हाथ जोड़कर आ गई |

प्रभु ने पूछा तो उसने बताया कि-प्रभु ,मुझे भी न्याय चाहिए |प्रभु ने पूछा -तुम्हें किस से शिकायत है ?वह बोली कि इस साधु ने तीस साल मुझी पर सवारी की है इसलिए मुझे भी हिस्सा मिलना चाहिए |

प्रभु ने कहा कि बात तो ठीक है ,इसका दावा ज़ायज़ है| 

अब तपस्वी घबरा गया |वह कुछ सोच पाता इस से पहले ही पेड़ आ गया जिसने उस पर छाया की थी और जिसके फल उसने भूख लगने पर खाए थे |

वह सोचने लगा कि यह भी अपना हिस्सा मांगेगा |साथ में नदी भी तो बह  रही है ,वह भी हिस्सा मांगेगी |फिर मृगछाला भी है ,वायुमंडल भी है उसे तपस्या का फल धूमिल होता नज़र आने लगा |उसने कहा - प्रभु मैं न्याय नहीं चाहता ,आप जिसे जो मर्ज़ी  दे दीजिये ,आपका निर्णय स्वीकार्य है |अपनी कृपा बख्श दीजिये |

अब तपस्वी अहंकार के रोग से मुक्ति पा चुका था इसलिए शिला वापस चली गयी |प्रभु ने पूछा कि क्या तुमको न्याय नहीं  चाहिए ?वह बोली -प्रभु ,सब कुछ आप ही तो दे रहे हैं और देंगे भी इसलिए मुझे कुछ नहीं चाहिए |पेड़ को कुछ कहने की ज़रुरत नहीं पड़ी और नदी को तो आने की भी ज़रुरत नहीं पडी क्यूंकि प्रभु तो है ही न्यायकारी लेकिन भक्त के लिए करूणानिधि है,कृपालु है ,दयालु है इसलिए भक्त निष्काम भाव से प्रभु की उपासना करता है और आनंद लेता है |

किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं इस सर्वव्यापी सत्ता निरंकार प्रभु की आँख में धूल झोंकने में सफल हो पाऊंगा इसलिए सावधानीपूर्वक कर्म करने जरूरी हैं |          

 

 

ज्ञान योग ,कर्म योग और भक्ति योग तथा निरंकारी सुमिरण   

रामकुमार सेवक

एक बच्चा चर्च में ,हाथ जोड़कर ,आँख बंद करके परमेश्वर की प्रार्थना कर रहा था |इतना छोटा बच्चा सही प्रार्थना जानता होगा या नहीं ,यह एक बड़ा प्रश्न था |पादरी ने उसके शब्दों को सुनने का प्रयास किया |उसने महसूस किया बच्चे के शब्द सही नहीं हैं |उसने बच्चे को सही शब्द बोलने का आदेश दिया |बच्चे ने कहा-मैं तो प्रार्थना जानता नहीं इसलिए पूरी वर्णमाला (Alphabets  )बोल देता हूँ ,ताकि प्रभु अपनी पसंद की प्रार्थना बना ले और भाव स्वीकार कर ले |

अनेक लोग सोचते हैं कि प्रार्थना के कुछ निश्चित शब्द होते हैं ,उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होना चाहिए |उनका क्रम भी अपरिवर्तनीय रहना चाहिए | मांत्रिक,तांत्रिक ,ज्योतिषी आदि इसी विचारधारा के होते हैं लेकिन प्रार्थना में शब्दों से ज्यादा भाव ही महत्वपूर्ण होते हैं |

बाबा अवतार सिंह जी फरमाते थे-

सिफत-श्लाघा करनी तेरी मेरे वश का रोग नहीं |

यानी कि हे  प्रभु , मेरे द्वारा तेरी स्तुति करना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है यानी कि महत्वहीन है |

यह बात सही भी है  कि जिस प्रभु की स्तुति करते हुए ब्रह्मा जी भी कहते हैं-नेति-नेति यानी कि पूरी स्तुति कर पाना संभव नहीं है, ऐसे प्रभु की स्तुति हम अल्पज्ञ जीव कैसे कर पाएंगे ?यह तो वाकई असंभव सा काम है लेकिन भक्त हर युग में यह काम करते आये है क्यूंकि यही एक ऐसा काम है जिसमें असफल होने का ख़तरा नहीं होता क्यूंकि जिसकी स्तुति की जा रही है ,यह प्रभु स्तुति अथवा प्रार्थना को सफलता  अथवा असफलता  के पलड़ो में नहीं तोलता बल्कि किसी भी भक्त की प्रार्थना को उसके मन की सरलता-सहजता और भक्ति भाव के अनुसार स्वीकार करता है |प्रभु के पास अस्वीकृति के लिए कोई स्थान नहीं है इसलिए भक्त सदैव से प्रभु की प्रार्थना करते आ रहे हैं |उन्हें चाहें ऋचाओं,आरतियों  आदि का नाम दें या नात-कव्वालियों ,सुसमाचार आदि का ,जो शब्द प्रभु की प्रशंसा में कहे जाते हैं उन्हें प्रार्थना-स्तुति आदि की श्रेणी में ही रखा जाता है |

          पिछले दिनों एक सज्जन ने एक बहुत तर्कसंगत बात कही कि हमारे द्वारा प्रभु की स्तुति या अध्यात्म की बहुत बातें करना प्रभु के सामने वाकई सूरज को दीपक दिखाने के समान अथवा महत्वहीन ही हैं  जैसे एक दीपक सूर्य के सामने महत्वहीन होता है लेकिन अन्धकार में तो उसकी बहुत महत्ता है क्यूंकि वहाँ तो उसका उजाला किसी भटके हुए राही को राह दिखाता है |इसी प्रकार प्रभु के सामने बेशक हमारी प्रार्थनाएं अथवा स्तुतियाँ महत्व नहीं रखतीं लेकिन हमारे मन को तो उनसे   सुकून मिलता ही है इसलिए अन्धकार में एक दीपक के समान उस स्तुति-प्रार्थना  की भी बहुत महत्ता है |

निरंकारी मिशन में जो सुमिरन है वह भी प्रार्थना का बहुत संक्षिप्त मगर सारगर्भित रूप है|जब तू ही निरंकार कहते हैं तो ज्ञानयोग प्रकट हो जाता है |मैं तेरी शरण हाँ कहते हैं तो कर्मयोग साकार हो जाता है |मैनु बख्श लो ,भक्तियोग का प्रमाण है |ऐसी सारपूर्ण प्रार्थना,जिसे अनपढ़ व् नादान  भी आसानी से बोल ले , प्रदान करने के लिए सतगुरु -निरंकार का हार्दिक धन्यवाद | 

 

भगवान राम का न्याय  

रामकुमार सेवक 

पहले भारत धर्मप्रधान देश था .आजकल धनप्रधान है |पहले व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चारित्रिक बल से होता था ,आजकल पैसे से होता है |दुर्भाग्य से धर्म में भी भावना की बजाय धन ही महत्वपूर्ण हो चुका है |;

आश्रमों और गुरुओं की आजकल छवि बहुत ख़राब है |इसका मूल कारण यह है कि पहले धर्म नैतिकता का दूसरा नाम था |लोग नैतिकता सीखने के लिए धर्मगुरुओं अथवा संत -महात्माओं की शरण में जाते थे लेकिन इनमें से अधिकांश लोग धीरे -धीरे पाप करने में भी आगे हो गए और इनके कर्मो के कारण इन के प्रति लोगों में सम्मान  का भाव कम और फिर ख़त्म हो गया |

वास्तव में सम्मान तो अद्यात्म अथवा नैतिकता का  था लेकिन इन  लोगों में से अधिकांश ने अध्यात्म अथवा धर्म के कारण मिले सम्मान को अपना व्यक्तिगत सम्मान मानना शुरू कर दिया |समस्या तो तब आयी जब गुरु होने को भी एक व्यवसाय मान लिया गया |व्यावसायिक दृष्टिकोण के कारण धीरे-धीरे  धर्म भी कर्मकांड बन गया और निजी लालच के कारण  संत और गुरु के रूप में पूजनीय पहचान रखने वाले लोग अपराधियों के रूप में परिणत हो गए |

आशा का एकमात्र केंद्र था- निरंकारी मिशन और निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी |उन्हें देखकर परमात्मा में विश्वास मजबूत होता था और मानवता को शक्ति मिलती थी |उनके दिव्य वचन ह्रदय में पवित्र भाव जगाते थे |उनके पास निरंकार का ज्ञान भी था और ध्यान भी |काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया और हम जैसे अनाथ हो गए |

इस समय इंसान दिग्भ्रमित सा है क्योंकि बचाव की एकमात्र आशा -धर्म के क्षेत्र में भी दया के नाम पर शोषण शुरू है और ज्ञान के नाम पर मात्र लफ़्फ़ाज़ी और अभिमान दिख रहा है |

यथार्थ यह भी है कि यह सिर्फ आज की समस्या नहीं है बल्कि पुरानी दर्दनाक परंपरा है | 

वाल्मीकिरामायण का एक प्रसंग ध्यान में आ रहा है-भगवान राम के दरबार में एक कुत्ते ने एक साधु के विरुद्ध शिकायत की |शिकायत थी कि वह गली से गुज़र रहा था कि साधु ने उसे डंडा मार दिया |इतनी बुरी तरह से मेरी पिटाई कि  मैं पीडा से बिलबिला उठा |कुत्ते ने इस प्रकार अपना दर्द बयां करते हुए प्रश्न किया , सन्यासी धर्म और ऐसे कर्म ?

भगवान राम  उस समय न्यायाधीश के पद पर भी थे और राजधर्म निभा रहे थे |उन्होंने कुत्ते की पीड़ा सुनी और साधू को बुलाया |उससे पूछा-आपने इस कुत्ते को पीड़ा क्यों दी ?

साधु ने कहा-मैं तो अपने रास्ते जा रहा था |इस कुत्ते ने मुझ पर भोंका |सुबह-सुबह इसका भोंकना मुझे बुरा लगा और मैंने इसे डंडे से मारा |

भगवान राम ने कहा-सन्यासियों -ऋषियों-मनीषियों को तो धैर्य का परिचय देना चाहिए और धर्म का पालन करना चाहिए|

साधु  शर्मसार हुआ |वह चूंकि अपना अपराध स्वीकार कर चुका था तो आवश्यक था कि उसे दंड दिया जाए |वह ऐसा युग था कि सामान्य जनता भी नागरिक धर्म का पालन करती थी |कहने का तात्पर्य है कि आम जनता के कर्म भी आज के संतों-महापुरुषों से बेहतर थे |

भगवान  ने कुत्ते से ही पूछा-इस साधु को क्या सजा दी जाए ?

कुत्ते का जवाब हैरान करने वाला था |उसने कहा-साधु महाराज को फलां आश्रम का अधिपति बना दिया जाए |

भगवान ने कहा-यह सजा है या इनाम ?

कुत्ते ने बहुत अर्थपूर्ण बात कही,जो आज की परिस्थितियों में भी सत्य मालूम हो रही है |उसने कहा-महाराज ऐसा कोई दुष्कर्म नहीं है जो वहां नहीं होता हो |

भगवान ने कहा-तुम इतने विश्वास से कैसे यह कह सकते हो ?

कुत्ते ने कहा-मैं पिछले जन्म में उसी आश्रम का अधिपति था |उसी का परिणाम है कि मैं आज इस अधम योनि में हूँ |

भगवान ने कुत्ते की अभिलाषा पूरी की |उस साधु को उस आश्रम का अधिपति बना दिया | इस प्रकार पुरस्कार के रूप में उस साधु को दंड मिला और कुत्ते को न्याय |