बाबा बूटा सिंह जी की मेहनत का स्वरुप 

रामकुमार सेवक 

योग्य शिष्य पर मेहनत करने में सतगुरु को प्रसन्नता होती है परोपकारी सतगुरु हमेशा से यह करते आये हैं | ब्रह्मज्ञान प्राप्ति की अगली सुबह बाबा बूटा सिंह जी और बाबा अवतार सिंह जी ने चार खानियों पर चर्चा की |चार खानियों में पूरी सृष्टि के जीवों की रचना मानी जाती है |किसी दिन इस पर विस्तार से चर्चा करेंगे लेकिन मेरा इरादा एक अन्य प्रसंग पर चर्चा करने का है जो कि बाबा अवतार सिंह जी के साथ घटित हुआ और उसके लगभग 60 साल बाद मुझे भी कुछ-कुछ वैसा ही अनुभव हुआ जिससे मुझे पक्का यकीन हो गया कि निरंकार के लिए कुछ भी करना कठिन नहीं है और जब मेरा बचाव हो सकता है तो किसी का भी बचाव हो सकता है |

युगपुरुष पुस्तक मैंने 1978में पहली बार पढ़ी थी और यह मुझे इतनी रोचक लगी कि पूरी रात लालटेन की रोशनी में इस पुस्तक को पढता रहा क्यूंकि उस समय तक मुराद नगर के हमारे घर में बिजली नहीं होती थी और निरंकारी मिशन की शुरूआत कैसे हुई ,यह जानने की जिज्ञासा बहुत थी |  

घटना इस प्रकार है कि निरंतर किसी सच्चे जिज्ञासु की खोज में लगे रहने वाले बाबा बूटा सिंह जी ने जब बाबा अवतार सिंह जी की सत्यनिष्ठा देखी तो उन्हें लगा कि मुझे जिस शिष्य की खोज थी वो मुझे मिल गया है तो बाबा बूटा सिंह जी ने उन पर मेहनत करनी शुरू कर दी |उसी दिन वे अवतार सिंह जी को अपने घर ले गए |उन्होंने अपनी पत्नी (माता गुणवंती जी ,लोकप्रिय नाम-माता बनती जी )को कहा कि ब्रह्मज्ञानी महात्मा घर में आये हैं इसलिए नयी चादर बिछाकर महात्मा वहां बिठाओ और उनका संत की मर्यादा के अनुसार उचित सेवा-सत्कार करो |  

माता बनती जी को कोई संतान नहीं थी और उस ज़माने में पत्नी उच्च ज्यादा ही सुशील हुआ करती थीं और सच्ची बात तो यह है कि बाबा बूटा सिंह जी ने एक महान कदम की शुरूआत करनी थी तो मर्यादा की स्थापना ऐसे ही हो सकती थी कि स्वयं सत्कार करके बताया जाए कि संतों का सत्कार कैसे होना चाहिए |  

बाबा अवतार सिंह जी,बाबा बूटा सिंह जी को बार -बार रोकने की कोशिश करते कि शिष्य होने के नाते मेरा काम है कि मैं आपकी सेवा और सत्कार करूँ यह जो आप सेवा-सत्कार कर रहे हैं यह गुरु का काम नहीं है |इस प्रकार बाबा बूटा सिंह जी ने करां मैं संतां दा सत्कार की आधारशिला रखी |इस सिसिले में बाबा अवतार सिंह जी को अपने घर में जाने के लिए काफी देर हो गयी |

आप सोचकर देखें कि यह तब की बात है जब देश अंग्रेज़ों का गुलाम था और उस हिस्से की बात है जो इस समय पाकिस्तान कहलाता है |

बाबा अवतार सिंह जी को अपने घर तक आने के लिए छावनी क्षेत्र से गुजरना था और उस क्षेत्र में कोई भी भारतीय सात बजे के बाद नहीं गुजर सकता था लेकिन बाबा अवतार सिंह जी को वहीं ग्यारह बज गए लेकिन बाबा जी को निरंकार की सत्ता पर पूरा भरोसा था इसलिए बिना किसी डर के अपने घर की ओर चल पड़े |

जब वे घर पहुंचे तो जगतमाता बुद्धवंती जी (बाबा अवतार सिंह जी की धर्मपत्नी )और घर के लोग उन्हें इस समय पहुंचा देखकर हैरान हुए कि छावनी क्षेत्र में घर तक निष्कंटक कैसे पहुँच गए ?अंग्रेज फौजियों ने रोका क्यों नहीं ?

बाबा अवतार सिंह जी ने कहा कि मैं तो सुमिरन करता हुआ आ गया |मैंने फौजियों को जगह-जगह तैनात देखा लेकिन वे शायद मुझे नहीं देख पा रहे थे क्यूंकि मुझे किसी ने नहीं रोका |

इसे कहते हैं विश्वास |मुझे यह बात एकदम सत्य लगी क्यूंकि 1990  के आस -पास की बात है |मैं तब मुराद नगर और दिल्ली के बीच रोजाना यात्रा किया करता था |अब भी काफी लोग नयी दिल्ली और मेरठ के बीच चलने वाले शटल से रोजाना यात्रा करते हैं लेकिन 15  अगस्त 1993  को मैं दिल्ली में बस गया दैनिक यात्रा का क्रम पीछे छूट गया लेकिन 1990  में दैनिक यात्री था जबकि सन्त निरंकारी (हिंदी )का सह सम्पादक भी था | 

बहरहाल एक दिन भीड़-भाड़ में गाड़ी में मेरी और मेरे साथियों की किसी बदनाम आदमी से कहा-सुनी हो गयी क्यूंकि वह किसी नए यात्री से दुर्व्यवहार कर रहा था | उसने धमकी दी और हमने उसकी परवाह न की |

अपने घर से रेलवे स्टेशन तक मैं पैदल जाता था और वह खतरनाक आदमी रेलवे स्टेशन से लगभग एक किलोमीटर पहले मुझे रोज मिलता था |मुझे यह तो पता था कि रोज मिलता है तो आज भी मिलेगा |दिमाग में उसकी धमकी भी याद थी  लेकिन मुझे रत्ती भर भी डर न था क्यूंकि रोज की तरह निरंकार आज भी साथ था |

रोज की तरह वह मिला लेकिन सीधा निकल गया |मेरी रफ़्तार उससे कम थी |जब मैं प्लेटफार्म पर चढ़ा तो मेरे साथियों ने कहा-वो मिला नहीं क्या ?मैंने कहा-मिला था |वे बोले -उसने गाली-वाली तो दी होगी |

मैंने कहा-नहीं यार |वो बोले-ऐसा कैसे हो सकता है ?

मैंने कहा-यह निरंकार तो सदा साथ है |बाबा अवतार सिंह जी को इसने पेशावर की छावनी में बचाया था ,मुझे यहाँ बचाया है |तब से कई बार मैंने इस प्रसंग को लिखने के बारे में सोचा लेकिन आज लिख पाया |खास बात यह है कि यह निरंकार सदैव सत्य है और आगे भी सत्य रहेगा |मेरा यह यकीन जितना भी मजबूत हो उतना ही लाभ है | 


टाइम  की   क़द्र  करें  , पास  करने की बजाय

रामकुमार सेवक 

    वर्षों पहले एक विडिओ व्हाट्सएप्प पर किसी ने भेजा था उसमें कुछ युवा अपनी दादी से मिलने गांव में जाते हैं |विडिओ में दिखाया गया कि दादी अकेली बैठी है और वे सब अपने-अपने मोबाइल पर व्यस्त हैं |वे दादी से मिलने गांव गए हैं लेकिन बीच में मोबाइल फोन आ गया और दादी मिलने के लिए तरसती ही रह गयी |

      हर कोई टाइम पास करने में लगा  है | महंगे  मोबाइल हैं ,उनके ढक्कन खुले हैं |भीड़ है लेकिन भीड़ से बेखबर वे गेम खेल रहे हैं |एक से बढ़कर एक खेल |कोई आये या जाए -कोई मरे या जिए-वे आराम से गेम खेलते हैं |

कुछ लोग जो गिरते मानव मूल्यो पर चिंता प्रकट करते हैं ,नैतिकता पर बहस करते हैं ,सबको चोर बताते हैं और फिर घर चले जाते हैं|

वे कभी इस पक्ष में चले जाते हैं तो कभी उस पक्ष में -जिधर का पलड़ा भारी ,उधर ही वे | अपना कोई विचार नहीं -बस टाइम पास |

सोचने की  बात तो यह है कि टाइम तो पास हो ही रहा है |समय को पास होने से कोई रोक ही नहीं सकता | जो समय को पास करना चाहते हैं वो असल में अपने मनोरंजन में लगे हैं ताकि पता ही न चले कि गाड़ी तेज चल रही है या धीमी ?

ऐसे लोग वास्तविकता के खुरदरेपन से बचना चाहते हैं और एक प्रकार का नशा कर लेते हैं |ऐसा समझ लीजिये जैसे सूखी घास को देखकर कोई बैल हरा चश्मा लगा ले |सूखी घास को हरी समझकर खा ले |यह भी एक प्रकार का सपना है जिसमें शेष  सब दोषी व् अपराधी हैं और वे खुद दूध के धुले हैं |

वे अपराधी नहीं हैं क्युकी मासूमियत से गेम खेल रहे हैं मोबाइल पर | देश,समाज व् विश्व में कुछ भी हो रहा है -उसकी जिम्मेदारी से वे खुद को अलग कर लेते हैं |

ऐसे लोग अक्सर जिम्मेदारियों से मुह मोड़ लेते हैं और खुद को निर्दोष समझते हैं - यह एक प्रकार का भ्रम है ,जिससे कभी न कभी बाहर आना ही होगा |

इस भ्रम के वशीभूत होकर जो गेम को एन्जॉय कर रहे हैं वे उस कुत्ते कि तरह भ्रम में हैं जो कि हड्डी चूसता है- खून उसके मुह में से आ रहा होता है और वह सोच रहा होता है कि जो वह पी रहा है वह खून  हड्डी में से निकल रहा है |

मैं मोबाइल या किसी अन्य संचार माध्यम पर गेम खेलने का विरोधी नहीं हूँ -सिर्फ यह कहना चाहता हूँ कि अपने मनोरंजन के लिए शेष जिम्मेदारियों के प्रति गाफिल न हो जाया जाए |यह ध्यान रखा जाए कि वहाँ बाकी लोग भी हैं और किसी को तंग करना मानवीय गुण नहीं है | 

टाइम पास अपने तरीके से करना अपराध नहीं है लेकिन टाइम यूँ ही गंवाने वाले महान नहीं कहलाते |महान वे होते हैं जो टाइम की  कदर करते हैं और कम समय में भी उतना काम कर जाते हैं जितना कि काफी लोग काफी समय जीकर भी नहीं कर पाते |  स्वामी विवेकानंद और भगत सिंह जी आदि क्रांतिकारी वीरों को मैं इसी श्रेणी में रखता हूँ |

सांसारिक विकास के लिए जो जरूरी है वो तो सब कर ही रहे हैं लेकिन हमारा जो अस्तित्व है,आत्मा से है |आत्मा को परमात्मा से जोड़ने की पहल करें क्यूंकि यह जीवन क्षणभंगुर है और इसका कोई विकल्प नहीं है |कल सत्संग में महात्मा समय की पाबंदी पर बहुत जोर दे रहे थे |कभी प्रधान लाभ सिंह जी ने भी समय की पाबंदी पर मंडल की प्रतिबद्धता प्रकट की थी |1974 -75  की सन्त निरंकारी पत्रिका के पिछले मुखपृष्ठ पर उनके फोटो के साथ छपी अपील मुझे अब तक याद है |

वर्तमान निरंकारी सतगुरु भी इसके लिए संकल्पबद्ध दिखाई देती हैं और यह चाहिए भी लेकिन सोचने की बात यह है कि समय की पाबंदी को सर्वोच्च मानने और इसकी खुली घोषणा कहीं (खासकर बुजुर्गों को) संगत से दूर न कर दे |हर किसी को चाहिए कि समय की क़द्र करें क्यूंकि जो समय की क़द्र नहीं करते उन्हें समय सबक जरूर सिखाता है |  


सुमिरन की गहराई-

बाबा बूटा सिंह जी खुश होकर बोले-मुझे जिसकी तलाश थी ,वो मिल गया 

रामकुमार सेवक 

मेरे ख्याल से यह पेशावर की बात है |बाबा अवतार सिंह जी में परम पिता परमात्मा की प्राप्ति की गहरी लगन थी इसलिए किसी ऐसे महात्मा-सतगुरु की खोज में थे ,जो स्वयं प्रभु से एकाकार हो चुका हो |रामकृष्ण परमहंस जी कहा करते थे कि यदि आपके भीतर प्रभु प्राप्ति की ऐसी लगन है जैसी डूबते हुए इंसान को पानी से बाहर आने की होती है तो यह प्रभु आपसे दूर रह ही नहीं सकता |लगता है बाबा अवतार सिंह जी में भी प्रभु प्राप्ति की ऐसी ही गहरी जिज्ञासा रही होगी,तभी बाबा बूटा सिंह जी की कृपा उन पर हुई |

जैसे ही बाबा बूटा सिंह जी ने उन्हें निरंकार का ज्ञान दिया उनकी आत्मा झूम उठी |उन्हें ऐसी लगन लगी कि रात भर सो भी न पाए |यह तब था जबकि उनके आस-पास के लोगों में बाबा बूटा सिंह जी के प्रति कोई अच्छी धारणा नहीं थी |उनके मामा जय सिंह जी ने तो यहाँ तक चेताया कि अपने अच्छे कामो और सेवाओं से आपने पंथ में जो प्रतिष्ठा पायी है,बाबा बूटा सिंह जी की संगति में गंवा बैठोगे लेकिन प्रभु प्राप्ति के आनंद का पलड़ा इतना भारी था कि उन्होंने ऐसी बातों की रत्ती भर भी परवाह न की और प्रभु प्राप्ति का आनंद लूटने में लग गए |

पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब ने युगपुरुष पुस्तक में लिखा है कि बाबा अवतार सिंह जी इस ख़ुशी में रात भर सो न पाए |सुबह उठते ही अपने गुरु बाबा बूटा सिंह जी से मिलने चल दिए |उधर बाबा बूटा सिंह जी भी अपने शिष्य के प्रति प्रेम में सराबोर थे |रास्ते में ही दोनों की मुलाक़ात हुई तो पता चला कि गुरु और शिष्य का प्रेम कैसा अनूठा होता है |

बाबा अवतार सिंह जी और बाबा बूटा सिंह जी,दोनों एक दूसरे के प्रति शुभ भावनाओं से लबरेज़  थे |

बाबा बूटा सिंह जी ने उन्हें चलते-चलते भी  निरंकार प्रभु का सुमिरन करने की शिक्षा दी |बाबा जी का ह्रदय पहले ही ऐसी शिक्षा अपनाने को तैयार थी क्यूंकि गांव के गुरद्वारे के स्कूल से जो शिक्षा उन्होंने पायी उसके दो मूल तत्व थे-१-ईमानदारी २-भक्ति |भाई नंद जी की यह शिक्षा पूरा काम कर रही थी | 

इतिहास बताता है कि बाबा बूटा सिंह जी ने संत अवतार सिंह जी से चार खानियों के बारे में  पूछा तो बाबा जी ने इंकार में सिर हिला दिया |इस पर बाबा जी ने कहा-मुझसे पूछिए मैं आपको विस्तार से बताऊंगा |बाबा जी ने तुरंत बताना भी शुरू कर दिया लेकिन बाबा अवतार सिंह जी मौन थे फिर जब मौन से बाहर आये तो उन्होंने खुद ही बाकी खानियों के बारे में बताना शुरू कर दिया |बाबा बूटा सिंह जी ने कहा कि जब मैंने आपसे चारों खानियों के बारे में पूछा तब आपने इंकार क्यों किया ?बाबा अवतार सिंह जी बोले-मैं तो आपके आदेशानुसार सुमिरन में लगा हुआ था चार खानियों वाली बात सुनी ही नहीं |

बाबा बूटा सिंह जी ने खुश होकर उन्हें नमस्कार की और बोले-मिल गया ,मुझे जिसकी तलाश थी वह मुझे मिल गया |   

इस दृश्य की कल्पना करके किसी उर्दू शायर का यह शेअर याद आता है-

उल्फत का तब मज़ा है,दोनों हों बेकरार 

दोनों तरफ हो आग बराबर लगी हुई |

यह ऐसी आग थी जिसमें रफ़्तार तो अग्नि की ही थी लेकिन मूल में भक्ति की शीतलता सर्वत्र व्याप्त थी |  

          


रामकृष्ण परमहंस का परोपकार 

रामकुमार सेवक 

पिछले दिनों रामकृष्ण परमहंस के बारे में पढ़ा कि उनकी भोजन में बहुत रूचि थी |समय पर भोजन न मिले तो असंतोष ज़ाहिर कर देते थे |इतने बड़े महात्मा और खाने के प्रति ऐसी रूचि तो उनकी पत्नी ,(माँ शारदा )को विचित्र लगता था |उन्होंने एक दिन थोड़ा सख्ती से कहा कि कैसी बात करते हो |इस उम्र में भोजन के प्रति यह रूचि शोभा नहीं देती |

रामकृष्ण मन से पूरी तरह सन्यासी लेकिन नियम से गृहस्थ |उच्च कोटि के ब्राह्मण होने के बावजूद ,ब्रह्मणत्व का रत्ती भर अहंकार नहीं |जिन्होंने ईसाइयत का ऐसा अध्ययन किया कि ईसा के प्रेम मार्ग की गहराई तक उतरे |फिर हज़रत मुहम्मद साहब के मार्ग इस्लाम का पूर्ण अध्ययन किया और अंततः इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि जिस प्रकार एक नदी के कई घाट हो सकते हैं इसी प्रकार विभिन्न धर्म एक परमात्मा रूपी नदी के कई घाट समझिये |

उनका कहना था कि पूरे संसार का एक ही  परमात्मा है इसलिए ऐसे परमात्मा के लिए बुद्धि में कुछ स्थान विशेष रूप से होना चाहिए |सब कार्य करते हुए भी मन के एक हिस्से में परमात्मा का स्थायी भाव |यह उसी प्रकार संभव है जैसे घास काटने वाली औरत घास तो काटती ही है ,अपने बच्चे की देखभाल भी करती है |घास खरीदने कोई आ जाए तो उससे मोल -भाव भी करती है लेकिन इसके साथ-साथ यह भी ध्यान करती है कि दरांती कहीं उसकी ऊँगली को नुक्सान न पहुंचा दे |

इसी बात को कबीरदास जी ने यूँ कहा-

सुमिरन की सुधि यूँ करो,ज्यूँ गागर पनिहारी 

हाले- डोले सुरत में कहे कबीर विचारि | 

अर्थात जिस प्रकार एक पनिहारी गागर में पानी भरकर अपने घर तक लाती है जबकि बीच में अपनी सहेलियों से  वार्तालाप भी करती है इसके बावजूद उसे ध्यान रहता है कि गागर कहीं छलक या टूट न जाए |एक गुरसिख अथवा भक्त भी ऐसा ही ध्यान प्रभु के प्रति रखता है |   

परमात्मा के प्रति इतना उच्च विश्वास और शेष धर्मो के प्रति इतनी उदारता के बावजूद भोजन के प्रति ख़ास लगाव |यदि खाना बनने में देरी हो तो बेचैन हो जाना |माँ शारदा ने एक दिन उन्हें स्पष्ट कह ही दिया लेकिन उन्होंने जो जवाब दिया वह महत्वपूर्ण है |उन्होंने कहा-भोजन की रूचि मैंने इसलिए पकड़ रखी है ताकि संसार में रहने का कारण बना रहे |यदि कभी मुझे भोजन से भी अरुचि हो जाए तो समझ लेना इस दुनिया में मेरा जीवन बस दो-चार दिन का ही बचा है |    

सोचने की बात यह है कि भोजन में रूचि होना पाप नहीं है लेकिन भोजन और स्वाद के प्रति ज्यादा आसक्ति परमात्मा से फासला पैदा कर देती है |रामकृष्ण परमहंस ने परमात्मा से इतनी निकटता पैदा कर ली थी कि जीवित रहने के लिए स्वाद को बीच ले आये ताकि शरीर का कार्य -व्यापार चलता रहे |शायद इसीलिए उन्हें परमहंस   कहा जाता है क्यूंकि वे हंस की भाँति नीर में से क्षीर अर्थात प्रभु को ग्रहण कर चुके थे |मात्र ब्रह्मवेत्ता सन्तों में ही ऐसा कर पाने की क्षमता होती है |    


लगता है बाबा हरदेव सिंह जी ऐसे प्रबंधक चाहते थे ---

रामकुमार सेवक 

अध्यात्म की बात करने वाले अनेक रहे हैं |उन बातों को जीवन में अपनाने वाले भी अनेक रहे हैं लेकिन अध्यात्म का तत्व समझना हर किसी को उपलब्ध नहीं है |कल भगत कोटूमल जी के बारे में एक लेख पढ़ रहा था |लेख में एक घटनाक्रम था जो मुझे बहुत अपना लगा |

पचास व् साठ के दशक के दिनों में भगत कोटूमल जी दिल्ली के पटेल नगर में रहते थे |उन दिनों पहाड़गंज दिल्ली से निरंकारी मिशन का सूर्योदय भारत में हो रहा था |पहाड़गंज में निरंकारी सत्संग की सेवा महात्मा रामचंद जी को मिली हुई थी |उन दिनों की संत निरंकारी पत्रिका में जो उल्लेख है,वो उनका पद भंडारी(Storekeeper) दिखाता है | कहीं-कहीं यह पद लांगरी भी लिखा है |सन्त निरंकारी मंडल की ओर से  वे आये हुए सन्तों के लिए लंगर अर्थात भोजन का प्रबंध करते रहे होंगे | 

वे शुरूआती सात सितारों में युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी द्वारा नियक्त किये गए थे लेकिन सही अर्थों में वे एक समर्पित सेवादार थे |वे शत प्रतिशत भक्ति को समर्पित महात्मा थे |इतिहास बताता है कि वे ब्रह्मचारी थे |

  भगत कोटूमल जी जब दिल्ली में विभाजन के बाद बसे तो ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने के बाद पहाड़गंज में सेवा करने जाने लगे |  

वे हर रोज सुबह चार बजे साइकिल चलाकर पहाड़गंज में जाते थे |कभी -कभी लेट हो जाते थे |घड़ी भी पास नहीं थी |एक दिन भगत रामचंद जी से कहने लगे कि उठने -जागने में लेट हो जाता हैं |

भगत रामचंद जी ने कहा -निरंकार है न ,इसकी ड्यूटी लगाकर सोया करो यह सही समय पर जगा देगा |

इतिहास बताता है कि फार्मूला पूरी तरह कामयाब रहा |

मैंने जिस भी सज्जन से यह बात बताई , उसने कहा-किताबों में ऐसी बातें बहुत पढ़ने को मिलती हैं |महात्मा निरंकार पर विश्वास दृढ करने के लिए ऐसी प्रेरणा देते रहते है अर्थात किसी को इस बात पर यकीन न आया |

मुझे यह मनोवस्था देखकर बहुत दुःख हुआ क्यूंकि मेरा अपना अनुभव इसे यथार्थ सत्यापित करता है |

बात 1986  की है ,मैं प्रकाशन विभाग में सेवा हेतु नया-नया मुज़फ्फर नगर (उत्तर प्रदेश )से आया था |मुझे कमरा न.13  में सिक्योरिटी के महात्माओं के साथ ठहराया गया |उन्हीं दिनों मेरे एक दोस्त को दिल्ली आना था परीक्षा देने के लिए |दोस्त आया |अगले दिन उसकी परीक्षा थी |मेरे बगल में एक सिक्योरिटी के महात्मा रहते थे |रात को मैंने उनसे कहा-महात्मा जी,आप तो रोज सुबह बहुत जल्दी उठते हैं |कल हम दोनों को भी उसी समय जगा देंगे तो कृपा होगी |

महात्मा बोले-सेवक जी,उठता तो रोज हूँ लेकिन कल सुबह उठ पाऊंगा या नहीं ,कह नहीं सकता |सच्ची बात यह है कि मैं रोज अपने तकिये को कहकर सोता हूँ कि सुबह उठा देना और यह उठा देता है ,आप भी अपने तकिये से कह दो |

मैंने सोचा बेशक माध्यम तकिया रहा होगा लेकिन काम तो निरंकार ही करेगा इसलिए मैं इस से अरदास करके सो गया | कमाल यह हुआ कि सुबह साढ़े पांच बजे हम दोनों ही उठ गए |यह निरंकार के समयपालन का पहला अनुभव था उसके बाद तो यह मेरा नियम ही बन गया |कहीं सुबह की संगत में जाना हो,सुबह जल्दी गाड़ी पकड़नी हो ,या सुबह जल्दी का अन्य कोई भी काम हो इस मालिक ने हमेशा काम किया इसलिए जब पहली बार मैंने भगत कोटूमल जी और महात्मा रामचंद्र जी का यह प्रसंग पढ़ा तो एकदम यकीन आ गया क्यूंकि ज्ञान जब अभ्यास में आ जाता है तो यकीन मजबूत हो जाता है |

ऐसे ही निरंकार पर मजबूत यकीन रखने वाले सेवादार और प्रबंधक चाहते थे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी |यदि दोनों तरफ भक्ति की इतनी ही मजबूती रही होती तो मिशन सूर्य के समान जगमगा रहा होता |मालिक कृपा करे कि इस निरंकार पर ऐसा यकीन हमेशा बना रहे |           

      


निवेदन 

15  सितम्बर को संत निरंकारी मंडल के प्रचार विभाग से 16 /09 /2018  को होने वाली रविवारीय साप्ताहिक सत्संग कविता पढ़ने का आदेश हुआ |ऐसे आदेश मुझे अवसर प्रदान करते हैं,अपने भाव प्रकट करने का |आने वाले महात्माओं को किस कविता की ज़रुरत है,निरंकार बेहतर जानता है |ऐसे वक़्त में निरंकार से अरदास करनी होती है ,यह सब कुछ करने में सक्षम है,कृपा कर देता है |

धर्म सिंह जी शौक़ का यह शेअर ऐसे अवसर पर याद आता है-

ग़ैब से सकते हैं ख्याल तो आने दे शौक़ ,

तेरा क्या जाता है,इन्हें  लिख देने के सिवा |

मालिक ने जो भेजा,मैंने वही लिखा और कल एक बजे के आस-पास मालिक की नज़र कर दिया |सन्त-महात्माओं से आशीर्वाद प्राप्त करने के भाव से कविता प्रस्तुत है-धन निरंकार जी 

 

कविता 

जागना होगा 

रामकुमार सेवक 

 

समय के साथ सब कुछ बदलता है 

लेकिन 

समय कभी नहीं बदलता 

बरसों से -वही सुबह ,वही शाम 

वही दिन,वही रात 

नए-नए मुखोटों के साथ -हर दिन की शुरूआत 

साल बदलते हैं,तारीखें बदलती हैं 

घटनाएं बदलती हैं परन्तु-नहीं बदलता है-समय

जब तक नहीं होता-जीवन में -ब्रह्मज्ञान का उदय 

खुद को बदलने का पक्का इरादा- दृढ़निश्चय

किसी पीड़ित को देखकर -

मज़ाक के स्थान पर 

उपजे मन में करुणा 

पिघले ज़ज़्बात 

किसी मज़लूम को दें सहारा 

आंसू पोंछने के लिए -बढ़ें हाथ 

जब महसूस हो -दूसरे की मज़बूरी  ,समझनी जरूरी 

समझ में आएं बिगड़े हुए हालात 

और-किसी अन्य के लिए -बड़ा हो जाए दिल ,निकले अरदास  

जुड़ें प्रार्थना के लिए हाथ 

तब समझिये -आया है जीवन में सार 

लगने लगे हैं-जीवन में 

निरंकार के आगमन के आसार 

क्यूंकि धर्म-दरअसल  

मोटे-मोटे ग्रंथों का नाम नहीं -

उनमें दर्ज़ -मिलवर्तन का पैग़ाम है,

सच्चाई का,प्रेम व् भलाई का नाम है |

इस दया के भाव को,जिसने रोम-रोम से पिया है,

सतगुरु ने इसे सेवा का नाम दिया है |

सेवा है-भक्ति की अभिव्यक्ति 

आसक्ति में विरक्ति -और -सहनशक्ति 

लेकिन सेवा -पाती है प्रशंसा और जय-जयकार 

इसके कारण-कभी -कभी -

बढ़ने लगता है-अहंकार 

तब बढ़ जाता है-पहने हुए कपड़ों का भी भार 

इसलिए

उपजनी चाहिए -कठोरता के स्थान पर करुणा 

वैर के स्थान पर प्रेम 

जुल्म के स्थान पर शांति 

तब होगी-मेरे जीवन में -भी -क्रांति 

अहंकार के मीठे ज़हर को त्यागना होगा 

सो लिये बहुत

अब जागना होगा -अब जागना होगा |

 

 


इस दर्द का अंत कहाँ है ?

रामकुमार सेवक 

मुझे अंकुश फिल्म का वह दृश्य याद आता है जिसमें नायिका आत्मविश्वास से भरी हुई है और अपने नियोक्ताओं को समझाना चाहती है कि वे कुछ मानवीय हो जाएँ |उसके रंग -ढंग देखकर नियोक्ता पहले ही  उसको सबक सिखाने का फैसला ले चुके होते हैं |जहाँ तक मुझे स्मरण है उस समय वे एक संवाद बोलते हैं कि औरत को सबक सिखाना बहुत आसान है और वे मिलकर उसके साथ दरिंदगी करते हैं |इसके बावजूद नायिका अपने उसूलों पर अडिग रहती है |उसके बाद नाना पाटेकर और उनके साथी इस दरिंदगी का अपने तरीके से बदला लेना चाहते हैं लेकिन नायिका इस तरीके के पक्ष में नहीं है |तब से मेरे दिमाग में सवाल है कि पीड़ित को न्याय कौन देगा ? न कानून न्याय  दे पायेगा और न ही कानून को हाथ में लेने वाले ,फिर उपाय क्या है ? 

कुछ दिनों से यह समस्या गहराई तक जाकर मुझे परेशान कर रही है |अंकुश फिल्म को आये 32  साल का लम्बा समय गुजर चुका है और हालत ऐसे हैं कि न बूढ़ी सुरक्षित है और न बच्ची | समस्या इतनी बढ़ चुकी है कि किसी भी बच्ची को देखकर मुझे यह डर सताने लगता है कि कहीं इसके साथ दरिंदगी न हो जाए |

असल में कुछ दिन पहले एक नौजवान ने मेरे व्हाट्स एप्प पर एक युवा दम्पति का विडिओ भेजा था जिनकी साढ़े तीन साल की बच्ची के साथ एक प्रतिष्ठित स्कूल में दरिंदगी हो गयी थी और स्कूल प्रबंधन अपराधी को बचाने में लगा था |इतना तो वीडियो के साथ लिखा हुआ था और वह नौजवान चाहता था कि बच्ची के माता-पिता को न्याय मिले |

कल दैनिक भास्कर में एक और ऐसी खबर पढ़ने को मिली जिसने मेरा ध्यान अपनी ओर खींचा -खबर यह थी कि हरियाणा के एक गांव में उस लड़की के साथ सामूहिक दुष्कर्म हुआ जिसने उस इलाके में टॉप किया था |अपराधी गांव के ही कुछ लड़के थे |

इन दिनों ऐसी ख़बरें इतनी बढ़ चुकी है कि डर के कारण अक्सर अख़बार पढ़ने की भी इच्छा नहीं होती |लेकिन जैसे कबूतर का आँख बंद कर लेना बिल्ली से बचने का उपाय नहीं है इसी प्रकार इन ख़बरों से बचना इस बुराई को रोकने का सही उपाय नहीं है |

ऐसी ख़बरें पढ़कर अक्सर पाठकों के भी दो वर्ग हो जाते हैं |एक वर्ग पीड़िता के साथ होता है और दूसरा अपराधियों के साथ |

पीड़िता को तो सहानुभूति मिलनी ही चाहिए यह तो तय है लेकिन अपराधियों को भी सहानुभूति मिलती है |

ऐसे लोग प्रायः पीड़िता पर ही संदेह के बाण चलाते हैं और कहते हैं कि मामला प्रेम का रहा होगा जिसे बात बिगड़ने पर बदल दिया गया होगा |कुछ लोग यह भी कहते हैं कि मामला गांव की पार्टीबाजी का होगा और अपनी नज़र से,दरिंदों का आराम से बरी कर देते हैं |

वास्तविकता के धरातल पर उतरते हैं तो ऐसे मामलों में और भी कई कारक नज़र आने लगते हैं लेकिन एक संवेदनशील नागरिक होने के नाते मैं विभिन्न कारकों में नहीं उलझता इसलिए किसी से टकराता भी नहीं हूँ लेकिन ऐसी ख़बरें जानकर मुझे एक विचित्र सी  दहशत महसूस होती है जबकि ऐसी किसी लड़की को मैं जानता भी नहीं लेकिन मेरी संवेदना कहती है कि साढ़े तीन साल की उस बच्ची ने या उस टॉपर छात्रा ने किसी का क्या बिगाड़ा था ?

उस बच्ची के युवा माता-पिता ने किसी का क्या बिगाड़ा था ? जिस दिन उसके साथ दरिंदगी हुई उससे पहले उसके माता-पिता ने कितने ही सपने देखे होंगे ,तभी तो अपनी बच्ची का प्रवेश एक प्रतिष्ठित स्कूल में करवाया होगा |उस विशेष दिन जिस दिन उन्होंने दंश झेला ,उससे पहले के उनके जीवन की कल्पना करें जब वे सोचते होंगे कि कितने प्रतिष्ठित स्कूल में वे अपनी बच्ची को प्रवेश दिलाने में सफल हुए |पड़ोसियों-रिश्तेदारों में उनकी इज्जत कितनी बढ़ गयी होगी |

अब इस घटना के अगले दिन की सोचिये-लोगों ने उन्हें अजीबोगरीब नज़रों से देखना शुरू कर दिया होगा |लोग उन्हें कलंकित माँ-बाप के रूप में देख रहे होंगे तो कुछ शातिर लोग राजनीतिक रोटियां सेकने में लगे होंगे |

साढ़े तीन साल की बच्ची को तो  पता भी नहीं होगा कि उसके साथ जो हो गया है,उसके नकारात्मक नतीजे जीवन भर उसका पीछा करेंगे |

कोई ऐसा कानून नहीं है कि वो बच्ची उस स्कूल में फिर न जाए लेकिन उसके माता-पिता पहले जैसी सहजता के साथ क्या उसे स्कूल भेज पाएंगे ?

वह बच्ची बड़ी होकर जब सुनेगी कि उसके साथ क्या हुआ तब उसे पता चलेगा कि उस दर्द की शाखाएं कहाँ तक फैली हुई हैं |

हरियाणा की उस ग्रामीण टॉपर की समस्या और भी ज्यादा है |उसके साथ दरिंदगी करने वाले तो उसी के गांव के थे | इसका अर्थ है कि यह भी हो सकता है कि उसे टॉपर होने की सजा दीं गयी हो |अहम का संघर्ष ऐसा ही होता है वह कोई भी पाप करने में संकोच नहीं करता |

उस टॉपर के भविष्य पर तो जैसे  तारकोल पुत गया है |वह क्या उसी तरह आगे पढ़ पाएगी जैसे कि पहले पढ़ती थी ?फिलहाल तो उसे न्याय प्राप्ति की कतार में लगना होगा |अपने आपको पीड़िता सिद्ध करना होगा |शातिर वकीलों के शातिर सवालों के जवाबों पर दिमाग लगाना होगा |कैरियर तो डूब गया बंगाल की खाड़ी में,उसके तो विवाह में भी भयकर समस्याएं आएँगी |  

अच्छे दिनों की सरकार के शासनकाल में यह कया है ?

बेटी बचाओ,बेटी पढ़ाओ के इस युग में किसी की बेटी को यह सब भी झेलना पड़ेगा ,कल्पना से परे है | कोई न्यायालय इस नुक्सान की भरपाई नहीं कर सकता |मुझे लगता है कि खुद दरिंदों को भी यह एहसास नहीं होता कि वे कितना बड़ा पाप कर रहे हैं |उनकी सोच इतनी गहरी होती ही नहीं कि उनके इस क्षणिक प्रतिशोध अथवा वासना का असर पीड़िता के जीवन को कितना भयावह और असामान्य कर देगा |

मुझे नहीं लगता कि कोई पीड़िता कभी इस सदमे से उबर पाती होगी क्यूंकि हमारे समाज को इतना प्रगतिशील होने में बहुत समय लगेगा |मैं यह कहना चाहता हूँ कि लोग गहराई से उस दर्द का एहसास करें जो पीड़िता और उसके माता-पिता आदि को झेलना पड़ता है |

निर्भया नाम से मशहूर उस पीड़िता के माता -पिता के चेहरे कई बार अखबारों में छप चुके हैं |उन चेहरों पर लिखे दर्द को जो पढ़ सके वो भाषा सीखनी होगी तब संभव है निर्भया जैसी इन सब पीड़िताओं के साथ न्याय की संभावना बने |

                  


ज्ञान की संभाल का सही तरीका 

रामकुमार सेवक     

एक गुरु ने अपने शिष्य से कहा कि-ये दाने रख लो,एक वर्ष बाद वापस ले लूँगा |

दाने दो शिष्यों में उन्होंने बराबर-बराबर दाने बाँट दिए |

समझ लीजिये ,गुरु ने सबको एक जैसा ज्ञान बांटा |पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी कहा करते थे कि ज्ञान तो मैंने तुमको दे दिया लेकिन पांच प्रणो   का पालन नहीं करोगे या गुरमुख की गरिमा का पालन नहीं करोगे तो मेरा दिया हुआ ज्ञान मेरे पास वापस लौट आएगा |

मुझे यह बात वैसी ही लगती थी जैसे बड़े-बूढ़े बच्चों को बुरी आदतों से बचाने के लिए भूत का डर  दिखाते हैं लेकिन निरंकार को अक्सर ही हम भूल जाते हैं,उस अवस्था में शायद गुरु का दिया हुआ ज्ञान गुरु के पास वापस लौट जाता हो | फिर हम घबरा जाते हैं और कहते हैं-तू ही निरंकार,मैं तेरी शरण हूँ ,मुझे बख्श लो तो धीरे -धीरे राहत मिलनी शुरू हो जाती है |शुक्र है कि मालिक दया करके दोबारा-तिबारा और जब भी हम उलझ जाते हैं तो ज्ञान को फिर प्रकट कर देते हैं |

हाँ तो गुरु जी ने दोनों शिष्यों को बराबर दाने दिए |शिष्य ने बहुत ईमानदारी से उन्हें ग्रहण किया और एक खूबसूरत डिब्बी में बंद करके एहतियात से रख दिया | 

दूसरे शिष्य ने दूरदृष्टि से सोचा और खेत के एक हिस्से में वह बीज बो दिया |

एक वर्ष बाद गुरु जी लौटे तो पहले शिष्य ने वह पुरानी डिबिया निकाली | डिबिया को खोलकर देखा तो कोई भी दाना साबुत नहीं था लेकिन उसने गुरु जी की अमानत की पूरी निष्ठा से देखभाल की और मांगने पर उन्हें लौटा दिया |

दूसरे शिष्य के पास उनमें से कोई भी दाना नहीं था |वह गुरु जी को अपने साथ खेत के उस हिस्से में ले गया जहाँ गेहूं की बालियाँ लहरा रही थीं |वह इशारा करके बोला-  गुरु जी,वे रहे आपके दाने -पकते ही मैं इन्हें आपकी सेवा में ले आऊंगा |

पहला शिष्य हैरानी से गुरूजी की ओर देख रहा था कि-देखें,गुरु जी उसे क्या कहते हैं |गुरु जी ने उसे शाबाशी दी और कि तुमने दानो की सही संभल की है |

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी फरमाते थे कि गुरु के ज्ञान की संभाल का सही तरीका है ज्ञान का जीवन में इस्तेमाल करना |इस्तेमाल करने से मन में ज्ञान अंकित हो जाता है और अनुभव की खेती लहलहाती है |ऐसा शिष्य खुद भी मजबूत रहता है और औरों को भी मजबूत करता है |    

 


आपकी गाड़ी तो ख़राब नहीं होनी चाहिए ?

रामकुमार सेवक 

भगत कोटूमल जी का स्वास्थ्य कुछ ठीक नहीं था |संत-महात्मा यद्यपि निरंकार को ही सब कुछ का कर्ता मानते हैं ,इस बात की सत्यता महसूस करते हैं-

तू ही ,तू ही निरंकार करो ते हर पल इस नू याद करो 

इस अमृत नू रज-रज पियो तन-सोखा दिल शाद करो 

इसके बावजूद शरीर में तकलीफ आने पर डॉक्टर की सेवाएं निःसंकोच लेते हैं |भगत जी डॉक्टर के पास गए तो डॉक्टर ने व्यंग्य किया कि आपको तो परमात्मा का ज्ञान है,फिर भी मेरे पास आये हैं ?

भगत जी ने अपने स्वभाव के कारण डॉक्टर से बहस नहीं की लेकिन सही समय पर डॉक्टर को अपने तरीके से जवाब दिया | 

चलने से पहले वे बोले-डॉक्टर साहब,अपने घर से क्लिनिक तक आप कैसे आते हैं ?

डॉक्टर ने कहा-कार से 

भगत जी ने कहा-कार कभी रास्ते में ख़राब हुई है क्या ?

हाँ जी,कई बार हुई है,डॉक्टर ने कहा |

आप तो इतने बड़े डॉक्टर हैं,फिर तो आपकी गाड़ी ख़राब नहीं होनी चाहिए ?

आप अजीब बात करते हैं,गाड़ी के खराब होने से डॉक्टर होने का क्या सम्बन्ध है ?डॉक्टर सहित किसी की भी गाड़ी ख़राब हो सकती है |

मैं भी आपसे यही कहना चाहता हूँ कि जिस तरह गाड़ी का डॉक्टर की डिग्री से सम्बन्ध नहीं है इसी प्रकार शरीर के रोगी या स्वस्थ होने से  ब्रह्मज्ञान होने या न होने का कोई सम्बन्ध नहीं है |शरीर में मौसम के अनुसार परिवर्तन होने स्वाभाविक हैं |शरीर में होने के कारण किसी से भी थोड़ी -बहुत चूक हो सकती है |

 गाड़ी की मरम्मत करवाने के लिए उसे वर्कशॉप में ले जाना पड़ता है ,मैं भी शरीर को आपकी वर्कशॉप में ले आया हूँ ,उम्मीद है यह भी बिलकुल स्वस्थ हो जाएगा |

बात डॉक्टर की समझ में आ गयी और बहस भी नहीं करनी पडी |सम्बन्ध भी ठीक रहे |भगत जी की यह विशेषता थी कि वे विनम्रता में रहकर अपनी सेवा निभाते थे ,टकराव में पड़ते ही नहीं थे क्यूंकि निरंकार को ह्रदय में बसाया हुआ था |

पिछले दिनों एक किताब में यह प्रसंग पढ़ा तो जैसे दिल में बस गया ,ध्यान में आया कि- यह था भगत जी का जवाब देने का तरीका |

निरंकार की संगति में जो रहते हैं वे कठिन सवालों के जवाब भी आसानी से दे देते हैं |    

            


कहाँ गया वह जुनून? 

रामकुमार सेवक 

लगभग बीस साल पहले मुझे सराय काले खां गांव (दिल्ली) में सत्संग में जाने का अवसर मिला था |वहां जब स्थानीय महापुरुषों से बात चल रही थी तो उन्होंने बताया कि इस गांव में मिशन की शुरूआत एक माता ने की थी |माता को भक्ति का जैसे जुनून था |आज जबकि औपचारिक शिक्षा को इंसान की पहली योग्यता  माना जाता है ,उस दृष्टि से देखें तो माता अतरी बिलकुल अनपढ़ थीं लेकिन प्रभु का रंग उन पर खूब चढ़ा हुआ था |इस हिसाब से वे कबीरदास जी की श्रेणी में थीं |

दृष्टि को थोड़ा फैलाता हूँ तो नज़र आता है कि मेरी माता विद्या जी भी इसी श्रेणी में थीं |किसी से निरंकारी मिशन की चर्चा करने में उन्हें जरा भी संकोच न होता था |रेलगाड़ी में भक्ति गीत गाने में उन्हें ज़रा भी झिझक न होती थी |इन माताओं की एक टीम हुआ करती थी जो पढ़ी-लिखी तो न थीं लेकिन मन भक्ति में पूरे रंगे हुए थे |

स्थानीय महापुरुषों ने बताया था कि माता अतरी जी ,सामने से जा रहे किसी भी इंसान को रोककर बुला लेती थीं |उसे गीतों की किताब देकर कहती थीं कि मेरे बाबा जी का गीत तो सुना |बुजुर्गी के लिहाज़ के कारण लोग माता जी को एक बार तो गीत सुना देते थे लेकिन बाद में कोशिश करते थे कि माता जी की नज़र में न पड़ें लेकिन माता जी उस दिन किसी और को पकड़ लेती थीं |

इस घटनाक्रम पर उन दिनों मैंने एक सम्पादकीय लिखा था-जुनून |  

निरंकारी मिशन की जड़ें मजबूत करने में ऐसी माताओं का,बुजुर्गों का बहुत योगदान रहा है जो पढ़ी-लिखी तो नहीं थीं लेकिन सही अर्थों में सत्यनिष्ठ थीं इस प्रकार सही अर्थों में शिक्षित थीं |

बाबा हरदेव सिंह जी ने अनेक बार इस बात को कहा कि-यह मिशन टी.वी.आदि के कारण नहीं उभरा बल्कि इसके पीछे त्याग-तपस्या और बलिदान रहे हैं |सन्तों-महात्माओं ने दिन-रात और दूरी -भाषा आदि की परवाह किये बिना मिशन को फैलाया |

जब तक सत्यनिष्ठा भक्ति का आधार रही मिशन का उजला पक्ष हावी रहा |किसी की ज़ुर्रत न थी कि कोई इस पर उंगली उठाता ,सत्यनिष्ठा जैसे ही कमजोर हुई संकट दिखने शुरू हो गए |

ऐसा लगता है कि हमने सत्यनिष्ठा की बजाय चमक-दमक और ऊंचे पदों को महत्ता देनी शुरू कर दी जिसके कारण वह मिशन, जिसने इस जगत की कायाकल्प का बीड़ा उठाया था किसी और ही तरफ चल पड़ा |नब्बे के दशक में ही ये खतरे नज़र आने शुरू हो गए थे ,पत्रिका विभाग में खुलकर चर्चा होती थी मगर हम पूर्णतः सुरक्षित थे क्यूंकि समर्थ सतगुरु की छत्रछाया हमारे ऊपर थी |

कल किसी व्यावसायिक वक्ता को सुन रहा था | ऐसे लोगों की आजकल बहुत महत्ता है,उन्हें सुनने के लिए लोग ख़ुशी-ख़ुशी खर्चा करते हैं |गीता पर उनका भाषण बहुत ही रोचक था जिसे सुनते समय मुझे निर्मल जोशी जी भी याद आये और बाबा हरदेव सिंह जी भी |

उनके दो घंटे के रोचक भाषण के बाद मुझे बहुत कुछ सीखने को मिला लेकिन मन में आया कि जिसे ये लोग इतने ताम-झाम के साथ सिखाते हैं उससे भी ज्यादा चीजें बाबा जी मुफ्त में सिखाते थे लेकिन न उनकी बातों की कदर हुई और न आंसुओं की |

इन बातों को मैं बार-बार दोहराना नहीं चाहता लेकिन वो जुनून चाहिए जो उन माताओं में था |बुजुर्गों-जवानो और बच्चों में था |यदि कहीं वह बचा हुआ है तो ऐसे इंसान को कपडे-गांव-और भाषा की परवाह किये बगैर आगे बढ़कर संभालना चाहिए | 


भक्ति में अभिनय चलता  है  ? 

रामकुमार सेवक

अभिनय के स्तर पर दुनिया में बहुत काम होते हैं |धीरे -धीरे होता यह है कि हम भक्ति में भी अभिनय करने लगते हैं जबकि भक्ति में अभिनय की गुंजाइश नहीं है क्यूंकि निरंकार से सम्बन्ध भीतरी पवित्रता चाहता है |क्या यह संभव है कि अभिनय करते हुए भी भक्त सिद्ध हो सकें ?

बचपन में मुझे रामलीला देखने का बहुत शौक रहा है |एक दृश्य याद आ रहा है -रावण के दरबार में अंगद द्वारा पैर जमाने का प्रसंग था |वह रावण के दरबार में चुनौती दे रहा था कि यदि तुम लोगों में इतनी ही ताक़त है तो यहाँ से मेरा पैर हटाओ ,यदि तुममें से कोई भी आदमी मेरा पैर हटाने में सफल हो गया तो फिर राम जी के नेतृत्व में होने वाले  युद्ध में  हम  तुम्हें विजयी मान लेंगे |

हर साल ही यह प्रसंग देखते थे तो यह पक्का था कि अंगद का पैर कोई हिला भी नहीं पायेगा लेकिन उस दिन पैर उठाने वालों में अंगद का बेटा भी रावण के महारथियों में शामिल था |

उस बच्चे ने सचमुच जोर लगा दिया और अंगद को पैर उठाकर दोबारा रखना पड़ा |हम लोग हंस पड़े |रामलीला के प्रबंधकों ने उस बच्चे को हटाया और रामलीला की शाश्वत परंपरा का बचाव हुआ अन्यथा उस बच्चे ने तो अपने बाप की चुनौती को गंभीरता से ले लिया था क्यूंकि वह बच्चा था और अभिनय करना वह नहीं जानता था |

 सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहा करते थे कि ऊपर से तो कहेंगे कि आपने बहुत कृपा की,ऐसा लगता है जैसे चींटी के घर नारायण आ गए हों लेकिन भीतर से कहेंगे कि नारायण के घर यह चींटी कहाँ से आ गयी ?

इस प्रकार ऊपर से अभिनय किया जा रहा है ,अध्यात्म अथवा भक्ति में अभिनय के स्तर पर जीना खतरनाक है |

जिस प्रकार अभिनय की दुनिया में यथार्थ के धरातल पर जीना अयोग्यता समझी जाती है इसी प्रकार भक्ति में अभिनय अथवा दिखावा करना खतरनाक अथवा अयोग्यता मानी जाती है |

हमें भूख लगती है तो हमें सचमुच खाना खाना पड़ता है |प्यास लगती है तो पानी पीना पड़ता है ,सिर्फ एक्टिंग से काम नहीं चलता |भोजन करने और पानी पीने में अक्सर हर आदमी ईमानदार होता है लेकिन सत्संग में अक्सर हम देखते हैं कि किसी की भी अति मधुरता हमें धोखे में डालने में काफी होती है |

 अभिनय की इसी शाश्वत परंपरा के कारण देखा जाता है कि संगतों में  जो प्रचारक काफी लोकप्रिय होते है,अपने परिवार में प्रायः अलोकप्रिय पाए जाते हैं ,यह अभिनय का दुष्प्रभाव है क्यूंकि घर  में दिखावेबाजी से काम नहीं चलता |परिजन अक्सर हमारी असलियत से परिचित होते हैं तो वे कह भी देते हैं -घुमाओ मत ,सीधी बात करो | 

 आज जो महात्मा मंच से आशीर्वाद दे रहे थे उनके विचारों से मुझे बहुत कुछ सीखने को मिलता रहा है |उनमें से कुछेक मैंने लिखे भी हैं,कभी अपने नाम से और कभी किन्हीं अन्य नामो से  |

आज कुछ भी उल्लेखनीय सुनने को नहीं मिला तो मुझे निराशा सी हुई और अंगद के पैर वाला प्रसंग ध्यान में आ गया क्यूंकि जब कोई नाटक खेलना हो तो वहां अभिनेता चाहिए ,वहां झूठ को सच सिद्ध कर देना ही योग्यता है |

यह दौर अभिनय का है इसलिए सच्चे इंसान को भी अभिनय करना पड़ता है |जो कच्चे अभिनेता होते हैं वे प्रायः नाटकों से बाहर कर दिए जाते हैं |एक भक्त के लिए बाहर हो जाना वरदान साबित होता है लेकिन नाटक के मोह में फंसकर झूठ का साथ देते रहना भक्त के लिए भी जानलेवा साबित होता है |याद रखने की बात यह है कि सतगुरु सत्य का प्रतिनिधि है अतः झूठ को स्वीकार नहीं करता और   अभिनय झूठ का दूसरा नाम है |     


सम्पादकीय

हिंदी भाषा को चलन से बाहर करने की कोशिश

रामकुमार सेवक 

पिछले दिनों एक शब्द पढ़ने में आया-मॉब लिंचिंग | शब्द किसी अंग्रेजी के अखबार में नहीं बल्कि हिंदी के अखबार में छपा था |मैंने बेटे से पूछना चाहा लेकिन झिझक हुई कि वह क्या सोचेगा ?

मैं रुक गया ,पहली बार हिंदी के अखबार में छपी को खबर को पढ़ने के लिए बाहरी सहायता की ज़रुरत पडी थी |

मैं सोच रहा था कि क्या अखबार के पत्रकार इतने लापरवाह हो गए हैं कि पाठकों के लिए इस शब्द का हिंदी में अनुवाद नहीं कर सकते थे या वे समझते हैं कि हिंदी में इस शब्द का समानार्थी शब्द नहीं है या हिंदी के सब पाठक अंग्रेजी भी अच्छी तरह जानते हैं ?

नए शब्दों को स्मृति में लेने की पुरानी आदत रही है तो उस शब्द के अर्थ तक पहुंचा |

शब्द जरूर मेरे लिए नया था लेकिन अर्थ नया नहीं था |भीड़  द्वारा हिंसा कोई नयी बात नहीं है फिर उसके लिए अंग्रेजी शब्द हिंदी के अखबार में ,बात कुछ हज़म नहीं हुई |       

भाषा अलग चीज है और लिपि अलग |अब हम यह भिन्नता हम  पहचान चुके हैं लेकिन हमारी राष्ट्रभाषा को ख़त्म करने का सुनियोजित षड़यंत्र चल रहा है,ऐसा लगता है क्यूंकि कुछ वर्ष पहले जो अख़बार हिंदी लिपि के साथ हिंदी शब्दों का ही इस्तेमाल करते थे अब धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं |

वर्षों पहले ही हमारे भाषा वैज्ञानिकों ने इस समस्या को भांप लिया था कि धीरे -धीरे हमारी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को नष्ट करने के प्रयास किये जा रहे हैं |प्रश्न यह है कि जब हिंदी भाषा में उपयुक्त शब्द उपलब्ध है तो सही शब्द से बचने का क्या कारण   है?

एक कारण तो यह हो सकता है पत्रकार को अंग्रेजी के शब्द का तो ज्ञान हो लेकिन समानार्थी हिंदी शब्द का ज्ञान न हो |

यदि ऐसा हो तो शब्दकोष की सहायता ली जा सकती है लेकिन जो शब्द प्रचलित नहीं हो और अख़बार की भाषा का भी न हो तो उसका उपयोग नहीं करना चाहिए |लेकिन इस गलती को लगातार और सोच-समझकर किया जा रहा है|धीरे- धीरे ऐसा लगने लगा कि या तो हिंदी भाषा में शब्दों का अभाव है या हम हिंदुस्तानी अपनी भाषा के प्रति कुंठित हो गए हैं कि हमारी भाषा अंग्रेजी भाषा से कमतर है इसलिए हमारे रिपोर्टर्स हमारी राष्ट्रभाषा से  अनभिज्ञ हो गए हैं |

लगभग बीस वर्ष पहले अखबारों में हिंदी लिपि के साथ हिंदी भाषा का ही  उपयोग  होता  था  |उन दिनों जमानत के लिए जमानत ही लिखा जाता था न कि बेल |इसी प्रकार कोई अगर गिरफ्तार होता था तो उसके लिए अरेस्ट शब्द का उपयोग नहीं किया जाता था |

उस समय जब अखबार पढ़ते थे तो पाठकों की भाषा समृद्ध होती थी लेकिन अंग्रेजी भाषा

के बढ़ते वर्चस्व ने अखबारों की शब्दावली बिगाड़ दी है |

एक मित्र से जब यह बात कही तो वे बोले -अंग्रेजी शब्दावली तो बढ़ रही है |

सुनने में यह बात बहुत सकारात्मक लगती है कि भाषाई नुक्सान का सकारात्मक प्रभाव भी है लेकिन यथार्थ इतना मधुर नहीं है |

यथार्थ के धरातल पर उतरकर देखें |

देश में निकलने वाले अखबारों में हिंदी की पाठक संख्या सर्वाधिक है |हो भी क्यों न आखिर हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या भी तो सर्वाधिक है |

यथार्थ यह है कि जो पहले जमानत बोलता  था,अब भी ज़मानत ही बोलता है लेकिन अख़बार में पढता है-लालू यादव को बेल |अब वह उलझ जाता है कि यह तोरई की बेल है या सेम की बेल है ?इस प्रकार पाठक उलझन में पद जाता है |   

इस उलझन को बढ़ाने में जिन पत्रकारों का योगदान है उन्हें पाठकों को उलझन से बचाना चाहिए और अपने कर्तव्य को सही प्रकार निभाना चाहिए अन्यथा हिंन्दी भाषा को चलन से बाहर करने में उनका भी दोष होगा इसलिए इस आदत से जितनी जल्दी बचा जाए उतना ही बेहतर है |    


अध्यात्म -आसान भी , कठिन भी कैसे ?
रामकुमार सेवक
रामकृष्ण परमहंस कहा करते थे कि-आप संसार में किसी के 99  काम कर दें और एक न कर पाएं तो वह इंसान किये गए निन्यानवें काम भूल जाता है और केवल वह एक काम याद रखता है जिसे आप नहीं कर पाए |परमात्मा के मामले में यह स्थिति उलटी है |आपने परमात्मा की 99  बार   उपेक्षा की लेकिन एक  बार याद किया तो परमात्मा 99  उपेक्षाओं को नज़रअंदाज़ कर देता है और इस एक बार को याद रखता है ,यह सकारात्मक ऊर्जा  है-अध्यात्म |
अध्यात्म गहरा विषय है ,यह ज़ुबानी कहा-सुनी या विचार- विनिमय (thought  Exchange  )का  नाम नहीं है |विचार- विनिमय इसमें मददगार तो होता है लेकिन विचार प्रकट करने की कुशलता किसी को आध्यात्मिक ऊंचाई उपलब्ध होना सिद्ध नहीं करती |विचार- विनिमय आध्यात्मिक रूप से अनुभवी  होने की गारंटी नहीं है |
बाबा गुरबचन सिंह जी ने कभी कहा था कि-विश्व शांति का एकमात्र साधन आध्यात्मिकता ही है |यह सत्तर के दशक की बात है |तब यह बात समझने लायक  उम्र नहीं थी कि आध्यात्मिकता को समझ पाता |स्वामी विवेकानंद को पढ़ा और रामकृष्ण परमहंस के विचारों से पूर्ण आध्यात्मिकता का परिचय मिला |
वे कहा करते थे कि-कोई यदि पूछे कि-घी कैसा होता है तो उसका एकमात्र जवाब यह है कि-खुद घी खा लो |कोई चाहे जितने शब्द बोले घी कैसा है,पता नहीं चलेगा |घी कैसा है,जानने के लिए है कि-घी को खाया जाए |जहाँ नीयत में खोट नहीं है वहां अध्यात्म का अर्थ जानना इतना ही सरल है लेकिन आज तो अध्यात्म में राजनीति इतनी घुल-मिल गयी है सरल मामले भी उलझ चुके हैं |
बाबा हरदेव सिंह जी से जब परिचय हुआ तब मेरी उम्र 16वर्ष के आस-पास थी |उनके प्रवचनो को सुनने -पढ़ने की मुझे लत थी |
साल-दर साल उनमें अनुभवों की गहराई मिलती गयी |लोग उन्हें अलग-अलग रूपों में देखते थे लेकिन मेरी दृष्टि में वे निराकार के साकार रूप , महान सतगुरु और चमत्कारिक व्यक्तित्व के स्वामी होने से भी पहले मेरे प्रोफेसर थे ,जो मेरी ज्ञान की भूख को शांत करते थे |मुझे अध्यात्म के नए-नए अनुभव प्रदान करते थे,जो मुझे दिशा देते थे कि तुझे इस तरफ जाना है और उस तरफ नहीं जाना है |वे बेफिक्री के दिन थे |
हमारे वरिष्ठ साथी ,जो 40 साल से पत्रिका विभाग में थे ,उन दिनों अपनी निजी अनेक समस्याओं में घिरे थे |बहुत निराश थे |न जाने क्यों -एक दिन उन्होंने नमस्कार की |
मुझे लगा कि-निरंकार चाहता है कि-मैं उन्हें कुछ प्रेरणा दूँ |
अचानक ही दिलो-दिमाग में वचन आये और मैं बोला -भाई साहब ,जो लोग ट्रेन में बैठे होते हैं उन्हें इस बात की बिलकुल भी चिंता नहीं होती कि-ड्राइवर ने कहाँ पटरी बदलनी है |ड्राइवर अपना काम करता रहता है |हमारा ड्राइवर (सतगुरु )एकदम कुशल है इसलिए हमें चिंता करने की ज़रुरत नहीं है |
थोड़े ही समय में निरंकार ने उनकी सब जिम्मेदारियों को पूरा किया |इससे उन्हें  भी हौसला मिला और मुझे भी लेकिन अब वे सुनहरे दिन दूर जा चुके हैं |   
बाबा जी कमी हटने का नाम नहीं लेती |
जिस भी सत्संग में जाता हूँ ,विचार सुनता हूँ ,95% मुझे Hidden Agena(छिपे हुए लक्ष्य ) नज़र  आता है और बाबा जी की  कमी भारी महसूस होने लगती है क्योंकि कहीं भी  वह ऊंचाई  नज़र नहीं आती |
ऐसे लोगों के प्रति क्रोध भी आता है ,जो जान-बूझकर ,अपने संकीर्ण हित साधने के लिए बेशर्मी से झूठ बोलते हैं |
यद्यपि अध्यात्म में क्रोध की गुंजाइश नहीं लेकिन क्रोध आता है उन लोगों पर जिन्होंने 24  अप्रैल से पहले रात की सैर के समय बाबा जी से कहा कि आपको 36 साल हो गए हैं |यह अवधि शेष निरंकारी गुरुओं की अपेक्षा सबसे ज्यादा थी |
बाबा जी ने 24  अप्रैल के विचारों में  इस घटना का उल्लेख किया और कहा कि -36  वर्षों में कुछ भी नहीं कर पाया |उस दिन बाबा जी के चेहरे से निराशा झलक रही थी |उन लोगों की बात सुनकर शायद बाबा जी को लगा कि लोग अब शायद उन्हें नहीं चाहते जबकि आज तो एक उनके बिना सब कुछ सूना है |ऐसा लगता है जैसे सिर के ऊपर से छत हट गयी हो |
क्रोध उन पर भी आता है जो बाबा जी की कृपा का अनुचित लाभ उठाते थे और उनसे मज़ाक करते थे जबकि सतगुरु से मज़ाक करना खतरे से खाली नहीं है |उन्होंने पत्थर के घोड़े को घास खिलाने के लिए कहा (जैसे पूज्य माता सविंदर हरदेव जी ने ग्राउंड न.8 में एक बार अपने विचारों में बताया )और बाबा जी ने उस मज़ाक को भी पूरी गंभीरता से माना क्योंकि सतगुरु सदा सतगुरु ही होता है ---- |
सबसे बड़ी समस्या ही यही है कि अध्यात्म की गहराई और ऊंचाई का हमें एहसास बहुत कम है और कहीं-कहीं तो बिलकुल ही नहीं है और हम दावा करते हैं अध्यात्म के आचार्य होने का |परिणाम यह है कि हमारे व्यवहार में प्रायः अपरिपक्वता नज़र आती है जबकि हमें ज्ञान और उपदेश सबसे ऊंचे दर्ज़े के मिले हैं |
यथार्थ यह है कि विवेक कभी झूठ नहीं बोलता लेकिन बर्बरीक जितना हौसला और ईमानदारी कहीं नज़र नहीं आती |अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं कि -यदि नीयत स्वच्छ है तो आध्यात्मिक होने से ज्यादा सरल कोई भी काम नहीं है और यदि नीयत में खोट है तो सबसे कठिन ---


श्रीकृष्ण जन्माष्टमी पर विशेष 

जो सदा सत्य के पक्ष में रहे -क्रान्तिदर्शी श्रीकृष्ण 

रामकुमार सेवक 

जोहर कानपुरी के इस शेअर ने आज विचारोत्तेजना से भर दिया है - 

जीतने का यह हुनर भी आजमाना चाहिए 

भाईयों से जंग हो तो ,हार जाना चाहिए 

कोई भी आम भारतीय इस भावना की प्रशंसा करेगा लेकिन मेरे सामने सीधा सवाल यह है कि क्या श्रीकृष्ण गलत थे क्यूंकि अर्जुन अपने परिजनों से हारना ही तो चाहता था | 

उसका कहना था कि अपने प्रियजनों को मारकर यदि सत्ता मिल भी गयी तो मैं उसका क्या करूंगा |वो तो युद्ध से पलायन कर जाना चाहता था |   

ज़रा सोचें कि अर्जुन अगर यही करता, जो उसके मन में था तो क्या अच्छा और न्यायोचित था ? 

कौरवों की पृष्ठभूमि देखें |पूरे पांडव परिवार को भस्म कर देने के लिए लाख का मकान बनवाना |अर्जुन से विवाह के पश्चात भी द्रोपदी के अपहरण का षड़यंत्र और अंततः भरी सभा में चीर-हरण | 

ज़रा सोचें जो इंद्रप्रस्थ की महारानी और अपनी भाभी द्रोपदी का सबके सामने चीर-हरण  कर सकते हैं तो वो सामान्य स्त्रियों के साथ क्या -क्या नहीं करते होंगे यह कल्पना सहज ही की जा सकती है |उन्होंने कभी भी युधिष्ठिर को न्याय का पात्र नहीं माना जबकि वे ज्येष्ठ भ्राता थे ,और जितना भी संभव था उनका उत्पीड़न किया ,फिर भी कौरवों का पक्ष सिर्फ इसलिए लेना  कि वे भाई थे,न्यायोचित नहीं है | 

मेरे साहित्यिक गुरु निर्मल जोशी जी अक्सर कहते थे कि श्रीकृष्ण ने महाभारत का युद्ध करवाकर समस्या पैदा कर दी अन्यथा अर्जुन तो शांति चाहता था |

कई बार मुझे अर्जुन की मनभावन यह शांति कायरता का नमूना लगती थी लेकिन जोशी जी मुझसे बहुत बड़े थे और अपनी बात के समर्थन में उनके पास तर्कों की भरमार होती थी |मेरे पास सिर्फ श्रीकृष्ण के प्रति जन्मजात श्रद्धा थी इसलिए मेरा चुप रहना लाजमी था |यद्यपि जोशी जी अपना मत प्रकट करने और स्वयं से असहमत होने की स्वतंत्रता देते थे लेकिन उनसे असहमत होने और उसे सिद्ध   करने का काम सरल नहीं था |

श्रीकृष्ण ने अर्जुन के द्वंद्व को समझा और अपने ऐसे तर्क दिए कि अर्जुन ने गांडीव उठाया और कौरवों को नाको चने चबवा दिए |श्रीकृष्ण ने अर्जुन की वीरता दिखाकर सिद्ध कर दिया कि वे महागुरु हैं |

निर्मल जोशी जी ने किसी मंदिर में रास और कृष्ण पर बोलते हुए स्पष्ट कहा था कि लोग श्रीकृष्ण के बारे में अजीब-अजीब बात करते हैं जिनमें से ज्यादातर सुनी-सुनाई होती हैं |मैं कहता हूँ तुम भी रास रचाओ लेकिन शर्त यह है कि-जीवन में एक गीता लिख दो | 

गीता का पूरा नाम है-श्रीमद्भगवद गीता |इसके कुल अठारह अध्याय हैं जिनमें जीवन की सम्पूर्ण समस्याओं का समाधान निहित है |कल ही महाराष्ट्र के एक मंत्री कह रहे थे कि गीता को किसी धर्म के दायरे में बांधना संभव नहीं है |अमेरिका के एक विश्वविद्यालय में गीता का नियमित  अध्ययन किया जाता है ताकि जीवन की समस्याओं पर विजय पायी जा सके |

स्पष्ट है कि गीता में दिया गया ज्ञान आज भी प्रासंगिक है |गीता का ज्ञान  सुनकर ही तो अर्जुन कायर विचारों से उबरा और वीर सिद्ध हुआ |

श्रीकृष्ण के जीवन में बहुत सारे चमत्कार दिखते हैं ,कोई भी तार्किक व्यक्ति उन पर आसानी से यकीन नहीं कर सकता |जैसे बचपन में पूतना नामक राक्षसी ने उन्हें अपना दूध पिलाकर मारने की कोशिश की और वह स्वयं मर गयी |

बचपन में ही खेलते-खेलते उनकी गेंद यमुना में चली गयी ,जिसे लेने के लिए वे यमुना में कूद गए |वहां कालिय नाग रहता था ,जिसके प्रभाव से यमुना का पानी ज़हरीला हो गया था |श्रीकृष्ण किष्कंटक वहां से सफल होकर लौटे |

श्री कृष्ण का पूरा जीवन चमत्कारों से भरा पड़ा है |श्रद्धालु हर चमत्कार को सत्य मानते हैं |जो साम्यवादी अथवा तर्कप्रधान जीवन जीते हैं वे हर चमत्कार को झूठ मानते हैं |जो मध्यमार्गी हैं वो न सब बातों को सच मानते हैं और न सब बातों को झूठ मानते हैं |वे हर घटना में से अपने मतलब का तत्व निकाल लेते हैं और संतुलित जीवन जीते हैं | 

श्रीकृष्ण पर कम लिखना संभव नहीं लगता क्यूंकि उनके जीवन में आयाम अथवा विशेषताएं बहुत हैं |संक्षेप में यही कहना उचित होगा कि-

१-वे जन्मजात अवतार थे अन्यथा देवकी की उनके पूर्व की अन्य सन्तानो की भांति वे भी मारे जाते |उनका बचना संभव नहीं हो पाता |   

२-वे क्रांतिकारी थे,क्यूंकि गाँव के मक्खन व् घी आदि को गांव से बाहर नहीं जाने देते थे भले ही मटकियां फोडनी पड़ें या मक्खन घरों से चुराना पड़े |

३-अर्जुन को उन्होंने वीरता का सबक सिखाया लेकिन स्वयं मथुरा छोड़कर द्वारिका चले गए क्यूंकि 

ज़रासंध का मुक़ाबला करने की क्षमता मथुरा की सेना में नहीं थी |यह उनके जीवन का विरोधाभास था |

४-इसके बावजूद जरासंध का अंत उन्हीं की रणनीति से हुआ |

५--साम-दाम-दंड-भेद ,हर प्रकार की नीति को उन्होंने अपने जीवन में अपनाया और विजयश्री प्राप्त की लेकिन उनके अपने परिजन ही उनके कहे का सम्मान नहीं करते थे इसलिए एक व्याध के तीर से उनके नश्वर जीवन का अंत हुआ |

परिवार का पूर्ण सहयोग न मिलना लगभग सभी महापुरुषों के जीवन की विडंबना रही है| बहरहाल श्रीकृष्ण का पक्ष आज भी न्यायोचित लगता है क्यूंकि अन्यायी और अहंकारी लोग सर्वनाश के ही पात्र हैं शासक बनने के नहीं ,भले ही वे किसी के भी भाई क्यों न हों |         


ब्रह्मज्ञान प्रदान कर देना ही काफी नहीं है बल्कि ----

रामकुमार सेवक 

 

कुछ साल पहले मैंने सन्त निरंकारी (हिंदी)में एक सम्पादकीय लिखा था -कोशिश और मेहनत |

वह जनरल बॉडी मीटिंग के विशेष सत्र के बाद की बात है |उस मीटिंग में बाबा हरदेव सिंह जी ने कोशिश और मेहनत पर बहुत जोर दिया था लेकिन शायद ही मैंने किसी अन्य प्रचारक से कोशिश और मेहनत विषय पर कभी कुछ सुना हो |

लगभग सबने एक बुजुर्ग माता की पोटली और रेलगाड़ी वाली मिसाल पकड़ी हुई है और यह मिसाल देकर लोगों को प्रायः गुरु की कही बातों को अपने जीवन में उतारने के आदेश को स्वयं पर लागु करने  की अपनी जिम्मेदारी से पीछा छुड़ाते देखा है |शायद ही कोई प्रचारक ब्रह्मज्ञान प्रदान करने के बाद ,निरंकार पर यकीन मजबूत करने के लिए किसी नए श्रद्धालु पर मेहनत करता हो |

यही कारण है कि  विपरीत परिस्थितियों में हम सिर्फ भीड़ का रूप दिखाई देते हैं |लगभग सब दिशाहीन |

हमारे पास आकर्षक शब्द तो बहुत सारे  हैं लेकिन व्यावहारिक जीवन में उनका प्रभाव प्रायः दिखाई नहीं देता |जीवन में पवित्र  शब्दों का प्रभाव उस युग में तो सचमुच  था जिसे वापस लाने के लिए सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी कोशिश कर रहे थे |तब सब्र-शांति और सहनशीलता वाकई गहने थे |डॉ.देसराज जी के बारे में मशहूर है कि वे निरंकार का आधार लेने के साथ-साथ अपनी तरफ से भी मेहनत करते थे |उनके दर्शन करने का अवसर मुझे विद्यार्थी जीवन से ही अनेक बार मिला |1981 में जब वे मुरादनगर में आये तो निकट से,उनके आशीर्वाद लेने का अवसर मिला | वर्ष  2001 में जब वे ब्रह्मलीन हुए तब मैं संत निरंकारी (हिंदी )का संपादक था और उनका जीवन परिचय लिखने और छपने की सेवा भी मिली थी |  

पिछले दिनों एक किताब में पढ़ा कि डॉ,देसराज जी ने किसी दम्पति को ज्ञान दिया |उनके बारे में सुना है कि वे किसी को ब्रह्मज्ञान प्रदान करके ही नहीं रुक जाते थे बल्कि निरंकार पर यकीन मजबूत करने के लिए उसके साथ मेहनत भी करते थे |वे ऐसा इसलिए कर पाते थे क्यों कि प्रचारक होने के लिए उन्होंने किसी की चापलूसी या कुछ अलग प्रकार के प्रयास नहीं किये थे बल्कि एक ज़ज़्बा था जो उन्हें प्रचारक के रूप में स्थापित करता था |

संयोग बना कि ज्ञान प्रदान करने के कुछ ही दिनों के बाद दीपावली का त्यौहार था |हुआ यह कि दीपावली पर जितने मिठाई के डिब्बे उनके घर में आये,रात गुजरने के बाद सब पर खून के धब्बे पाए गए |तंत्र की परंपरा में इस प्रकार की घटनाएं आम सुनी-पढ़ी हैं इसलिए यह पढ़कर मुझे हैरानी नहीं हुई |

निश्चय ही कोई भी यह सब देखकर डर जाएगा |वे भी घबरा गए और डॉ,देसराज जी के पास गए |डॉ,साहब तुरंत उनके घर गए |उन्होंने पूरे घर में चरण डाले,परिवार को सुमिरन करवाया |चरणामृत बनवाया |चरणामृत पूरे घर में छिड़का |डिब्बे में से पहली मिठाई खुद खाई और शेष सबको भी खिलाई |इस प्रकार उन श्रद्धालु महात्मा का निरंकार पर यकीन मजबूत किया और यह करके डॉ.साहब अपनी दुकान पर आ गए |

निरंकार का कुछ ऐसा खेल हुआ कि जिस पड़ोसी ने उनका अहित चाहा था कुछ ही समय बाद वह स्वयं उस श्रद्धालु परिवार के चरणों में नतमस्तक हुआ |

न जाने क्यों ज्यादातर लोग ऐसे प्रसंगों की सत्यता पर शक करते हैं ,और यह शक कुछ हद तक उचित भी है क्यूंकि यह ज़माना ही ऐसा है ,अफवाहें बहुत फैलाई जाती हैं लेकिन जो निरंकार का जीवन में प्रयोग कर चुके हैं वो ऐसे प्रसंगों को भी प्रेरणा का माघ्यम बना लेते हैं |वे स्वयं अपना यकीन दृढ करके भीतर-बाहर से निरंकार का पूर्ण एहसास करते हैं |

चरणामृत निरंकार की शक्ति का जीवंत प्रमाण है |चरणामृत के बहुत सारे चमत्कार मैंने अपने जीवन में देखे हैं |ये चमत्कार उन लोगों को जवाब हैं जिन्हें निरंकारी मिशन में आजकल कुछ भी अच्छाई नहीं दिखती |

भीड़ किसी से भी जल्दी प्रभावित हो जाती है और उतनी ही जल्दी छंट भी जाती है |

जिन्हें निरंकार के अस्तित्व का स्पष्ट एहसास है वे किसी की विपरीत बातों पर इतनी जल्दी विश्वास नहीं कर लेते | वे भीड़ के पीछे नहीं चलते बल्कि विवेक की आँखें खोलकर ब्रह्मवेत्ता सतगुरु के विचारों के पीछे चलते हैं |ऐसे लोग ही होते हैं जो ब्रह्मज्ञानी सिर्फ कहलाते नहीं बल्कि ब्रह्मज्ञानी सचमुच होते हैं |ऐसे हीरे ही आज मिशन को चाहिए |

 


गुरु सब कुछ जानता है,शहंशाह जी ने इस प्रकार सिद्ध कर दिया 

रामकुमार सेवक 

सन्त निरंकारी सेवादल के मुख्य संचालक श्री जोगिन्दर सिंह जी खुराना बुजुर्ग महात्मा हैं |इस उम्र में इंसान नया कुछ करने की नहीं सोचता बल्कि जो कुछ अब तक किया है ,उसी को सँभालने में अपनी बची-खुची ऊर्जा का  प्रयोग करता है | ईदुल जुहा के दिन प्रातःकालीन सत्संग को सम्बोधित करते हुए खुराना जी ने शहंशाह जी के समय का एक प्रसंग सुनाया |उन्होंने कहा-उस समय निरंकारी कोठी के चारों दिशाओं में चार द्वार थे |बाबा जी कहा करते थे कि इनमें से होकर चारों वर्ण मेरे पास आएंगे |और लोग आते भी थे क्यूंकि बाबा जी सबको देखकर खुश होते थे |उनका तप -त्याग और प्यार लोगों को अपनी तरफ खींचता था |

आम लोग उनमें अपने बुजुर्ग की छवि देखते थे |हालांकि वे सख्त भी थे लेकिन उनकी सख्ती बाहर की सख्ती थी जो शिष्य को मजबूत बनती थी -भीतर से भी और बाहर से भी |साथ ही शिष्य उनके भय के कारण मर्यादित भी रहता था |मुझे  उनकी किताब अवतार उपदेश पढ़ने का मौका मिला है |उनके विचार पढ़कर मैंने भली भाँति महसूस किया है ;कि एक खरे इंसान की तरह वे बहुत खुलकर बोलते थे |

निर्मल जोशी जी अक्सर बताया करते थे कि उनके समय में महात्मा जुगल किशोर जी(जिन्हें खरेपन के कारण कबीर जी कहा जाता था )सन्त निरंकारी मंडल का पूरा अकाउंट संभालते थे और उनके रहते कोई बेईमानी करने की सोच भी नहीं सकता था क्यूंकि उनके नियम सिर्फ औरों के लिए नहीं थे बल्कि उन्हें वे पहले स्वयं और अपने परिवार पर लागू करते थे |

उनके पौत्र श्री विवेक कबीर मेरे साथी रहे हैं और उन्होंने कबीर जी के बारे में काफी कुछ बताया भी और लिखकर भी दिया जिसे मैंने अपने कार्यकाल में सन्त निरंकारी (हिंदी मासिक पत्रिका )में प्रकाशित भी किया था |

अभी पिछले महीने एक किताब में मुझे उनके और उस समय के अनेकों महात्माओं के बारे में काफी कुछ पढ़ने को मिला .जिससे निरंकार की सत्ता पर मेरा यकीन और मजबूत हुआ ,साथ ही अनहद -नाद के बारे में भी जानकारी बढ़ी |

इस बात को यहीं रोककर अभी खुराना जी के उस दिन के प्रवचन की बात करते हैं |खुराना जी ने बताया कि बाबा अवतार सिंह जी सरोवर पर सैर के लिए जा रहे थे |हम कई सेवादार उनके साथ थे |बाबा जी ने एक खुदे हुए गड्ढे को देखकर मुझसे कहा-यह गड्ढा भर दे |

उस समय मुझे लगा कि बाबा जी ने गड्ढा भरने को ही तो कहा है ,शुक्र है गड्ढा खोदने को नहीं कहा क्यूंकि मेरी कमर दर्द कर रही थी |

मैंने सोचा कि जब बाबा जी आगे चले जाएंगे तो धीरे -धीरे गड्ढा भर लूँगा लेकिन बाबा जी ने कहा-सिद्धू साहब ,यहीं कुर्सी खींच लाओ |

बाबा जी वहीं बैठ गए तो मैंने सोचा-ये कैसे गुरु हैं कि मेरी कमर का ख्याल नहीं कर रहे लेकिन मैं उनके आदेश के पालन में लगा रहा |अंदर से मेरे मन में बाबा जी के प्रति अजीबोगरीब ख्याल आ रहे थे |

बहरहाल हम कोठी वापस आ गए |दो सेवादार बहने थीं-भागी जी और रामप्यारी जी |बाबा जी ने बेंतउन्हें पकड़ाया |

मैंने बाबा जी को नमस्कार की |बाबा जी ने कमर पर हाथ रखकर पूछा-कितना दर्द है लेकिन उस समय दर्द न जाने कहाँ खो गया था | 

सोचता हूँ कि सतगुरु और शिष्यों के ऐसे ही सहज सम्बन्ध बाबा हरदेव सिंह जी चाहते थे लेकिन 40-50 वर्षों के इस अंतराल में भीड़ और संसाधन तो बहुत बढे लेकिन तप-.त्याग  और  सहजता जैसे धीरे -धीरे कम होते और अंततः ख़त्म होते चले गए |  लेकिन निरंकार आज भी वही है इसलिए उम्मीद अब भी जीवित है |     

        


बाबा बूटा सिंह जी का समझाने का तरीका  

रामकुमार सेवक 

परसों प्रसिद्द शायर मिर्ज़ा ग़ालिब की जन्मतिथि मनाई जा रही थी |वे बहुत प्रगतिशील इंसान थे क्यूंकि वे कट्टर नहीं थे |गुलज़ार साहब ने उन पर एक धारावाहिक भी बनाया था जिसमें एक प्रसंग था कि उनके किसी मित्र का नौकर दीपावली की मिठाइयां उनके घर देकर जा रहा था |रास्ते में ग़ालिब मिल गए |उन्होंने उस नौकर को खुशी से बख्शीश दी |पास में एक बुजुर्ग बैठे थे |उन्होंने ग़ालिब को फटकारते हुए कहा-मिर्ज़ा ,दिवाली की मिठाई खाओगे ?

ग़ालिब बोले -मिठाई क्या हिन्दू है या मुसलमान है ? उन्होंने उनमें से एक मिठाई तो वहीं खायी  और हँसते हुए आगे बढ़ गए |

हमने ग़ालिब को नहीं देखा लेकिन मान सिंह जी मान को देखा है बल्कि लगभग 30 साल तक इकट्ठे काम भी किया है |उन्हें निरंकारी ग़ालिब कहा जाता था क्यूंकि उनकी विचारधारा भी ऐसी ही थी |विवादों से उन्हें डर नहीं लगता था |मैं उनकी हर बात से तो सहमत नहीं रहा लेकिन बहुत सारी बातों से सहमत था और साहित्य और पत्रकारिता पर बहुत -कुछ मैंने उनसे सीखा |अंतिम समय तक मेरा उनसे संवाद था |बहरहाल इस समय मुझे अपने और उनके सम्बन्ध में नहीं बल्कि बाबा बूटा सिंह जी के सम्बन्ध में बात करनी है जो बहुत स्पष्ट और प्रखर थे साथ ही ब्रह्मज्ञानी और बहुत साहसी भी थे ,जैसा मैंने सुना-पढ़ा है | 

iमान सिंह जी मान संत निरंकारी मिशन के संस्थापक बाबा बूटा सिंह जी के  प्रसंग बताया करते थे, जिन्हें सुनकर मनोमस्तिष्क में उन गुरुओं स्मरण हो जाता था जो कि मायावी प्रभाव से बिलकुल दूर और शतप्रतिशत इस निरंकार से ही ओत -प्रोत होते थे |

मान  सिंह  जी  मान  पंजाबी भाषा के वरिष्ठ कवि थे ,जिनका जन्म उसी गाँव में हुआ था जिसमें बाबा अवतार सिंह जी का जन्म हुआ था |एक बुजुर्ग (संत निरंकारी मंडल में सिक्योरिटी गार्ड,अब ब्रह्मलीन ) तो उन्हें गुरु के गांव का आदमी ही कहा करते थे |सब कवि उन्हें उस्ताद कहते थे क्यूंकि वे दयालु थे और नए कवियों को भी कविता के नियम बता देते थे |जिस कवि में उन्हें संभावना लगती थी ,उस पर मेहनत भी करते थे|मैं भी उन्हें अपना उस्ताद मानता था और अब भी मानता हूँ इसलिए उनके लिए मेरा एक ही सम्बोधन है-उस्ताद जी | 

एक  बार उन्होंने बताया कि बाबा बूटा सिंह जी ने किसी को तांगा लाने के लिए कहा |यह उस समय की बात है जब बाबा जी इस महान मिशन की शुरूआत कर रहे थे |बाबा बूटा सिंह जी सांसारिक कार्य-व्यवहार करने के लिए गोदना (टैटू )गोदने का काम किया करते थे |स्पष्ट है कि उनकी आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी और उसके बारे में वे सोचते भी नहीं थे |उस्ताद जी बताते थे कि वे मस्त फ़कीर की तरह थे ,संसार में ,गृहस्थी में रहकर भी उससे न्यारे |और भी जितने उनके शिष्य थे,उनकी आर्थिक स्थिति भी लगभग ऐसी ही थी |संत-महात्माओं का यह समूह किसी गांव में संगत करने जा रहा था इसलिए तांगा मंगवाया गया |

जो महात्मा तांगा लेने गए उन्होंने मजबूत घोड़े से जुड़ा तांगा चुना |उन्होंने सोचा कि संगत में जल्दी पहुंचेंगे लेकिन बाबा जी ने कहा -भाई साहब ,यह तांगा तो बहुत जल्दी मंजिल पर पहुंचेगा और हमें प्रभु चर्चा का मौका कम मिलेगा इसलिए कोई ऐसा तांगा लाओ जिसका घोडा कमजोर हो,ताकि हमें प्रभु चर्चा का ज्यादा मौका मिले |

यह प्रसंग सुनकर मुझे हंसी भी आयी और यह एहसास भी हुआ कि उस समय के संत-महात्मा कितने सरल और सहज थे |

उस्ताद जी बताते थे कि बाबा जी का प्रचार करने का तरीका भी अलग ही किस्म का था |वे सामने खड़े किसी तांगे वाले से पूछ बैठते थे कि-तुझे अपने प्यो (पिता )दा पता है ?वह अनजान आदमी अचकचा जाता था |वह अपने पिता का नाम बताता तो बाबा जी कहते -शरीर दा नहीं रूह दा?

वह इंकार करता था तो बाबा जी फ़ौरन उसे ज्ञान का संकेत प्रदान करते थे ताकि प्रभु के प्रति जाग्रति आये |

उस्ताद जी की उम्र उस समय 14-15 साल रही होगी |वे बताते थे कि मैंने बाबा जी से पूछा कि आप गुरु क्यों बनते हो जबकि पावन बाणी में लिखा है कि ग्रन्थ ही गुरु है |

बाबा जी ने कहा कि-मुझे वह पेज न. बता दो जहाँ ऐसा लिखा है ,मैं गुरु नहीं बनूँगा |

उनका जीवन खुली किताब की तरह था |

 उस्ताद  जी उस वक़्त को बहुत दिल से याद करते थे |बाबा हरदेव सिंह जी के बारे में वे कहते थे -इस समय यदि कोई गुरु है तो यही है और दुनिया में यदि कोई परमात्मा है तो यह निरंकार ही है |बाबा जी के लिए उन्होंने स्पष्ट लिखा था-तू जो वी बख़श्या एह,शुक्राना होर पा दे ,अपणे सुभा वरगा साड्डा सुभा बना दे |

          इससे  ज़ाहिर होता है कि गुरु के प्रति उनके भीतरी भाव कितने ऊंचे थे |

 


 नारी पर बढ़ते अत्याचार के परिपेक्ष्य में 

उजाले की किरण है-रक्षाबंधन 

रामकुमार सेवक 

रक्षा बंधन कभी भी मेरे लिए मात्र औपचारिकता में सीमित त्यौहार नहीं रहा |

अभी गीत सुन रहा था-ये राखी बंधन है ऐसा --आगे कवि ने लिखा है-जैसे धरती और गगन का,जैसे बदरी और पवन का ,जैसे सुभद्रा और क्रिशन का---मैं ह्रदय से कवि की कल्पना को प्रणाम करता हूँ |कुछ साल पहले तक ऐसे गीत सुनने को मिल जाते थे-बहना ने भाई की कलाई से प्यार बांधा है ,प्यार के साथ ही संसार बांधा है |ऐसे बहुत गीत हैं जिन्हें सुनकर आँखें भीग जाती है लेकिन पचपन साल की उम्र में रोना शोभा नहीं देता क्यूंकि आंसू पोंछने वाला कोई नहीं होता इसलिए यह रोना भीतर ही भीतर होता है |फिर भी ऐसे गीत हमें पसंद आते हैं जिन्हें सुनकर आँखें भीग जाएँ | 

रक्षा बंधन इस बार मुझे विशेष तौर पर महत्वपूर्ण इसलिए लग रहा है क्यूंकि हमारे समाज में स्त्री और पुरुष के सम्बन्ध इतने असुरक्षित कभी नहीं थे जितने कि आज हैं |

पिछले सप्ताह मैं दफ्तर से घर आ रहा था |रास्ते में थोड़ा सा हिस्सा ऐसा है जहाँ रिहायशी आबादी नहीं है बल्कि हरियाली का क्षेत्र है |यह जनता की हलचल से दूर लगभग शांत क्षेत्र है |

गाड़ी ट्रैफिक लाइट न होने क्र कारण रुकी हुई थी |मैंने सहज ही बाहर देखा |

बाहर फुटपाथ पर एक बच्ची चली आ रही थी |उसके रंग-ढंग से लग रहा था कि वह किसी गरीब माता-पिता की संतान रही होगी और निश्चय ही रिज के इस इलाके की वासी नहीं हो सकती |

वह चूंकि फुटपाथ पर अकेली आ रही थी और उसके वस्त्र कुछ ठीक-ठाक नहीं थे तो मुझे बहुत अफ़सोस हुआ कि कहीं किसी नरपिशाच ने उसका जीवन बर्बाद न कर दिया हो |इतनी छोटी बच्ची यह कल्पना भी नहीं कर सकती कि इंसान ,जिसे प्रभु की सर्वश्रेष्ठ रचना माना जाता है ,वासना में अँधा होकर कहाँ तक गिर सकता है |

उतनी ही देर में लाइट ग्रीन हो गयी और गाड़ी आगे बढ़ गयी |उन दिनों मैं अल्जीरिया के विचारक अल्बेयर कामू पर लेखिका -मंजू खेतान की किताब पढ़ रहा था तो मैं कामू के विचारों की मन ही मन समीक्षा करने लगा |

थोड़ी ही देर में कामू के स्वतंत्रता विषयक विचार मुझे मथने लगे कि मानवता की बात करनी कितनी आसान है और मानवता का व्यवहार करना कितना कठिन |इस सन्दर्भ में मेरा ध्यान फिर उस मासूम बच्ची की ओर चला गया |उस वीभत्स कल्पना से मैं इतना डर गया कि मैंने प्रभु से प्रार्थना की कि उस मासूम की रक्षा होती रहे सदा |

कुछ वर्षों में स्त्री की असुरक्षा बहुत ज्यादा बढ़ी है |शुरूआत में ऐसे अपराध युवा स्त्रियों के साथ होते थे ,उसमें ऐसा भी लगता था कि संभवतः असहमति की स्थिति में उसे अपराध का रूप दे दिया जाता

 है| न्यायालय ने भी कुछ मामलों में इस आशंका की पुष्टि की लेकिन बाद में तो पीड़ितों में छोटी-छोटी बच्चियों और बुजुर्ग माताओं के नाम भी आने लगे तो यह सवाल पैदा हो गया कि क्या यह वही देश है जहाँ छोटी-छोटी बच्चियों की वर्ष में दो बार देवी मानकर पूजा की जाती है ?

 

क्या यह वही देश है जहाँ के बड़े भू भाग में रक्षा बंधन का त्यौहार मनाया जाता है ,जहाँ बहने हर वर्ष अपने भाईयों की कलाई पर राखी बांधकर उनसे अपनी रक्षा की आशा लगाती है ?

 

क्या यह वही देश है जहाँ रक्षा बंधन की गौरवशाली परंपरा पर कवियों -गीतकारों ने दिल को छूने वाले गीत लिखे?

 

तीनो प्रश्नो का जवाब एक ही हैं -हाँ लेकिन आज की परिस्थितियों में वही देश लगता नहीं है |

 

 सुंदरता किसी धर्मविशेष की मोहताज़ नहीं होती और इंसान के विचारों की पवित्रता अथवा अपवित्रता भी किसी धर्म या समुदाय में सीमित नहीं है |यद्यपि रक्षा बंधन हिन्दू धर्मावलम्बियों का त्यौहार है लेकिन रक्षा बंधन पर ऐसे हृदयस्पर्शी गीत लिखने वालों में सिर्फ हिन्दू नहीं हैं मुसल्मान भी हैं |प्रसिद्द धारावाहिक महाभारत के संवाद डॉ.राही मासूम रज़ा ने लिखे थे |    

मैंने अपने लेखों में अनेक बार भारत की महान सांस्कृतिक परम्पराओं का जिक्र किया है जिनका पालन हमारे बड़े-बूढ़े करते आ रहे |

बचपन में मैंने अनेक बार यह मुश्किल झेली कि मेरे पिताजी किसी भी  स्त्री की तरफ इशारा करके कहते थे कि ये तेरी बुआ हैं,इनके पांव छू |उन बुआ को हमने कभी देखा भी न होता था लेकिन एक चलन था कि कोई स्त्री यदि हमारे गांव की या उसके आस-पास की होती थी तो हमारे पिताजी उन्हें अपनी बहन मानते थे और हमें भी ऐसे ही संस्कार प्रदान करते थे |इस प्रकार उस ज़माने में लड़कियां ज्यादा सुरक्षित रहा करती होंगीं |

मुझे लगता है कि स्त्री के विरुद्ध होने वाले अत्याचाओं-अनाचारों को मात्र कानून-व्यवस्था की समस्या मान लिया गया है जबकि इसकी जड़ें आदमी की संकीर्ण और कुंठित मानसिकता में हैं |यह मानसिकता अचानक ही पैदा नहीं हुई बल्कि इसका सम्बन्ध ऐसी शिक्षा पद्धति  से है जिसमें नैतिकता अथवा अध्यात्म का स्थान कहीं नहीं है |इन सबका स्थान पैसे कमाने के ज्ञान ने लिया है और स्त्रियां बहुत असुरक्षित हो गयी है क्यूंकि पैसे की दौड़ में आदमी की नैतिकता और मर्यादा रास्ते में कहीं गिर गयी है |

कुछ वर्ष पहले हमारे गांवों में संयुक्त परिवार होते थे |बड़े-बूढ़ों के संरक्षण में दो-तीन परिवार एक साथ रहते थे |अक्सर बीस-तीस लोगों का खाना एक ही चूल्हे पर बनता था और मेहमानो का भी आगमन होता रहता था |वो एक कुटुंब या घर लगता था |लड़के और लड़कियां एक ही घर में खेल-कूदकर बड़े होते थे |न लड़कों में लड़कियों के प्रति कोई कुंठा नहीं होती थी ,न ही लड़कियों में लडकों से कमतर  होने का भाव होता था |हालांकि ऊपरी तौर पर जिसे असमानता मानते हैं वो थी लेकिन भीतर से दोनों को ही अपनी दो आँखों की तरह महत्वपूर्ण माना जाता था |तब कन्या भ्रूण हत्या का चलन नहीं था |बड़े परिवार में रिश्ते बहुत स्वाभाविक रूप से विकसित होते थे लेकिन अंग्रेजियत ने हमें हमारी जड़ों से दूर कर दिया और बहुत सारे रिश्ते दूर हो गए और अंततः ख़त्म हो गए |इसी कारण फासले बढे और फिर अपराध भी |

इतिहास साक्षी है कि भारतीय जीवन मूल्य यहाँ के वासियों की सांझी विरासत रही है, जिसे हिन्दुओं ने तो सींचा ही मुसलमानो ने भी जिन्हें उपयोगी माना और अपनाया |

कर्मवती राजपूत महारानी थी |जब राज्य पर संकट आया तो उसने पद्मशाह के माध्यम से मुग़ल बादशाह हुमायूँ को राखी भेजी और सहायता का अनुरोध किया |हुमायूँ रक्षा बंधन के महत्व से तब से परिचित था जब उसने अमरकोट के किले में शरण पायी थी इसलिए उसने राखी का मान रखा और रानी कर्मवती को बहुमूल्य उपहार भिजवाए लेकिन अनेक इतिहासकारों के अनुसार हुमायूं कर्मवती की रक्षा न कर सका लेकिन यह तो स्पष्ट था कि हिन्दू-मुसलमान के सम्बन्ध तब भी  किन्हीं संकीर्ण दीवारों में बंदी नहीं थे और उस समय भी सावन की पूर्णमासी को रक्षा बंधन भावपूर्वक मनाया जाता था |

हनारी फिल्मो में भी मर्यादा और आस्था के ये ये तत्व प्रचुर मात्रा में थे जिसके कारण हर धर्म और संस्कृति में निकटता की परंपरा कायम रही लेंकिन धीरे -धीरे सोच बदली और स्त्री को वस्तु समझा जाने लगा |                         

यह सबसे दर्दनाक हालत थी |समाज भी बदला और फिल्में भी |समाज ने फिल्मों को बदला या फिल्मों ने समाज को ,यह एक विवादस्पद प्रश्न है लेकिन पैसे की होड़ ने आदमी को एक मशीन का रूप दे दिया और शायर ने लिखा -

इसका नहीं ग़म कि गिरी सिक्के की कीमत,

अफ़सोस है कि कीमते-इंसान गिरी जाती है |

अगर मानव मूल्य ऊंचे हों,सिर्फ पैसे को ही सर्वाधिक महत्व देने की परंपरा चलन से बाहर हो तो फिर समाज की तस्वीर बदल सकती है |रक्षा बंधन जैसे त्यौहार हमारे लिए उजाले की किरण हैं | 

     


पक्षपात भी और न्याय भी 

एक ही स्थान पर कैसे संभव है ?

रामकुमार सेवक   

एक ही परिस्थिति में पक्षपात भी और न्याय भी ,यह संभव नहीं लगता लेकिन परमात्मा के सन्दर्भ में ये दोनों बातें सही हैं |एक ओर परमात्मा सदैव न्याय करता है बल्कि यह कहना भी अतिशयोक्ति नहीं होगी कि सिर्फ परमात्मा ही न्याय करता है |

बात सुनने में कुछ अजीब लगेगी लेकिन तथ्य है कि क़ानून और न्यायलय के अनुसार मृत्युदंड से बढ़कर कोई सजा नहीं है |किसी ने एक खून किया हो तो भी मृत्युदंड और किसी ने अधिक हत्याएं की हों तो भी मृत्युदंड| एक  हत्या और आठ हत्याओं का  न्यायोचित दंड  एक जैसा नहीं हो  सकता इसलिए निरंकार ही सच्चा न्यायकारी है | 

अब पक्षपात का भी विश्लेषण कर लेते हैं |1973 में  मुरादनगर की  हमारी  संगत की शुरूआत पावन संत बाणी की एक प्रार्थना से होती थी जिसमें कहा गया था-

बांह पकड़ कढ़ लेने जन अपने,गृह अंधकूप ते माया--सतगुरु तुम शरणाई आया 

इस सबद की गहराई में जाएँ तो अर्थ स्पष्ट हो जाता-है -सतगुरु ने कृपा करके माया के अंधे कुए से निकाल लिया अर्थात मेरा पक्ष किया | 

सम्पूर्ण अवतार बाणी में भी लिखा है-    जिसका पख करे तू स्वामी उस बन्दे लई मौज बहार 

श्रीकृष्ण ने अर्जुन का अनेक बार पक्ष किया |श्री राम ने हनुमानजी को कहा-तुम मम प्रिय भरत सम भाई |लक्ष्मण जी के बारे में उन्होंने ऐसा नहीं कहा |उन्होंने लखन सम भाई नहीं कहा जबकि लक्ष्मण जी ने राम जी की निःस्वार्थ सेवा की  |स्पष्ट है कि उन्होंने हनुमान व् भरत जी का पक्ष लिया |

निष्कर्ष यह निकलता है कि सत्गुरु अपने भक्तों का सदैव पक्ष करता है |कौरवों पर पांडवों का पक्ष किया |द्रोपदी का पक्ष लिया |मीराबाई पर ज़हर का प्रभाव नहीं होने दिया |

कहने का तात्पर्य है कि जिस प्रकार अग्नि व् जल का साथ संभव नहीं है पंचभौतिक शरीर में अग्नि भी है और जल भी इसी प्रकार प्रभु में न्याय और पक्षपात एक साथ मौजूद है |

केवट प्रभु से प्रार्थना करता है मुझे पारिश्रमिक मत दीजिये बस यह वचन दीजिये कि जब मैं आपके घाट आऊं  तो मुझे पार कर देना |यह कार्य सिर्फ प्रभु ही कर सकता है |केवट परम बुद्धिमान था जिसने उनसे वह वचन लिया जिसे और कोई दे नहीं सकता |मूर्ख है वह वो जो प्रभु से मुक्ति मांगने की बजाय सांसारिक पदार्थों की मांग करता रहता है |  

बकरीद (22  अगस्त ) पर विशेष 

 

पशुओं की बलि देने से परवरदिगार खुश नहीं हो सकता 

रामकुमार सेवक 

 

आज ईद-उल-अज़हा के अवसर पर सुबह-सुबह अज़ान की आवाज़ सुनकर एक परवरदिगार से ध्यान जुड़ गया ,आनंद आ गया |साथ ही बकरों के हालात पर बहुत दया आयी |मौलाना वहीदुद्दीन खान साहब द्वारा लिखा गया एक लेख याद आ गया जिसमें उन्होंने बकरों की बजाय खुद के अहंकार और दुर्गुणों की बलि देने की बात कही थी |

हिंदी फिल्मो के जाने -पहचाने अभिनेता इरफ़ान खान भी याद आये जो मुस्लिम होने के बावजूद मूक पशु की बलि देने के खिलाफ हैं |

महात्मा गाँधी भी याद आये जिन्होंने हिन्दुओं द्वारा की जाने वाली बलि का विरोध किया था कि यदि बलि इतनी ही जरूरी है तो बकरे की क्यों ,इंसान की क्यों नहीं ?बकरे को बचाने के लिए उन्होंने कहा- मेरी बलि दे दो |

यह बात सुनकर कट्टरपंथियों को धक्का लगा और इस प्रकार उस समय मूक पशु की बलि होने से बच गयी |

मैं स्वयं पहले मांसाहारी था |बकरीद के अवसर पर आये मांस को स्वाद लेकर खाता था लेकिन जब सन्त निरंकारी (हिंदी )का संपादक था तो वर्ष 2000  के आस-पास सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ने अहिंसा के तत्व पर बल दिया |अहिंसा परमो धर्मः की बात पहले ही मेरे संज्ञान में थी |निर्णय लिया गया कि अक्टूबर अंक को अहिंसा विशेषांक के रूप में प्रकाशित किया जाएगा |

संपादक होने के नाते मेरे सामने गंभीर चुनौती थी कि अहिंसा विशेषांक निकालने से पहले जुबान के स्वाद का मोह त्यागना होगा |इसका अर्थ है कि मांसाहार त्यागना होगा |ध्यान में आया कि मेरी ऊँगली में अगर आलपिन भी चुभ जाए तो दर्द होता है फिर क्या मूक पशु को दर्द नहीं होता होगा ?

यह कल्पना  करते ही जीभ का मोह ख़त्म हो गया और तब से अभी तक मांसाहार की तरफ नहीं घूमा |

कहने का भाव यही है कि जुबान के क्षणिक स्वाद के लिए मूक पशु की बलि इंसान का स्वार्थ है और ऐसा संकीर्ण स्वार्थ धर्म नहीं हो सकता |धर्मशास्त्र तो कहते हैं-

परोपकार पुण्याय,पापाय परिपीडनम 

अर्थात किसी के काम आना पुण्य है और किसी को दुःख पहुंचाना पाप है |

यदि इंसान को पीड़ा देना पाप है तो मूक पशु को भी पीड़ा देना पाप है |

धर्म को परिभाषित करते हुए श्रीरामचरित मानस में गोस्वामी तुलसीदास जी कहते हैं-

परहित सरस धर्म नहीं भाई 

परपीड़ा सम नहीं अधमाई |

कहते हैं कि किसी अन्य को पीड़ित करने से नीच कोई काम नहीं है |

शर्म के नाम पर जब मूक पशुओं की बलि दी जाती है तो वह धर्म का पालन करना नहीं बल्कि शर्म का उपहास उड़ाना है |

मांसाहार के विरुद्ध जब भी मेरी अपने मित्रों से चर्चा होती है तो अक्सर सुनने को मिलता है कि यदि पशुओं को खाने के काम में न लाया जाए तो उनकी संख्या इतनी ज्यादा बढ़ जायेगी कि इंसानो के रहने लिए जगह भी न बचेगी |

यह तर्क कभी भी मेरे गले नहीं उतरा और मैंने उनसे कहा कि जानवरों के कारण  अभी ऐसी  समस्या प्रकाश में नहीं आयी है अन्यथा पशुपालन विभाग और मंत्रालय बंद हो चुके होते |

स्पष्ट है कि जानवरों के कारण इंसान को रहने की समस्या पैदा हो रही है,अभी तक इस बात को किसी ने नहीं कहा लेकिन इंसानो को इंसानो से ही जगह की समस्या है वह लगातार पढ़ने-सुनने को मिलता रहता है |भारत में कई राज्य ऐसे हैं जहाँ रोजी-रोटी की तलाश में आये लोगों पर हमले आम हैं और  स्पष्ट है कि मोटे तौर पर  इंसान ,इंसान को जगह देने के लिए तैयार नहीं है |

ध्यान में आता है कि यदि इंसान के रहने के लिए जगह कम लगे तो क्या उसका उपाय यह है कि बढे हुए इंसानो को मार डाला जाए ?

नहीं हमने ऐसा कब कहा?लोग कहते हैं |

फिर मैं कहता हूँ कि-यदि हम लोग अपने लिए इस उपाय को मानने के लिए तैयार नहीं हैं तो निरीह पशुओं के लिए यह उपाय क्यों स्वीकार किया जाए ?

मुझे कर्नल(डॉ.)(अवकाशप्राप्त ) कर्म सिंह जी की भी याद आ रही है |निरंकारी प्रचारकों को प्रशिक्षण देते हुए उन्होंने शाकाहार पर बल देते हुए कहा था कि प्रकृति ने मानव की रचना शाकाहार के लिए ही की है |न उसके जबड़े मांसाहार के लिए बने हैं और न ही उसके पाचन यन्त्र इसके अनुकूल हैं -सिर्फ जुबान के स्वाद के लिए इंसान मूक पशु-पक्षियों को अपना आहार बना लेता है |

आज जो धर्म के प्रचलित रूप हैं उनमें बहुत सी धाराएं हैं |सबको अपनी-अपनी धारा में बहने की स्वतंत्रता हमारे देश के संविधान ने दी है |

हम किसी के धर्म में कोई हस्तक्षेप नहीं कर रहे सिर्फ यह कहना चाहते हैं कि जो व्यवहार अपने साथ नहीं चाहते वो किसी और के साथ भी मत करो |

धर्म का सही रूप है-जियो और जीने दो |इस परिपेक्ष्य में पशुओं की बलि चढ़ाना अथवा अपने स्वाद के लिए मूक पशुओं की हत्या करना मानवता अथवा किसी भी सभ्य धर्म के विरुद्ध है |     

     

            


कठिन सवालों के भी सरल जवाब देते थे वे 

रामकुमार सेवक 

संत साहित्यकार आदरणीय निर्मल जोशी जी बाबा अवतार सिंह जी के कई प्रेरक प्रसंग सुनाया  करते थे |टेढ़े सवालों के भी बाबा जी सीधे सरल जवाब देते थे |ये इतने सहज होते थे कि महत्माओं की शंकाओं का सहज समाधान हो जाता था |

सतगुरु वास्तव में निरंकार की तरह सरल होता है इसलिए निरंकार उसमें सीधा-सीधा और पूरा-पूरा  सम्मिलित हो जाता है और गुरु की बात में ताक़त आ जाती है |वह ताक़त निरंकार की ताक़त होती है और जो शिष्य अपने दोष ख़त्म कर लेता है उसे भी यह ताक़त प्राप्त हो जाती है,यही तो इस युग की तपस्या है शायद इसीलिए निरंकार को पारस माना जाता है |इस अवस्था में निराकार और साकार एक ही हो जाते हैं |देखा यह भी जाता है कि जिस बात में भक्ति का तत्व होता है,सत्य होता है और वह किसी के लिए भी वरदान हो सकता है |

शिष्यों के मन में कई प्रकार के प्रश्न होते हैं जिनका समाधान वे तत्वदर्शी सतगुरु से प्राप्त करते हैं |

निर्मल जोशी जी ने एक बार बाबा अवतार सिंह जी से पूछा  कि-बाबा जी,आप बहुत साधारण भाषा में अपनी बात कहते हैं |उसमें किसी को प्रभावित करने का दबाव भी नहीं होता तो भी महापुरुष आपकी बातें बहुत ध्यान से सुनते हैं और उनका प्रभाव भी ग्रहण करते हैं |

दूसरी और हम लोग अपनी बातों में धर्म ग्रंथों के हवाले भी देते हैं और बात कहते समय कोशिश करते हैं कि लोगों पर उनका बहुत अच्छा प्रभाव पड़े इसके बावजूद महापुरुष हमारी बातों पर ख़ास ध्यान नहीं देते ,इसका क्या कारण है ?   

बाबा जी ने कहा कि सरल -सीधी बात है कि मैं सबकी बातें ध्यान से सुनता हूँ इसलिए श्रद्धालु -भक्तजन मेरी बातें भी ध्यान से सुनते हैं |

इसके विपरीत जब दूसरे महापुरुष बोल रहे होते हैं तब आपका ध्यान होता है कि मेरी बारी कब आएगी ?

इस प्रकार आप लोग बाकी महापुरुषों की बातें ध्यान से नहीं सुनते |सीधी सी बात है कि जिसने सुनने का बीज डाला है उसकी बातें सुनी ही जाएंगी |आप भी सुनने का बीज डालिये ताकि आपकी बातें भी सुनी जाएँ |

बाबा जी की सीधी -साधी बातों में बहुत सार होता था |उदहारण के लिए देखें कि जब वक्ताओं की सूची में नाम होने की सूचना हमें मिल जाती है तो हमारा पूरा ध्यान इस पर लगा होता है कि सतगुरु के सामने हम अपनी तरफ से सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुति दे सकें |

कई बार वक़्त की कमी के कारण यदि हमारी बारी काट जाए तो हम बहुत दुखी हो जाते हैं और उस अवस्था में कई बार हम सतगुरु के विचारों पर भी हम पहले की तरह ध्यान नहीं देते |

यह बहुत ही दुखद स्थिति है क्यूंकि एक श्रद्धालु होने के नाते हमारा पहला कर्तव्य यही होता है कि हम अपने आध्यात्मिक मार्गदर्शक की बातों को पूरी गंभीरता से सुने ताकि उनका पालन सुनिश्चित कर सकें |    

शहंशाह जी के युग की सबसे बड़ी विशेषता ही यह थी कि भक्त बहुत सहज रहते थे |यदि बारी आ गयी तो भी प्रभु का शुकर और यदि बारी न आये तो भी प्रभु का शुकर |ऐसी सहज भावना होने के कारण उन महापुरुषों की भावनाएं बहुत सरल-सहज और प्रभावशाली रहती थी |उन भावनाओं को सुनकर तसल्ली भी होती थी क्यूंकि बातों का जो आधार था वह निरंकार का एहसास था |वह एहसास बहुत स्पष्ट था ,उसके पीछे किसी भी प्रकार का लालच नहीं होता था ,प्रशंसा का भी नहीं |  

 


सिर्फ इसीलिए  भूमिया के साथ अब भी चोर लगाया जाता है |       

रामकुमार सेवक 

अध्यात्म सिर्फ ऋषि-मुनियो-सन्तों का ही मार्ग नहीं है बल्कि उनका मार्ग भी है जो किसी और रूप में पेट भरने व् सांसारिक भरण-पोषण के लिए चोरी और लूट-मार जैसे अपराध करते रहे ,ईमानदारी से दूर थे लेकिन संतों की संगति मिली तो उन्होंने सन्तों के मार्गदर्शन को ईमानदारी से अपनाया और क्या से क्या हो गए अर्थात वो अध्यात्म की पहचान बन गए |इन महात्माओं के जीवन से हमें यह एहसास होता है कि इंसान यदि अपनी संकल्पशक्ति से कुछ करना चाहे तो बड़े से बड़ा काम भी मुश्किल नहीं है ?

थोड़ी देर पहले सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के विचार सी.डी .में सुन रहा था | वह ओरिजनल सी.डी.थी और बाबा जी फरमा रहे थे कि कोई भी गुरु से ज्ञान लेकर भक्ति का उपहार ले सकता है |

विचार सुनकर ध्यान आया कि- भूमिया चोर ,अजामिल पापी ,कोड़ा राक्षस और गणिका पापन का नाम हमने सुना है और इन सबकी  चर्चा इसीलिए है कि इन  सबने अपने जीवन में क्रांति ला दी |यदि ये सब भी गुरु के ही सिर पर बोझ डालते रहते और खुद ज़रा सी भी कोशिश नहीं करते तो इनके जीवन में क्रांति नहीं आती |

ज़रा भूमिया चोर की चर्चा करें |कहते हैं वो असम के किसी स्थान पर रहता था और चोरी ही उसका मुख्य धंधा था |श्री गुरु नानक देव जी एक बार उस शहर में आये तो भूमिया चोर का भेद खुला |उसे महसूस हो गया कि-गुरु साहिब ही उसका उद्धार कर सकते हैं |वह सतगुरु की शरण में हो गया लेकिन चोरी करना उसका पुराना  पेशा था जिसे पूरी तरह छोड़ पाना उसके लिए संभव नहीं था इसलिए उसने गुरु साहब से अपनी मजबूरी साफ़-साफ़ बता दी |

गुरु साहब का काम करने का अपना तरीका था |उन्होंने कहा-तुम अपना काम करते रहो लेकिन जैसे तुमने मुझसे सच कहा है इसी प्रकार सबसे सच ही बोलना |शिष्य ने गुरु की बात को ह्रदय से स्वीकार किया |यह नहीं कि ज़ुबान से सतवचन कह दिया और जैसा चाहा किया |यह तो गुरु के साथ विश्वासघात ही हुआ |भूमिया ने गुरु से जो वादा किया उसे निभाया और उसके जीवन में चमत्कार हो गया | 

हुआ यह कि एक दिन महल में चोरी करने गया |द्वारपाल ने -पूछा -कौन है ?भूमिया ने कहा-चोर हूँ |

द्वारपाल ने कहा-महल में क्या करने जा रहा है ?

द्वारपाल ने कहा-चोरी करने जा रहा हूँ |द्वारपाल ने सोचा कि यह आदमी गुस्सेबाज है अन्यथा चोर तो खुद को कभी भी चोर नहीं कहता |उसने उसे भीतर जाने दिया |

पहला द्वार पार कर लिया तो फिर बाकी नौकरों ने उसे आराम से जाने दिया कि कोई नया नौकर होगा |

रात का समय था तो ज्यादा दिक्कत नहीं हुई और वो चोरी के काम में व्यस्त हो गया |माहिर चोर था उसे सामान ले जाने में दिक्कत नहीं हुई और गुरु जी की तरफ से तो एक ही आदेश था कि -सत्य बोलना है |

इस आदेश का उसने अक्षरशः पालन किया और सफल हुआ लेकिन राजमहल की रसोई में गलती से नमक खा लिया |इसका नतीजा यह निकला कि चोरी किया सामान वहीं छोड़ दिया क्यूंकि राजा का नमक खाकर राजा की चोरी तो नहीं कर सकता था | 

अगले दिन महल में शोर मच गया क्यूंकि सामान गायब भी हुआ और फिर मिल भी गया |राजा उस ईमानदार चोर तक पहुंचना चाहते थे क्यूंकि ऐसे सत्यनिष्ठ इंसान दुर्लभ हैं |राजा को उससे बहुत आशाएं थीं |

राजा के पूछने पर एकद्वारपाल ने बताया कि उस दिन एक आदमी आया था जिसने खुद को चोर बताया था |यह सुनकर राजा भी हैरान हुए |उन्होंने ऐसा पहला आदमी देखा था जिसने खुद का परिचय चोर के रूप में दिया था |

राजा पहले ही उससे प्रभावित थे |राज्य में घोषणा करवा दी गयी और अंततः भूमिया को पकड़ लिया गया |भूमिया ने बताया कि गुरु जी के सामने मैंने सत्य बोलने का वचन दिया है इसलिए वह अब झूठ नहीं बोल सकता | 

राजा ने गुरु के प्रति निष्ठां और उनके आदेश के प्रति ईमानदार समर्पण देखकर उसे अपना निजी सलाहकार बना लिया |अब उसे सम्मानित पेशा मिल गया था और चोरी -चकारी के काम में मेहनत तो ज्यादा थी ही बदनामी भी थी इसलिए उसने चोरी करना छोड़ दिया |

गुरु साहब के फॉर्मूले ने भूमिए का जीवन ही बदल दिया |एक चोर भी महापुरुष के रूप में परिणत हो सकता है ,आम आदमी के मन में यह आशा का दीप  जलाये रखने के लिए भूमिया के नाम के साथ अब भी चोर लगाया जाता है |      


सबको साथ लेकर चलने की 

अनूठी क्षमता थी अटल जी में

रामकुमार सेवक 

1980  का लगभग मार्च या अप्रैल था |भारतीय जनता पार्टी की स्थापना मुंबई में हुई थी |अटल बिहारी वाजपेयी भारतीय जनता पार्टी के पहले अध्यक्ष थे |उस समय भाजपा की स्थिति अभी से ठीक उलटी थी |उस समय इंदिरा गाँधी जी की आंधी  चलती थी और भाजपा को कोई पूछने वाला नहीं था |

  मुरादनगर में मेरी छात्रावस्था में उस दिन रक्षा में घोषणा हो रही थी कि भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष और पूर्व विदेश मंत्री श्री अटल बिहारी वाजपेयी कुछ ही देर में जी टी रोड से गुजरेंगे |

मेरे दिल में अटल जी के प्रति श्रद्धा थी |उस श्रद्धा का आधार थी -अटल जी की कविता-आओ फिर से दिया जलाएं,इस कविता को आदरणीय वासुदेव राय जी ने अपने साप्ताहिक समाचार पत्र-एक नज़र में प्रकाशित किया था |

मैं और मेरा दोस्त अनिल भल्ला जल्दी -जल्दी बस स्टैंड पर पहुंचे |वहां सिर्फ 15 -20  कार्यकर्ता थे | जो आम लोग थे ,जिनका राजनीति से कोई सम्बन्ध नहीं था ,बस हम दोनों ही थे |

अम्बेस्डर कार में अटल जी आये |उनकी गाड़ी रुकी और भाजपा कार्यकर्ताओं ने नारा लगाया-देश का नेता कैसा हो,अटल बिहारी जैसा हो |उस दिन मैंने उन्हें पहली बार देखा |कई लोगों ने उन्हें अपने कागज़ पकड़ाए |हम उस दिन उन्हें माला भी पहना सकते थे क्यूंकि मालाएं ज्यादा थीं और पहनाने वाले कम  लेकिन भीतर से हम दोनों ही सरकारी नौकरी करना चाहते थे न कि किसी राजनीतिक दल का अनुयाई बनना |

दिल से मैं आध्यात्मिक था और निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी को अपना मार्गदर्शक मानता था |

खैर वाजपेयी जी,आगे मोदीनगर चले गए |उस दिन हमें एक राष्ट्रीय नेता के बहुत करीब से दर्शन करने का गौरव प्राप्त हुआ |   

वाजपेयी जी जब प्रधानमंत्री बने तो परमाणु परीक्षण किया |समाजवादी नेता चंद्रशेखर जी ने लोकसभा में कहा कि इस प्रकार हथियारों की होड़ लगेगी |उन्होंने कहा- गुरुदेव,इस मामले में आप गलत हैं |

मैं कहना चाहता हूँ कि चंद्रशेखर जैसे कद्दावर नेता जो भाजपा के धुरविरोधी थे,और प्रधानमंत्री भी रहे,उन्हें अपना गुरु कहते थे |

उन्हें अपना गुरु मानने वालों में पूर्व प्रधानमंत्री श्री पी.वी.नरसिंहराव जी भी थे |विद्वान और भाषाविद राव ने उनकी पुस्तक -मेरी इक्यावन कवितायें -का लोकार्पण किया था ,दिल्ली के सप्रू हाउस में |अटल जी की एक   कविता को उद्धृत करते हुए राव जी ने कहा-अपनी आहट पर स्वयं दरवाजा खोलना ,आपने जो लिखा है,आँखें भिगो देता है |जीवन में किसी को गुरु बनाने का मौका नहीं मिला ,अब सोच रहा हूँ,आपको गुरु बना लूँ |

नरसिह राव जी कांग्रेस के बड़े नेता थे और उस समय प्रधानमंत्री थे |स्पष्ट है सबको साथ लेकर चलने की अटल जी में अद्भुत क्षमता थी |

अटल जी जब प्रधानमंत्री थे तब उनके राजनीतिक सलाहकार (जहाँ तक मुझे स्मरण है )ब्रजेश मिश्र थे ,उन्होंने किसी अखबार को बताया था किअटल जी अपने संकटमोचक स्वयं थे |कितने ही विपक्षी नेताओं से उनकी दोस्ती थी |कभी -कभी वे देर रात को श्री ज्योति बसु (कद्दावर साम्यवादी नेता और मुख्यमंत्री ) से सीधे फोन पर बात कर लेते थे |यह उनके बड़े दिल को दर्शाता है |

अटल जी को राजनीति की  गहरी समझ थी और सबसे बड़ी बात यह थी कि वे किसी वाद में सीमित नहीं थे |इस कारण उनका अपना कद  बहुत बड़ा हो गया था |मुसलमान सज्जनो में भी बहुत बड़ा वर्ग उनका समर्थक था |उन्होंने बस द्वारा भारत और पाकिस्तान को जोड़ने की ईमानदार कोशिश की |बेशक उनकी कोशिश पूर्ण सफलता नहीं मिली लेकिन यह एक बड़ा और ऐतिहासिक कदम था |

अंतर्राष्ट्रीय राजनीति और विदेश नीति में वे मुझे नेहरू जी के निकटवर्ती लगते हैं |

1996  में मैंने अपने मित्रों-साथियों के साथ अपनी संस्था अखिल भारतीय प्रगतिशील युवा मंच की ओर से एक स्मारिका प्रकाशित की थी  ,जिसमें पहला सन्देश उन्हीं का प्रकाशित किया था |यह इस बात का प्रमाण है कि मेरे दिल में उन के प्रति एक अनूठी श्रद्धा थी |

उनके भाषणों को भी प्रकाशित किया जा चुका है,उसे भी पढ़ने का मिला है |उनके स्वर में राष्ट्रीय भावना सुनाई पड़ती थी |पिछले कुछ वर्षों से प्रकृति ने उनके बोलने की क्षमता छीन ली थी |कल उनका शरीर  भी निष्प्राण हो गया |

अटल जी अब हमारे बीच नहीं हैं लेकिन जिन मूल्यों के लिए वे जिये,उनके रूप में दिए गए योगदानो द्वारा वे सदैव हमारी स्मृतियों में जीवित रहेंगे |उनकी स्मृति को प्रणाम |      


72 वे स्वतंत्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं 

 

किसी के हाथ की कठपुतली बनना उचित नहीं 

रामकुमार सेवक   

अपने दिमाग की डोर किसी और को थमा देनी उचित नहीं क्यूंकि किसी भी मनुष्य के साथ परमात्मा ने भेदभाव नहीं किया है |हर मनुष्य को परमात्मा ने एकसमान क्षमता और अवसर प्रदान किये हैं तो आप स्वयं अपने लिए सर्श्रेष्ठ कर सकते हैं बशर्ते अपने ज्ञान का पूरा उपयोग करें ,विवेक को जीवित रखें |

दो दिन पहले सुबह के वक़्त  बस स्टैंड पर बस की प्रतीक्षा कर रहा था |सामने से एक दूध बेचने वाला सज्जन आया और बाइक खड़ी करके वहीं खड़ा हो गया |उसने टी-शर्ट पहन रखी थी, जिस पर लिखा था- follow  your  heart  but  take  your  brain  with .यह पढ़कर मुझे बहुत मज़ा आया |मैंने उस सज्जन से कहा कि-क्या आपको पता है कि आपकी टी-शर्ट पर कितनी अच्छी बात लिखी है |

वह बोले-मैं तो अनपढ़ हूँ,मुझे नहीं पता कि क्या लिखा है ,आप बता दीजिये ?

मैंने कहा -इसमें लिखा है कि अपने दिल की बात मानो लेकिन अपना दिमाग साथ रखो |

यह सुनकर उसे ख़ुशी हुई |मगर मैंने सोचा कि यह पढ़कर सबको ख़ुशी नहीं होगी , कुछ लोगों को यह बात पढ़कर अफ़सोस भी हो सकता है |

ये वो लोग हैं जो आपको सत्यनिष्ठ नहीं अंधनिष्ठ बनाना चाहते हैं,मानसिक रूप से अपना गुलाम बनाना चाहते हैं |ये लालची लोग चाहते हैं कि आप उनकी मुट्ठी के खिलोने बने रहो |धर्म के नाम पर अथवा किन्हीं और भ्रमो के कारण उनके मोहरे बने रहो |

भारत में यह बहुत होता है,लोगों को बहकाकर उन्हें राष्ट्रीय संपत्ति और जन मानस को नुक्सान पहुंचाने के लिए प्रेरित किया जाता है |स्वामी विवेकानंद ने कहा था कि धर्म भारत की नस -नस में बसा है |जीवन में कोई परिवर्तन लाना हो तो उसे धर्म का अंग बना दो तो वो परिवर्तन हो जाएगा |

स्वामी जी ने जनता की धर्मप्रियता के मर्म को पहचाना था |लोकमान्य तिलक ने इस मर्म को पहचानकर गणेश चतुर्थी को स्वतंत्रता की अलख जगाने माध्यम बना लिया |महात्मा गाँधी ने सत्याग्रह और अहिंसा के तत्व लिये और जन-जन को स्वतंत्रता सेनानी बना दिया |   

जो रचनात्मक विचारों वाले महात्मा थे उन्होंने धर्म के इस मर्म का उपयोग जनता को जगाने के लिए किया जबकि लालची और स्वार्थी लोगों ने अपना लालच पूरा करने में |

गोस्वामी तुलसीदास जी ने कहा है-बिनु सत्संग विवेक न होइ अर्थात विवेक जागना जरूरी है |इस परिपेक्ष्य में उस टी-शर्ट पर लिखे सन्देश की प्रासंगिकता के बारे में सोचिये |साथ ही उन लोगों के बारे में भी सोचिये जो आपको अपना दिमाग इस्तेमाल न करने की सलाह देते हैं |उनसे कहिए कि-जिस प्रकार शरीर का हर अंग परमात्मा ने हमें दिया है इसी प्रकार दिमाग भी परमात्मा ने ही दिया है |हमें इस दिमाग से अपने द्वारा होने वाले हर काम के औचित्य के बारे में सोचना है और जीवन में नवनिर्माण करना है |

आज 72 वे स्वतंत्रता दिवस पर आईए स्वार्थी तत्वों तथा मानवविरोधी शक्तियों के हाथों की कठपुतली  बनने से इंकार करें और मन-वचन-कर्म से सम्पूर्ण मानवता की भलाई के लिए काम करें क्यूंकि काम करने की यह स्वतंत्रता हमारे महान पूर्वजों के बलिदानो से मिली है |सिर्फ यही एक तरीका है जिससे हम अपने पूर्वजों के ऋण से उऋण हो सकते हैं ,धन्यवाद       


क्रांति लाने का उनका तरीका 

रामकुमार सेवक 

विभाजन के बाद बाबा अवतार सिंह जी दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में निवास कर रहे थे | वह भारत में एक अनूठे मिशन की शुरूआत कर रहे थे |मुट्ठी भर लोग थे जो उनके साथ भारत आये थे |जो उनमें अपने सतगुरु बाबा बूटा सिंह जी की छवि देखते थे |1943  में बाबा बूटा सिंह जी ने उन्हें अपना उत्तराधिकारी बनाया था इसलिए बाबा जी की आशाओं को पूरा करना उनका दायित्व भी था जिसके लिए उन्हें किसी को जवाब नहीं देना था लेकिन उन्हें अच्छी तरह मालूम था कि उन्होंने हवा का रुख बदलना है |

इसके लिए सिर्फ अच्छा बोलना काफी नहीं था बल्कि व्यवहार के स्तर नए कीर्तिमान स्थापित करने थे |खुद को रोशनमीनार बनाना था ताकि विभाजन के भयंकर दौर से बचकर आये आशावान भक्तों को जीने का सहारा मिले |

यद्यपि बाबा अवतार सिंह जी स्वयं भी इस विभीषिका के  शिकार थे लेकिन निरंकार को आधार बनाने का स्वभाव होने के कारण उन्होंने स्वयं को इस प्रकार बचाये रखा जैसे बत्तीस दांतों के मध्य जीभ |निरंकार ने भी उनकी रक्षा की और वे स्वयं भी सुरक्षित थे और निरंकारी अनुयाई भी |

मुझे उनके शरीर रूप में दर्शन करने का सौभाग्य नहीं मिला लेकिन उनकी जीवन शैली को मैंने समझने की कोशिश की |मुझे ऐसे सन्तों का साथ मिला जिन्होंने बाबा जी के न सिर्फ दर्शन किये थे बल्कि उनके मार्गदर्शन में जीवन भी जिया था |उनमें से एक थे पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब ,जिनकी लिखी किताबों ने मुझे बाबा अवतार सिंह जी और बाबा गुरबचन सिंह जी को नजदीक से दिखाया |उन किताबों के माध्यम से मैंने उस समय के सन्तों के बारे में भी जाना |

मैं सोचता हूँ वह कौन सा जादू था जो बाबा अवतार सिंह जी ने अपने अंदर पैदा किया और अनेकों के लिए रोशन मीनार बने |

मैं जिन निष्कर्षों पर पहुंचा हूँ कोशिश करूंगा उन गुणों की एक-एक करके सन्दर्भ सहित चर्चा करूँ | उनमें से पहला गुण है- सत्यनिष्ठा | आज़ादी के बाद के राजनीतिक  वातावरण ने सत्यनिष्ठा की गरिमा को कम किया है लेकिन मैं इस शब्द के वास्तविक अर्थ की बात कर रहा हूँ |बाबा अवतार सिंह जी ने गुरमुखों-सन्तों के बारे में कहा है-

गल अपणी दा पहरा देंदे जो वी बोलन-चालण वो |

यह है सत्यनिष्ठा ,जो उन्होंने अपने जीवन में अपनायी थी |साठ के उसी दशक की बात है |बाबा अवतार सिंह जी दिल्ली के पहाड़गंज क्षेत्र में रहते थे |बाबा अवतार सिंह जी की शिक्षा -दीक्षा तो ज्यादा नहीं हुई थी लेकिन अपने संघर्षों -अनुभवों और सतगुरु बाबा बूटा सिंह जी से जो कुछ सीखा ,उसे अपने जीवन में लागु किया तभी हालातों से जूझ रहे लोगों को संभाल पाए |

उन्होंने कुछ जीवन मूल्यों को स्थापित किया उनमें एक था दूसरों का ख्याल रखना |कोई यदि सत्संग में नहीं पहुँच पाता तो बाबा जी स्वयं उसकी खोज -खबर लेते थे | उन्होंने मालिक राम साजन जी और उनकी धर्मपत्नी को किस प्रकार अपनेपन की हमदर्दी से संभाला वह प्रसंग भी मुझे याद आ रहा है |अपनी छात्रावस्था में मुझे मालिक राम जी का आशीर्वाद लेने का मौका मिला है |मालिक राम जी एक प्रचार यात्रा पर मुरादनगर आये थे,तब मैं छात्रावस्था में था और युगपुरुष पुस्तक मैंने ताज़ी-ताज़ी पढ़ी थी तो मैंने उनसे उस प्रसंग की चर्चा की |और उन्होंने इस प्रसंग की सत्यता प्रमाणित की थी  |

हुआ यह कि बाबा अवतार सिंह जी सहज ही मालिक राम जी के घर आये |महात्मा उस समय काम पर गए हुए थे |समय संभवतः दोपहर का था | खाने का समय था तो मालिक राम जी की पत्नी (रामप्यारी जी )ने खाना लगा दिया |तब तक मालिक राम जी भी आ चुके थे तो बाबा जी ने जोर दिया कि दोनों एक साथ खाएंगे |माता रामप्यारी जी महात्मा को संकेत दे चुकी थीं कि घर में जितना आटा था उसकी बनी रोटियां थाली में आ चुकी हैं |

बाबा जी ने जब दोनों की थाली साथ लगाने पर जोर दिया तो दोनों की आँखों में आंसू आ गए |

बाबाअवतार सिंह जी ने उन्हें समझाया कि आप लोगों ने मुझे अपना नहीं समझा इसीलिए सच्चाई मुझसे छिपाई |अच्छा हुआ निरंकार ने मुझसे सच्चाई बता दी |बाबा जी ने भोजन स्वीकार तो कर लिया लेकिन दस-पंद्रह दिनों का राशन महात्मा के घर में डलवाया |इस प्रकार अपनत्व की अमिट छाप दोनों के दिलों पर लगाकर वापस आये |

मालिक राम जी को पूरी अवतार बाणी कंठस्थ थी |उनके बेटे सुखदयाल जी बाबा हरदेव सिंह जी के मित्र रहे हैं  |निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के सत्संग हॉल में मालिक राम जी को अवतार बाणी का गायन करते हुए मैंने  स्वयं सुना है |

मुरादनगर  जब वे आये थे तो उन्होंने बताया था कि -पहले ज्योतिषी कहते थे कि तेरे हाथ में तो कुछ भी नहीं है |अब वही  ज्योतिषी कहते हैं कि सब कुछ है |इसे वे गुरु की कृपा का चमत्कार मानते थे | 

जहाँ तक मुझे स्मरण है,उन्होंने इंग्लैंड की धरती पर,बाबा हरदेव   सिंह जी के युग में ही शरीर त्यागा |

यह था बाबा अवतार सिंह जी का क्रांति लाने का तरीका-सत्यनिष्ठा और अपनत्व , जिसे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज हमारे जीवन में देखना चाहते थे |   

पाप से तो बचना चाहिए लेकिन पुण्य में क्या हर्ज़ है?

रामकुमार सेवक 

युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी ने 1965  में सम्पूर्ण अवतार बाणी की रचना की |चूंकि इसकी भाषा और भाव बहुत सरल है इसलिए विद्वानों ने इसको समुचित महत्व नहीं दिया लेकिन दिव्य विभूति के अनुभवों  को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए क्यूंकि उसकी गहराई को समझने के लिए सिर्फ विद्वता काफी नहीं है बल्कि ह्रदय में भक्ति चाहिए |

बाबा अवतार सिंह जी सम्पूर्ण अवतार बाणी के एक शब्द में  कहते हैं- 

ऐ मेरे मन ओट लेया कर रब दे क़ामिल बन्दे दी,

तन-मन-धन सब अर्पण कर दे सोहबत छड़ दे मंदे दी |

इसी शब्द में आगे यह भी कहा गया है-   

 ऐसे जन दे दर्शन करके पाप-पुण्य मिट जांदा ए | 

पहली नज़र में यह बात हज़म नहीं होती कि पाप के साथ पुण्य भी नष्ट हो जाएँ --क्यूंकि पुण्य इकट्ठे करने के लिए इंसान बहुत सारे सत्कर्म करता है और उन सत्कर्मो से एकत्रित सब सत्कर्म नष्ट हो जाना तो बड़ा नुक्सान है लेकिन बाबा अवतार सिंह जी यदि पाप के साथ पुण्य भी नष्ट होने को ,भक्ति में सहायक मान रहे हैं तो जरूर उनका कुछ गहरा अर्थ होगा |बुद्धि को उस दिशा में सक्रिय किया और मालिक से अरदास भी की कि उनके ह्रदय के तत्व तक पहुँच पाऊं |

इस दिशा में सोचने पर पहला ख्याल तो यह आता है कि पुण्य करने की एक हानि तो यह है कि -पुण्य करने का अहंकार हो सकता है और अहंकार सदैव डुबोने वाला सिद्ध होता है |

दूसरा ख्याल आता है कि -पुण्य करने के पीछे भाव यदि नाम के लालच का था तो  वो सेवा की बजाय डुबोने वाला ही सिद्ध होता है |तीसरी बात यह है   कि पुण्य के कारण हम स्वर्ग की कल्पना में खो जाते हैं जबकि स्वर्ग और नर्क दोनों ही मुक्ति अथवा मोक्ष के बराबर नहीं हैं इसलिए अस्थायी हैं| क्यूंकि किये गए पुण्य एक निश्चित संख्या में होते हैं जबकि आत्मा असीम है इस प्रकार स्वर्ग किसी इंसान का सदैव साथ नहीं देते |  

रामायण धारावाहिक में बहुत कुछ देखकर सीखने का अवसर मिला है |कल यू ट्यूब पर सीता स्वयंवर का प्रसंग देख रहा था |राम जी के धनुष तोड़ने के बाद परशुराम जी आये और लक्ष्मण जी के साथ उनकी गर्मागर्म बहस हुई |लक्ष्मण जी की यह भूमिका उनका अधैर्य तो दिखाती है लेकिन लक्ष्मण जी की बातें भी यथार्थ थीं |यदि परशुराम जी क्रोध के प्रभाव में नहीं होते तो स्थिति इतना विकट रूप लेती ही नहीं |यह अक्सर हमारे साथ भी होता है |बहरहाल रामजी ने सतगुरु वाली भूमिका निभायी जबकि उस समय वे दूल्हे की भूमिका में थे |

बहरहाल राम जी के प्रति अपनी शंका का निराकरण करने के लिए परशुराम जी ने उन्हें धनुष देकर उसकी प्रत्यंचा चढाने की प्रार्थना की अर्थात बड़ी आयु के बावजूद परशुराम जी मन से यह मान चुके थे कि राम जी ईश्वर के अवतार हैं |

इसी प्रसंग में पाप-पुण्य का मामला अब आगे  शुरू होता है -राम जी परशुराम जी से कहते हैं कि -इस बाण को किसी न  किसी पर छोड़ना होगा |यह अमोघ है काम करके ही रहेगा |मैं आप पर यह बाण छोड़ना नहीं चाहता |दूसरी चीज है मन की गति से आपकी आने-जाने की शक्ति ,क्या मैं उसे ख़त्म करूँ या आपके अर्जित पुण्य कर्मो को ?

परशुराम जी कहते हैं -अर्जित पुण्य कर्म हमारा अभिमान बढ़ाते हैं तो प्रभु ,उन्हें ही नष्ट कर दो |

अब सम्पूर्ण अवतार बाणी की वो पंक्ति याद करें -ऐसे जन दे दर्शन करके पाप -पुण्य मिट जांदा ए |अर्थात पुण्य को मिटाने के लिए परशुराम जी ने भी रूचि ली इसका अर्थ है कि बाबा अवतार सिंह जी जिस निष्कर्ष पर पहुंचे उसका महत्व परशुराम जी ने भी महसूस किया था |

एक तथ्य यह भी है कि पुण्य कर्म मोक्ष या मुक्ति में कोई मदद नहीं करते अपितु एकत्व की अवस्था में बाधक ही बनते हैं इसलिए भी सन्त महात्मा सत्कर्म तो करते हैं लेकिन उनका बदला नहीं चाहते इस प्रकार इन्हें अधिक महत्व नहीं देते |मालिक ने कृपा की बुद्धि को दिशा मिली परशुराम जी के इस प्रसंग से सम्पूर्ण अवतार बाणी के उपर्युक्त शब्द का महत्व समझ में आता है |        


ईमानदारी और निःस्वार्थ सेवा के गुणों के बीज बोये उन्होंने  

रामकुमार सेवक 

निरंकारी मिशन मुझे उतना ही जरूरी लगता है जितना सांसों के चलते रहने के किए-ऑक्सीजन |इस महत्व का कारण है -मिशन की कुछ अनूठी परम्पराएं |

यह धनप्रधान युग है |बिना धन के लालच के अब कोई कुछ नहीं करता लेकिन सन्त निरंकारी मिशन में  सामान्य गुरसिख और सेवादल के जवान निःस्वार्थ भाव से सबका स्वागत -सत्कार करते हैं |

आज के युग में कोई कल्पना भी नहीं कर सकता कि वार्षिक सन्त समागमों में भाग लेने के लिए जो  निरंकारी भक्त लाखों की संख्या में दिल्ली आते रहे हैं उन्हें निरंकारी मिशन की ओर से कोई आर्थिक सहायता नहीं मिलती |वे तीर्थयात्रा के श्रद्धा भाव से अपने सत्गुरु का सन्देश सुनने और अपने गुरुभाईयों -बहनो का प्रेम पाने आते हैं |प्रेम और भक्ति के ये जीवनमूल्य अनायास ही पैदा नहीं हो गए बल्कि निरंकारी सत्गुरुओं ने अपने व्यवहार से ऐसे संस्कार दिए ,जिनके कारण आम श्रद्धालु  बदले की भावना   अथवा धन का लालच नहीं रखते | निरंकारी मिशन के द्वितीय सत्गुरु युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी ने इन संस्कारों को व्यापक बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभायी |उन्होंने प्रेरणापुरुष की इस भूमिका को निभाने के लिए किस प्रकार की परिस्थितियों पर और कैसे विजय प्राप्त की,इसकी झलक को आईए करीब से देखें -   

      युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी ने जीवन के विभिन्न पक्षों को गहराई से देखा और ज़िया था |वे निर्धन परिवार में जन्मे लेकिन लगातार प्रयास करके खूब उन्नति की |

बाबा बूटा सिंह जी की कृपा से अध्यात्म में भी खूब तरक्की की |अपनी भक्ति के प्रभाव  से हज़ारो जीवन महकाए और परोपकार का भाव रखने के कारण शहनशाह भी कहलाये  |

युगपुरुष पुस्तक में पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब ने उनके बारे में लिखा है कि-उनके पिताजी का देहांत उनके बचपन में ही हो गया था |उनकी माता जी ने बहुत मेहनत से उनका पालन-पोषण किया | चौदह-पन्द्रह  वर्ष की कच्ची आयु में ही उन्होंने रावलपिंडी के रेलवे स्टेशन पर कुली का काम किया |उन्होंने मेहनत और ईमानदारी के बल पर जीवन के संघर्षों पर विजय पायी |

महात्मा पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब ने युगपुरुष पुस्तक में लिखा है कि सेठ सावन मल जी एक दिन रेलगाड़ी से उतरे |उन्हें सामान तांगे तक पहुंचाने और लदवाने के लिए कुली की आवश्यकता थी |उन्होंने अवतार जी की सेवा ली |उन्हें बच्चे पर दया आ गयी और ज्यादा पैसे देने चाहे लेकिन अवतार जी तय मेहनताने से ज्यादा एक पैसा भी लेने को तैयार नहीं हुए |

यह तथ्य गौर करने लायक है कि वे निर्धन अवस्था में होने के बावजूद पूर्णतः ईमानदार थे और लालची भी नहीं थे |हालांकि वे उस समय 14 -15  वर्ष के किशोर रहे होंगे |किशोर अवस्था में एक प्रकार की चंचलता हावी होती है युगपुरुष पुस्तक से जितना भी मैंने जाना है,उससे लगता है कि (उस समय ब्रह्मज्ञानी नहीं होने पर भी )उनके व्यवहार में अनूठी गंभीरता थी | 

 सेठ सावन मल जी का बेकरी का कारोबार था |उन्होंने अवतार जी की मेहनत और ईमानदारी  को देखकर कहा कि मेरी दुकान पर आना |अवतार जी की सेठ जी ने परीक्षा भी ली |कहते हैं कि सेठ जी जान-पूछकर पैसे रखे छोड़ देते थे ,इस प्रकार वे अवतार जी की ईमानदारी को परख रहे थे लेकिन  अवतार जी हर परीक्षा में खरे उतरे |तब  सेठ जी ने उन्हें बेकरी का काम सिखाया और कालांतर में उन्होंने खूब तरक्की की और सेठ सावन मल जी के आशीर्वाद से उन्होंने स्वयं की बेकरी की दुकान शुरू की |

जहाँ तक मुझे स्मरण है ,उसी दुकान पर उनकी भेंट धन्ना सिंह अथवा अनूप सिंह नामक दूध बेचने वाले सज्जन से हुई |उसी ने उन्हें बाबा बूटासिंह  जी से मिलवाया और अंततः बाबा बूटा सिंह जी ने 1929  के मई माह में उन्हें ब्रह्मज्ञान प्रदान किया |

बाबा बूटा सिंह जी ने भी उनकी कई परीक्षाएं लीं तभी 1943  में उन्हें अपना उत्तराधिकारी भी  घोषित किया |उनका युग ऐसा था कि आज भी लोग याद करते हैं क्यूंकि उस युग में प्रदर्शन की भावना नहीं थी |  दिये गए वचन की रक्षा करने अथवा सत्वचन की परंपरा थी और आपसी प्रेम व् विश्वास था |

बाबा अवतार सिंह जी की गुरुभक्ति भी अनूठी थी ,उसकी चर्चा आगे करेंगे |आज तो यही कहना चाहता हूँ  कि सत्गुरु की  शरण में आने से पहले भी उनका जीवन  सुन्दर और श्रेष्ठ था जिसके कारण ब्रह्मज्ञान उनके जीवन में रच-बस गया और वे ज्योति स्तम्भ अथवा रोशन मीनार सिद्ध हुए |  

क्या गुरु-पैगम्बर या अवतार से मिलने पर भी यह खाली रह जाता ?  

रामकुमार सेवक 

बाबा बूटा सिंह जी महाराज  के समर्पित शिष्य बाबा अवतार सिंह जी को जीवन के हर क्षेत्र का अनुभव था |यह अनुभव कोई एकदम नहीं आ गया था बल्कि स्वच्छ मन से अपने सतगुरु के प्रति समर्पण और जीवन के उतार चढ़ावों में अपनी भक्ति अडिग रखने से आया था |

सतगुरु बाबा बूटा सिंह जी उन्हें अपने व्यवहार से सिखाते थे कि भक्ति का मर्म यह है ?

बाबा बूटा सिंह जी ने एक दिन उनसे कहा-भाई अवतार सिंह जी,आईए आपको एक कौतुक दिखाता हूँ |बाबा अवतार सिंह जी उनके समर्पित शिष्य थे इसलिए सोचने लगे कि-बाबा जी का कौतुक देखते हैं |

यह शायद रावलपिंडी की बात है,बाबा जी एक ज्योतिषी की दुकान में गए |हमारे पुराने बुजुर्ग बताते हैं कि बाबा बूटा सिंह जी का व्यक्तित्व शानदार था |कोई राजा या जागीरदार लगते थे |

सतगुरु को अपनी इन्द्रियों पर पूरा नियंत्रण होता है इसलिए सतगुरु को महाराज कहा जाता है |आत्मनियंत्रण की अद्वितीय क्षमता किसी को भी उनके आगे नतमस्तक कर देती है |

बाबा बूटा सिंह जी को देखकर ज्योतिषी अपने स्थान से उठकर खड़ा हो गया और बाबा अवतार सिंह जी से बोला-आपके साथ जो ये सज्जन आ रहे हैं ,वे कोई पैगम्बर ,महापुरुष या अवतार हैं |

अपने सतगुरु की प्रशंसा सुनकर बाबा अवतार सिंह जी को बहुत ख़ुशी हुई और उन्होंने उस ज्योतिषी को कुछ धन देना चाहा लेकिन बाबा बूटा सिंह जी ने अपने शिष्य को रोक दिया और वहां से बाहर निकलने लगे |

युगपुरुष पुस्तक में पूर्णप्रकाश साक़ी साहब ने लिखा है कि दोनों बाहर निकलने लगे तो बाबा अवतार सिंह जी ने कहा-बाबा जी आपने ज्योतिषी को कुछ देने से मुझे क्यों रोक दिया ?

बाबा बूटा सिंह जी ने कहा-यह आदमी या तो विद्वान नहीं है या अपनी ही बात का इसे विश्वास नहीं है |

बाबा अवतार सिंह जी ने एक जिज्ञासु की दृष्टि से बाबा बूटा सिंह जी की तरफ देखा | बाबा जी ने कहा-यह आदमी मेरे बारे में कह रहा था कि मैं गुरु-पीर-पैगम्बर या अवतार हूँ |यदि इसे अपनी बात पर यकीन रहा होता तो क्या यह  गुरु-पीर-पैगम्बर या अवतार से इस निरंकार प्रभु का ज्ञान लेने की कोशिश नहीं करता क्या गुरु-पैगम्बर या अवतार से मिलने पर भी खाली रह जाता ?

बात समझ में आ गयी कि इस निरंकार को activate  करने के लिए इस पर विश्वास करना पड़ता है |जो इस निरंकार का एहसास कर चुके हैं वे यह विश्वास करते हैं कि यह खाली नहीं भरपूर है |इस भरपूर को सामने देखने के कारण ये अपने कर्मो में पवित्रता रखते हैं |मेरा तो अनुभव है कि यह निरंकार माँ की तरह मेरी देखभाल करता है |जैसे ही मन से इस विराट की शरण में आता हूँ तो तुरंत राहत मिलनी शुरू हो जाती है |उस अवस्था में महसूस होता है कि एक माँ जिस प्रकार अपने बच्चे की हर सेवा करती है यह भी अपने शरणागत की छोटी से छोटी सेवा करता है और तन-मन-धन की शक्ति देकर अप्रत्यक्ष रूप में सेवा करवाता भी है |

उपर्युक्त प्रसंग में बाबा बूटा सिंह जी ने हमें विश्वास की आवश्यकता सिद्ध करके बतायी है | 


हम भीड़ का जंगल हैं या जाग्रत समाज ?

रामकुमार सेवक 

अस्सी के दशक में जब सन्त निरंकारी मिशन बड़े संकटों के बीच फंसा था तो यह गीत बहुत गाया जाता था कि-  

सदा से ये किस्सा पुराना रहा है,हकीकत का  दुश्मन ज़माना रहा है |

हकीकत की परिभाषा हर दौर में अलग-अलग रही है ,इसे यूँ भी समझ सकते हैं कि पेड़ एक था उस पर चिड़िया भी एक थी ,जिसकी आँख में निशाना लगाना था |लेकिन सामने क्या नज़र आ रहा है इस प्रश्न के (जितने शिष्य थे )सबके अलग-अलग जवाब थे और वे सब जवाब उनके हिसाब से सही थे लेकिन जो सही उत्तर होता है वो हमेशा एक ही होता है |वो है-

आद सच ,जुगाद सच है भी सच ,नानक होसी भी सच |

ऐसा सच है-एक निराकार प्रभु |

एक निराकार प्रभु का जो रहस्य उजागर करे उसे सतगुरु कहते हैं और जो इस निरंकार प्रभु का एहसास करके इसी में निवास करता है वह निरंकारी होता है |

सत्तर के दशक में ही निरंकारी समागमों में भीड़ दिखने लगी थी |बाबा हरदेव सिंह जी के कार्यकाल में यह भीड़ कई गुना बढ़ गयी |मेरे जैसे नादान लोग उस भीड़ को देखकर बहुत खुश होते थे |भीड़ को हम सफलता का पैमाना मानने लगे थे लेकिन उस समय अनुभवी और बुजुर्ग महात्मा जीवित थे |वे हकीकत को बहुत अच्छी तरह पहचानते थे |मान सिंह जी मान ऐसे ही सहृदय बुजुर्ग थे |वे कहते थे कि भीड़ का कोई दींन -ईमान नहीं होता |अपने निष्कर्ष के समर्थन में वे यह काव्यांश सुनाते थे-

सिंहंन  के लहंडे नहीं ,हंसन की नहीं पांत  

लाल न हुन्दे बोरियां ,साध न चले जमात |

उनका कहना था कि शेरों की बहुत सारी संताने नहीं होतीं |हंसों की अनेक  पंक्तियाँ नहीं होतीं |जिस प्रकार हीरे मोती-जवाहरात बोरियों में भरने लायक संख्या में नहीं होते इसी प्रकार सन्तों-महात्माओं की भी भीड़ नहीं होतीं |

मैं उनसे कहता था कि सन्तों-महात्माओं की भीड़ भी तो हो सकती है ,गुरु के लिए तो सब कुछ संभव है लेकिन उस्ताद मान जी मेरी इस नादानी पर सिर्फ मुस्कुरा देते थे |     

देखा यह जाता है कि भीड़ की भेड़चाल होती है जिसका कोई विज़न नहीं होता |सबसे बड़ा सवाल यह है कि सतगुरु के विज़न को विश्वासघात और अंधनिष्ठा के हाथों नष्ट होने से कैसे बचाया जाए ?

 2015 के वार्षिक सन्त समागम में मैंने भीड़ के पक्ष में एक कविता पढ़ी थी जिसकी सबने सराहना की थी और आदरणीय अवनीत सेतिया जी ने तो उस दिन उस कविता को अपने वक्तव्य का माध्यम भी बनाया था ,मेरे नाम के उल्लेख के साथ |आज मुझे लगता है कि भीड़ जुटाना आसान है लेकिन उसके भीतर से सन्त-महात्मा पैदा करने कठिन हैं |

बाबा हरदेव सिंह जी ने स्वयं एक बार स्वीकार किया कि ऐसा लगता है जैसे पानी को मथ रहा होऊं |वर्ष  2016 में हमने उनके दर्द की सच्चाई महसूस की |

उस दर्द की हकीकत हमने भली भाँति महसूस की और कर रहे हैं लेकिन वक़्त कभी किसी के लिए नहीं रुकता |उस दर्द को हम भूल नहीं सकते लेकिन अपने आप में भक्ति की एक नयी ऊर्जा तो पैदा कर सकते हैं |इसके लिए चाहिए सत्यनिष्ठा और सतगुरु के विज़न की पहचान |

तीन -चार महीने पुरानी एक  घटना याद आ रही है |विगत 31 मार्च को ग्राउंड न, 8(दिल्ली ) में सत्संग हो रहा था |पूज्य माता जी अपने प्रवचन शुरू करने ही करने वाली थी कि सामने से मंडल की बस स्टार्ट हो गयी |बस की आवाज़ माता जी की आवाज़ पर भारी पड़ गयी |प्रश्न पैदा हुआ कि क्या इतनी जल्दबाजी ठीक है कि उनके प्रवचन ही दब जाएँ जिन्हें हम उस समय गुरु मानते थे ?

यह एक बड़ा प्रश्न है क्यूंकि मिशन भीड़ का नाम नहीं है बल्कि उस विज़न को व्यवहार में लाने का नाम है जो सदैव से सतगुरु के मन-मस्तिष्क और प्रवचन में स्थित रहा है |यदि हम सतगुरु के प्रवचन गंभीरता से नहीं सुनते तो सतगुरु के विज़न को कैसे अपने दिल-ओ- -दिमाग में बिठाएंगे और कैसे हकीकत से वाकिफ होंगे ?

उस अवस्था में हम स्वयं भीड़ के हिस्से होंगे और अपने रहनुमा के लिए एक समस्या |

हमें स्वयं सत्यनिष्ठा से अपने आपको भीड़ से अलग करना होगा ,स्वयं को एक गुरसिख सिद्ध करना होगा क्यूंकि इतिहास हमारा मूल्यांकन इस बात से करेगा कि कर्म के स्तर पर गुरु का स्थान हमारे जीवन में कहाँ है ?  


अपना हिसाब-किताब साफ़ रखना जरूरी है 

रामकुमार सेवक   

वास्तविकता यह है कि हम सबका जीवन कुछ calculations (गणनाओं )का परिणाम भर है |वर्ष 1981  से 1983 के बीच मैं मुज़फ्फरनगर में एक तकनीकी डिप्लोमा कोर्स कर रहा था |रोज दोपहर में मैं घास मंडी के इलाके से गुजरता था |वहां एक कोठी थी उस कोठी की पहली मंज़िल पर संगमरमर पर एक अर्थपूर्ण बात लिखी हुई थी ,जिसे मैं रोज घर जाते समय पर पढता था-दुःख के बीज जवानी के दौरान राग-रंग-विलासिता के द्वारा बोये जाते हैं,जिनकी फसल बुढ़ापे में दुःख भोग द्वारा काटनी पड़ती है |

मेरी आयु उस समय अठारह वर्ष के आस-पास थी लेकिन बचपन से ही निरंकारी मिशन से जुड़ा होने के कारण स्वभाव में एक प्रकार की गंभीरता थी ,जिसके कारण अब तक मैं इन पंक्तियों को विस्मृत नहीं कर पाया हूँ |

पिछले दिनों महात्मा बुद्ध को पढ़ रहा था -एक प्रसंग आया कि महात्मा बुद्ध को कुछ लोगों ने गालिया दीं |महात्मा बुद्ध चुपचाप अपने रास्ते पर जाते रहे |

उनके शिष्यों में से एक ने पूछा-उन्होंने आपको गालियां दीं और आपने जवाब नहीं दिया |बुद्ध ने कहा कि क्या आप सोचते हैं कि मैं भी उन्हें गाली देता ?अरे,कभी किसी वक़्त मैंने उन्हें गाली दी होगी तभी तो वो मुझे गालियां दे रहे हैं |अगर अब मैं उन्हें फिर गालियां देता तो मुझे फिर गालियां सुननी पड़तीं इसलिए मैंने यह सिलसिलाआगे नहीं बढ़ाया |

यह पढ़कर मुझे बहुत अच्छा लगा और किसी विचारक की यह बात याद आ गयी कि किसी के साथ वैसा व्यवहार मत करो जो आप खुद के लिए नहीं चाहते |मुझे इस सन्दर्भ में महात्मा बुद्ध का यह प्रसंग बहुत दमदार लगा और जवानी के दिनों का वह वाक्य भी याद आ गया, जो मुज़फ्फरनगर में एक कोठी पर लिखा था |

तीनो वाक्यों को जोड़कर देखिये तो मामला साफ़ हो जाता है कि-परमात्मा की चक्की बिना आवाज़ किये चलती रहती है लेकिन पीसती बहुत बारीक है |इसके न्याय से किसी का भी छूटना संभव नहीं है इसलिए अपना हिसाब-किताब (Calculations ) साफ़ रखनी जरूरी हैं |       


सिर्फ तालियां बजवाने के लिए कविता लिखना बहुत खतरनाक है

रामकुमार सेवक 

आज सुबह अवतार पार्क ,निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में  एक युवक महात्मा ने प्रश्न किया कि-क्या मुक्ति मिलनी आवश्यक है? 

मुक्ति या मोक्ष बहुत दुर्लभ उपलब्धि है इस कारण मुझे यह प्रश्न कुछ हल्का लगा ?

मैंने प्रतिप्रश्न किया कि-क्या मुक्ति प्राप्त करनी इतनी आसान है जबकि ऋषि-मुनियों ने इसके लिए भारी तपस्या की फिर भी मुक्ति की उपलब्धि हासिल नहीं हुई |

युवक बोला-हमने तो संगत में यही सुना है कि हम मुक्त हो चुके हैं लेकिन मैं मुक्ति नहीं चाहता बल्कि सदैव इस दुनिया में आते रहकर गुरु की रहमत पाते रहना चाहता हूँ,इसमें क्या हर्ज़ है ?

यह बात सुनकर मुझे लगभग 20 साल पुरानी घटना याद आ गयी |मेरे एक कवि मित्र ने एक कविता लिखी थी कि -युग-युग में गुरुभक्ति मिले तो मुझको मुक्ति नहीं चाहिए |

कुछ साल पहले एक कवयित्री संत ने भी गुरु पूजा दिवस के मंच से अपनी कविता में इस आशय के भाव व्यक्त किये थे और अच्छी-खासी तालियां बटोरी थीं |

तालियां बजवाने के लिए यदि यह घोषणा की जाती है तो यह बड़ा खतरा है क्यूंकि हर शब्द निरंकार में जीवित रहता है और उसकी ज़िम्मेदारी से बोलने अर्थात हम लोग बच नहीं सकते |

वे मित्र जिन्होंने -मुझको मुक्ति नहीं चाहिए की बात कही थी कुछ ही वर्षों के बाद सत्संग और समागमों से लुप्त हो गए और अब तक लुप्त हैं |तालियां बजवाने के लिए लिखी गयी कविताओं का परिणाम ऐसा ही दुखद निकलता है |बल्कि जब मुझे पत्रिका की सेवा से अलग किया गया था तो तब उन्होंने प्रश्न किया था कि-कब तक धन निरंकार बोलते रहोगे ?

कहने का भाव -मुक्ति नहीं चाहिए सोचने -कहने में बहुत खतरे हैं |जो युवक मेरे सामने थे ,मैंने उनसे कहा कि अभी तो इंसान का शरीर मिला हुआ है ,गुरु और ज्ञान भी उपलब्ध है |मुक्ति मिलनी सरल है लेकिन अभी तो शरीर है तो मुक्त कहाँ हैं क्यूंकि आशा-तृष्णा हमारे साथ हैं |

मैंने उनसे निवेदन किया कि -क्या गारंटी है कि अगला जन्म इंसान का ही मिले |यह भी संभव है कि  जन्म तो मिल जाए लेकिन ऐसे व्यक्ति के घर में जन्म हो जो अनीश्वरवादी अथवा नास्तिक हों |यह भी संभव है कि सोमालिया आदि किसी देश में पैदा हों जहाँ खाने -पीने के पदार्थों की भी भयंकर दिक्कत है |यह भी हो सकता है कि किसी आतंक पीड़ित देश में पैदा हो जाएँ | 

मैंने उनसे कहा कि अभी तो मालिक की कृपा (ब्रह्मज्ञान)प्राप्त हो चुकी है |समझाने वाला सतगुरु भी मौजूद है और संगत भी उपलब्ध है तो ज्यादा संभावना मुक्त हो जाने की है |यह अवसर चूक गए तो भटकन के सिवा कुछ गुंजाइश नहीं है बाकी आप मालिक हो |

उनके चेहरे पर संतुष्टि के भाव दिख रहे थे और आगे से उन्होंने कुछ पूछा भी नहीं |          

 

अपने समय से आगे के शायर थे -मिर्ज़ा ग़ालिब 

रामकुमार सेवक 

मिर्ज़ा ग़ालिब ने लिखा है-

था न कुछ तो खुदा था ,कुछ न होता तो खुदा होता ,

डुबोया मुझको होने ने,न होता मैं तो क्या होता |

उपर्युक्त शेअर पढ़कर मिर्ज़ा ग़ालिब की आध्यात्मिकता की झलक मिलती है जबकि उनके जीवन के बारे में जानने वाला कोई भी इंसान शायद ही उन्हें आध्यात्मिक मानने को राजी हो क्यूंकि मस्जिद और नमाज से प्रायः वे दूर रहते थे लेकिन उपर्युक्त पंक्तियों से पता चलता है कि वे खुदा की हकीकत से भली भाँति वाक़िफ़ थे |हम ,जिन्हें निरंकार प्रभु का ज्ञान मिला है,ब्रह्मवेत्ता गुरु की कृपा से ,भली भाँति जानते हैं कि ग़ालिब की ये पंक्तियाँ बिलकुल सच हैं |

जब ग़ालिब हुए उस समय दिल्ली में मुग़ल शासन था |शासन में इस्लामी विचारधारा का वर्चस्व था जिस कारण हिन्दुओं पर जज़िया (एक प्रकार का टैक्स)भी लगा हुआ था |इसके बावजूद ग़ालिब की सोच में साम्प्रदायिकता अथवा संकीर्णता का लेशमात्र भी नहीं था |वे विशाल दृष्टिकोण रखते थे जबकि उनका कोई आध्यात्मिक गुरु नहीं था | 

वह  विशालता  सिर्फ  मज़हब  के स्तर पर सीमित नहीं थी बल्कि साहित्यिक तथा विभिन्न संस्कृतियों के स्तर पर भी थी |   

मिर्ज़ा ग़ालिब जब कलकत्ता जाते समय बीच में अवध में रुके तब उन्होंने देखा कि शायरों में भी कैसे-कैसे बंटवारे हैं |अवध के दरबार में कोई दिल्ली वालो को नहीं टिकने देता और हैदराबाद में बाकी दूसरे शहर वालों को |हर दरबार में एक गुट हावी है जो बाकी लोगों को आगे नहीं आने दे सकता भले ही वे कितने ही प्रतिभासम्पन्न क्यों न हों |

इस दृष्टि से आज का समय काफी अच्छा और प्रगतिशील है क्यूंकि इस समय स्थानो के नामो पर बटवारे नहीं हैं |मिर्ज़ा ग़ालिब आगरा के थे |दिल्ली में तो उनकी ससुराल थी इसलिए शुरू में तो दिल्ली में भी उनकी खूब बेकद्री हुई |बाद में वे यहाँ  सम्मानित हुए लेकिन अंग्रेज़ो के शासनकाल में 1857 के बाद दिल्ली दरबार अर्थात मुग़ल शासन का सितारा भी डूबने लगा था |तब उन्होंने कहीं और जाने की सोची लेकिन कहीं गुंजाइश बनी नहीं |ग़ालिब स्थानो,भाषाओं ,मजहब आदि के नामो पर बंटवारे के खिलाफ थे |उन्होंने कहा था कि जयपुर,आगरा,लखनऊ और हैदराबाद आदि के बीच से अगर कहीं हिंदुस्तान पैदा हो सका तो उसकी किसी डाल पर मुझे भी बसेरा मिल जाएगा नहीं तो शहरो -प्रांतो में तो मेरा दम घुटता है |सही मायनो में वे आज के मिजाज़ के शायर थे जबकि पैदा 300 साल पहले हो गए थे |

ग़ालिब मानते थे उर्दू का जन्म हिंदुस्तान में ही हुआ है |जहाँ तक मेरी जानकारी है वे उर्दू को हिन्दू या मुसलमान की दृष्टि से नहीं देखते थे |उनका मानना था कि लिपि फारसी होने से उर्दू हिंदी से जुदा नहीं हो जाती |ये दोनों ही हिंदुस्तानी भाषाएँ हैं |  

इसके बावजूद यह भी सत्य है आज भी जहाँ जिन प्रांतो के लोगों का नेतृत्व है वहां प्रायः उन प्रांतो के लोगों को ही आगे बढाया जाता है ,बाकी प्रांतो की प्रतिभाओं को प्रायः अनदेखा करके |इससे ईर्ष्या और वैर के भाव उत्पन्न होते हैं ,जबकि हमारा संविधान सबके लिए समान अवसर मुहैया करता है |यह ईर्ष्या और वैर ही एक देश के लोगों में अलगाव के भाव पैदा करते हैं |

इस सम्बन्ध में मुझे बाबा गुरबचन सिंह जी का प्रगतिशील दृष्टिकोण याद आता है |हिंदी,उर्दू और अंग्रेजी आदि भाषाओँ में कौन सी भाषा श्रेष्ठ है ?किसी पत्रकार के पूछने पर बाबा जी ने कहा था कि भाषा तो जोड़ने की माध्यम है |कोई भी  भाषा छोटी या बड़ी नहीं होती है बल्कि प्रेम की भाषा ही सबको एक -दुसरे से जोड़ती है |इस प्रकार जिस भाषा में इंसान को इंसान से जोड़ा जाए सर्वश्रेष्ठ भाषा है | 

ग़ालिब के जीवन को जितना भी करीब से देखा अध्यात्म और विशालता  का भाव प्रबल होता चला गया |इस प्रकार अध्यात्म हमें प्रगतिशील बनता है,इस बारे में आपका क्या मत है ?सहमत हैं या असहमत कृपया खुलकर बताएं ताकि हम अपने आपको सही कर सकें-धन्यवाद   

ताकि विवेक जागा रहे और न करने योग्य कर्म न हों 

रामकुमार सेवक 

कल 21-07-2018 (शनिवार )को प्रातः सन्त निरंकारी सत्संग भवन ,पटेल नगर में साध संगत को सम्बोधित करने का अवसर मिला ,जिसमें कुछ मुद्दों पर विचार  अनायास ही सांझे हो गए |इन विचारों का आधार तो सम्पूर्ण अवतार बाणी का यह शब्द था-सतगुरु आउँदै जग दे अंदर सारे ही संसार लई |ध्यान आया कि-सतगुरु का संसार कुछ देशों तक सीमित नहीं है बल्कि जिन देशों का हमें मालूम भी नहीं है अर्थात आकाशमण्डल में स्थित ग्रह-  उपग्रह भी सतगुरु के संसार के हिस्से हैं क्यूंकि सतगुरु का ह्रदय सबके लिए खुला है |इसे यूँ भी कह सकते हैं कि जिसका ह्रदय सबके लिए खुला है,वही हमारा सतगुरु है |

बाबा हरदेव सिंह जी एक बार विश्व कल्याण यात्रा पर किसी देश में गए हुए थे |उन दिनों मेरे पास संत निरंकारी पत्रिका में छापने के लिए एक फोटो आया था जिसमें बाबा जी एक बुजुर्ग सज्जन से संवाद कर रहे थे |मुझे किसी प्रत्यक्षदर्शी ने बताया कि ये जो बुजुर्ग सज्जन हैं ये निरंकारी नहीं हैं |बाबा जी के नाम से भी ये परिचित नहीं हैं |इनकी भाषा हिंदी ,अंग्रेजी आदि से भिन्न है |अज़नबी देश और भाषा वाले सज्जनो के साथ भी सतगुरु का संवाद हो जाता है क्यूंकि प्रेम की भाषा का इस्तेमाल होता है |

मुझे यह भी ध्यान आ गया कि सतगुरु ने कभी भी हमें अपने शरीर के साथ नहीं जोड़ा |जैसे कि श्री गुरु नानक देव जी ने कहा-

एको सिमरो  नानका जो जल -थल रहा समाय 

दूजा काहे सिमरिये जो जम्मे ते मर जाए |

स्पष्ट है कि कोई भी शरीर परमात्मा का स्थान नहीं ले सकता लेकिन कोई भी आत्मा शरीर के माध्यम से ही संसार में विचरण करती है इसलिए हम शरीर का खंडन भी नहीं करते लेकिन हमारे सतगुरु ने हमें निराकार प्रभु के साथ ही जोड़ा है |

मुझे वर्षों   पुराना वाकया याद आ गया जब बाबा अवतार सिंह जी से कुछ महापुरुषों ने पूछा था कि क्यों न धन निरंकार के स्थान पर धन अवतार कहें क्योकि निरंकार का ज्ञान आपने ही हमें दिया है लेकिन सतगुरु का विजन बहुत स्पष्ट होता है वे व्यक्तिवादी नहीं होते |बाबा जी ने कहा कि निरंकार को ही धन्यता देनी है |मेरा शरीर भी आप की ही तरह पांच तत्वों का है लेकिन निरंकार सदैव रहा है और रहेगा |

ऐसे सतगुरु का हमें सदैव शुक्रगुजार होना चाहिए जिन्होंने हमें इस निरंकार से जोड़ा और शरीरों की कमजोरियों से बचा लिया |जो लोग निरंकार को खाली समझते हैं वे भूल में हैं क्यूंकि श्री कृष्ण तथा अन्य तत्वदर्शियों ने जिस विराट सत्ता का ज्ञान दिया वह निराकार था .है और रहेगा  |इस निराकार के एहसास को मन-बुद्धि में सदैव बनाये रखने की ज़रुरत है ताकि विवेक जागा रहे और न करने योग्य कर्म न हों |             


साध संगत  की झूठी कसम नहीं खानी--- 

रामकुमार सेवक  

विद्वानों का कहना है-कभी कसम मत खाओ क्यूंकि तुम्हारे दुश्मन को तब भी यकीन नहीं आएगा और दोस्त को पहले से ही यकीन होता है |इस दृष्टि से कसम का महत्व कुछ भी नहीं है लेकिन दुनिया में कसम का चलन बहुत पुराना है| 

बात लगभग 35-40 साल पुरानी है |मैं तब मुरादनगर (उत्तर प्रदेश )(आजकल राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के अंतर्गत )में पढता था |मेरी पैदाइश भी वहीं की है और 1973 में ब्रह्मज्ञान भी वहीं मिला ,महात्मा बलवंत सिंह जी के माध्यम से और मेरे प्रोत्साहनकर्ता डॉ.शक्ति सिंह जी की कृपा से |

1977 के आस-पास मुरादनगर में एक महात्मा निवास किया करते थे,हरबंसलाल जी |गुरमत की प्रारंभिक शिक्षा मुझे उन्हीं के माध्यम से मिली है |

साध संगत अथवा सत्संग की महत्ता बतलाते हुए हरबंसलाल जी ने एक बार कहा कि- गुरु जी अपनी गद्दी पर विराजमान थे |शिष्य अपनी श्रद्धानुसार उन्हें कुछ न कुछ पदार्थ भेंट कर रहे थे ,यह रोज का क्रम था जो उस दिन भी चल रहा था |एक शिष्य गुरु जी की सेवा में गुरु जी के पीछे खड़ा होकर पंखा झल रहा था |

मुझे यह घटनाक्रम इसलिए याद है क्यूंकि मैं  स्वयं उस दिन मंच पर आसीन महात्मा को पंखा झल रहा था |इस प्रकार की सेवाएं मालिक ने कृपापूर्वक मुझे निरंतर दी है |

हरबंसलाल जी ने कहा कि जो सेवादार उस दिन पंखा झल रहा था ,चढ़ावे की चीजें देखकर उसके मन में लालच आ गया |उसने कुछ चीजें चढ़ावे में से चुरा लीं |

पूरा गुरु तो निराकार का साकार रूप होता है |यह चोरी गुरु साहब से छिपी न रही |गुरु साहब ने उस सेवादार से पूछा -तुमने वो चीजें चुराई हैं ?

सेवादार ने कहा-नहीं महाराज,मैंने नहीं चुराईं |

गुरु साहब को सच्चाई को पता था |उन्होंने कहा-निरंकार की कसम खा कि चीजें आपने नहीं लीं |

सेवादार ने निःसंकोच निरंकार की कसम खा ली |

निरंकार के प्रति उसकी अवहेलना देखकर गुरु साहब दंग रह गए |उन्होंने कहा-खा मेरी कसम ?

सेवादार ने निःसंकोच उनकी भी कसम खा ली |

गुरु साहब हैरान तो थे ही |उन्होंने उससे कहा-साध संगत की कसम खा कि चीजें तुमने नहीं लीं |

वो नतमस्तक हो गया और बोला -जी गुरु जी चीजें मैंने ही चुराई हैं |

यह उदाहरण अब मुझे लगातार याद आता है हालांकि उस समय किसी सेवादार द्वारा अमानत में खयानत करने और गुरु के साथ विश्वासघात करने की बात मुझे असंभव लगी थी |हरबंसलाल जी द्वारा सुनाई गयी यह कहानी मुझे निजी तौर पर अच्छी नहीं लगी थी क्यूंकि साध संगत से जुड़ा सेवादार चोरी जैसा जघन्य काम करेगा ,मेरी कल्पना से परे था लेकिन उस सेवादार को कम से कम साध संगत का तो भय था लेकिन आज तो साध संगत की मर्यादा को भी बचाये रखने की ज़रुरत है |निरंकार को जब खाली जगह मान लिया जाए तो खतरा पैदा हो जाता है |मेरा स्पष्ट मत है कि निरंकार को कभी खाली नहीं मानना चाहिए और सतगुरु को कभी शरीर नहीं मानना चाहिए |निरंकार  प्रभु कृपा करे कि यह जीवन अमृत साध संगत अपनी ऊंचाई पर स्थित रहे ताकि पीने को पानी मिलता रहे और जीवन चलता रहे |     



अध्यात्म में हर किसी के लिए राहत

रामकुमार सेवक

भक्ति मार्ग में दो परम्पराएं लम्बे समय से अस्तित्व में हैं-एक वो जो अद्वैतवादी हैं और इस सिद्धांत पर यकीन रखते हैं सृष्टि में सर्वत्र प्रभु ही है |वे कहते हैं-ब्रह्म सत्यम ,जगन्मिथ्या -केवल ब्रह्म ही सत्य है ,शेष सब मिथ्या है |इसे यूँ भी कह सकते हैं -तीन काल है सत्य तू मिथ्या है संसार

इस्लाम में एक शब्द है-बका यानी कि जो बाकी रहता है- इश्वर |कल सत्संग में हम एक बच्चे का जन्मदिन मना रहे थे |  बहुत ख़ुशी का वातावरण था |ऐसे ही ध्यान चला गया कि क्या वह बच्चा ,उसके दादा -दादी या हम सब जो आनंद ले रहे हैं ,मिथ्या है ?

मन इस सब को मिथ्या मानने को राज़ी नहीं हुआ |इस विरोधाभास से बचने के लिए यह वाक्य समाधान सुझाता है-

तेरा रूप है ये संसार

सबका भला करो करतार

मेरी मांग यही दातार --एक तू ही निरंकार

यानी कि वह बच्चा ,उसके दादा -दादी और हम सब प्रभु के रूप हैं |इस धरातल पर खड़े होकर सोचते हैं तो मिथ्या होने का डर ख़त्म हो जाता है -हालांकि सब शरीर मिथ्या ही हैं लेकिन जब इश्वर का रूप होने का विचार सामने आता है तो फिर असुरक्षा का भय ख़त्म हो जाता है और हम प्रभु की छत्रछाया में स्वयं को संतुष्ट अनुभव करने लगते हैं |हम माया को मिथ्या मानकर फ़ेंक नहीं देते बल्कि यथासंभव उसका सदुपयोग करते हैं | 

 

स्पष्ट है कि अध्यात्म के सिद्धांत हर परिस्थिति में राहत देते हैं |


वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं |

रामकुमार सेवक 

1985  के आस-पास की बात है |अक्टूबर -नवम्बर का महीना था |मैं उन दिनों मुज़फ्फर नगर में रहता था |सन्त निरंकारी सेवादल के स्थानीय महात्माओं के साथ मैं सीढ़ी पर चढ़कर वार्षिक सन्त समागम का  पोस्टर चिपका रहा था |

उन दिनों निरंकारी मिशन के विरुद्ध एक सुनियोजित अभियान विशेषकर पंजाब में चल रहा था |लगभग रोज ही किसी न किसी  निरंकारी श्रद्धालु की कहीं न कहीं हत्या हो जाती थी लेकिन निरंकार को सर्वव्यापक मानने के दृढ़निश्चय के चलते हम लोग सक्रिय रहते थे |इस निश्चय के बावजूद ,समय की पुकार सुनते हुए,सक्रिय रहने के साथ यथासंभव हम चेतन भी रहते थे |

मुज़फ्फर नगर शहर में जिला अस्पताल के पास पूरब दिशा में ,एक सड़क है जो आगे जाकर अंसारी रोड में मिल जाती है के किनारे पर हम लोग पोस्टर चिपका रहे थे |रात के ग्यारह बजे के आस-पास का समय था |हलकी सर्दी शुरू हो चुकी थी तो सड़क लगभग सुनसान थी | एक महात्मा जो रिक्शा चलाते थे ,के रिक्शे में पोस्टर और चिपकाने का साधन रखा हुआ था |

नीचे से दो-तीन लोग आये और पोस्टर पढ़ने लगे -निरंकारी सन्त समागम |नीचे खड़े साथियों से उन्होंने प्रश्न करने शुरू किये |वे सीधे-सादे महात्मा थे क्या कहते |मैंने सीढ़ी पर चढ़े -चढ़े ही प्रश्न हल करने की कोशिश की |

भीतर से मुझे लग रहा था कि परिस्थितियां आसान नहीं हैं ,ये कोई जिज्ञासु नहीं हैं बल्कि शरारती तत्व हैं और शरारती को कोई नहीं समझा सकता |

बहरहाल निरंकार का सुमिरन करते हुए काम करता रहा |सीढ़ी से नीचे उतरकर आया तो उन्होंने पूछा-निरंकारी मिशन किस धर्म का प्रचार करता है ?

मैंने कहा -यह तो हर धर्म का सार है और सब धर्मो का समन्वय करता है |

यह सुनकर वे धीरे -धीरे अपने रास्ते चले गए |मुझे बहुत संतुष्टि हुई कि मालिक ने हालात बिगड़ने नहीं दिए |आज भी वह दिन याद आता है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं |वह एक विशेष दिन लगता है जिसने हमें यह निष्कर्ष दिया कि-हालात चाहे जैसे भी हों सुमिरन हमेशा हमें संतुलित करता है |यह ढाल की भाँति हमें बचा लेता है | 

बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे कि सुमिरन की जब बात चलती है तो हम कहते हैं कि हम किसी समय या वार में बंधे हुए नहीं हैं |हम कभी भी सुमिरन कर लेते हैं लेकिन पूरा दिन गुजर जाता है और हमें निरंकार का ध्यान भी नहीं आता |देखा जा रहा है कि सेवा के भी उत्साह हैं,सत्संग में भी खूब आते हैं लेकिन सुमिरन की कमी है तो सुबह-शाम परिवार के सदस्यों के साथ मिलकर सुमिरन करने में कोई हर्ज़ नहीं है |यह कोई बंधन नहीं है |जब मोबाइल फोन आये तो उससे पहले लैंडलाइन फोन थे |यदि मोबाइल फोन पर बात नहीं हो पाए तो लैंडलाइन फोन का सहारा लेना पड़ता है |हम कहते तो हैं-सांस -सांस सुमिरन लेकिन हर सांस में सुमिरन कहाँ हो पा रहा है तो इस प्रकार घर के सब लोग मिलकर सुमिरन करें |यह कोई बंधन नहीं है बल्कि भक्ति का अंग है |(स्मृति के आधार पर लिखा )

 

सम्पादकीय (जुलाई 2018 ) 

काश ,हम  लोग वास्तविक धार्मिक होते----

--रामकुमार सेवक  

भारत की अंतर्राष्ट्रीय पहचान धर्मप्रधान देश के रूप में है |श्री राम,श्रीकृष्ण,महात्मा बुद्ध ,भगवान महावीर ,श्री गुरु नानक देव जी सहित दस गुरु साहेबान  ने जनमानस को प्रेम-शांति-सहनशक्ति-सहजता के ही सन्देश दिए हैं लेकिन धर्म के नाम पर जो कुछ हमें देखने को मिल रहा है वह इन महापुरुषों की शिक्षाओं को प्रतिबिंबित नहीं करता |

पिछले दिनों दिल्ली के बुराड़ी क्षेत्र में एक ही परिवार के ग्यारह लोग अपने ही घर में मृत मिले |मामले की तह में पहुँचने की कोशिश निरंतर हो रही है लेकिन प्रथमदृष्टया यह मामला सामूहिक आत्महत्या का माना जा रहा है |ज्ञात हुआ है कि परिवार के इन सब लोगों ने मोक्ष या मुक्ति के लिए यह हृदयविदारक कदम उठाया |परिवार  के इन ग्यारह लोगों में एक युवा बेटी थी ,जिसका विवाह शीघ्र ही होने वाला था |एक बुजुर्ग माता थी |दो बच्चे भी शामिल थे जिन्होंने अभी अपने सपनो को पूरा करना था |बाकी लोग भी युवा और अधेड़ आयु के थे |

युवा लोगों से यह आशा की जाती है कि वे कुछ नया सोचेंगे और नया करेंगे |जॉर्ज बर्नार्ड शॉ कहते हैं कि-

सभी बुद्धिमान लोग अपने आपको दुनिया के अनुरूप ढाल लेते हैं |सिर्फ कुछ ही लोग ऐसे होते हैं जो दुनिया को अपने अनुरूप बनाने में लगे रहते हैं |दुनिया की सारी तरक्की इन दूसरी तरह के लोगों पर  निर्भर होती है |

इस घटना में जो केंद्रबिंदु है ,बताया जा रहा है कि वह परिवार का अथवा बुजुर्ग माता का सबसे छोटा बेटा है |अफ़सोस की बात यह है सबसे कम उम्र और युवा होने के बावजूद वह तंत्र -मंत्र आदि में आस्था रखता था और वह नकारात्मक सोच के लोगों के बहकावे में आ गया और पूरे परिवार को अपने साथ मिलाने में सफल हो गया |

इस घटना को घटित हुए दस दिन बीत चुके हैं लेकिन अफ़सोस अभी तक क़ायम है कि अज्ञान और भ्रम के कारण एक हँसता-खेलता परिवार उजड़ गया |

धर्म कहता है-मांगोगे मिलेगा ,खटखटाओगे द्वार खुलेगा |सोचने की बात है कि कोई भी देख सकने में सक्षम इंसान किसी नेत्रहीन को राह दिखा सकता है लेकिन कोई इंसान यदि स्वयं भी नेत्रहीन हो तो कैसे किसी नेत्रहीन इंसान को मंज़िल पर पहुंचा सकेगा |इस घटना में यही तथ्य प्रमाणित हुआ है कि यदि भक्ति और मुक्ति की जिज्ञासा रखते हो तो किसी तत्वदर्शी ब्रह्मवेत्ता महात्मा की शरण में जाओ जिसे स्वयं भी सत्य का ज्ञान हो |

यह जिज्ञासा सदैव स्वागतयोग्य है |श्रीकृष्ण ने गीता में भक्तों को जिन चार किस्मो में चिन्हित किया है उनमें से आर्त,अर्थार्थी के बाद इनसे ऊंची श्रेणी में जिज्ञासु को रखा जाता है |जिज्ञासु जब किसी तत्वदर्शी महात्मा का शिष्यत्व ग्रहण कर लेता है तो वह ज्ञानी हो जाता है |भक्तों का यह सर्वश्रेष्ठ प्रकार है |

निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी से उनकी विदेश यात्रा के दौरान एक बार किसी विदेशी पत्रकार ने पूछा-आपका देश इतना धार्मिक है फिर वहां भुखमरी और गरीबी क्यों है ?

बाबा जी ने कहा- हमारे देश के लोग यदि महात्माओं,अवतारों,गुरुओं की शिक्षा को अपनाकर धर्म के वास्तविक अनुयाई होते तो हमारा देश दुनिया के आगे हाथ फैलाने की बजाय दुनिया को खाना बाँट रहा होता |

बाबा जी ने सत्तर के दशक में यह बात कही थी लेकिन इस इक्कीसवीं सदी में भी हालातों में बहुत परिवर्तन नहीं हुआ है ,उपर्युक्त घटना ने यह साबित कर दिया है |                


निरंकारी मिशन क्या है ?

रामकुमार सेवक 

लोग सोचते हैं कि निरंकारी मिशन भीड़ के विशाल समूह का नाम है जबकि निरंकारी मिशन भीड़ का नाम नहीं है बल्कि भीड़ के रूप में जो लोग हैं उनके दिमागों में जो भरा है वह किसी व्यक्ति का निरंकारी होना या नहीं होना प्रकट करता है |

निरंकारी मिशन किस चीज का नाम है इस पर चिंतन करता हूँ तो  मुझे एक प्रवचन याद आ जाता है |मार्च 2017 में किये गए उन विचारों में महात्मा ने कहा था -   

१-मैं किसी के बच्चे का विवाह नहीं कर सकता लेकिन-विवाह होने के लिए  अरदास तो कर सकता हूँ |

(प्रेरक प्रसंग)-भगत राम जी बरनाला वालों की बेटी विवाहयोग्य थी |भगत राम चन्द जी ,कपूरथला वालों ने उस बेटी का रिश्ता तय कर दिया और विवाह की तारीख भी तय कर दी |भगत राम जी को जब यह बताया गया तो उन्होंने कहा-आपने जो किया ,ठीक ही किया होगा लेकिन मेरे पास पैसे की बहुत समस्या है |फिर बेटी को कुछ देना भी तो होता है |वे पैसे वाले लोग हैं,उनकी आवभगत कैसे कर पाऊंगा?

भगत जी बोले-बाबा अवतार सिंह जी हैं न -सब हो जायेगा |

बाबा जी ने किसी ज्वेलर महात्मा को कहा-भगत राम जी की बेटी की शादी है,कुछ जेवर बना देना |कपडे वाले को कहा -कुछ कपडे बना देना |विवाह बहुत अच्छा हो गया |उन महात्माओं ने अपनी सेवा कर दी लेकिन भगत राम जी ने भी धीरे -धीरे उनका दाम चुकाया |

निरंकारी मिशन की शुरूआत ऐसे प्रेम से हुई है |

प्रेरक प्रसंग -2-बाबा गुरबचन सिंह जी ने किसी महात्मा ,जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी ,से कहा-कल आपके घर खाना खाने आऊंगा | यह सुनकर वह महात्मा घबरा गए|वे सोचने लगे-खुद के खाने का प्रबंध तो है नहीं,बाबा जी के खाने का प्रबंध कैसे होगा ?

बाबा जी ने खुद कहा था इसलिए वे ऐसा अवसर छोड़ना भी नहीं चाहते थे |शुक्र हुआ -तकिये के नीचे बीस रूपये रखे हुए मिल गए |

वे खुश भी हुए और हैरान भी कि ये बीस रूपये कहाँ से आ गये ?

पुराना वक्त था,सस्ता ज़माना था इसलिए बीस रूपये में पूरा प्रबंध हो गया |

सच्चाई यह है कि जब बाबा जी ने खाने के लिए कहा था ,उसी समय महात्मा के तकिये के नीचे बीस रूपये रखवा दिए थे |

यह था गुरु और गुरसिख का प्रेम और साथ ही अपने निर्धन शिष्य को भी समान अवसर देना और हीनभावना से बचा देना ,दूसरी और पैसे वाले शिष्यों को अभिमान से बचाना |

३-बाबा जी से एक बार किसी बच्चे ने पूछा-क्या बाबा जी आपको क्रोध नहीं आता ?बाबा जी ने कहा-क्रोध आता तो है लेकिन करता नहीं हूँ |

४-कमल जी से एक बार किसी निर्धन महात्मा ने कहा-कि घर में टी.वी. नहीं है,आशीर्वाद दीजिये कि बच्चों की यह इच्छा पूरी हो सके |

जोगिन्दर सिंह जी कमल ऐसे महात्मा थे ,जो निरंकारी मिशन के सबसे लोकप्रिय महात्माओं में से एक थे |लोग मानते थे कि उनका आशीर्वाद हमेशा पूरा होता है इसलिए उनके आस-पास भीड़ लगी होती थी |

कमल जी ने प्रभु से अरदास कर दी और महात्मा अपने घर चला गया |

कमल जी ने एक धनाढ्य महात्मा से कहा-एक टी.वी.की सेवा करो |वे महात्मा बहुत खुश हुए कि कमल जी ने खुद उन्हें सेवा दी है |उन्होंने इसे खुशकिस्मती माना और टी.वी खरीदकर कमल जी के घर पहुंचा आये |

कमल जी ने अगले दिन उस निर्धन महात्मा के घर टी.वी पहुंचा दिया -यह है परोपकार ,जो निरंकारी मिशन की विशेषता रहा है |  



ऐसे निरंकारी तो घर- घर में होने चाहिए 

रामकुमार सेवक 

सम्पूर्ण अवतार बाणी में बाबा अवतार सिंह जी कहते हैं-

सन्तजना दी संगत करके रब दी सोच-विचार करो 

रब बोले एहना दे अंदर एहना नू नमस्कार करो |

यह निरंकारी मिशन का आधार है इसी कारण हम धुनि में गाते हैं-

मेरा डोले ना ऐतबार 

बख्शो श्रद्धा-भक्ति -प्यार 

करूँ मैं सन्तों का सत्कार |

अर्थात सन्त सत्कार करने के योग्य हैं |अभी थोड़ी देर पहले इस शब्द की व्याख्या करते हुए महात्मा कह रहे थे कि -

सेवा को दोऊ भले एक  सन्त इक राम 

राम है दाता जगत का सन्त जपावे नाम |

राम (निरंकार) और सन्त को एक ही पंक्ति में रखा गया है |

उपर्युक्त पंक्तियों से यह बात स्पष्ट है कि सत्संग में सन्त आते हैं |वे विशाल ह्रदय के स्वामी होते हैं ,निरंकार को अंग-संग जानते और मानते हैं |पवित्र जीवन जीते हैं लेकिन सत्संग तो बदस्तूर हो रहे हैं लेकिन ये विशेषताएं वहां दिखाई नहीं देतीं फिर भी सत्संग में जाना, न जाने से बेहतर है |

आज निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में महात्मा एक प्रसंग सुना रहे थे कि एक महात्मा,जो मामूली सा काम करके अपने परिवार का गुजारा करते हैं को रास्ते में एक पर्स पड़ा हुआ मिला |उन्होंने पर्स उठा लिया |उन्होंने सोचा कि उस पर्स को उसके मालिक तक पहुंचा दिया जाए |वे मेरे पास आये |मैंने ढूँढा तो पर्स में एक नंबर मिला |हमने उस न.पर संपर्क किया तो पता चला कि वह रोपड़ जिले का न,था |उनसे बात हुई |पर्स के बारे में सुनकर उन्हें जो राहत मिली उसे शब्दों में बयान करना कठिन है |

हमने उनके पूछने पर बताया कि हम निरंकारी मिशन से जुड़े हैं |वो बोले कि-मेरी निरंकारियों के बारे में इसके विपरीत धारणा थी लेकिन आपके उस महात्मा ने जो गरीब होने के बावजूद पूरी तरह ईमानदार है,(उसने) मेरी मिथ्या धारणा बदल दी है |मुझे लगता है कि ऐसे निरंकारी तो घर- घर में होने चाहिए |

महात्मा के ये विचार सुनकर मुझे अपनी एक पुरानी कविता याद आ गयी ,जिसके अंत में कहा गया था -शक्ल -ओ-सूरत पर मत जाईये ,

निर्धन भी दानी हो सकता है 

और-सतगुरु की शिक्षा को अपनाकर

मूर्ख भी ज्ञानी हो सकता है |

सेवा करने का जब ध्यान बने तो सिर्फ किसी अधिकारी की तलाश में मत घूमिये बल्कि ऐसे सरल-सादगीयुक्त भक्त के माध्यम से सतगुरु-निरंकार की सेवा कीजिये क्यूंकि ऐसे ही महात्मा हैं,जिनके कारण निरंकारी मिशन जीवित है और जब तक यह ईमान क़ायम है विश्वास रखिये निरंकारी मिशन को कोई खतरा नहीं है |             

           


हम शुद्ध जल कहाँ से पिएंगे ?   

रामकुमार सेवक 

बरसों पहले सम्पूर्ण अवतार बाणी में  बाबा अवतार सिंह जी ने लिखा -

गुरसिखों का रूप धार के सतगुरु परगट होंदा ए |

सतगुरु अपना आप सदा गुरसिक्खां विच समोंदा ए |

10 जून 2018   की बात है |ग्राउंड न.8 में सत्संग हो रहा था | मंच पर समर्पित गुरसिख और केंद्रीय पदाधिकारियों में से एक सुन्दर लाल खुराना जी विराजमान थे |सुन्दर लाल जी को गुरमत का भी बहुत अनुभव है जो कि मेरे विचारों  को समृद्ध करने में सदैव योगदान देता है इसलिए मन में बहुत शुभ आशाएं थीं कि कुछ नया सुनने को मिलेगा |

नमस्कार करके दर्शकों में बैठकर सत्संग सुन रहा था लेकिन सत्संग में सुन्दर लाल जी को बोलने का अवसर ही  नहीं दिया गया |

साढ़े बारह बजे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के विचारों की चार साल से भी पुरानी सी.डी.चला दी गयी और सत्संग समाप्त कर दी गयी | सुन्दर लाल जी के दीर्घ अनुभवों को सुनने से मैं वंचित ही रह गया |

ध्यान आया कि निरंकारी सत्संग में सी.डी. से प्रवचन सुनने की परंपरा नहीं है |हम मंच पर विराजमान महात्मा को गुरु का रूप समझकर उन्हें नमस्कार करते हैं और आशीर्वाद प्राप्त करते हैं |

यदि उस मंच पर विराजमान सज्जन के बारे में हमारी जानकारी में कोई  विपरीत सूचना हो तो भी हम उन्हें नमस्कार करते हैं क्यूंकि वे उस समय सतगुरु के स्थान पर विद्यमान होते हैं |अपना ध्यान निरंकार से जोड़कर हम बेहिचक नमस्कार कर लेते हैं |

सी.डी. के माध्यम से जो शब्द मुझ तक पहुंचे उन्हें  मैं पहली बार नहीं सुन रहा था |बाबा हरदेव सिंह जी के सुलझे हुए प्रवचन सुनने का मेरा रोज का क्रम है तो सी.डी.के प्रवचन के लिए ग्राउंड न.8 ,में आने की ज़रुरत नहीं थी ,उन्हें तो मैं घर में ही सुन सकता था |

प्रश्न यह भी है कि वह सी.डी.सम्पादित थी अर्थात उसमें  संक्षिप्त करने के लिए निश्चित हीकाट-छाँट की गयी होगी जबकि मंच पर विराजमान गुरसिख के प्रवचन में मौलिकता होती है |  

शायद इसीलिए निरंकारी सत्संगों में सी.डी.से प्रवचन सुनने की परंपरा नहीं रही  है लेकिन पिछले ढाई साल में लगभग तीन बार मैंने इस पीड़ा को झेला है |

बाबा जी ने जो कुछ कहा उससे किसी को भी कोई दिक्कत नहीं हो सकती लेकिन चार वक्ता कम करके तय समय में ही सी.डी.को भी आराम से समाहित किया जा सकता था फिर  मंचासीन महात्मा का सम्मान और मर्यादा भी क़ायम रहती |

तथ्य तो यह भी है कि सतगुरु के स्थान पर जब भी बैठने का अवसर मिलता है तो मेरी सोच यही होती है कि अपने आपको पूर्णतः निरंकार को सौंप दिया जाए |इस समर्पण के बाद जो विचार आते हैं उन्हें सुनकर हम खुद भी हैरान होते हैं कि सच्चे बादशाह ने कितना कुछ कहलवा दिया |दिल से की गयी विचार दिल तक जाती है लेकिन सी.डी.में दिल नहीं होता |सी डी केवल एक instrument (यंत्र )है |वह इंसान की रचना है जबकि इंसान परमात्मा की रचना है |इंसान की रचना पर परमात्मा की रचना को ही वरीयता (Preference )दी जानी चाहिए |     

मेरे कहने का अर्थ यह है कि सत्संग की गतिविधि को जो विभाग नियंत्रित करता है उसे इस बारे में निर्णय करते समय अध्यात्म और एक गुरसिख के सम्मान का भी ध्यान रखना चाहिए अन्यथा सत्संग सिर्फ एक मीटिंग बनकर रह जाएगा |निरंकारी इतिहास की गरिमामय परम्पराओं का ख्याल करना जरूरी है |

ऐसा लगता है कि मिशन का प्रबंध तंत्र जिनके हाथों में है इनमें से अधिकांश  लोगों में आम श्रद्धालु की अपेक्षा आधी भी आस्था और विश्वास  नहीं है जो कि  इनकी ऐसी गरिमाहीन कारगुजारियों से ज़ाहिर हो जाता है | ज्यादातर सत्संग अब भी पुरानी और गरिमामय पद्धति से चल रहे हैं लेकिन दिल्ली के ग्राउंड न.8 में जो कुछ दिनों से लगभग लगातार चल रहा है वह सपूर्ण अवतार बाणी की उपर्युक्त पंक्तियों के अनुकूल नहीं लग रहा |यहाँ उस गुरसिख पर भी यकीन नहीं किया जा रहा है ,जिसकी ड्यूटी स्वयं प्रबंधतंत्र ने ही लगायी है |

ढाई वर्ष तक मैं इस दर्द को दबाये रहा लेकिन जब यह सिलसिला परंपरा ही बनने लगा तो भीतर की पीड़ा बाहर आ गयी |सत्संग हमारा आधार है,यदि यह भी प्रदूषित हो गया तो हम शुद्ध जल कहाँ से पिएंगे ?

इस पीड़ा को कई ऐसे सज्जनो को भी बताया जो प्रबंध तंत्र तक इसे पहुंचा सकने में सक्षम हैं लेकिन सब जैसे मौन हैं| मगर लेखक के धर्म ने मुझे इस मामले में मौन नहीं रहने दिया |यह सब लिखने के लिए  कुछ अंधविश्वासी भक्तों से माफ़ी चाहता हूँ |   मालिक हम सबको सद्बुद्धि और वास्तविक भक्ति प्रदान करे-धन निरंकार जी-

            


न्याय चाहिए या  कृपा ?

रामकुमार सेवक 

न्याय की दुनिया में बहुत महत्ता है |अमृतसर कांड के दिनों में हमने स्वयं न्याय की प्राप्ति के लिए जुलूस निकाला था |न्याय जनवरी 1980  में मिला भी जबकि हमारे निर्दोष लगभग 60  महापुरुषों को बाइज्जत बरी कर दिया गया था | 

अध्यात्म में ईश्वरीय न्याय को ही सर्वोच्च माना गया है क्यूंकि सांसारिक न्याय में तो सबसे बड़ा दंड मृत्युदंड है (चाहे किसी ने एक खून किया हो या पांच) | पैसे वालों को प्रायः मृत्युदंड मिलने की कोई संभावना नहीं होती  इसलिए इश्वर ही उनके साथ न्याय करता है |पांच हत्याओं का सही दंड तो इश्वर अथवा निरंकार ही दे सकता है |इसे दलील या वकील की ज़रुरत नहीं पड़ती क्यूंकि यह तो अँधेरे में भी स्पष्ट देख लेता है |

एक भक्त मानता है कि मैं गलतियों का पुतला हूँ क्यूंकि कदम-कदम पर हमसे गलतियां होती रहती हैं हालांकि वह तो प्रेम ही करना जानता है और प्रेम ही करता है लेकिन-

भुल-भुलेखे वी जे भुल्ले साह उसदा सुक जांदा ए |

  इसलिए वह हमेशा क्षमा याचना करता रहता है |उसके शब्दकोष में न्याय से ऊपर बख्शिश (क्षमा )का स्थान होता है |  

कहते  हैं कि किसी  शिलाखंड  पर किसी  ने बहुत वर्षों  तक  तप  किया |जब  उसका  तप  पूरा  हुआ  तो प्रभु  ने पूछा  कि तुमको  कृपा  चाहिए या  न्याय चाहिए ?

चूंकि  तप  का  मार्ग   कठिन  है इसलिए  कुछ  लोगों  को अभिमान  हो  जाता  है कि हमसे  बढ़कर  कौन  है ?यही  उस तपस्वी  के साथ भी हुआ - उसने  कहा कि मैं तो अपने  कर्म  में विश्वास रखने  वाला इंसान हूँ और मुफ्त में कुछ नहीं लेता |

यह तो प्रभु की दया ही थी जो ऐसा पूछ लिया नहीं तो जिसमें ज़रा भी अकड़ हो तो कृपा कहाँ होती है ?

खैर उसे न्याय दे दिया गया - जो भी उसकी तपस्या का फल बनता था |

कहते हैं कि वह अभी अपनी तपस्या के फल मिलने की ख़ुशी भी न मना पाया था कि वह शिला जिस पर बैठकर उसने तपस्या की थी ,हाथ जोड़कर आ गई |

प्रभु ने पूछा तो उसने बताया कि-प्रभु ,मुझे भी न्याय चाहिए |प्रभु ने पूछा -तुम्हें किस से शिकायत है ?वह बोली कि इस साधु ने तीस साल मुझी पर सवारी की है इसलिए मुझे भी हिस्सा मिलना चाहिए |

प्रभु ने कहा कि बात तो ठीक है ,इसका दावा ज़ायज़ है| 

अब तपस्वी घबरा गया |वह कुछ सोच पाता इस से पहले ही पेड़ आ गया जिसने उस पर छाया की थी और जिसके फल उसने भूख लगने पर खाए थे |

वह सोचने लगा कि यह भी अपना हिस्सा मांगेगा |साथ में नदी भी तो बह  रही है ,वह भी हिस्सा मांगेगी |फिर मृगछाला भी है ,वायुमंडल भी है उसे तपस्या का फल धूमिल होता नज़र आने लगा |उसने कहा - प्रभु मैं न्याय नहीं चाहता ,आप जिसे जो मर्ज़ी  दे दीजिये ,आपका निर्णय स्वीकार्य है |अपनी कृपा बख्श दीजिये |

अब तपस्वी अहंकार के रोग से मुक्ति पा चुका था इसलिए शिला वापस चली गयी |प्रभु ने पूछा कि क्या तुमको न्याय नहीं  चाहिए ?वह बोली -प्रभु ,सब कुछ आप ही तो दे रहे हैं और देंगे भी इसलिए मुझे कुछ नहीं चाहिए |पेड़ को कुछ कहने की ज़रुरत नहीं पड़ी और नदी को तो आने की भी ज़रुरत नहीं पडी क्यूंकि प्रभु तो है ही न्यायकारी लेकिन भक्त के लिए करूणानिधि है,कृपालु है ,दयालु है इसलिए भक्त निष्काम भाव से प्रभु की उपासना करता है और आनंद लेता है |

किसी को भी यह नहीं सोचना चाहिए कि मैं इस सर्वव्यापी सत्ता निरंकार प्रभु की आँख में धूल झोंकने में सफल हो पाऊंगा इसलिए सावधानीपूर्वक कर्म करने जरूरी हैं |          

 

 



ज्ञान योग ,कर्म योग और भक्ति योग तथा निरंकारी सुमिरण   

रामकुमार सेवक

एक बच्चा चर्च में ,हाथ जोड़कर ,आँख बंद करके परमेश्वर की प्रार्थना कर रहा था |इतना छोटा बच्चा सही प्रार्थना जानता होगा या नहीं ,यह एक बड़ा प्रश्न था |पादरी ने उसके शब्दों को सुनने का प्रयास किया |उसने महसूस किया बच्चे के शब्द सही नहीं हैं |उसने बच्चे को सही शब्द बोलने का आदेश दिया |बच्चे ने कहा-मैं तो प्रार्थना जानता नहीं इसलिए पूरी वर्णमाला (Alphabets  )बोल देता हूँ ,ताकि प्रभु अपनी पसंद की प्रार्थना बना ले और भाव स्वीकार कर ले |

अनेक लोग सोचते हैं कि प्रार्थना के कुछ निश्चित शब्द होते हैं ,उनमें किसी भी प्रकार का परिवर्तन नहीं होना चाहिए |उनका क्रम भी अपरिवर्तनीय रहना चाहिए | मांत्रिक,तांत्रिक ,ज्योतिषी आदि इसी विचारधारा के होते हैं लेकिन प्रार्थना में शब्दों से ज्यादा भाव ही महत्वपूर्ण होते हैं |

बाबा अवतार सिंह जी फरमाते थे-

सिफत-श्लाघा करनी तेरी मेरे वश का रोग नहीं |

यानी कि हे  प्रभु , मेरे द्वारा तेरी स्तुति करना तो सूरज को दीपक दिखाने के समान है यानी कि महत्वहीन है |

यह बात सही भी है  कि जिस प्रभु की स्तुति करते हुए ब्रह्मा जी भी कहते हैं-नेति-नेति यानी कि पूरी स्तुति कर पाना संभव नहीं है, ऐसे प्रभु की स्तुति हम अल्पज्ञ जीव कैसे कर पाएंगे ?यह तो वाकई असंभव सा काम है लेकिन भक्त हर युग में यह काम करते आये है क्यूंकि यही एक ऐसा काम है जिसमें असफल होने का ख़तरा नहीं होता क्यूंकि जिसकी स्तुति की जा रही है ,यह प्रभु स्तुति अथवा प्रार्थना को सफलता  अथवा असफलता  के पलड़ो में नहीं तोलता बल्कि किसी भी भक्त की प्रार्थना को उसके मन की सरलता-सहजता और भक्ति भाव के अनुसार स्वीकार करता है |प्रभु के पास अस्वीकृति के लिए कोई स्थान नहीं है इसलिए भक्त सदैव से प्रभु की प्रार्थना करते आ रहे हैं |उन्हें चाहें ऋचाओं,आरतियों  आदि का नाम दें या नात-कव्वालियों ,सुसमाचार आदि का ,जो शब्द प्रभु की प्रशंसा में कहे जाते हैं उन्हें प्रार्थना-स्तुति आदि की श्रेणी में ही रखा जाता है |

          पिछले दिनों एक सज्जन ने एक बहुत तर्कसंगत बात कही कि हमारे द्वारा प्रभु की स्तुति या अध्यात्म की बहुत बातें करना प्रभु के सामने वाकई सूरज को दीपक दिखाने के समान अथवा महत्वहीन ही हैं  जैसे एक दीपक सूर्य के सामने महत्वहीन होता है लेकिन अन्धकार में तो उसकी बहुत महत्ता है क्यूंकि वहाँ तो उसका उजाला किसी भटके हुए राही को राह दिखाता है |इसी प्रकार प्रभु के सामने बेशक हमारी प्रार्थनाएं अथवा स्तुतियाँ महत्व नहीं रखतीं लेकिन हमारे मन को तो उनसे   सुकून मिलता ही है इसलिए अन्धकार में एक दीपक के समान उस स्तुति-प्रार्थना  की भी बहुत महत्ता है |

निरंकारी मिशन में जो सुमिरन है वह भी प्रार्थना का बहुत संक्षिप्त मगर सारगर्भित रूप है|जब तू ही निरंकार कहते हैं तो ज्ञानयोग प्रकट हो जाता है |मैं तेरी शरण हाँ कहते हैं तो कर्मयोग साकार हो जाता है |मैनु बख्श लो ,भक्तियोग का प्रमाण है |ऐसी सारपूर्ण प्रार्थना,जिसे अनपढ़ व् नादान  भी आसानी से बोल ले , प्रदान करने के लिए सतगुरु -निरंकार का हार्दिक धन्यवाद | 

 

भगवान राम का न्याय  

रामकुमार सेवक 

पहले भारत धर्मप्रधान देश था .आजकल धनप्रधान है |पहले व्यक्ति का मूल्यांकन उसके चारित्रिक बल से होता था ,आजकल पैसे से होता है |दुर्भाग्य से धर्म में भी भावना की बजाय धन ही महत्वपूर्ण हो चुका है |;

आश्रमों और गुरुओं की आजकल छवि बहुत ख़राब है |इसका मूल कारण यह है कि पहले धर्म नैतिकता का दूसरा नाम था |लोग नैतिकता सीखने के लिए धर्मगुरुओं अथवा संत -महात्माओं की शरण में जाते थे लेकिन इनमें से अधिकांश लोग धीरे -धीरे पाप करने में भी आगे हो गए और इनके कर्मो के कारण इन के प्रति लोगों में सम्मान  का भाव कम और फिर ख़त्म हो गया |

वास्तव में सम्मान तो अद्यात्म अथवा नैतिकता का  था लेकिन इन  लोगों में से अधिकांश ने अध्यात्म अथवा धर्म के कारण मिले सम्मान को अपना व्यक्तिगत सम्मान मानना शुरू कर दिया |समस्या तो तब आयी जब गुरु होने को भी एक व्यवसाय मान लिया गया |व्यावसायिक दृष्टिकोण के कारण धीरे-धीरे  धर्म भी कर्मकांड बन गया और निजी लालच के कारण  संत और गुरु के रूप में पूजनीय पहचान रखने वाले लोग अपराधियों के रूप में परिणत हो गए |

आशा का एकमात्र केंद्र था- निरंकारी मिशन और निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी |उन्हें देखकर परमात्मा में विश्वास मजबूत होता था और मानवता को शक्ति मिलती थी |उनके दिव्य वचन ह्रदय में पवित्र भाव जगाते थे |उनके पास निरंकार का ज्ञान भी था और ध्यान भी |काल के क्रूर हाथों ने उन्हें हमसे छीन लिया और हम जैसे अनाथ हो गए |

इस समय इंसान दिग्भ्रमित सा है क्योंकि बचाव की एकमात्र आशा -धर्म के क्षेत्र में भी दया के नाम पर शोषण शुरू है और ज्ञान के नाम पर मात्र लफ़्फ़ाज़ी और अभिमान दिख रहा है |

यथार्थ यह भी है कि यह सिर्फ आज की समस्या नहीं है बल्कि पुरानी दर्दनाक परंपरा है | 

वाल्मीकिरामायण का एक प्रसंग ध्यान में आ रहा है-भगवान राम के दरबार में एक कुत्ते ने एक साधु के विरुद्ध शिकायत की |शिकायत थी कि वह गली से गुज़र रहा था कि साधु ने उसे डंडा मार दिया |इतनी बुरी तरह से मेरी पिटाई कि  मैं पीडा से बिलबिला उठा |कुत्ते ने इस प्रकार अपना दर्द बयां करते हुए प्रश्न किया , सन्यासी धर्म और ऐसे कर्म ?

भगवान राम  उस समय न्यायाधीश के पद पर भी थे और राजधर्म निभा रहे थे |उन्होंने कुत्ते की पीड़ा सुनी और साधू को बुलाया |उससे पूछा-आपने इस कुत्ते को पीड़ा क्यों दी ?

साधु ने कहा-मैं तो अपने रास्ते जा रहा था |इस कुत्ते ने मुझ पर भोंका |सुबह-सुबह इसका भोंकना मुझे बुरा लगा और मैंने इसे डंडे से मारा |

भगवान राम ने कहा-सन्यासियों -ऋषियों-मनीषियों को तो धैर्य का परिचय देना चाहिए और धर्म का पालन करना चाहिए|

साधु  शर्मसार हुआ |वह चूंकि अपना अपराध स्वीकार कर चुका था तो आवश्यक था कि उसे दंड दिया जाए |वह ऐसा युग था कि सामान्य जनता भी नागरिक धर्म का पालन करती थी |कहने का तात्पर्य है कि आम जनता के कर्म भी आज के संतों-महापुरुषों से बेहतर थे |

भगवान  ने कुत्ते से ही पूछा-इस साधु को क्या सजा दी जाए ?

कुत्ते का जवाब हैरान करने वाला था |उसने कहा-साधु महाराज को फलां आश्रम का अधिपति बना दिया जाए |

भगवान ने कहा-यह सजा है या इनाम ?

कुत्ते ने बहुत अर्थपूर्ण बात कही,जो आज की परिस्थितियों में भी सत्य मालूम हो रही है |उसने कहा-महाराज ऐसा कोई दुष्कर्म नहीं है जो वहां नहीं होता हो |

भगवान ने कहा-तुम इतने विश्वास से कैसे यह कह सकते हो ?

कुत्ते ने कहा-मैं पिछले जन्म में उसी आश्रम का अधिपति था |उसी का परिणाम है कि मैं आज इस अधम योनि में हूँ |

भगवान ने कुत्ते की अभिलाषा पूरी की |उस साधु को उस आश्रम का अधिपति बना दिया | इस प्रकार पुरस्कार के रूप में उस साधु को दंड मिला और कुत्ते को न्याय |