बची-खुची भक्ति भी ख़त्म हो जायेगी यदि---

रामकुमार सेवक 

सत्संग के मंच से फलां व्यक्ति विचार करने वाला है,वह अंदर से  में बहुत गंदे विचारों और कर्मो वाला आदमी है |वह सोचता है कि कोई उसके बारे में जानता नहीं है इसीलिए सफेदपोश बनकर सत्संग की अध्यक्षता करेगा इसलिए आज मुझे सत्संग में नहीं जाना है |मैं ऐसे गंदे आदमी के पैरों में अपना माथा रखना नहीं चाहता |  आपको मैं रोकना नहीं चाहता ,मेरे रोज के साथी ने कहा |

वह अपनी जगह बिलकुल ठीक था लेकिन मैं तो बहुत से ऐसे लोगों को जानता हूँ जो इस आदमी से भी ज्यादा गंदे हैं और सफेदपोश बनकर विचार कर चुके हैं |तब तो तुम्हें कोई दिक्कत नहीं हुई ,फिर आज दिक्कत क्यों है ?मैंने उससे पूछा |

जिन सफेदपोश लोगों की चर्चा तुम कर रहे हो,मैं उनके बारे में  उन दिनों जानता नहीं था इसलिए सत्संग में भी गया और नमस्कार भी की |लेकिन अब मैं उस आदमी के कुकर्मों से परिचित हूँ इसलिए यह मस्तक ऐसे आदमी के सामने नहीं झुकेगा |उन्होंने दृढ़ता से कहा |

लगता है आपने कबीरदास जी का दोहा नहीं पढ़ा-बुरा जो देखन मैं चला बुरा न मिलिया कोय ,जो दिल खोजा आपना ,मुझसे बुरा न कोय |

कबीरदास जी बुरे थे ही नहीं |उन्होंने हेराफेरी करके पैसा इकठ्ठा नहीं किया था और मैंने भी हेरा -फेरी करके पैसा इकठ्ठा नहीं किया है,इसलिए कम से कम इस आदमी को मैं सर नहीं झुकाऊँगा |वो बोले |

महात्मा जी,वह सतगुरु का आसन है |उस आसन पर जो भी बैठता है,हम उसे सतगुरु का प्रतिनिधि मानते हैं |मैंने विनम्रता से कहा |

वहां बैठे सतगुरु के प्रतिनिधि के सामने झुकना सतगुरु के सामने झुकना है इसलिए इस वजह से पुराना नियम तोडना ठीक नहीं है |मैंने आगे कहा |

क्या आप मानते हैं कि सतगुरु का यह प्रतिनिधि स्वयं सतगुरु ने चुना है ?वे बोले |

जी नहीं,उसे तो संयोजक महात्मा ने चुना है |

फिर तो वह सतगुरु का प्रतिनिधि नहीं हुआ ?फिर उसे सतगुरु का प्रतिनिधि नहीं मान सकते |आप जाईये ,मैं आपको तो नहीं रोक रहा-साथी महात्मा ने दृढ़ता से कहा |

लगता है आपने वह प्रसंग नहीं सुना जिसमें सम्राट अशोक के मंत्री ने उनसे कहा कि आप मामूली भिक्षुओं के सामने अपना सर झुका देते है जबकि आप इतने बड़े राज्य के सम्राट हैं |मामूली भिक्षुओं के सामने आपका सर झुकाना शोभा नहीं देता |आपका शीश तो इतने बड़े राज्य का शीश है,इसका इस प्रकार झुकना शोभित नहीं है |

सम्राट अशोक महात्मा बुद्ध के विचारों के सच्चे अनुगामी थे ,उन्होंने अपने मंत्री को शब्दों से नहीं व्यवहार से समझाने की कोशिश की |

उन दिनों भी नगर में साप्ताहिक बाजार लगा करते थे जिनमें लोग सड़क पर रखकर सामान बेचते थे |सम्राट ने मंत्री से कहा -एक फांसी पा चुके व्यक्ति का सर उस साप्ताहिक बाजार में ले जाओ और उसे बेचकर आओ ,तब पता चलेगा कि सर की कीमत क्या है ?

मंत्री को यह काम अच्छा तो नहीं लगा लेकिन राजाज्ञा का उल्लंघन करने का साहस नहीं था |मरे हुए आदमी का सर लेकर उस बाजार में गए|सुबह से रात तक सर लेकर खड़ा रहा लेकिन कोई उस सर को मुफ्त में भी लेने को तैयार नहीं हुआ और मंत्री महोदय मजबूरन ऐसे ही वापस आ गए |

सम्राट ने मंत्री से पूछा -सबका माल बिक जाता है,आपका क्यों नहीं बिका ?

महाराज ,कोई इंसान का सर खरीदने को तैयार ही नहीं हुआ |मंत्री जी बोले |

बकरे-भेड़- सूअर -भैंस तक के सर बिक जाते हैं ,आदमी क्या इनसे भी गया गुजरा है ?सम्राट ने कहा |

जी नहीं,लेकिन आदमी का सर तो किसी ने मुफ्त में भी नहीं लिया |

ज़रा सोचिये ,यदि सर मेरा या आपका होता तब क्या बिक जाता ?

नहीं महाराज  ,मंत्री ने विनम्रता से कहा |

फिर आप ऐसे सर के झुकने से क्यों चिंतित हैं जिसे कोई मुफ्त में भी लेने को तैयार नहीं ?सम्राट बोले |यह प्रसंग सुनाकर मैंने साथी महात्मा से कहा  - इस सर को ,जब तक इसमें आत्मा है तो लोग इसे नमस्कार करते हैं लेकिन यदि आत्मा न हो तो इसे मुफ्त में भी कोई नहीं पूछता |

प्रसंग सुनकर मित्र बोले-आप तो अपराधी को बाइज्जत बरी कर रहे हैं ,क्या यह ठीक है ?

हम न्यायाधीश नहीं हैं |निरंकार ही सच्चा न्यायाधीश है जो सबका न्याय करता है |जिस सज्जन ने आज विचार करनी है,उसका न्याय भी निरंकार ही करेगा ,आप निरंकार का दायित्व अपने सर पर क्यों ले रहे हैं ?

सुनिए-कबीरदास जी ने कहा है-

कबीरा तेरी झोपड़ी गल कटियन के पास 

करेगा सो भरेगा ,तू क्यों भय उदास |मैंने फाइनली कहा |

     मित्र मौन थे लेकिन उनकी मुखमुद्रा बता रही थी कि वे अब भी संतुष्ट नहीं हैं |

माफ़ करना भाई साहब ,आपकी बातें बुद्धि को प्रभावित करती हैं इसलिए मैं आपके रहना पसंद करता हूँ लेकिन आपकी बातें व्यवाहरिक नहीं हैं |आज की दुनिया में लोग मौन तो रहते हैं लेकिन मूर्ख नहीं हैं ,उन्होंने निर्णायक स्वर में कहा |

अब मौन रहने की बारी मेरी थी |उनकी शंका दूर करने के चक्कर में मैं उस दिन स्वयं भी सत्संग में नहीं जा पाया |मुझे लगता है कि बोलने वाले के व्यवहार और जीवन में उलझने की बजाय उसके शब्दों में से सार को ग्रहण करना चाहिए |हम समय निकालकर सत्संग में जा रहे हैं तो सत्संग से जब लौटें तो हमारे भीतर भक्ति होनी चाहिए ,निरंकार के एहसास की ऊर्जा होनी चाहिए |अगर सत्संग में जाकर भी गिले-शिकवे  में ही पड़े रहे तो बची-खुची भक्ति भी ख़त्म हो जायेगी |

  

 

  

 

        

 

इतिहास पढ़ने का लाभ क्या है ?

रामकुमार सेवक 

गीत सुनते आये हैं-

छोडो कल की बातें ,कल की बात पुरानी---

 जब  हम विद्यार्थी थे तो अक्सर सोचते थे कि इतिहास विषय को यदि न पढ़ना पड़ता तो कितना  अच्छा  होता |बेवजह इतने बादशाहों के नाम और वर्ष याद करने पड़ते हैं|अब सोचता हूँ कि इतिहास पढ़ने से ज्यादा समझने की चीज है |शायद इसीलिए हर देश और कौम के इतिहास हैं |यदि इसका कोई उपयोग न होता तो कई देश अब तक इस विषय को विदा कर चुके होते |

इतिहास को समझने का एक लाभ तो यह है कि हम अतीत की गलतियों को दोहराने से बच जाते हैं |जो सिर्फ इतिहास को पढ़ते हैं वे विद्वान होने का अहंकार तो जरूर पाल लेते हैं लेकिन इतिहास ने जो सबक सिखाये उन्हें समझ नहीं पाते और विद्वान होने के बावजूद वे गलतियां फिर कर लेते हैं जिनसे बचना जरूरी था |यह वैसा ही है जैसे कुछ तोतों को सिखा दिया गया कि शिकारी आएगा,जाल बिछायेगा,दाना डालेगा मगर हम उसके जाल में नहीं फंसेंगे |वे तो तोते थे इसलिए फंस गए मगर हम जो अतीत में देश का इतना बड़ा विभाजन झेल चुके हैं,आज भी सांप्रदायिक तत्वों की कठपुतली बनने से स्वयं को रोक नहीं पाते |जाति व् सम्प्रदाय की ज़िद अपने कन्धों पर लादकर घूम रहे हैं | वास्तव में धर्म का वास्तविक अर्थ है -मानवता,हर मानव की आत्मा में प्रभु को देखना |

थोड़ा ही समय गुज़रा है,बाबा हरदेव सिंह जी को हमने अपने सामने देखा |उनके विजन को देखा |उनकी मेहनत भी देखी|बाबा जी कहा करते थे कि पवित्र लक्ष्य के लिए साधन भी पवित्र होने चाहिए लेकिन हम लोग उनका अनुकरण नहीं कर सके  इसलिए बाबा जी ने स्पष्ट कह दिया था कि यदि गलती करने वाले नहीं रुकते तो माफ़ करने वाले को रुकना पड़ेगा |यह इतिहास था जिसे हमने देखा और आज देख रहे हैं कि गलतियां करने वाले तो हैं लेकिन माफ़ करने वाला नहीं है और दुष्परिणाम हम देख ही रहे हैं |

  हमें इतिहास से सबक लेकर परस्पर प्रेम को सम्मान देते हुए मानवता और सत्यनिष्ठा को अपना व्यवहार बनाना चाहिए |इस अवस्था में हमारा इतिहास पढ़ना भी मुबारक है और समझना भी क्यूंकि विद्वान कहते हैं कि-जो कौम अपना इतिहास भूल जाती हैं वह अंततः नष्ट हो जाती हैं |          

शायद इसीलिए बाबा हरदेव सिंह जी उस युग को वापस लाने की बात करते थे | 

रामकुमार सेवक 

 कल सत्संग में महात्मा युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी के समय का एक प्रसंग सुना रहे थे |किसी महात्मा ने सत्संग में कविता सुनाई-कौन जन्मा है हमें डुलान वाला |

कवि होने के कारण मुझे अच्छी तरह पता है कि जोश में हम लोग अक्सर बड़े -बड़े दावे कर बैठते हैं हालांकि यह भी गुरु कृपा के बल पर ही होता है लेकिन महात्मा बता रहे थे कि गुरमत की दृष्टि से यह सही नहीं है कि-गुरु के सामने कुछ दावा किया जाए इसीलिए मैंने कभी भी अपनी कविता पढ़ते समय किसी को विशेष तौर पर ध्यान देने के लिए नहीं किया क्यूंकि मुझे अपनी औक़ात का पता है |

बहरहाल कवि महात्मा ने बाबा अवतार सिंह जी के सामने पहाड़गंज में सगत में दावा कर दिया कि-कौन जन्मा है हमें डुलान वाला अर्थात निरंकार -सतगुरु पर हमारे को कमजोर कर दे ऐसा कौन जन्मा है ?

अगले दिन सत्संग में जाने लगे तो साइकिल में पंचर था |महात्मा की चप्पल भी टूट गयी |सड़क पर जो लोग अपने -अपने  वाहनों पर शान से गुजर रहे थे,उन्हें देखकर महात्मा के मन में असंतोष उभरा कि रोज ही सत्संग करते हैं फिर भी ऐसी दिक्कतें झेलनी पड़ती हैं |मन में विकार आया तो उत्साह ढीला पड़ गया |रोज सत्संग में जाने का नियम बना रखा था लेकिन आज जाने की इच्छा न थी |

प्रभु मेरी तो साइकिल भी काम नहीं कर रही,चप्पल भी टूट गयी है-सत्संग में जाकर मैंने क्या पाया ?

प्रभु से ही गिला-शिक़वा शुरू हो गया |फिर एक-दो दिन सत्संग में नहीं गए तो बाबा अवतार सिंह जी ने खबर भेजी कि-कई दिनों से दर्शन नहीं हुए ?

 बाबा जी ने खबर भेजी तो फिर बादल छंट गए और महात्मा डरते-डरते सत्संग में चले गए |पीछे जाकर चुपचाप बैठ गए |बाद में जब नमस्कार करने गए तो शर्म-सार थे |पहले किया गया दावा खोखला प्रमाणित हो गया था |

वह समय ही दूसरा था |साकार गुरु से शिष्य की सीधी बातचीत थी क्यंकि माया का ज्यादा दखल नहीं था |निरंकार से महापुरुषों का गहरा सम्बन्ध था इसलिए बाबा जी को प्रबंध की भी चिंता नहीं करनी पड़ती थी |न गुरु को चिंता न शिष्य को चिंता |शायद इसीलिए बाबा हरदेव सिंह जी उस युग को वापस लाने की बात करते थे |

बाबा जी ने उनसे पूछा -जगत राम जी,अब वो कविता सुनाओ जिस में कहा था -कौन जन्मा है मैनू डुलान वाला |महात्मा ने क्षमा याचना की |बाबा जी ने कहा-वो कविता पढ़ना बंद मत करना लेकिन उस लाइन को इस प्रकार पढ़ना-कोई जन्मे न मैनू डुलान वाला |

शहंशाह बाबा अवतार सिंह जी स्वयं कवि भी थे और उन्होंने उस्ताद कवि वाला काम किया |मात्रा कम-ज्यादा किये बिना उस कविता में दावे की बजाय अरदास वाला भाव पैदा कर दिया |

आज सुबह दोबारा यह प्रसंग सुनने को मिला तो बहुत ख़ुशी हुई क्यूंकि यह प्रसंग मैंने अप्रैल में लिखना शुरू किया था लेकिन स्पष्ट आज हो पाया हूँ |यह निरंकार ने कृपा कि-वे कवि महात्मा थे -जगतराम जी उडारू,जो कहते थे इस प्रसंग को मेरा नाम लेकर बताया करो ताकि कोई और महात्मा ऐसी गलती ना करे | 

बाबा जी ने समझाया कि सत्संग में जब भी बोलो तो यह सोचकर बोलो कि निरंकार सब देख और सुन रहा है, जो चाहे तो कही गयी बात की परीक्षा भी ले सकता है इसलिए गुरमत की मर्यादा को याद रखना जरूरी है |

महात्मा तो हमेशा अरदास करते हैं-डोलन ते राखो प्रभु |प्रभु से हमें अरदास करनी चाहिए कि यह हमें डोलने से बचाये |

यह प्रसंग सुनकर ध्यान आया कि महापुरुष तो अति उत्साह में निरंकार तक को चुनौती दे देते हैं और कुछ वर्ष बाद वे ऐसे लुप्त हो जाते हैं जैसे -गधे के सर से सींग |

गुरसिख का कर्तव्य है कि वह हमेशा समर्पण की ,भक्ति की भाषा बोले -किसी को भी चुनौती देने से बचे |               

वह सत्य था या यह सत्य है ?

रामकुमार सेवक 

यह सोचकर मुझे खुशकिस्मती का एहसास होता है कि मेरे पास गुरु है |निरंकार सच्चे बादशाह ने कृपा की मुझे ऐसे गुरु मिले जिन्होंने कृपा करके समझा दिया कि यह है निरंकार और एकमात्र यही है जिससे जुड़ना सौभाग्य की बात है अन्यथा सब लोग और सब पदार्थ इस दुनिया के मेले में ही मिले और इस मेले में ही बिछुड़ गए |

यह भी सौभाग्य की ही बात रही कि उस समय बाबा गुरबचन सिंह जी के रूप में क़ामिल मुरशद ही मिले अन्यथा यह लिखने वाले शायर भी इसी दुनिया में हैं-

बड़ा हैरान हूँ मैं ज़िन्दगी के इस तज़ुर्बे पर ,

जिन्हें मैं रहबर समझा वे सारे राहजन निकले |

चूंकि मुरशद क़ामिल थे,ब्रह्मवेत्ता थे तो उपर्युक्त शेअर कहने की नौबत ही नहीं आयी और इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि-गुरु का आना जीवन में राहत का आना है |

राहत की ज़रूरत हर किसी को महसूस होती है लेकिन गुरु अथवा मार्गदर्शक पर भरोसा नहीं होता |निरंकार का एहसास जब हो जाता है तो फिर हर चीज़ में यही नज़र आता है | गुरु आपको मार्ग दिखला सकता है लेकिन चलने का काम तो शिष्य का ही होता है |

राजा जनक अपने गुरु के योग्य शिष्य थे |वे गुरु के कन्धों पर सवारी करने वालों में से नहीं थे बल्कि गुरु के दर्शाये मार्ग पर चलने वालों में से थे |उस समय के गुरु स्वयं भी साधक होते थे और शिष्य भी वैसे ही ढूंढते थे |

हुआ दरअसल यह कि राजा जनक ने एक रात सपना देखा कि वे राज्य हार चुके हैं |मिथिला पर शत्रुओं का कब्ज़ा है |वे जंगल में भटक रहे हैं |भूख की भयंकर पीड़ा से वे व्याकुल हैं |किसी शहर में पहुँचते हैं |रात्रि का वक़्त था तो भोजन का प्रबंध हो न सका |  किसी ने बताया कि शहर में एक धर्मशाला है जहाँ रात को भोजन बँटता है,एक बार वहां जाकर देख लो |कहाँ इतने बड़े सम्राट और कहाँ भोजन के मोहताज़ |

बहरहाल वहाँ गए |वहां खिचड़ी बंटती थी |भूख में तो खिचड़ी भी छत्तीस व्यंजनों से कम नहीं |खिचड़ी ख़त्म हो गयी थी |भोजन बांटने वाले ने जवाब दे दिया लेकिन भूख से व्याकुल इंसान को देखकर दया आ गयी |बोला-खिचड़ी तो ख़त्म है लेकिन थोड़ी सी खुरचन है ,आप कहें तो इसे दे दूँ ?

राजा भूख से बेहाल थे ,उन्होंने हामी भर ली |बांटने वाले ने खुरचन उन्हें देने के लिए निकाली |लेकिन उधर से एक कुत्ता आया |कुत्ते के कारण असंतुलन हुआ और खुरचन भी नीचे गिर गयी जिसे कुत्ता खा गया |राजा के दुःख का अंत नहीं था |पीड़ा की इसी पराकाष्ठा में आँख खुल गयी और राजा को राहत मिली |

देखा-कहीं कोई अभाव नहीं ,वे पूरे आनंद से अपने बिस्तर पर थे लेकिन मन में उलझन अवश्य थी |

सुबह उठकर उन्होंने अनेकों से यह प्रश्न पूछा कि-वह पीड़ा और भूख सत्य थी या यह सुख व् आराम सत्य है ?सब अपनी-अपनी बुद्धि के अनुसार उत्तर देते थे लेकिन राजा की तसल्ली नहीं हो रही थी |वे सबसे यही पूछते कि वह सत्य था या यह सत्य है ?

अंत में प्रश्न ऋषि अष्टावक्र जी के पास पहुंचा |

अष्टावक्र जी ने पूरी परिस्थिति का मूल्यांकन किया और बोले -सपने में आप जंगल में थे और घोर दुःख और भयंकर भूख का अनुभव कर रहे थे |

 राजा बोले -जी हाँ 

अभी आप महल में हैं और भूख की कोई समस्या नहीं है |ऋषि अष्टावक्र जी ने कहा |

राजा ने अपनी सहमति व्यक्त की |

इसका अर्थ है कि-महल-रानियां और नौकर-चाकर सत्य नहीं हैं |

राजा पहले भी इन सबकी निःससारता को समझते थे इसलिए वे पूर्णतः सहमत थे |

ऋषि बोले -न जंगल और भूख की आग सत्य थी ,न ही यह महल सत्य है लेकिन आप जंगल में भी थे और महल में भी इसलिए आपका होना ही सत्य है |आप सत्य हैं |

राजा जनक महात्मा की बात के सार को समझ गए लेकिन शरीर तो सबका ही नाशवान है तो वह तो सत्य नहीं था और न है ,राजा जनक अथवा किसी इंसान का वास्तविक अस्तित्व है,उसकी आत्मा |यह आत्मा ही सत्य है शेष जो भी कुछ नज़र आ रहा है,उस सबके बारे में बाबा अवतार सिंह जी ने सम्पूर्ण अवतार बाणी में लिखा है-

कहे अवतार जो दृष्टि आवे भ्रम-भुलेखे सारे हैं |                  

विश्वास का सुखद असर    

रामकुमार सेवक 

निरंकार कपोल कल्पना नहीं है बल्कि एक ऐसी हकीकत है जो शाश्वत सत्य,शिव और सुन्दर है|इसका प्रत्यक्ष अनुभव मैंने हमेशा किया है और अब भी करता हूँ |

आदरणीय विनय जोशी जी ने एक कविता लिखी थी -

हे प्रभु ,मुझे अपना अन्धविश्वास प्रदान करो -----

अंध विश्वास के पक्ष में पहली बार मैंने कुछ पढ़ा था |

निरंकार का ज्ञान तो बहुतों ने लिया है लेकिन निरंकार का विश्वास सबको नहीं होता |निरंकार सब कुछ का दाता है और इसका विश्वास इसी से माँगना पड़ता है |विश्वास किसको कैसे मिला ,यह सबकी अलग-अलग कहानी है ,यहाँ ऐसी ही कहानी प्रस्तुत है -

 1993  की बात है ,मैं उत्तर-पूर्व के सन्त समागम में भाग लेने के लिए कलकत्ता गया |

उस समय तक हमारे परिवार में पिताजी-माता जी के अलावा दो बेटियां थीं |उन दिनों मेरा निवास देहाती क्षेत्र में था इसलिए लड़कों को महत्व देने की परंपरा थी |विशेषकर महिलाओं में यह पिछड़ी सोच फैली हुई थी |हम तो लम्बे समय से मिशन से जुड़े थे और मुझे सन्त निरंकारी  (हिंदी पत्रिका )में नियमित सेवा भी मिली हुई थी |जीवन यापन के लिए सरकारी सेवा थी |इसके बावजूद निश्चय ही पत्नी को पुत्र प्राप्ति का दबाव झेलना पड़ता होगा |

कलकत्ता के रवींद्र सरोवर मैदान में समागम हो रहा था |पत्नी ने ब्रह्मज्ञान ,विवाह के बाद लिया था लेकिन विश्वास सबका अपना-अपना है |उसने जब कलकत्ता में बाबा जी को देखा तो कुछ नया अनुभव हुआ |अब भी उस दिन को वह याद करती है कि-बाबा जी सत्संग में जब पधार रहे थे उसके तार जुड़ गए |उसकी आँखों में आंसू थे और उसने प्रार्थना की कि-आपने इतने लोगों को इतना कुछ दिया है |मैं तो आपको तब मानूंगी जब मुझे पुत्र दोगे |

ऐसा लगा जैसे मालिक ने प्रार्थना सुन ली हो क्यूंकि रात में उसे सपना आया कि-जैसे हमारे घर में पुत्र का जन्म हुआ है |कुछ ऐसा ही सपना मुझे भी आया था |

जब हम दिल्ली लौटे तो दो लड़कों के जन्म की मिठाइयां हमें खाने को मिली |आदरणीय निर्मल जोशी जी मुझे पितृवत स्नेह करते थे |उन्होंने सहज भाव से कहा-बाबा जी आजकल लड़के बाँट रहे हैं,आप भी लाइन में लग जाओ |

अब मुझे श्री रामचरितमानस की यह पंक्ति ध्यान में आ रही है-

जा पर कृपा राम की होइ 

ता पर कृपा करे सब कोई |

यह पंक्ति जोशी जी के वचन से साकार हो गयीं |इस घटनाक्रम के ठीक नौ महीने बड़े पुत्र कुणाल का जन्म हुआ और वह भी असामान्य परिस्थितियों में |मुझे महसूस होता है लड़के और लड़कियां हमारी दो आँखों की तरह हैं इसलिए मालिक ने जिस तरह इस दृष्टि से भी परिवार में संतुलन प्रदान किया है,सबके जीवन में यह  संतुलन क़ायम रहे,यही अरदास है |

कुणाल का जन्म जब हुआ , वह भी एक चमत्कार था जिसकी चर्चा अलग से करेंगे |धन निरंकार जी |    

ऐसा लगता है जैसे कल ही की बात हो

रामकुमार सेवक 

महान गीतकार इन्द्र सिंह अनथक जी ने लिखा है -

सुपने विच वी ना डोले मेरा विश्वास बाबा 

तेरे चरना च मेरी अरदास बाबा ----

बरसों से यह गीत विभिन्न महात्माओं से सुनते आये हैं और सदैव इस अरदास में खुद को भी जोड़ा है कि मेरा विश्वास तुझ पर कायम रहे क्यूंकि हे निरंकार प्रभु ,एक तू ही हमेशा होता है.सामने भी ,पीछे भी  अन्यथा सपने पर तो किसी का भी कोई नियंत्रण नहीं होता |

उन दिनों सन्त निरंकारी मंडल दिल्ली के निरंकारी कॉलोनी स्थित एक क्वार्टर में रहता था |रात को सपने में मैं कश्मीर पहुँच गया | 

उन दिनों भी कश्मीर में आतंक का दौर चल रहा था |सपने में मैंने देखा कि आतंकवादियों का एक समूह मुझे ही घूर रहा है |मैं डर गया क्यूंकि मृत्यु सामने नज़र आ रही थी |

उन दिनों मैं सन्त निरंकारी (हिंदी )का संपादक था |

सम्पादकों पर हमले होने का इतिहास बहुत पुराना है |सपने में मैंने महसूस किया कि क्या मैं इतना बड़ा संपादक हूँ कि आतंकवादियों की हिट लिस्ट में आ जाऊं ?मैंने सोचा कल के अखबार में खबर तो यही छपेगी कि सन्त निरंकारी पत्रिका के संपादक फलां-फलां को आतंकवादियों ने गोली मारी |

यह सोचकर मैं डर गया कि अब मृत्यु बिलकुल सामने है,क्या किया जाए ?

जान बचाने का ख्याल आया कि कोई पतली गली दिखाई दे तो उस में घुस जाऊं |

यह ध्यान में आया तो मैंने किसी पतली गली की तलाश की लेकिन कोई भी गली ऐसी दिखाई न दी जिसमें छिपा जा सके |

अब यह तय है कि मृत्यु निश्चित है तो मैंने बोलना शुरू किया-तू ही निरंकार,मैं तेरी शरण हाँ ,मैनू बख्श लो |अभी पहली ही पंक्ति बोली थी कि मेरी आँख खुल गयी |आँख खुलते ही मुझे लगा -शुकर है जान बच गयी | 

लगभग बीस साल हो गए होंगे,जब यह सपना देखा था लेकिन आज भी ऐसा लगता है,जैसे कल ही की बात हो |

          

सम्पादकीय (जून 18 )

सूचना क्रांति और सत्य

रामकुमार सेवक  

सूचना क्रांति का दौर जब शुरू हुआ तो मुझे इसमें कुछ विशेष बात नज़र नहीं आयी क्यूंकि उन दिनों मैं एक आध्यात्मिक पत्रिका का संपादक था |उसमें हम जो समाचार प्रकाशित करते थे वे बिलकुल सत्य हुआ करते थे |हमारा लक्ष्य परम सत्य परमात्मा के प्रति लोगों को जागरूक करना था |हम जो कुछ भी प्रकाशित करते थे उसके प्रति कुछ लोग बहुत आकृष्ट थे और वे अपनी प्रतिक्रिया भी देते थे |इसके अलावा कोई विशेष बात हमें देखने को नहीं मिली |

लगभग 25  वर्ष तक निःस्वार्थ भाव से सेवाएं देने के बावजूद बहुत अपमानजनक तरीके से संगठन ने मुझे सेवामुक्त कर दिया | भाव जब निःस्वार्थ सेवा का हो तो फिर मनोवस्था टकराव की नहीं रहती |मन किसी भी परिस्थिति को जल्दी स्वीकार कर लेता है और विपरीत परिस्थितियों में से भी अनुकूल तथ्य ढूंढ लेता है |

उन दिनों मेरे नियमित पाठक यह जानना चाहते थे कि मुझे अनायास ही क्यों हटाया गया था ?लोग सही कारणों तक पहुंचना चाहते थे क्यूंकि 1986  में जब मैं उस पत्रिका से जुड़ा था तो उसकी पाठक संख्या 20000   के आस-पास थी जबकि जब मुझे हटाया गया तो यह संख्या एक लाख को पार कर चुकी थी इसलिए पाठकों के मन में यह स्वाभाविक प्रश्न था कि मुझे हटाया क्यों गया था इसलिए पाठक पत्रिका विभाग से संपर्क करते थे और  विभाग उन्हें अपनी बनायीं हुई कहानी सुना देता था |उनमें से ज्यादातर लोग तो उस कहानी पर विश्वास कर लेते थे लेकिन कुछ लोग जिनका मुझसे संपर्क बन जाता था वे उस कहानी की जाँच करने की कोशिश करते थे और इस निष्कर्ष पर पहुँचते थे कि जो पत्रिका कभी सत्य के प्रति जागरूक करने को प्रतिबद्ध थी उसे अब असत्य जानकारी देने से कोई परहेज नहीं था |

इस घटनाक्रम ने मेरी जानकारी में यह तथ्य जोड़ दिया कि सूचना माध्यमों की शक्ति कितनी ज्यादा है |गलत सूचनाओं को योजनाबद्ध तरीके से प्रसारित करके नायक को खलनायक सिद्ध किया जा सकता है |वह स्थिति पैदा की जा सकती है कि अपराधी को पुरस्कृत कर दिया जाए और नायक की हालत ऐसी कर दी जाए कि लोग उसे ईसा मसीह की भाँति सलीब पर चढ़ा दें |

पिछले दिनों मेरी दृष्टि में हिटलर का इतिहास आया |हिटलर का सूचना मंत्री बहुत खतरनाक आदमी था |उसका मानना था कि झूठ को यदि बार- बार दोहराया जाए तो लोग उसी को सच मानने लगते हैं |उसका मानना था कि सच को सच नहीं बल्कि राज्य जो चाहे उसी को सच माना जाना चाहिए |

प्रजातंत्र में प्रायः राजनीतिक दलों के हाथों में ही वास्तविक सत्ता होती है और राजनीतिक दलों की दृष्टि में सत्ता प्राप्ति ही सबसे बड़ा लक्ष्य होती है |हर राजनीतिक दल चाहता है कि लोग उसी की बात को सत्य माने और बाकियों को झूठा माने |इस परिपेक्ष्य में जनता यह महसूस करती है कि कोई भी दल सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करता |

सत्ताधारी दल प्रायः इतने समर्थ होते हैं कि सूचना के स्रोतों को ही खरीद लेते हैं |ऐसी परिस्थितियों में जनता के लिए सही तथ्य जान पाना लगभग असंभव हो जाता है लेकिन सत्य की अपनी सामर्थ्य होती है और वह किसी भी माध्यम से प्रकट हो जाता है इसलिए हमारे धर्मशास्त्र कहते हैं -सत्यमेव जयते अर्थात सत्य की ही विजय होती है |       

हम वही हैं,सावधान रहना 

रामकुमार सेवक 

 एक नज़र(साप्ताहिक के रूप में ) जब आदरणीय वासुदेव राय जी छापते थे ,उन दिनों उसमें मैंने एक कहानी पढ़ी थी| उसमें जो बात कही गयी थी वो आज मुझे कुछ सोचने को विवश कर रही है |1978 या 1979 में पढ़ी गयी यह कहानी इस प्रकार है-

चर्च में प्रार्थना के बाद कुछ बच्चे बाहर निकले |बाहर उन्होंने देखा कि यीशु मसीह खड़े हुए हैं |उनकी हथेलियों के ज़ख्मो से अब भी खून रिस रहा था ,जो हथेलियों में कीलें ठोके जाने के परिणामस्वरूप बने थे |वे बच्चे बोले-देखो ,यह आदमी यीशु मसीह जैसा लगता है |

यीशु ने कहा-मैं स्वयं यीशु मसीह हूँ |

वहां शोर मच गया |लोग इकट्ठे हो गए |पादरी भी बाहर आ गया -उसने कहा-अरे,ये ढोंगी कहाँ से आ गया |यीशु बोले-मैं सचमुच यीशु हूँ |लेकिन लोगों ने यीशु मसीह की बजाय पादरी की बात पर यकीन किया और उन्होंने भी यीशु को ढोंगी ही माना | पादरी ने उन्हें चर्च के भीतर बनी जेल जैसी जगह में बंद कर दिया |

लोग भी अपने -अपने घरों को चले गए |यीशु मसीह ने खाना नहीं खाया तो पादरी के कान खड़े हो गए ,वह स्वयं थाली में खाना लेकर गया और बोला-मैं आपको पहली नज़र में ही पहचान गया था लेकिन तुम मुझे अब तक नहीं पहचान सके |मैं उन्हीं में से हूँ जिन्होंने तुम्हारी हथेली में कीलें ठोकी |बेहतर यही है कि तुम जहाँ से आये हो,वहीं चले जाओ नहीं तो हम तुम्हारा वही हाल करेंगे जो पहले किया था |बल्कि उससे भी बुरा हाल करेंगे |

प्रसंग का निहित अर्थ यह है कि माया इतनी प्रभावी है कि माया के लालच में विरोधी भी पुजारी का वेश बना सकता है और वह आडम्बर पैगम्बर के उसूलों की हत्या कर देता है |भोले-भाले मगर अविवेकी अनुयाई जाने -अनजाने उसूलों के विरोधियों का समर्थन कर रहे होते हैं| ऐसे लोगों से सावधान रहने की आवश्यकता है | 

जब मैं सन्त निरंकारी ,हिंदी का संपादक था ,उस समय मैंने एक सम्पादकीय लिखा था-आँखें खोलो |निरंकारी मिशन की शुरूआत दुनिया की आँखें खोलने के लिए ही हुई थी लेकिन धीरे धीरे वही सब सिलसिले शुरू हो गए जिनसे दुनिया को बचाने के लिए यह महान आध्यात्मिक आंदोलन शुरू हुआ था |लेकिन निरंकार पहले भी सच था ,अब भी सच है और आगे भी सच होगा इसलिए हमें हमेशा निरंकार को ही पहल देनी चाहिए |   

मुझे अवतार बाणी का वह शब्द भी याद आ रहा है,जिसमें बाबा अवतार सिंह जी कहते हैं -

आये दी ते कदर ना  जानण दीवे बालण मढ़ियाँ ते |

कहे अवतार अड़े ने मूरख ,अज वी अपनी अड़ियां ते  | 

आज के सन्दर्भ में यह शब्द कौन से अर्थ दे रहा है यह हर इंसान का अपना विवेक बताएगा | किसी सुनी  -सुनाई बात पर यकीन करने की बजाय जरूरी है कि गुरु द्वारा समय-समय पर दिए गए मार्गदर्शन और उनमें निहित सार को याद रखा जाए और किसी को भी परखने के बाद यथायोग्य व्यवहार किया जाए क्यूंकि यह अंधानुकरण का ज़माना नहीं है |बाबा हरदेव सिंह जी को क्या-क्या झेलना पड़ा ,उनकी जनरल बॉडी की मीटिंग्स में की गयी विचारें इस तथ्य को प्रमाणित करती हैं | हम उनके दर्द को भूल नहीं सकते इसलिए जो वे कहते थे -मेरी ऊँगली की तरफ नहीं बल्कि ऊँगली जिस तरफ इशारा कर रही है,उस इशारे को देखो ,उसे पकड़ो |

समर्पण होना चाहिए लेकिन अपने लक्ष्य के प्रति |पूर्ण समर्पण चाहिए सिर्फ    निरंकार के प्रति ,सतगुरु के मिशन के प्रति |  अंधानुकरण समर्पण नहीं है और न ही भक्ति है |         

 

 

इस सीख को भी वही मान सकता है ------

रामकुमार सेवक


आज का पूरा सिस्टम अहंकार का पोषक है/आज का आदर्शवाक्य है-हम किसी से कम नहीं/
माँ बच्चे को सिखाती है कि तू किसी से कम नहीं है/वह इस सबक को सीखता है और चरण-स्पर्श को त्यागने योग्य मानता है/छोटे-बच्चों तक को माताएं सिखाती हैं-शेक हैंड्स यानी कि हाथ मिलाओ /बच्चा सबसे हाथ मिलाता है/हाथ हमेशा दोस्तों से ही मिलाया जाता है /हाथ मिलाने का भाव ही बराबरी का होता है/बराबरी का मतलब स्पष्ट है कि वह बचपन में भी किसी से कम नहीं है बल्कि बराबर तो ज़रूर है

हमारी शिक्षा जो अंग्रेजो की नक़ल है भी भारतीय संस्कृति और अध्यात्म से विमुख है/पब्लिक स्कूलों में बच्चों को पढ़ाना भी स्टेटस सिंबल है/बचपन से ही आम और ख़ास में फर्क वाले संस्कार मिलने शुरू हो जाते हैं/आगे समाज में भी इंसान-इंसान में फर्क किया जाता है/अमीर-गरीब की खाई लगातार बढ़ रही है इस कारण नक्सल जैसे हिंसक आन्दोलन अस्तित्व में आये हैं/गाडी वाले और पैदल के बीच जो सम्बन्ध है उसमें नफरत हावी है जिसके कारण अपराध बढ़ रहे हैं
रोज़ देखता हूँ कि कोई किसी के सामने झुकने को तैयार नहीं है/

विद्यार्थी बूढों पर तरस तो खा लेते हैं लेकिन उनके सामने झुकते नहीं /झुकते तो माता-पिता के सामने भी नहीं हैं /आत्म-विश्वास ने जैसे अहंकार का रूप ले लिया है/विद्यार्थी मेधावी हैं और निरंतर तरक्की कर रहे हैं लेकिन देश में ईमानदारी का घोर संकट है/ सहनशीलता-विशालता-दया-विनम्रता आदि लुप्तप्राय हैं/


ऐसे में जब सुनते हैं कि हरि को अहंकार प्रिय नहीं है तो लगता है कि यह किसी और युग की बात है/आज तो अहंकार ही चलन में है/जो जितना बड़ा है उसका अहंकार भी उतना ही बड़ा है/कोई छोटे अहंकार को गोद में बिठाए है तो कोई बड़े को मगर अहंकार सबके पास है/अहंकार के पुत्र-पुत्रियाँ हैं-वैर-ईर्ष्या-द्वेष-हिंसा आदि |

बाबा हरदेव सिंह जी ने सन्त-महात्माओं के अनेक प्रसंग समय-समय पर दोहराये और कहा-

हरजी को हंकार न भावै अर्थात प्रभु को अहंकार पसंद नहीं है |

आज के ऐसे अहंकार को पोषित करने वाले वातावरण में बाबा जी की यह सत्य बात यथार्थ से परे नज़र आती है  जबकि सारा सिस्टम अहंकार की जड़ें मजबूत करने में लगा है | अहकार और अहंकार का परिवार ही आज सर्व-व्यापक है/यह चलन बदलना बहुत ज़रूरी है लेकिन हालात तो विपरीत हैं-शायर के शब्दों में-
चमन में शाख पर पत्ते भी नज़र नहीं आते
आपने किस रुत में फूलों का तकाजा कर दिया/
इस हालत में जबकि ब्रह्मज्ञानी कहलाने वाले हम लोग भी भी अहंकार से मुक्त नहीं हो सके हैं तो आशा की किरण धूमिल हो चली है/कौन है जो इस अहंकार के पोषक सिस्टम को बदलने की पहल करेगा?नज़र तो वहीं टिकती है जो आज भी एक दूसरे के चरणों में झुक रहे हैं.निरंकारी बाबा जी के वास्तविक शिष्य|

इसका सुन्दर परिणाम भी देखने को मिला है |दिल्ली के मैदान न.8 की बात है |किसी सज्जन की गाड़ी किसी दूसरे महात्मा की गाड़ी से छू गयी |अगली गाड़ी वाले सज्जन ने पलटकर देखा और पिछली गाड़ी वाले महात्मा ने हाथ जोड़ दिए |प्रत्युत्तर में उन्होंने भी हाथ जोड़ दिए |

ज़रा कल्पना करें कि यह घटना यदि इस मैदान से बाहर कहीं हुई होती तो हालात कितने विपरीत होते |मेरे ज़हन में वो दर्दनाक समाचार आने लगते हैं जिनमें फंसकर हज़ारों लोग अपनी जान गंवा चुके हैं |

 

यह मिशन में ही सीख मिली कि गलती किसी से भी हो सकती है |सहनशीलता और समझदारी को हर हालत में बनाये रखना चाहिए लेकिन इस सीख को भी वही मान सकता है जिसे अहंकार से ज्यादा निरंकार प्रिय हो ,सतगुरु की शाश्वत शिक्षाएं प्रिय हों |   

क्यूंकि यही हमें ब्रह्मज्ञानी सिद्ध करेगी 

रामकुमार सेवक

महात्मा जोगिन्दर सिंह जी कमल कहा करते थे कि एक घोडा था जिस पर सजा -धजा एक नौजवान बैठा था |इस नौजवान को रस्सी से बांध रखा था |किसी ने पूछा कि इसे रस्सी से क्यों बाँध रखा है ?बताने वाले ने बताया कि-आज इसकी शादी है |यह सुनकर पूछने वाला और भी हैरान हुआ |उसने कहा -फिर इसे रस्सियों से क्यों बांध रखा है ?उसने कहा-अगर इसे रस्सी से न बाँधूँ तो यह घोड़ी से नीचे उतारकर ज़मीन पर बिखरे पैसे बटोरने लगता है |

कमल जी कहते थे-इंसान का मन ऐसा ही है |बेहतर रहता कि यह इस जीवन के बाद के बारे में अर्थात परलोक के बारे में भी सोचता लेकिन यह सिक्के ही बटोरता रहता है |यह नहीं सोचता कि यह धन साथ नहीं जाएगा |जरूरी है कि प्रभु पर चिंतन किया जाए ,माया बटोरने की बजाय |

इसी को अध्यात्म कहते हैं,जब इंसान प्रभु की तरफ मुड़ता है | 

अध्यात्म एक दीवारविहीन दुनिया है जिसमें हर जीव-जंतु के लिए स्थान है |आमतौर से अध्यात्म को धर्म से जोड़ दिया जाता है |किसी समय धर्म और अध्यात्म में कोई फ़र्क़ था भी नहीं लेकिन धीरे लोगों ने धर्म को अपनी लालसाएं पूरा करने का जरिया बना लिया तो धर्म की मानवता से दूरी बढ़नी शुरू हो गयी |

अनेक संत-महात्माओं ,अवतार ,गुरु,पीर-पैगम्बरों ने मानव को लालच त्यागने और एक सर्वव्यापक परमात्मा से जुड़ने की प्रेरणा दी |जिससे मानव में प्रभु के प्रति आकर्षण बढ़ा और भक्ति भावना ने शांति की और अग्रसर किया |

यह एक सकारात्मक कदम था लेकिन धीरे हर पैगम्बर ,सन्त -महात्मा के अनुयाईयों के अपने समुदाय बन गए |विभिन्न धर्म इन समुदायों की पहचान बन गए |

व्यक्तिगत अहंकार ने सामुदायिक अहंकार का रूप ले लिया और इस रूप में धर्मो ने एक प्रकार की दीवार का रूप धारण कर लिया |

बाबा अवतार सिंह जी के सामने अनेक बार यह प्रश्न आया कि क्या निरंकारी मिशन भी कालांतर में ऐसा ही एक धर्म नहीं बन जाएगा लेकिन बाबा अवतार सिंह जी को ऐसी कोई आशंका नहीं थी क्यूंकि उनकी सोच बहुत विशाल थी |उनकी शिक्षाएं मानव मात्र के लिए थीं और मानवता को ही सच्चा धर्म मानती थी |सत्तर के दशक में बाबा गुरबचन सिंह जी ने कहा-प्यार हमारा धर्म है,इंसानियत ईमान है |

बाबा हरदेव सिंह जी ने कहा-धर्म है बस इन्सां होना कोई और धर्म-ईमान नहीं |उन्होंने यह भी कहा- धर्म जोड़ता है तोड़ता नहीं तथा-धर्म वह प्रक्रिया है,जिससे मनुष्य ,मनुष्य बनता है |

लगभग हर धर्म या समुदाय की घोषित सोच यही है लेकिन वास्तविकता के धरातल पर तस्वीर इतनी सुन्दर नहीं   है इसलिए आध्यात्मिक जीवन मूल्यों को जीवित रखने के लिए निरंकार अथवा परमात्मा को जीवन का आधार बनाना होगा |

यह आधार हममें वैसा ही विश्वास जगाने वाला होना चाहिए जो रामकृष्ण परमहंस में था |उनसे स्वामी विवेकानंद ने प्रश्न किया कि-क्या आपने प्रभु को देखा है और उन्होंने इधर-उधर की बातें बनाने की बजाय साफ़ -साफ़ कह दिया कि-हाँ ,मैंने  देखा है  और अब भी देख रहा हूँ ,उतनी ही स्पष्टता से,जितनी स्पष्टता से तुम्हें देख रहा हूँ |यही है आत्मविश्वास ,जो कि-ब्रह्मज्ञानी का आभूषण है |गुरु महाराज कहते थे-जिसके पल्ले सच तो कोठे चढ़के नच |यही ख़ुशी हमारे जीवन का आभूषण होनी चाहिए क्यूंकि यही हमें ब्रह्मज्ञानी सिद्ध करेगी |    

हम  आग  लगाने  वालों में हैं  या  बुझाने  वालों  में ?

रामकुमार सेवक

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी अक्सर एक प्रसंग सुनाया करते थे और पिछले दिनों पूज्य माता सविंदर जी ने भी उसे दोहराया कि एक शहर में आग लग गयी |शहर में दो प्रकार के लोग थे-पहले-आग लगाने वाले और दूसरे-आग बुझाने वाले |तभी देखा कि एक चिड़िया अपनी चोंच में पानी की बूँद लाकर आग पर डाल रही है |यह देखकर बुद्धिमानो ने कहा -तेरी इस एक बूँद से क्या आग बुझ जायेगी ?कहते हैं कि उस  चिड़िया ने कहा-इस बूँद से निश्चय ही इतनी आग नहीं बुझ सकती लेकिन जब कभी आग लगाने वाले और आग बुझाने वालों की चर्चा होगी तो मेरा नाम आग बुझाने वालों में आएगा |

इस प्रसंग को थोड़ा और आगे ले जाते हैं |अपने चारों तरफ देखें |हालाँकि किसी के भी हाथ में मिट्टी का तेल और दियासलाई नहीं है फिर भी आग लगी दिखाई देती है |यह आग बिजली के तारों के कारण नहीं लगी है |यह बांस का जंगल भी नहीं है फिर भी आग लगी हुई है क्यूंकि प्रतिद्वंद्विता में कोई हमसे आगे निकल गया है |हमारी पार्टी को कोई और ले उड़ा |हमारी थाली का खाना कोई और ले गया |हर कोई एक दूसरे से उलझने को तैयार है |कोई अपनी निंदा सुनकर तैश में है |कोई चुगली से परेशान है |वैर-ईर्ष्या,हिंसा-लड़ाई आदि की अग्नि ने हमें चारों तरफ से घेर रखा है |चिड़िया की चोंच में पानी के समान संत-महात्मा-महापुरुष इस आग को बुझाने का प्रयास कर रहे हैं लेकिन आग कम होती नज़र नहीं आ रही-वे कहा करते थे-

माना कि इस जहाँ को न गुलज़ार कर सके,

पर खार कुछ कम कर गए .जितने जिधर से हम |      

वे एक विश्लेषण और किया करते थे-1-part  of  the problem (समस्या  के अंग )2-part  of  the solution (समाधान के अंग ) अर्थात दो प्रकार के इंसान होते हैं-एक समस्या पैदा करते है और दूसरे समस्याओं  को हल करते हैं | इस समय निरंकारी मिशन बाहर -भीतर की समस्याओं में घिरा है |हमारे सत्गुरुओं की शिक्षाएं जैसे दांव पर लगी हैं |ऐसे में सोचने की बात यही है कि हम समाधान का हिस्सा बने ,समस्याओं का नहीं |सत्य को स्वीकारना सीखें |जो चीज त्यागने योग्य है उनसे बचें ताकि हमारी गणना आग बुझाने वालों में हो | 

 भक्ति में लालसाओं का दखल ऐसा है जैसे--

रामकुमार सेवक 

भक्ति अथवा अध्यात्म के नियम दूसरे प्रकार के होते हैं |इकठ्ठा करने से कभी -कभी पास का भी चला जाता है और बांटने से और बढ़ जाता है |लंगर अथवा प्रसाद का तत्व यही तो है |इसमें हम कुछ बांटते हैं तो परिणाम यह होता है कि बहुत कुछ नष्ट होने से बचाते हैं और देने के आनद केुत कुछ पा भी लेते हैं |

 बहुत सारे प्रसंग ध्यान में आ रहे हैं ,उनमें से एक की चर्चा करता हूँ |लगभग दस वर्षों से दास ने एक नियम स्वीकार किया हुआ है कि जो धन मुझे मालिक की कृपा से प्राप्त होता है उसमें से नियमित घरेलू और अपने अनुमानित व्यक्तिगत व्यय का प्रबंध करने के बाद,गृहस्थी के सब प्रबंध अर्थात अपने सांसारिक उत्तरदायित्व पूरे करने अथवा उनकी व्यवस्था करने के बाद जो भी बचेगा उसे अपने विवेकानुसार सेवा में व्यय करूंगा |इसके अतिरिक्त महापुरुष अपनी श्रद्धानुसार कभी -कभी जो भेंट करते हैं ,उस पर मेरा व्यक्तिगत रूप से कोई अधिकार नहीं है इसलिए वह भी सेवा के लिए ही है लेकिन मन कभी -कभी बाधा  खड़ी करता है तो कुछ और उपाय भी करने पड़ते हैं |

शुक्रवार को अपने वर्तमान दफ्तर से बस से लगभग पंद्रह मिनट की दूरी पर हर कार्यदिवस को (विजय चौक नयी दिल्ली पर )होने वाली दफ्तरों की संगत में जा रहा था मेरी जेब में कुछ पैसे थे |उसी समय अपने मित्र और महात्मा को फ़ोन किया कि मेरे पास कुछ पैसे पड़े हैं ,इन पैसों का प्रसाद लेना है |

मित्र ने सहमति दिखाई और जरूरी प्रबंध करने की हामी भर ली |

बाद में अपने स्वभावानुसार  मन ने कुछ रुकावटें  भी डाली कि पहले ही खुद को फंसाने की क्या ज़रुरत थी ,वहां चलकर देख लेते, लेकिन मुझे यह बात हज़म नहीं हुई और पंद्रह-बीस मिनट बाद मैं सत्संगस्थल पर पहुंचा तो बहुत परेशान हुआ कि तेज गर्मी के कारण महापुरुष बहुत ही कम संख्या में थे|

 यहाँ तक कि बोलने तक के लिए भी पूरे सज्जन न थे |बहरहाल मुझे कोई चिंता न थी क्यूंकि सेवा का विचार निरंकार में से ही आया था इसलिए मुझे कोई दिक्कत न थी |लगभग पंद्रह मिनट बाद तीन महात्मा आते दिखाई दिए |दो-तीन नए सज्जन आकर बैठ गए |दो-तीन महापुरुष और भी प्रकट हो गए |सही समय पर मित्र -महात्मा प्रसाद भी ले आये |

जो महात्मा मंच पर विराजमान थे उन्होंने विचार शुरू किये कि किस प्रकार उन्हें अपनी बेटी को लगभग 70-80 किमी दूर एक इंजीनियरिंग कालेज में काउन्सलिंग के लिए ले जाना था |रेल दुर्घटना के कारण रेलें रोक दी गयीं लेकिन निरंकार ने कृपा की और ऐसे सज्जन प्रकट हुए जिन्होंने सही समय पर पहुंचाने का काम कर दिया |इसी प्रकार निरंकार पर विश्वास मजबूत करने वाले अपने जीवन के प्रसंग महात्मा ने सुनाये |निरंकार सतगुरु यकीन और मजबूत हुआ |

मुझे अब  कबीरदास जी का वह दोहा याद आ रहा है,जिसमें वे कहते हैं-

सतगुरु हम स्यों रीझके एक कह्यो प्रसंग |

बरसा बादल प्रेम का भीज गयो सब अंग ||

बहुत आनंद के साथ महात्माओं ने प्रसाद भी स्वीकार किया मुझे सहज ही ऐसी कृपा प्राप्त हुई जो दुर्लभ है |

कहने का भाव कि-थोड़ा सा खर्च करके और आनद लाखों का मिल जाए ,वह अध्यात्म अथवा भक्ति में ही संभव है |इसके विपरीत निजी लालसाओं की पूर्ति के लिए लाखों खर्च करके भी कुछ हासिल नहीं होता |भक्ति में लालसाओं का दखल दूध में जैसे नीबू निचोड़ देना है |      

           

ढाई मन के रीठे को मीठा करने का रहस्य   

रामकुमार सेवक 

मालिक की कृपा से चमत्कार बहुत देखे हैं ,पढ़े और अनुभव भी किये हैं लेकिन चमत्कार भक्ति की गारंटी नहीं है इसलिए गुरमुख महात्मा किसी को चमत्कार होने का आश्वासन देकर नहीं लुभाते बल्कि सहज भक्ति का सन्देश देते हैं |यह दूसरी बात है कि निरंकार को जब जीवन का आधार बना लेते हैं तो कदम-कदम पर चमत्कार होते हैं लेकिन हम उनकी बजाय सतगुरु की जीवनदायी शिक्षाओं को ही सत्य प्रचार का आधार बनाते हैं |

 बाबा गुरबचन सिंह जी से एक बार किसी ने पूछा-श्री गुरु नानक देव जी ने तो कड़वे रीठे को भी मीठा कर दिया था |आप ने भी ऐसा क्या कोई चमत्कार किया है ?

बाबा जी किसी भी पैगम्बर से अपनी तुलना करनी पसंद नहीं करते थे |उनका स्पष्ट कहना था कि हर धर्म और हर पैगम्बर ने मानव मात्र को परम पिता परमात्मा का बोध हासिल करने को प्रेरित किया |मानव जन्म का सर्वश्रेष्ठ कार्य है कि मनुष्य एक परमात्मा का बोध हासिल करे|जिस भी महात्मा ने इस बोध को हासिल किया है वह सतगुरु की कृपा से ही हासिल किया है |बाबा जी का कहना था कि कोई भी जिज्ञासु उनके पास आकर परमात्मा का ज्ञान हासिल कर सकता है |    

उनके साथ एक महात्मा सेवा करते थे,जिन्हें सब पहलवान जी कहते थे |नाम उनका सरवन सिंह जी था |वे दिल्ली में निरंकारी कॉलोनी में ही रहते थे |उनके दर्शन मैंने किये तो हैं लेकिन मैं उनके बच्चों की उम्र का  था इसलिए परिचय कभी नहीं हुआ |

पहलवान जी ने प्रश्न पूछने वाले सज्जन से कहा-मुझे देख रहे हो |मैं तो रीठे से भी ज्यादा कड़वा था | अपनी और ओर इशारा करते हुए उन्होंने कहा-इन्होने इस ढाई मन के रीठे को मीठा किया है |

इस महात्मा के घट का उपयोग करके निरंकार ने बता दिया कि-सतगुरु हमेशा सतगुरु ही होता है और चमत्कार सतगुरु के लिए कोई बड़ा काम नहीं होता |

बाबा गुरबचन सिंह जी स्वयं को सब गुरु-पीर -पैगम्बरों -का दास मानते थे और नम्रता -और प्रेमपूर्ण व्यवहार करने की शिक्षा सबको देते थे ,जिसका इशारा ही पहलवान जी ने किया था |  

निरंकार का संचार तंत्र अथवा चमत्कार 

रामकुमार सेवक 

अशरीरी आत्माओं के बारे में मैंने पढ़ा तो बहुत है |तंत्र -मंत्र की घटनाएं,यदि वे सत्य हों तो उन्हें  पढ़ने में मज़ा भी आता है |मैं जब 9वी कक्षा में पढता था तो उन दिनों मैंने संत इश्वर सिंह जी राड़ेवाले के बारे में पढ़ा था |हालांकि ब्रह्ज्ञान तब मैं प्राप्त कर चुका था लेकिन लिखने-पढ़ने की मुझे कोई मनाही नहीं थी |डॉ,शक्ति सिंह जी ने तो मुझे पाक क़ुरआन भी पढ़वाई थी |वे मेरे शुरूआती मार्गदर्शक थे |मिशन से भी उन्होंने ही जोड़ा और लेखन से भी |मेरा पहला लेख उन्होंने ही छपवाया था और जितना वो कर सकते थे उन्होंने मेरे लिए किया |

बहरहाल मूल मुद्दे पर आते हैं |1993 में बड़ा सुपुत्र कुणाल जब हुआ तो उसे हम चमत्कार मान सकते हैं |उससे पहले हमारे घर में दो बेटियां ही थीं |

तब मैं हरदेव नगर दिल्ली में किराए के मकान में रहता था और दिन-रात संत निरंकारी पत्रिका के संपादन के काम में लगा रहता था क्योंकि यह मेरा प्रिय काम था ,उसके लिए बड़े से बड़ा काम भी छोड़ देता था इसलिए मेरे साथी मेरी सरकारी नौकरी को पार्ट-टाइम जॉब बताते थे जबकि गुजारा उसी से होता था |

उन दिनों किसी ने हमारे मकान में कुछ खाने की चीजें फेंकी |वे इस किस्म की चीजें थीं कि किसी ने हम पर तंत्र किया है क्यूंकि एक स्त्री, जिसकी दसियो सालों से कोई संतान नहीं थी किसी भी तरह संतान हासिल करना चाहती थी |

मुझे उससे कोई शिकायत नहीं थी |हर विवाहित स्त्री चाहती है कि उसे संतान का सुख मिले |मुझे इतना समय ही नहीं था कि किसी पर ध्यान दूँ |पैसा कम था लेकिन गृहस्थी बहुत बढ़िया चल रही थी |

तांत्रिक क्रिया का जो सामान हमारे मकान में फेंका गया ,उसकी भी हमने परवाह नहीं की |हर इतवार को  पहले की तरह सत्संग जाते रहे|बाबा जी और विद्वान महात्माओं का खूब स्नेह मिल रहा था |प्रतिष्ठा भी दिन दोगुनी रात चौगुनी बढ़ रही थी लेकिन घर में मेरे और पत्नी के बीच विवाद शुरू हो गया था जबकि हालात वैसे के वैसे थे |

पत्नी भी हैरान थी कि यह क्या हो रहा है |पहले तो बेटियां ही थीं लेकिन अब तो बेटा भी हो गया था |पति,पत्नी और  बच्चे -फिर कलह क्यों थी ?मैं खुद भी हैरान था |मैंने हंसती दुनिया के पूर्व संपादक विनय जोशी जी से बात की |उन्होंने कहा-घबराने की बात नहीं है |महापुरुषों को घर बुलाकर उनकी सेवा कर दो |

अगले दिन शुक्रवार था |मैं दो बुजुर्ग महात्माओं के पास गया और उन्हें शनिवार सुबह अपने घर नाश्ता करने के लिए आमंत्रित किया |

उन्होंने निमत्रण स्वीकार तो किया लेकिन साथ ही यह भी बताया कि वे उस दिन यदि चंडीगढ़ नहीं गए तो आपके घर में नाश्ता करेंगे |

मेरा ध्यान था कि महात्मा आएं ,पूरी तैयारी भी की लेकिन वे जब नहीं पहुंचे तो मैंने मान लिया कि महात्मा अपनी पत्नी के साथ चंडीगढ़ चले गए होंगे |

अभी मैंने नाश्ता शुरू ही किया था कि हमारे घर का द्वार किसी ने खटखटाया |द्वार पर दो अपरिचित सज्जन खड़े थे उन्होंने धन निरंकार कही और भीतर आ गये |

मैंने उनसे कहा- हम तो सुबह से ही आपकी प्रतीक्षा कर रहे थे |वे बोले-लेकिन हम तो पहले कभी आपस में मिले नहीं ?

महात्मा का आदेश था कि-महापुरुषों की सेवा करनी है |जिन्हें निमंत्रण दिया वे कहीं और चले गए तो सच्चे बादशाह ने आपको भेज दिया | यहाँ के भोजन पर आप ही का नाम लिखा होगा |

इससे मेरे भीतर यह यकीन मजबूत हो गया कि निरंकार का अपना संचार तंत्र है और यह अपने तरीके से काम करता है,जिसे आप चमत्कार भी कह सकते हैं |चूंकि इसका कोई तर्क नहीं है इसलिए बुद्धिजीवियों के लिए यह सत्य नहीं है बल्कि एक कल्पना है |मेरे विचार से यह निरंकार का एक चमत्कार है |           

गुरु कौन है ?

रामकुमार सेवक 

मेरे ही क्या लगभग हर इंसान के मन में कभी न कभी यह सवाल अवश्य  कौंधता है कि गुरु किसे कहते हैं अथवा गुरु कौन होता है ?इस सवाल के सामान्य जवाब बहुत से हैं लेकिन उन जवाबों को लिखकर मैं अपनी ऊर्जा व्यर्थ नहीं करना चाहता |  

यथार्थ यह है कि-गुरु शरीर में होता जरूर है लेकिन शरीर में होने के बावजूद अपनी कमजोरियों से ऊपर उठ चुका होता है ,जिसके कारण जनसाधारण की जो समस्याएं हैं उसके पास उनके जवाब होते हैं |हर प्रश्न के उनके पास जवाब होते हैं |उसका अपना तप-त्याग होता है जिसके कारण यह निराकार प्रभु उसकी बुद्धि का,सोच का.वाणी का उपयोग करता है |

मुझे अपने बहुत से प्रश्नो के उत्तर सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के श्रीमुख से मिले हैं |उनकी विचारें आज भी सुनता हूँ तो मुझे मार्गदर्शन मिलता है |मुझे उनकी कोई भी विचार पुरानी नहीं लगती | 

यह सत्य है कि हर शरीर में आत्मा है और कोई भी शरीर परमात्मा की, निराकार सत्ता की दी गयी शक्तियों से संचालित होता है लेकिन गुरु का शरीर परमात्मा के सर्वाधिक अनुकूल होता है जिसके कारण यह निराकार प्रभु उसकी वाणी से बोलता है ,उसका इस्तेमाल करता है और गुरु से ऊपर उठकर वह व्यक्ति सतगुरु कहलाता है |ऐसे व्यक्ति के बारे में पावन बाणी में कहा गया-

गुरु परमेश्वर एको जान-

ऐसे सतगुरु को भक्त कबीर दास जी से प्रेरणा लेकर परमात्मा से भी ऊंचा दर्ज़ा देते हैं लेकिन भक्तों को यह ज़रूर ध्यान रखना चाहिए कि क्या उनका सतगुरु अपने तप-त्याग के बल पर अपने विकारों पर विजय पा चुका है अन्यथा वही  उदहारण साकार हो जाएगा ,जिसके बारे में बाबा अवतार सिंह जी कहा करते थे कि-खुद तो डूबेंगे ही लेकिन खुद की पूजा करवाने वाले ऐसे लोग चेलों को भी ले डूबेंगे |

किसी भी सतगुरु का अनुयाई बनने से पहले इस कसौटी का उपयोग जरूरी है अन्यथा बहुत सारे गुरुओं के बहुत सारे निरपराध अनुयाई आज शर्म से नज़रें झुकाने के लिए विवश हैं |

धर्मप्रेमियों को विवेक की आँखें हमेशा खोलकर रखनी चाहिए |कल एक अखबार में एक विज्ञापन छपा था कि-

 जो हथेलियां हिलाकर दिया जाता है,वह ब्रह्मज्ञान नहीं है बल्कि आकाश का ज्ञान दिया जा रहा है,जिससे मुक्ति नहीं हो सकती |

यह पढ़कर मुझे लगा कि -पिछले 40  वर्षों में मैं जिस निरंकार का आनंद लेता आ रहा हूँ उस यथार्थ को किस प्रकार लिखूं ?

हालाँकि यह मेरी ज़िम्मेदारी नहीं है लेकिन सन्त निरंकारी मंडल की जिम्मेदारी है कि उसका प्रचार विभाग निरंकार के अस्तित्व को आधिकारिक रूप से  प्रमाणित करे ताकि मिथ्या धारणाओं को जड़ जमाने का मौका न मिले |

इन दिनों सवाल तो और भी उठ रहे हैं लेकिन यह विज्ञापन तो हमारे आधार पर ही चोट कर रहा है इसलिए बाकी प्रश्नो की तरह इस प्रश्न को नज़रअंदाज़ करना उचित नहीं है |  

वायु ,आकाश,गैस,गंध आदि सूक्ष्म हैं इस प्रकार ये अपने प्रभावों और विशेषताओं के माध्यम से अनुभव तो होती हैं लेकिन स्थूल नेत्रों से इन्हें देख पाना संभव नहीं हैं इसी प्रकार निराकार प्रभु को भी महसूस तो किया जाता है और आस्था के बल पर अनुभूति की गहराई तक भी पहुंचा जा सकता है लेकिन स्थूल नेत्रों से निरंकार अथवा परमात्मा को देख पाना संभव नहीं है लेकिन सतगुरु ने महान वैज्ञानिक की भाँति इस अति विशाल और सर्वत्र व्यापक सत्ता को दो हथेलियों के माध्यम से बता दिया कि यह निराकार प्रभु ही हम सबके बाहर और भीतर है |

यह निराकार किसी शस्त्र से नष्ट नहीं होता और समय के प्रभाव में नहीं है |यही सच्चिदानंद है जो अनंत आनद का स्रोत है |

इस एहसास तक मानव को पहुंचाने के लिए निरंकारी सत्गुरुओं ने हर प्रकार की सात्विक प्रेरणा दी जिसके कारण विभिन्न धर्मो और संस्कृतियों में जन्मे -पले लोग अध्यात्म के करीब आये और सतगुरु के पावन संदेशों को अपने व्यवहारिक जीवन का अंग बनाने की भरपूर कोशिश की और काफी हद तक सफल भी हुए |

जो लोग निरंकारी मिशन और निरंकारी सत्गुरुओं द्वारा दिए गए ब्रह्मज्ञान पर प्रश्नचिन्ह लगाते हैं उन्हें सोचना चाहिए निरंकारी मिशन ने जीवन जीने की एक आध्यात्मिक पद्धति विकसित की है जिसके प्रभाव के कारण लाखों लोगों के व्यवहार में सार्थक परिवर्तन आया है |वो परिवर्तन विनम्रता,सेवा और सत्कार के रूप में सर्वत्र दिखाई देता है |

सतगुरु की महिमा और ज्ञान के म्बन्ध में अतीत में भी प्रश्न भी उठते रहे हैं और उनके उत्तर भी व्यावहारिक सन्दर्भों के साथ दिए जाते रहे हैं |वे प्रश्न जिन घटनाओं के माध्यम से उठे और जो उनके उत्तर दिए गए उनका वर्णन एक-एक करके मैं आगे करूंगा |

ज़रुरत है कि कही-सुनी बातों पर विश्वास करने की बजाय निरंकारी सत्संग में जो आध्यात्मिक वातावरण होता है उसके आधार की तरफ ध्यान दिया जाए और मिशन के सार को जीवन का आधार बनाया जाए ,इसी में हर किसी की भलाई है |धन निरंकार जी     

भाषणों से बहुत भारी है----

रामकुमार सेवक  

यह 1981  या 1982  की बात है |उस समय मुरादनगर में निरंकारी सत्संग का मैं कोई अधिकृत अधिकारी तो नहीं था लेकिन सेवादार तब भी था क्यूंकि शायद ही कोई कार्य हो,जिसमें मेरी भागीदारी नहीं रही हो |

निरंकारी मिशन का वार्षिक संत समागम लाल किले के पीछे तीन मैदानों में हो रहा था |समागम के दौरान ही मुरादनगर सेवादल के किसी काम से मुझे डॉ.शक्ति सिंह जी (मुरादनगर के तत्कालीन मुखी और मेरे प्रथम मार्गदर्शक )के साथ संत निरंकारी कॉलोनी स्थित संत निरंकारी मुख्यालय आना था |

शाम का समय था |डॉक्टर साहब की बाइक पर हम दोनों किंग्सवे कैंप से बुराड़ी रोड पर निरंकारी कॉलोनी की तरफ जा रहे थे कि मुख़र्जी नगर (पश्चिमी) से परमानन्द  कॉलोनी मोड़ की तरफ आ रही एम्बेसडर कार के पिछले हिस्से में टक्कर लगी और हम दोनों ही बाइक की सीटों से बहुत दूर जाकर गिरे |

यह कोई अनोखी बात नहीं थी लेकिन वहां  उन दिनों ऑटोमोबाइल की दो-तीन दुकाने हुआ करती थीं ,उन लोगों ने हमें उठाया और हल्दी का दूध भी पिलाया |मुझे तो सच्चे बादशाह ने बचा लिया था लेकिन  डॉक्टर साहब के गुम चोट ज्यादा थी |मेरी आयु उस समय 17  वर्ष की थी और डॉक्टर साहब पचास पार थे |

बाइक की अम्बेसडर से टक्कर होने के बावजूद बाइक ठीक थी और हम सहजता से निरंकारी मुख्यालय चले गए |

वहां मुख्य द्वार के साथ एक दुकान जितना बड़ा रिसेप्शन हुआ करता था |वहां हम गए और वहां बैठे महात्माओं से यह घटनाक्रम बताया तो महात्माओं ने यथासंभव उपाय किया बल्कि एक महात्मा ने अपना दुपट्टा डॉक्टर साहब के पैर में लपेट दिया ताकि दर्द न हो |महात्मा की आत्मीयता देखकर  दिल खुश हो गया |सेवादल कार्यालय में ब्रांच का काम करके हम वापस समागम में पहुँच गए |

यह बहुत सामान्य सी बात है लेकिन याद अब तक इसलिए है क्यूंकि वो दिन थे जब यह नहीं देखा जाता था कि यह मेरी ड्यूटी है या नहीं ?या जिसे चोट लगी है वो बड़ा आदमी है या नहीं ?ध्यान में आया  कि महात्मा तो हमारे गुरुभाई थे तो उन्होंने तो सेवा करनी ही थी और उन दिनों प्रबंधतंत्र में भी गुरमत का असर ज्यादा था लेकिन महात्माओं से भी ज्यादा प्रशंसनीय सेवा तो उनकी रही जिन्होंने हमें बाइक की सीटों से उठाकर हल्दी का दूध पिलाया जबकि वे हमें जानते भी न थे |

आजकल हम उजड़ने ,लुटने- लूटने ,हत्या आदि की ख़बरें यूँ पढ़ते हैं जैसे उन लोगों से हमारा कोई वास्ता नहीं हो लेकिन मानवता क्या यही है? 

मैं भी इस बारे में  सिर्फ सोचता हूँ लेकिन उन लोगों ने मानवता को जिया था ,और उनका कर्म आज तक ज़िंदा है और मानवता पर दिये गए भाषणों से बहुत भारी है |  

दिल बच्चे का और बड़े का ?

रामकुमार सेवक 

कल सत्संग में सुना कि- एक बच्चा प्रभु की प्रार्थना कर रहा था |

किसी बड़े ने पूछा कि प्रार्थना किससे और कैसे कर रहे हो ?

बच्चे ने कहा- दिल से कर रहा हूँ |पूछने वाले ने पूछा -अपने दिल से ?

बच्चे ने कहा-मेरा दिल तो छोटा सा है |प्रभु का दिल बड़ा है ,इसलिए मैं उनके दिल से ही प्रार्थना कर रहा हूँ | 

यह प्रसंग सुनने में बहुत अच्छा लगा लेकिन गहराई से सोचने पर कुछ सवाल पैदा हुए -उनमें से एक यह था कि हम अपने दिल के अलावा किसी और के दिल से प्रार्थना कैसे कर सकते हैं ?

दूसरा सवाल यह है कि-बच्चे का दिल क्या छोटा है ?

अनुभव कहता है कि बच्चा जितनी भी प्रार्थना करता है ह्रदय की गहराई और सच्चाई से करता है और उसकी प्रार्थना स्वीकार भी होती है | इस प्रकार बच्चे का दिल किसी भी प्रकार छोटा नहीं है |

जहाँ तक परमात्मा के दिल से प्रार्थना करने की बात है तो पहला प्रश्न है कि क्या परमात्मा का दिल है ?

बाबा हरदेव सिंह जी महाराज कहा करते थे-

एक धड़कते हुए पत्थर को तुम दिल समझते हो ,  

एक उम्र लग जाती है ,दिल को दिल बनाने में |

यह तो दिल के दिल होने पर ही एक प्रश्नचिन्ह है कि जिसमें किसी के लिए दर्द ही नहीं उसे दिल कहें या कुछ और ?   

सतही तौर पर सोचते हैं तो पाते हैं कि  हममें से हर एक अपना-अपना दिल रखता है |ह्रदय अथवा दिल इस शरीर का हिस्सा है |शरीर के शेष अंगों की भाँति ह्रदय का स्वामी भी परमात्मा है लेकिन कविता लिखने के लिए हम अन्य  किसी का दिल प्रयोग नहीं करते बल्कि परमात्मा ने जो दिल हमें दिया है उसका ही प्रयोग करते हैं |इसी प्रकार एक छोटा बच्चा भी उसी दिल का उपयोग करता है जो परमात्मा ने उसे दिया है |

बच्चे का दिल प्रार्थना के लिए अति उत्तम माना गया  है क्यूंकि उसमें छल-कपट नहीं होता  इसलिए परमात्मा से उसका सीधा संवाद होता है |  

महात्मा कहते हैं-

भक्ति करो जी ऐसे ऐसे 

ध्रुव प्रह्लाद कियो है जैसे  |

भक्ति के क्षेत्र में ध्रुव व् प्रह्लाद को बहुत ऊंचा मुकाम हासिल है |यह ऊंचाई इसलिए भी है क्यूंकि वहां दिखावेबाजी अथवा आडम्बर नहीं है |

ऐसी बहुत सारी घटनाएं हैं जहाँ  बच्चे ने जो कहा वही सच सिद्ध हो गया अर्थात बच्चे के दिल में परमात्मा बसता है |इस आधार पर बच्चे के दिल की बहुत महत्ता है |यहाँ बच्चे का दिल शुद्ध होने के कारण परमात्मा का निवास सिद्ध हो गया है |ऐसे पवित्र दिल की बहुत महिमा है | ऐसे दिल के बारे में जे.आर.डी,सत्यार्थी जी ने लिखा-

दिल है मंदिर ख़ास खुदा का ,इस मंदिर को कभी न तोड़ो

जोड़ो-जोड़ो सबको जोड़ो ,

लोक सुखी परलोक सुहेला करने का बस राज़ यही है |     

   

कैसे हम खुद अपनी ख़ुशी को नष्ट कर लेते हैं 

रामकुमार सेवक 

अपने पैरों पर खुद कुल्हाड़ी चलाना इसे ही तो कहते हैं कि इंसान खुद अपनी ख़ुशी के कारण को ख़त्म कर ले |

मसूरी (उत्तराखंड )की बात है |निरंकारी मिशन में सब इस बात को अच्छी तरह जानते हैं कि बाबा हरदेव सिंह जी ग्रीष्मकाल के कुछ दिन यहाँ बिताते थे |बाबा जी जितने भी दिन यहाँ रहते निरंकारी श्रद्धालुओं का तांता यहाँ लगा रहता था |बाबा जी का दिल बहुत बड़ा था -वे केवल निरंकारी श्रद्धालओं को नहीं बल्कि हर इंसान को भरपूर स्नेह देते थे जिसके कारण मसूरी का संत निरंकारी सत्संग भवन भरा रहता था | 

बाबा जी आने वाले श्रद्धालुओं को ख़ुशी देने के लिए सत्संग तो करते ही थे,शाम को वॉलीबॉल भी खेलते थे |विद्यार्थी जीवन से ही बाबा जी की इसमें रूचि थी |श्रद्धालुओं में से भी ,वॉलीबॉल में जिनकी रूचि थी ,उन्होंने एक टीम बना रखी थी जो सामने से खेलते थे |श्रद्धालु चूंकि बाबा जी से बहुत स्नेह रखते थे इसलिए बहुत आनंददायक समय हो जाता था |

कुछ अनुयाई बाबा जी को खेलते देख रहे थे ,जब बाबा जी की बॉल उनके पास आ जाती तो उन्हें लगता जैसे उन पर कृपा बरस गयी है |कुछ बच्चे उनके सामने खड़े थे |इन सज्जनो को उनकी उपस्थिति नागवार लग  रही थी |उन्होंने उन बच्चों को वहां से हटा दिया |वे वहां से हट भी गए लेकिन जिन सज्जनो ने उन्हें हटाया था ,अब उनके पास बॉल आनी बंद हो गयी जबकि बच्चों के पास तब भी आ रही थी |इन सज्जनो ने समझ लिया कि उनके हिस्से में जो दो चार बॉल्स मिलीं वो इन बच्चों की बदौलत ही मिली थीं |

उन्हें लगा कि बच्चों को उनके पहले स्थान से हटाना उनकी भूल थी |

यह प्रसंग सुनकर मुझे बाबा जी की वर्षों पहले की कही बात याद आ गयी |बाबा जी आजकल बुजुर्गों की हो रही उपेक्षा पर यह  शेअर बोला करते थे-

जिस बूढ़ी माँ को तूने घर से बाहर निकाला है,

उसी की दुआओं का असर है कि तेरे हाथ में निवाला है |  

यदि बुजुर्ग माता को घर से बाहर निकाल दिया है तो समझ लेना कि उनके जीवनदायी आशीर्वाद से स्वयं को वंचित कर लिया है |इस प्रकार हम स्वयं को अपने सुख से वंचित कर लेते हैं |समझ लीजिये अपनी तंगदिली के कारण हम अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार लेते हैं |मसूरी में उन सज्जनो द्वारा उन बच्चों को पीछे कर देना भी ऐसा ही उदाहरण था |           \

धर्म और अध्यात्म में अंतर  

रामकुमार सेवक 

मैं उस दिन पार्क में सैर कर रहा था ,जहाँ प्रातःकालीन सत्संग की आवाज़ साफ़-साफ़ सुनाई पड़ रही थी |चूंकि कार्यदिवस था इसलिए घर वापसी की जल्दी थी |जैसे ही पार्क से निकला तो मंगलाचरण शुरू हो गया |ध्यान आया कि सत्संग में निरंकार प्रभु का जो सन्देश उतरने वाला है,वह यदि सुनने को मिल जाता तो बहुत अच्छा होता |ध्यान इस निरंकार प्रभु से जुड़ गया |

अभी थोड़ी ही दूर निकला था कि ज्ञानी जी आते दिखाई दिए |ज्ञानी जी बाबा अवतार सिंह जी के समय से निरंकारी मिशन से जुड़े हैं |जब भी मिलते हैं कुछ सवाल भी करते हैं और कुछ सवालों के जवाब भी देते हैं |

मौसम चाहे जैसा भी हो,उनकी मुखमुद्रा एक जैसी दिखती है |निरंकार से उनका रिश्ता बहुत मजबूत है |मैं अध्यात्म की बात सुनना चाहता था और उनके पास सुनाने के लिए बहुत कुछ था और मेरे पास समय अत्यंत सीमित था |ज्ञानी जी ने बात बाबा अवतार सिंह जी शुरू की और बोले कि-बाबा अवतार सिंह जी कहा करते थे कि हर समय नमस्कार करने की ज़रुरत नहीं है बल्कि गुरु की,संतों की बातों पर अमल करने की ज़रुरत है |वे कहा करते थे कि शरीर तो मेरा भी उन्हीं पांच तत्वों का बना हुआ हुआ है,जिनसे तुम्हारा बना है |शरीर में समाया हुआ जो यह परमपुरुष निराकार है उससे जुडो |शरीर तो एक दिन सबका ही नष्ट हो जाना है लेकिन यह निरंकार अविनाशी है |इससे जुडो,इसे महसूस करो | आगे उन्होंने एक संत की बात शुरू की जिनका जन्म इराक में हुआ था |वे बोले-        

इराक में एक धर्मपरायण सज्जन थे-अब्दुल बिन मुबारक |उनका हजयात्रा पर जाने का ध्यान बना |जमा-पूँजी इकट्ठी की और यात्रा पर रवाना होने की तैयारी करने लगे |उनका एक मित्र भी साथ चला |पानी के जहाज़ से यात्रा करनी थी |दोनों मित्र रवाना हुए लेकिन ज़नाब मुबारक को रास्ते में एक बेहोश औरत दिखाई दी |उन्होंने अपने साथी से कहा कि इस औरत को इस हालत में छोड़ना क्या ठीक होगा जबकि यह भी उसी अल्लाह की बंदी है,जिसके हम हैं |

साथी ने कहा-हजयात्रा का मौका बार-बार नहीं मिला करता |दुनिया में तो हर जगह दुःख ही दुःख दिखेगा इसलिए हमें अपना ध्यान अपनी यात्रा पर केंद्रित करना चाहिए | 

ज़नाब मुबारक ने उससे कहा-आप जाईये ,मैं इस बहन के दुःख दूर करने की कोशिश करता हूँ |यदि मैंने ऐसा नहीं किया तो मेरे मन पर बोझ बना रहेगा |

यह सुनकर उनका साथी चल दिया और वे उस स्त्री की सेवा में लग गए |उन्होंने उसके मुँह पर पानी के छींटे मारे तो उसे होश आ गया |

उसने कहा-मेरे बच्चे चार दिन से भूखे हैं और मैं उनके लिए कोई प्रबंध नहीं  कर पा रही |ज़नाब मुबारक के पास यात्रा के खर्च के लिए पैसे थे इसलिए उन्होंने उस बहन को आश्वस्त किया कि-चिंता करने की ज़रुरत नहीं है |

वे उसके घर गए और बच्चों के खाने -दाने का प्रबंध किया |यह करके उन्हें लगा -जैसे सही मायनो में परमात्मा की सेवा हो गयी है |उन्होंने उस बहन से कहा -जब भी कोई समस्या आये मेरे घर चली आना ,मेरी बीवी जरूर मदद करेगी |

फिर वे अपने घर चले गए और अपनी पत्नी को पूरा घटनाक्रम बताया | उनकी पत्नी ने कहा-आपने सचमुच अल्लाह-मियां की खिदमत की है |दुखियों की मदद करना मालिक की सच्ची खिदमत है |

यह सुनकर मुझे ध्यान में आया कि क्या ज़नाब मुबारक को हजयात्रा पर नहीं चले जाना चाहिए था ?धर्म के मार्ग में बाधाएं तो आती ही हैं वह बेहोश औरत भी तो एक बाधा ही थी |

एक धार्मिक आदमी यही जवाब देगा |ज़नाब मुबारक के दोस्त का दृष्टिकोण यही था तो धार्मिक लोगों की दृष्टि में तो दींन -दुखी का दुःख-दर्द भी धार्मिक कार्य में बाधा ही है लेकिन सही अर्थों में जो भक्त हैं,जो प्रगतिशील हैं वो यही मानते हैं कि प्राणिमात्र की सेवा ही ईश्वर की सच्ची सेवा है तथा दींन -दुखियों की सेवा ही सच्ची तीर्थ यात्रा है |

इस प्रसंग में आगे कहा गया है कि-वो दोस्त जब हज की पावन यात्रा में था और वहां की गतिविधियों में भाग ले रहा था तब उसने ज़नाब मुबारक को वहां मुख्य लोगों के साथ देखा |वह आश्चर्य में पड़ गया कि वह यहाँ मुझसे पहले कैसे पहुँच गया और मुख्य लोगों से उसकी जानकारी कब हुई ?उसने ज़नाब मुबारक को हर गतिविधि ने स्वयं से आगे देखा |लौटने से पहले उसने वहां मुबारक से मिलने की कोशिश की ताकि वापसी की यात्रा साथ-साथ कर सकें लेकिन मुलाक़ात न हो सकी और वापस लौट आये |

घर आकर वे मुबारक से मिले और बोले-तुम मुझसे पहले यहाँ कैसे पहुँच गए ?मुबारक बोले -मैंने धन उस लाचार औरत की सेवा में खर्च कर दिया तो फिर मुझे हजयात्रा का अपना इरादा मुल्तवी करना पड़ा इसलिए मैं वहां गया ही नहीं |

उनके दोस्त को उनकी बात सत्य से परे लगी लेकिन मुझे लगता है कि-मुबारक का कर्म पवित्र था इसलिए अल्लाह ने उन्हें यात्रा पर आया मान लिया |

मुझे वो समय याद आता है जब वार्षिक संत समागम के दौरान बाबा जी कहा करते थे कि जो यहाँ आये हैं वो तो आनंद ले ही रहे हैं लेकिन जिन्होंने खुद पीछे रहकर औरों को आगे भेज दिया उनकी भी हाज़री यहाँ है |

अध्यात्म भौतिक उपस्थिति के आधार पर मूल्यांकन नहीं करता बल्कि भावनात्मक गतिविधियों के अनुसार व्यक्ति की उपस्थिति दर्ज़ करता है यही कारण है कि कर्मकांडों को आध्यात्मिक क्षेत्र से बाहर रखा जाता है |            

 

     

 

हम भी बंजारे हैं और ये भी --

रामकुमार सेवक 

11 मई 2018 (शुक्रवार )को सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी का एक संस्मरण सुनाते हुए स्थानीय संयोजक और कवि महात्मा ओमप्रकाश ओमी जी ने कहा -दास उस प्रचार यात्रा में बाबा जी के साथ था और देख रहा था कि  लोग बाबा जी को कितना प्यार करते हैं और बाबा जी भी लोगों को उतना ही प्यार करते हैं |

बाबा जी जिधर से गुजरते उधर ही कोई न कोई उनका इंतज़ार कर ही रहा  होता था |संगत के महात्मा अक्सर अपने गांव से बाहर सड़क पर उनका इंतज़ार कर रहे होते थे |

एक स्थान पर बंजारा समुदाय के लोग बाबा जी का इंतज़ार कर रहे थे |वे ज्ञानवान नहीं लग रहे थे इसलिए बाबा जी के यहाँ रुकने की आशा कम थी लेकिन गुरु तो पूरी दुनिया के लिए आता है और गुरु की दुनिया में तो हर जीव के लिए जगह है इसलिए रुकने या नहीं रुकने के बारे में निश्चय के साथ कुछ भी नहीं कहा जा सकता था |

दूसरी तरफ बाबा जी की यात्रा में सम्मिलित स्थान तय थे और यह स्थान उन नियत स्थानों में नहीं था |बाबा जी की गाड़ियां पास से गुजर रहीं थी |गाड़ियां धीमी हुई और फिर बाबा जी की गाडी रुक गयी |

बाबा जी गाड़ी से उतरे और इन लोगों द्वारा राखी गयी कुर्सी पर बैठ गए |बाबा जी को अपने बीच पाकर वे लोग बहुत प्रसन्न थे और बाबा जी भी उनके साथ प्रसन्नता ज़ाहिर कर रहे थे |

कुछ ही समय में वहां गीतों की गंगा बहनी शुरू हो गयी |बाबा  जी की यात्रा  में सम्मिलित महात्माओं ने गीत गाये और यह सिलसिला आगे बढ़ा |दास ने सोचा कि बाबा जी तो यहीं रुक गए हैं जबकि जाना तो आगे है |

उस समुदाय के एक सज्जन से दास ने पूछ लिया कि बाबा जी से आपका  क्या सम्बन्ध है ?

वे सज्जन बोले कि बाबा जी से हमारी रिश्तेदारी है |

यह बात मेरी समझ में नहीं आयी तो मैंने उनसे पूछा -किस तरह की रिश्तेदारी है ?

उन्होंने कहा-हम भी बंजारे हैं और ये भी |

उन्होंने कहा--हमारा  रिवाज़  है कि हम कहीं टिककर नहीं रहते और ये अपनी बात ,अपना सत्य सन्देश देने के लिए यात्राएं करते रहते हैं |

बाबा जी ने उन लोगों को अपना भरपूर प्रेम दिया और अपने गंतव्य की और चल दिए लेकिन उस सज्जन ने बाबा जी के सम्बन्ध में जो कहा ,उस बात ने मेरे दिल में स्थायी जगह बना रखी है |ये भी बंजारे हैं ,बिलकुल सही बात थी |

यह सुनकर मुझे (रामकुमार सेवक )ध्यान आ गया -एक नौजवान महात्मा जो सदा कहा करता है-हम भी कुम्हार हैं और बाबा जी भी |हम मिट्टी के बर्तन बंटाते हैं और ये पांच तत्वों के शरीर |उसकी यह बात मेरे दिल में भी गुदगुदी पैदा कर देती है और मैं भी सोचने लगता हूँ कि बाबा जी भी मेरी बिरादरी के हैं क्यूंकि मैं कागज़ पर लिखता हूँ और ये किस्मत लिखते हैं |बात उस सवाल पर पहुँचती है कि-

पानी रे पानी तेरा रंग कैसा 

जिसको भी देखें,लगे उस जैसा |

इसीलिए तो हर कोई उन्हें अपना मानता था और वे सबको अपना | 

यह कोई बिरादरीवाद नहीं है बस प्रेम का एक रूप है जो बाबा जी को अपने निकट लाना चाहता है |जिस प्रकार चाँद-सूरज आदि किसी देश विशेष के नहीं हैं इसी प्रकार गुरु भी किसी धर्म-जाति या बिरादरी का नहीं हो सकता लेकिन इस बहाने ख़ुशी लेने में क्या नुक्सान है ?     

अटूट निष्ठा ही क्यों मांगी ? 

रामकुमार सेवक 

संभवतः वर्ष 2000 के कुछ बाद की बात है सागरपुर (दिल्ली )के उत्साही नौजवानो ने अपने मुखी महात्मा के सहयोग के साथ टॉक शो का एक अनूठा कार्यक्रम शुरू किया था |ऐसा कार्यक्रम मैंने फिर कभी नहीं देखा |इसमें मुझे सम्मिलित होने का अवसर मिला था |मेरे मित्र और साथी विमलेश आहूजा जी भी मेरे साथ सम्मिलित हुए थे |उस कार्यक्रम में सीधे प्रश्न किये जाते थे जिनका अपने विवेक अनुसार उत्तर देना होता था |उसमें पूछे गए प्रश्न और दिए गए उत्तरों में से कुछ मुझे अब भी याद हैं लेकिन आज कुछ और चर्चा करनी है |

ऐसे अनूठे कार्यक्रम की जानकारी मैं साकार सतगुरु (बाबा हरदेव सिंह जी )को देना चाहता था लेकिन उनके सामने जाकर मैं अक्सर भयभीत हो जाता था जबकि बाबा जी हमेशा सदाबहार थे |मैंने सागरपुर से सब जानकारी लिखित में मंगवाई और सही अवसर की प्रतीक्षा करने लगा |आदरणीय जे.डी.शर्मा जी उन दिनों उत्साहपूर्वक जनसम्पर्क की सेवा में लगे थे |इस सम्बन्ध में मेरा उनसे सीधा संपर्क था |शर्मा जी ने सहयोग किया और बाबा जी से मुझे अलग तरह से मिलने का मौका मिल गया |

उन दिनों मेरी पहली स्वतंत्र गद्य पुस्तक बूँद-बूँद सागर छप चुकी थी |यह शनिवार का दिन था |हज़ारों महापुरुष निरंकारी भवन के प्रांगण में थे |चूंकि मुझे बाबा जी से कुछ कहना था इसलिए मेरी बारी बिलकुल अन्त में थी | मैं और मेरी पत्नी गुरबचन निवास के निचले तल पर खड़े थे |पंक्ति बहुत धीरे-धीरे चल रही थी और करीब-करीब सब बाबा जी से अपने मन की बात कह रहे थे |लगभग तीन घंटे बाद मुझे संकेत मिला और मैं महाराज के सामने पहुंचा |चूंकि निरंतर बाबा जी के दर्शन हो रहे थे इसलिए तीन घंटे  इंतज़ार करना मुझे बहुत अच्छा लगा |

बहरहाल महाराज के सामने पहुंचा |उनके लिए एक हार्दिक निमंत्रण था ,जो शायद समय को मंजूर नहीं था या मेरी हिम्मत नहीं थी या मन का संकोच हावी था |फिर अपनी पहली स्वतंत्र पुस्तक -बूँद बूँद सागर भेंट की |इस पुस्तक में एक लेख था -आध्यात्मिकता और व्यवसायिकता में परस्पर सम्बन्ध-इस लेख से मैं न जाने क्यों .कुछ आशंकित था और बाबा जी से उस समय छिपाना चाहता था   |बाबा जी ने तुरंत किताब का रैपर हटाया और उसे खोल लिया |जो लेख खुला वह था-आध्यात्मिकता और व्यवसायिकता में परस्पर सम्बन्ध| जिसे छिपाना चाहता था उसे ही बाबा जी ने एक मिनट पढ़ा और किताब अपने सेवादार महात्मा को दे दी |

फिर मैंने सागरपुर वाले कार्यक्रम का जिक्र किया और लिफाफा महाराज को दे दिया |

महाराज बहुत तसल्ली से खड़े थे |आदरणीय मंगल सेन जी भी वहां खड़े थे |मुझे याद है उन्होंने कहा- आज जो माँगना है मांग लो |महाराज ने मेरी और देखा |मैंने कहा-मांग तो एक ही है ----कि--आपके चरणों में मेरी निष्ठां अटूट बनी रहे |कभी भी मायावी प्रभावों में न बह जाऊं |बाबा जी ने संकेत किया और मैंने चरण स्पर्श किया |

अब मैं सोच रहा हूँ कि अन्य कुछ क्यों नहीं माँगा जबकि उस दिन सुअवसर था ,कुछ भी मांग सकता था |

बचपन में रामलीला में देखा था कि नारद जी ने अपनी मर्जी से हरि रूप मांग लिया था और बन्दर की तरह दिखने लगे थे इसलिए जब भी सतगुरु के सामने जाता था तो यही अरदास करता रहता था कि वाणी  पर आप बैठ जाना |वही बुलवाना जो जरूरी हो |उस समय भी यही भाव बना हुआ था और एक समर्पित शिष्य को अटूट निष्ठा के सिवा और क्या चाहिए |

मैं भाव विभोर था और आज सुबह पार्क में फिर उस दिन की याद में खो गया जब बाबा जी को मैं अपनी स्मृतियों में पा रहा था |स्मृतियों में उस मुलाक़ात को दोबारा जी रहा था | माया का प्रवाह बहुत तेज होता है लेकिन मालिक ने मुझे हमेशा संभाला है |आगे भी सम्भला रहूँ,यही प्रार्थना है |    

सम्पादकीय 

पम्पराओं के  बोझ से डूब रही धर्म की नाव 

रामकुमार सेवक 

जितनी अच्छी या बुरी परम्पराएं हैं,वे सब मनुष्यों द्वारा शुरू की गयी हैं और यह भी हो सकता है कि जहाँ से परंपरा हुई हो,उस इंसान को पता भी न हो कि उसने कितनी अच्छी या खराब परंपरा की शुरूआत कर दी है |

हम जानते हैं कि परमात्मा सर्वव्यापक व् सर्वशक्तिमान है लेकिन न जाने कहाँ से प्रतीक की पूजा शुरू हो गयी और प्रतीक इतने प्रबल हो गए कि परमात्मा के मूल तत्व की तरफ की इंसान का ध्यान ही जाना बंद हो गया |इंसान का ध्यान दिलाने के लिए अनेक सन्त-महात्माओं  ने अपनी वाणी बुलंद की |सही अर्थों में जो सन्त थे उन्होंने अपनी पूजा नहीं करवाई लेकिन इंसान न जाने क्यों व्यक्तिपूजा से जुड़ ही जाता है |वह चाहे धर्म हो या राजनीति|

 जैन व् बौद्ध को अनीश्वरवादी धर्म माना जाता है अर्थात वे ईश्वर को मानने की बजाय मनुष्य की नैतिक क्षमताओं को विकसित करने और परम्परावाद में परिवर्तन लाने की चेष्टा करते हैं |मनुष्य का जीवन सहज और सरल  बनाने की कोशिश करते हैं |दोनों ने ही साधना और संतुलन पर बहुत बल दिया है लेकिन बुद्ध और महावीर दोनों की ही मूर्तियां बहुत हैं और उनकी पूजा भी की जाती है |

सनातन धर्म ,जिसे हिंदुत्व कहा जाता है,ईश्वर को निराकार मानता है लेकिन निराकार के तत्वदर्शन पर प्रतीकों की पूजा हावी हो गयी है |कमोबेश लगभग हर धर्म के अपने -प्रतीक हैं,ये प्रतीक किसी को हानि भी नहीं पहुंचाते  लेकिन प्रतीकों की भीड़ में मूल सन्देश गायब हो गया जबकि उस सन्देश की सर्वकालिक महत्ता है |

उस सन्देश को उभारने के लिए समय -समय पर सन्त-महात्माओं का अभ्युदय हुआ लेकिन मायावाद के इस दौर में अध्यात्म में भी लालसाओं और वासनाओं का प्रवेश हो गया |मौलिक ज्ञान और सोच के अभाव में आस्था भी कर्मकांड और धर्मान्धता में परिवर्तित हो जाती है |यह हमने पिछले कुछ वर्षों में देखा कि शाश्वत परमात्मा की सर्वोच्चता पर व्यक्ति पूजा हावी हो गयी जिसके कारण बहुत से बुरी प्रवृत्ति वाले लोग भी धर्म का चोला ओढ़कर प्रकट हो गए |उनकी भी पूजा शुरू हो गयी लेकिन किया हुआ अपराध भला कब तक छिपता |सत्य उजागर हुआ और ऐसे तत्व जिनकी जनमानस में खूब प्रतिष्ठा थी अपराधियों की श्रेणी में गिने जाने लगे और उनके सामान्य अनुयाई  धर्मसंकट में पड़ गए  |

वास्तव में आम जन प्रायः अंधानुकरण की प्रवृत्ति रखते हैं जिसके कारण अपने विवेक का इस्तेमाल करने की बजाय ,अंधी आस्था के प्रवाह में बह जाते हैं |परिणामस्वरूप अविवेकी मार्ग पर निःसंकोच चल पड़ते हैं और बाद में पछताते हैं |

आका के अपराधी सिद्ध होने पर आम अनुयाई के सामने पछताने के सिवा अन्य कोई उपाय नहीं बचता |ऐसे में प्रतीक और व्यक्तियों की पूजा एक प्रकार का बोझ ही सिद्ध होती है |इसी का नतीजा है कि अपराधी प्रवृत्ति के आकाओं के कारण अच्छे और वास्तविक सन्त-महात्मा भी  श्रद्धा की बजाय संदेह की दृष्टि से देखे जाने लगते हैं |इस प्रकार वास्तविक धर्म अथवा मानव् सुधार के धर्म को भी क्षति उठानी पड़ती है |

इस अवस्था में वह परंपरा ,जो कभी महान उद्देश्य को ध्यान में रखकर शुरू की गयी थी धर्म की नाव को डुबोने वाली सिद्ध होती है |

किसी भी परंपरा के अनुकरण से पहले आवश्यक है कि विवेक की आँखें खुली रखें ताकि हम किसी गलत तत्व के मोहरे न बन जाएँ |निर्दोष होने के बावजूद शर्म से दृष्टि नीची ना करनी पड़े |        

उकताहट को उत्साह में कैसे बदला 

गंगटोक में दर्शनों का अनूठा नज़ारा 

रामकुमार सेवक 

सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी पूर्वोत्तर की प्रचार यात्रा पर गंगटोक के पास कहीं थे |सेना के 

 किसी वाहन के कारण मार्ग रुका हुआ था |यह कोई सीधी सड़क नहीं थी बल्कि पहाड़ का रास्ता था जहाँ रुकावट हटाना अपेक्षाकृत कठिन होता है |ऐसी स्थिति में धैर्य की असली परीक्षा होती है |चालक महात्मा तो अपने -अपने स्तर पर कोशिश कर ही रहे   थे लेकिन स

मस्या का समाधान जल्दी होने के

 कोई अवसर नहीं थे |गाड़ियां वहीं खड़ी थीं लेकिन अध्यात्म एक ऐसा ढंग है जहाँ उकताहट और बेरुखी नहीं होती मगर ऐसी हालत में कोई क्या करे ?

थोड़ी ही देर बीती थी कि सतगुरु बाबा जी भी अपनी गाड़ी से बाहर आ गए |वहां जो सेना के वाहन खड़े थे ,वहां कुछ हलचल हुई |वहां दो-चार जवान दक्षिण भारत के निवासी थे जिन्होंने निरंकार प्रभु का ज्ञान प्राप्त किया हुआ था |उन्होंने जैसे ही बाबा जी को देखा ,उनके उत्साह का आवेग बहुत ऊंचा हो गया |

वे बाबा जी के चरणों में नमस्कार करना चाहते थे |

यह जो लोकप्रियता थी यह कोई प्रचार अभियानों अथवा विज्ञापनों के कारण नहीं थी ,ये तो दिलों में अंकित भावनाओं के कारण थी |यह अपने कर्मो और विशाल भावनाओं के कारण अर्जित की गयी लोकप्रियता थी |बाबा जी ने कृपापूर्वक नमस्कार करने की अनुमति दे दी |थोड़ी ही देर में उन सैनिक महात्माओं के साथियों और अधिकारीयों का भी ध्यान बना तो जैसे जंगल में मंगल होने की कहावत साकार हो गयी |जहाँ थोड़ी देर पहले असुविधा का तनाव हावी था वहां अब भक्ति का सहज उत्साह हावी हो गया था |जिनका भी ध्यान था उन्हें नमस्कार का  अवसर मिला |

आनद का यह अवसर जितना भी चला लेकिन उन महात्माओं के आनद का ठिकाना नहीं था जो यहाँ अपनी सैनिक ट्रेनिंग लेने के लिए आये थे और अगले छह महीने यहीं रहने वाले थे |उन्हें अनायास ही सतगुरु बाबा जी की कृपा प्राप्त हो गयी |हम अभी इस आनंद में डूबे ही हुए थे कि पता चला कि रास्ता ठीक हो गया और ट्रैफिक सुचारू रूप से चलने ल गा | 

धन्य थे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी जिन्होंने जीवंत रूप से अपने व्यावहारिक जीवन से हमें यह समझाया कि भावनाएं यदि भक्ति पूर्ण हैं तो फिर कहीं भी उकताहट को आनंद में बदला जा सकता है\ बस दूसरों की ख़ुशी में भी खुश रहने की भावना मन में रहनी चाहिए |(10-05-2018 को श्री हरभजन सिंह जी कोहली द्वारा प्रकट किये गए विचारों से संकलित )

अटूट विश्वास चमत्कार कर सकता है 

रामकुमार सेवक 

हरभजन सिंह जी कोहली ने आज (10 -05-2018को सन्त निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के प्रातःकालीन सत्संग में )सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज का एक संस्मरण सुनाते हुए कहा कि महाराष्ट्र की प्रचार यात्रा थी |मैं एडवांस टीम में था |नागपुर के पास हम पहुंचे तो नाश्ता करने का ध्यान बना |पास ही एक नल से हमने पानी लिया और भोजन की तैयारी करने लगे |

हम अभी भोजन शुरू ही करने वाले थे कि कुछ स्थानीय लोग आये |वे बोले-यहाँ खाना खाने की बजाय बेहतर है आप आगे जाकर भोजन करना |वे बोले-असल में यहाँ दो साल से बारिश नहीं हुई है जिस कारण पानी नहीं है |

हमने कहा कि-हमने तो अभी एक नल से पानी लिया है |

वो बोले -यहाँ पानी कहाँ ?यहाँ तो पानी की गाड़ी आती है और उसका अपना समय है इसीलिए तो आपसे आगे जाकर खाने की बात कह रहे हैं |

हम समझ गए कि हमें यदि पानी मिला है तो यह गुरु की कृपा है अन्यथा ये सज्जन झूठ तो नहीं बोल रहे |हमने उन्हें अपना परिचय देकर कहा कि कुछ ही समय बाद निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी यहाँ से गुजरेंगे ,आप उनके चरणों में अरदास करना |वे दयालु हैं,जरूर कृपा करेंगे |

बाद में बाबा जी की गाड़ियां वहां से गुजरीं |बाबा जी स्थानीय सज्जनो को  देखकर वहां रुके |बाबा जी का तेज ही ऐसा था कि कोई भी इंसान उनसे प्रभावित हुए बिना नहीं रहता था |इन सज्जनो ने अपना दर्द बाबा जी से कहा |बाबा जी ने कहा-सच्चा बादशाह कृपा करेगा और फिर अपनी यात्रा में आगे बढ़ गए |

बाद में हमें बताया गया कि-बाबा जी ने उन लोगों को आशीर्वाद दिया और आगे बढ़ गए |

कुछ ही समय गुजरा होगा कि बादलों का एक समूह वहां आकाश में घुमड़ा और थोड़ी देर में बारिश भी शुरू हो गयी |

यह घटना विचारों में सुनने के बाद आज मैं सोचता हूँ कि यह चमत्कार कैसे हुआ ?इसका एक ही कारण नज़र आता है कि उन लोगों ने सतगुरु पर मजबूत और अटूट भरोसा किया और उन्हें वह मिल गया जिसकी वे इतने समय से प्रतीक्षा कर रहे थे |

बाइबिल में यीशु मसीह अपने एक श्रद्धालु से कहते हैं कि-तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है |बाबा जी ने उन सज्जनो से यह भाव शब्दों द्वारा नहीं कहा लेकिन मुझे लगता है कि-भक्त का गहरा यकीन चमत्कार करने की क्षमता रखता है |          (12-05-2018)

एक और हट जाना बेहतर है     

रामकुमार सेवक 

शरारती इंसान कहाँ नहीं होते लेकिन ऐसे लोगों से सीधे लड़ना समझदारी नहीं है |

एक बार बाबा हरदेव सिंह जी ने एक कहानी सुनाई |उन्होंने कुछ इस तरह कहा-

दो शरारती आदमी गांव के बाहर खड़े होकर बातें कर रहे थे कि-बहुत दिन हो गए किसी को पीटने का मौका नहीं मिला |

दूसरे इंसान ने हाँ में हाँ मिलाते हुए कहा -बात तो तुम्हारी ठीक है लेकिन करें क्या ?

वह आदमी बोला-सामने से वो इंसान चला आ रहा है |सामने जो सूरज चमक रहा है,तुम उसकी तरफ इशारा करके पूछना कि वह क्या है ?

यदि वह कहे सूरज ,तो तुम पीट देना और यदि वह कहे -चाँद ,तो मैं पीट दूंगा |

यह योजना बनाकर दोनों ही दोस्त खुश थे |थोड़ी देर में वह अज़नबी इंसान भी करीब आ गया |उन दोनों के हाव-भाव देखकर ही वह समझ गया कि ये लोग कुछ ठीक नहीं लग रहे इसलिए थोड़ा सावधान हो गया |

जब वह उन दोनों के पास से निकला तो साथ खड़े इंसान ने सूरज की तरफ इशारा करके पूछा -वह क्या है ?

वह बोला-साहब जी,मैं तो इस गांव में पहली बार आया हूँ इसलिए ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि यह क्या है- चाँद है या सूरज |यह कहकर इंसान अपने रास्ते चला गया |

जहाँ बाबा जी ने यह सूत्र दिया यह उस राज्य की बात है जहाँ आदिवासी क्षेत्रों में हिंसा आम है लेकिन बाबा जी ने  फार्मूला बता दिया कि-सामने यदि शरारती तत्व नज़र आएं तो समझदारी से एक और हट जाना बेहतर है | इस यात्रा में स्वयं मुझे ,पहली और आख़िरी बार बाबा जी के साथ जाने का मौका मिला था | इस प्रकार वह यात्रा मेरे लिए ऐतिहासिक है |         

मन की रस्सी खोली या नहीं ?

रामकुमार सेवक 

दो-तीन मित्र नाव पर सवार होकर अपने गाँव की और रवाना हुए |पूरी तरह मौज-मस्ती के मूड थे |अपने गाँव में पहुँचने का जोश हर किसी को होता है ,उन्हें भी था |उन्होंने खूब चप्पू चलाया |जब एक थकता तो दूसरा चप्पू चलाने लगता |आखिर रात बीत गयी और उन्होंने सामने देखा |

एक बोला-यह हमारा गांव है क्या ?

नशा अभी तक उतरा नहीं क्या ,दूसरा उसे डांटकर बोला-अपने ही गाँव को पहचान नहीं पा रहे ?

तीसरे ने कहा-सामने जो मकान हैं वे हमारे गाँव के नहीं लग रहे ?

पहले ने कहा-अरे यह तो वही गाँव है जहाँ से हम चले थे |

दूसरा बोला-क्या कह रहे हो,पागल हुए हो क्या ?सारी रात हमने चप्पू चलाया ,क्या तब भी अपने गाँव में नहीं पहुंचे ?

अरे चप्पू तो चलाया पर नाव की रस्सी तो खोली ही नहीं ,तीसरे ने अफ़सोस से कहा |

बाबा हरदेव सिंह जी ने इस कहानी के माध्यम से हमें समझाया-सेवा भी की ,सुमिरन और सत्संग भी किया पर ब्रह्मज्ञान से पहले अज्ञानता के कारण जिन कर्मकांडों को कर रहे थे,मन को जिनसे बांध रखा था ,मन की रस्सी उन अज्ञानतापूर्ण कर्मों से खोली या नहीं ?

मन की गाँठ यदि खोली नहीं तो ब्रह्मज्ञान समझ में ही नहीं आया ,फिर किसकी सेवा ?किसका सुमिरन और कैसा सत्संग ?

बाबा जी ने कहा -यदि मन की रस्सी खोली नहीं तो फिर चलना तो होगा लेकिन तेली के कोल्हू के बैल की भाँति हम कहीं पहुंचेंगे नहीं |इसलिए मन को अज्ञानतापूर्ण धारणाओं से आज़ाद करना जरूरी है तभी ज्ञान की समझ आएगी और भक्ति का आनंद भी | 

 

   

कांच और हीरा ?

रामकुमार सेवक 

एक राजा ने घोषणा की कि कांच और हीरे में से पहचानना हो होगा कि-कौन कांच है और कौन हीरा ?

भारी पुरस्कार मिलने वाला था इसलिए बहुत  से  लोग  इनाम  के  लालच  में  आ  गए  |अच्छी-खासी भीड़ इकट्ठी हो गयी लेकिन हीरा कौन सा है और कांच कौन सा है ,यह पहचान नहीं कर सके |कांच और हीरे की कीमत में बहुत फ़र्क़ है |यह तब है जबकि दिखने में दोनों एक जैसे लगते हैं | 

एक दिन एक नेत्रहीन व्यक्ति वहां आया |उसे देखकर बहुत सारे लोगों ने उसका मज़ाक उड़ाया लेकिन उसने मज़ाक की परवाह नहीं की |

नियम के अनुसार उसे भी वहां ले जाया गया जहाँ हीरा और कांच अलग-अलग रखे थे |वहां धूप भी थी लेकिन नेत्रहीन के लिए तो हर जगह अँधेरा ही अँधेरा था |

उस इंसान ने दोनों चीजों को अलग-अलग छुआ और जोर से बोला-पहले मैंने जिसे छुआ था वह हीरा है |उसे विजेता घोषित कर दिया |लोग हैरान थे कि इस अंधे ने हीरा कैसे पहचान लिया ?उनमें से अनेक तो राजकर्मचारियों से उसकी मिलीभगत होने का शक भी कर रहे थे लेकिन  उस नेत्रहीन सज्जन को विजेता घोषित कर दिया गया था |

राजा ने उससे पूछा कि-तुमने हीरे की पहचान कैसे की जबकि आपके तो नेत्र भी नहीं हैं | उसने कहा कि

कांच पर धूप का असर था जिसे छूते ही पता चल गया लेकिन हीरा धूप में वैसे का वैसा था,उस पर धूप का कोई असर नहीं पड़ा |

यह रोचक प्रसंग सुनाकर सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने कहा- जो लोग जल्दी ही धूप का असर ग्रहण कर लेते हैं और विचलित हो जाते हैं वे कांच की भाँति कम महत्व पाते हैं जबकि हीरे जैसे इंसान परिस्थितियों का असर जल्दी ग्रहण नहीं करते |वे कठिन परिस्थितियों में भी विचलित नहीं होते |यह इसलिए हो पाता है क्यूंकि वे इस निरंकार को अपने जीवन में पहल देते हैं इसलिए संतुलित जीवन जीते हैं |वे परिस्थितियों का सामना ज्यादा अच्छी तरह करते हैं और जीवन में सफलता प्राप्त करते हैं |वे न जल्दी क्रोधित होते हैं और न विचलित |ऐसे इंसान हीरे की भाँति महत्वपूर्ण होते हैं |मात्र जयजयकार करवा लेने से कोई हीरा नहीं होता बल्कि उसके मानवीय गुण ही उसे हीरा सिद्ध करते हैं | 

मानव जीवन सुन्दर कैसे ?

रामकुमार सेवक 

पिछले दिनों  निरंकारी बाबा जी के एक  प्रवचन में सुना-युग सुंदर,सदियाँ सुंदर,हर पल सुंदर-गर मानव जीवन हो सुंदर |सहज ही प्रश्न उभरा कि मानव जीवन सुंदर बनाने का उपाय क्या है ?

बचपन में जब अलंकारो के बारे में पढ़ा था तो उसमें अलंकार की  परिभाषा बताते हुए कहा गया था कि -जिस प्रकार कोई स्त्री आभूषण पहनकर ज्यादा सुंदर लगने लगती है इसी प्रकार अलंकार किसी भी कविता की सुंदरता बढ़ाते हैं |स्पष्ट हो गया कि अलंकार धारण करने से जीवन में सुंदरता आ जायेगी |सवाल उभरा कि क्या इतना कर लेना काफी है ?विभिन्न अलंकरण धारण करके क्या युगो को सुंदर बनाया जा सकता है ?

25-26 साल पुरानी बात है -मेरा विवाह हुए कुछ ही समय हुआ था |एक दिन पत्नी ने आभूषण बनवाने को कहा |संयोग की बात थी कि उस समय वैसा कर पाना सम्भव नहीं था |पत्नी को किसी प्रकार समझाने की कोशिश की लेकिन स्त्रियो को इस मामले में समझाना काफी कठिन होता है -बहरहाल साम-दाम -दंड-भेद आदि हर नीति का प्रयोग करके मामला सुलझाया |

वह रविवार का दिन था और हमारे नगर में साप्ताहिक सत्संग  शाम को होता था  |संयोगवश उस दिन मुख्य मंच प्रवचन करने  की  सेवा  मेरे हिस्से में आयी |मंच संचालक महात्मा ने जो शब्द निकाला उसमें बाबा अवतार सिंह जी महाराज ने कहा था कि -

सबर-शान्ति ते समदृष्टि संतजना दा  गहना ए-संतजना दा वड्डा जेवर भाणे अंदर रहना ए|

शब्द सुनकर मुझे लगा कि बाबा जी ने मेरा काम बहुत आसान कर दिया है |दास शुरू हो गया कि असली आभूषण हैं-सदगुण | सदगुण यानि कि सब्र-यानि कि - PATIENCE |

देखा तो यह जा रहा कि आज PATIENTS यानि कि रोगी तो हर कहीं नज़र आते हैं लेकिन धैर्यवानों का बेहद अभाव है |इसी का परिणाम है कि हर कोई हर किसी को OVERTAKE करने यानि कि धक्का देकर आगे निकलने में लगा है |मानव में मानवीय गुणो का नितांत अभाव नज़र आता है जिस कारण दुनिया नरक का रूप ले रही है |जब धैर्य ही नहीं है तो फिर शांति कहाँ से आयेगी ?यही कारण है कि घर-घर में तनाव है क्यूंकि बुनियाद ही खुदगर्ज़ी के आधार पर बनाई  हुई है |

समदृष्टि तो बहुत ही ऊंची अवस्था है |यह तो संत-महात्माओ में भी आसानी से नहीं आती |

द्रोणाचार्य अर्जुन और एकलव्य को समदृष्टि से कहाँ देख पाये ?

लोग अपने बच्चो को किसी और दृष्टि से देखते हैं और दूसरों  के बच्चो को किसी और दृष्टि से -इसीलिए बच्चो के प्रति अपराध करते हुए उन्हें संकोच नहीं होता |वास्तव में समदृष्टि सिर्फ पूर्ण ब्रह्मज्ञानी महात्मा की  ही हो सकती है इसलिए इसे अर्जित करना पड़ता है |

आगे बाबा जी ने परमात्मा के भाणे यानि कि प्रभु की रज़ा को सहज स्वीकार करने की बात कही |यह कर पाना भी कठिन है लेकिन होगा तो वही जो परमात्मा चाहेगा इसलिए भाणे को तो मानना ही होगा इसलिए बेहतर है कि राज़ी-खुशी यानि कि सहजता से मान लें |

मुझे लगा कि  जो गुण बाबा जी ने ऊपर बताये हैं वही जीवन को सुंदर बनाने वाले हैं |सिर्फ निरंकारी अनुयाईयों का ही नहीं बल्कि हर मानव का जीवन इन गुणो को धारण करने से सुंदर बन सकता है |मानव जीवन सुंदर होगा तो हर पल सुंदर होगा -वैसे भी सदियो या युगो तक कौन जी पाता है |सदियो तक रहता है उनका नाम -जो असाधारण जीवन जीते हैं यानि कि सब्र-शांति-समदृष्टि -सहजता आदि को जो जीवन में अपना लेते हैं |        

अपने दीपक स्वयं बनो 

रामकुमार सेवक 

एक नगर की सराय में कई व्यापारी ठहरे थे |शाम को अगली जगह प्रस्थान करना था तो एक आदमी अपनी लालटेन साफ़ कर रहा था |

बगल वाले यात्री ने सोचा कि इसी के पीछे चल देना बेहतर है |इसी की लालटेन से हम भी काम चला लेंगे |

चालाक आदमी हमेशा यही करते हैं -हल्दी लगे न फिटकरी ,रंग चोखा का चोखा |बैंड कोई और बजवा रहा है,और विवाह कोई और रचा ले |समझदार आदमी कहेंगे कि इसमें गलत क्या है ?

खैर कुछ घंटों बाद शाम भी हो गयी |यात्री सराय से निकल गया |योजना के अनुसार बगल वाला यात्री भी पीछे-पीछे हो लिया |लालटेन की रोशनी उसे  भी मिलती रही |सोच रहा था कि-बढ़िया रहा,अपनी लालटेन को तैयार नहीं करना पड़ा |

आगे लालटेन वाला अपने रास्ते मुड़ गया जबकि बगल वाले यात्री को किसी और मार्ग पर जाना था |अब लालटेन दिखनी बंद हो गयी तो आगे बढ़ना कठिन हो गया |किसी अन्य यात्री की प्रतीक्षा करने के सिवा कोई चारा न था |अब वह सोचने लगा कि यदि अपनी लालटेन साफ़ कर ली होती तो मंजिल तक पहुँच जाता | बुद्ध कहते थे-अप्पो दीपो भव,इसका अर्थ है कि-अपने दीपक स्वयं बनो | 

मैंने इसका अर्थ यह निकला कि-अपने-अपने युग में राम जी,कृष्ण जी,श्री गुरु नानक देव जी,हजरत ईसा ,हजरत मुहम्मद साहब आदि ने अपनी स्वयं की रोशनी से जीवन का अर्थ समझा |चूंकि हर कोई उतना समर्थ नहीं होता और हर किसी के भीतर इतनी गहरी जिज्ञासा भी नहीं होती इसलिए सतगुरु कृपा करके स्वयं को मिला ज्ञान अन्य जिज्ञासुओं को प्रदान कर देता है लेकिन उस ज्ञान का मर्म समझना और मर्म समझकर जीवन में उपयोग करना तो स्वयं जिज्ञासु की जिम्मेदारी है |

ढूंढने की कठिनाई तो सतगुरु ने कम कर दी लेकिन आत्मानुभूति के लिए तो स्वयं की मेहनत,स्वयं का चिंतन,स्वयं का आचरण चाहिए |

जन्म-मृत्यु की प्रक्रिया तो लगभग एक जैसी है लेकिन जीवन एक जैसा नहीं है |हर इंसान की क्षमता भी एक जैसी नहीं है इसलिए बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे कि-गुरु ने वही ज्ञान दिया जो उसे अपने गुरु से मिला लेकिन गुरु की स्टेज पर जो बैठा है,यदि वह गुरु वाली दृष्टि भी अपना ले तो जीवन में क्रांति घटित हो जायेगी |

वह यात्री अपनी लालटेन साफ़ कर रहा था, हमें अपनी दृष्टि साफ़ करनी होगी |ब्रह्मवेत्ता वाली दृष्टि बनानी होगी |यह काम कठिन तो है लेकिन असंभव नहीं है |किसी शायर ने कहा है-शौक़े दीदार है तो नज़र पैदा कर |            

निरंकार का किनारा

रामकुमार सेवक  

विख्यात कवि हरदेव सिंह जी अलमस्त ने एक कविता लिखी थी कि-डूबना है तो कहीं भी डूब जाओ लेकिन बचना है तो किनारा है |सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने अनेक बार यह बात अपने विचारों में सम्मिलित की | यहाँ तक कि न्यू जर्सी(अमेरिका )में 10 -05 -2016  को किये गए अंतिम विचार में भी उन्होंने इस बात को सम्मिलित किया कि यदि बचना है तो किनारा है |

कल ऐसे ही ख्याल में आ गया कि-निरंकार का किनारा कहाँ है ?सुनने वालों ने भी कहा कि निरंकार का किनारा भला कहाँ हो सकता है |

जब ध्यान जुड़ा तो निरंकार में से जवाब आया -निरंकार का किनारा है -गुरु |

हम निरंकार में पैदा हुए और लगातार इसी में  रहे लेकिन निरंकार से साक्षात्कार न हो सका |निरंकार का एहसास करने की और उन्मुख करने वाले ज्ञान नेत्र ,ब्रह्मवेत्ता सतगुरु ने ही हमें प्रदान किये |निरंकार का साक्षात्कार हुआ तभी हम भवसागर में से डूबने से बच सके |इस प्रकार सतगुरु ही निरंकार का किनारा है |        

प्रभु मुझे मझधार छोड़ न देना

रामकुमार सेवक 

यह गीत,शायद आपने भी सुना होगा-छोड़ न देना,प्रभु मुझे मझधार छोड़ न देना ,यह मुझे पसंद है लेकिन इसका वीडियो ,जो कि निरंकारी स्टूडियो ने फिल्मांकित किया है ,यह मुझे और भी पसंद है |इसका फिल्मांकन इतना मर्मस्पर्शी है कि सिर्फ मेरी ही नहीं बल्कि पत्नी व् बच्चों की आँखें भी गीली हुए बिना नहीं रहती |अब तो मैं सिर्फ गीत सुनता हूँ,आँखें गीली होने के डर से उसका फिल्मांकन नहीं देखता |

आज सुबह गीत चल रहा था और मैं दूसरे कमरे में था तभी पत्नी  ने हा-तुम्हारी  वो बात तो गलत हो गयी |

मुझे याद आ गया ,लगभग पांच साल पहले मैंने किसी से कहा कि-इस गीत को लिखने वाले का गुरु पर यकीन मजबूत नहीं है |

उसने पूछा-आप यह किस आधार पर कह रहे हैं ?

मैंने कहा-एक यही तो हैं जो किसी का साथ नहीं छोड़ते ,न इस लोक में ना परलोक में |हम बेशक नादानी के कारण ऊँगली छुड़ाने  की कोशिश करते रहते हैं लेकिन मालिक तब भी मेरा हाथ अपने हाथ में पकडे,मैंने अरदास की |

उनकी तसल्ली हो गयी लेकिन 13  मई 2016  को बाबा हरदेव सिंह जी हमारा साथ छोड़ गए तो यह गीत बहुत ही सारपूर्ण लगने लगा |

लगभग एक महीना पहले मैं यही बात पत्नी को बता रहा था कि मेरी धारणा कितनी अधूरी थी लेकिन तुरंत ही यह ख्याल आ गया कि-बाबा जी ने तो मुझे निरंकार से जोड़ा था और निरंकार अब भी मेरे साथ है |लेकिन बाबा जी के उस खूबसूरत व्यक्तित्व को हम कभी देख नहीं पाएंगे और पत्नी उस व्यक्तित्व के अभाव की बात ही कह रही थी| 

 मैंने  उससे विवाद नहीं किया और अपनी उस वार्ता के अधूरेपन को पूरे दिल से स्वीकार कर लिया |

मालिक की यह कृपा है कि जीवन रहते हम अपनी किसी भी धारणा को सही कर सकते है|

मालिक कृपा करे  कि निराकार को आधार बनाने के यथार्थ को भी ह्रदय से और  सही रूप में स्वीकार कर लें |   

सुदामा जी को इतना दुःख क्यों झेलना पड़ा ?

रामकुमार सेवक 

पिछले दिनों एक सज्जन ने प्रश्न किया कि सुदामा जी भी भगवान के भक्त थे फिर उन्हें इतना दुःख क्यों झेलना पड़ा ?

सुदामा जी व् भगवान कृष्ण दोनों ही द्वापर युग में हुए |मैं इस कलियुग में जन्मा हूँ |स्पष्ट है कि फासला  बहुत है |मुझे जो लगा वही मैंने उनसे बताया -श्रीकृष्ण और सुदामा सहपाठी थे |सांदीपनि ऋषि के आश्रम में दोनों पढ़ते थे |एक बार गुरुमा ने सुदामा जी को भुने चने दिए कि जंगल में लकड़ियां लेने जा रहे हो तो यदि भूख लगे तो ये चने कृष्ण और तुम खा लेना |

घटनाक्रम में तो कहा गया है कि बारिश आ गयी |दोनों दोस्त पेड़ के ऊपर थे |घने पत्तों के नीचे होने के लिए सुदामा जी किसी और डाल पर थे और श्रीकृष्ण किसी और डाल पर |सुदामा जी को भूख लगी तो उन्होंने चने खाने शुरू कर दिए |भूख तो कृष्ण जी को भी लगी थी इसलिए उन्होंने सुदामा से पूछा -क्या खा रहे हो सुदामा ?सुदामा जी ने कहा -कुछ खा नहीं रहा लेकिन ठण्ड के कारण दांत बज रहे हैं जबकि सुदामा जी चने ही खा रहे थे लेकिन झूठ बोल दिया |आगे से श्री कृष्ण ने कुछ कहा भी नहीं |

सांदीपनि जी के आश्रम के बाद श्री कृष्ण और सुदामा का साथ छूट गया |

श्रीकृष्ण ने गीता का उपदेश दिया और तत्वदर्शी सतगुरु और राजनीतिज्ञ की भूमिका पूरी कुशलता से निभाई |सुदामा जी ने घोर गरीबी का सामना किया लेकिन प्रश्न यह था कि आखिर इतनी गरीबी क्यों झेलनी पडी ?

१-बचपन में आपस में झूठ बोलना सामान्य क्रिया है लेकिन लगता है कि सतगुरु से इतना सा झूठ बोलना भी क्षम्य नहीं था इसलिए कालांतर में दुःख का कारण सिद्ध हुआ |(जिन्होंने सर्वशक्तिसम्पन्न सतगुरु को सामान्य इंसान समझकर जमकर झूठ बोला ज़रा  सोचें,उनके  साथ  क्या  होने  वाला  है ?) 

२-सुदामा जी को यह कोई पाप या अपराध लगा भी नहीं पश्चाताप का भाव रहा होता |तभी क्षमा याचना का भी भाव पैदा हुआ होता |तब संभवतः दुःख भोग न करना पड़ता |

३-सुदामा जी के पास खाद्य पदार्थ चने थे जिन पर कृष्ण का भी बराबर अधिकार था लेकिन सुदामा जी अकेले ही हजम कर गए तो यह झूठ धोखे की श्रेणी में आ गया |

४-एक पक्ष यह भी  है कि चने गुरुमाता ने दिए थे |चूंकि कृष्ण और सुदामा गुरु जी की सेवा कर रहे थे इसलिए गुरुमाता ने दया और कर्तव्यबोध के परिणामस्वरूप उन्हें दिए |ताकि भूख लगने पर दोनों बालक खा लें |भूख ने दोनों ही बालकों को सताया लेकिन एक बालक ने दूसरे के अधिकार को दबा दिया |इसे तो अनाधिकार चेष्टा ही कहेंगे | 

चूंकि बाल अवस्था थी इसलिए सुदामा जी उसका एहसास भी नहीं हुआ  |इसके अलावा दोनों सहपाठी थे तो क्षमा याचना का भाव भी नहीं आया होगा लेकिन प्रकृति के अपने नियम हैं |प्रकृति को मालिक ने स्वायत्तता दी हुई है इसलिए प्रकृति पीरों-पैगंबरों का भी लिहाज नहीं करती |सुदामा जी की पत्नी को कृष्ण की सामर्थ्य का बोध हुआ और बिना किसी प्रेरणा के कृष्ण पर उनका अटल विश्वास था इसलिए पत्नी के विश्वास के कारण ही सुदामा जी का दुखों से छुटकारा हुआ |मेरे ख्याल से इस विषय पर इतना ही चिंतन पर्याप्त है |   

         

बाबा गुरबचन सिंह जी- मेरे व्यवसायिक गुरु भी

रामकुमार सेवक 

बचपन से ही मुझे भाषाओँ से मुहब्बत रही है और गणित से बैर लेकिन परीक्षा पास करने के लिए गणित पढ़ना पड़ता था |जैसे ही अवसर मिला मैंने गणित से पिंड छुड़ाया लेकिन सच्चे बादशाह का अपना विधान है |1987 में भारत सरकार में जॉब मिली अकाउंटेंट के रूप में |लोग हैरान होते थे हिंदी का एक लेखक -संपादक और काम कर रहा है -अकाउंटेंट का |अब तीस साल से भी ज्यादा हो गए हैं अपना कामचलाऊ एकाउंट्स करते हुए |

मैं सोचता हूँ कि एकाउंट्स की परिभाषा क्या होती है?मुझे आज तक किसी ने नहीं बताया कि एकाउंट्स क्या होता है ?

एकाउंट्स की परिभाषा मुझे जून 1981  की सन्त निरंकारी ,हिंदी  पत्रिका में पढ़ने को मिली |वो परिभाषा बताई बाबा गुरबचन सिंह जी ने |यह तब की बात है जब कि उनका शरीरांत हुए एक वर्ष से भी ज्यादा हो चुका था |

दरअसल सन्त निरंकारी  (संभवतः जून 1981 )  में देसराज जी सिक्का के नाम से    एक संस्मरण छपा हुआ था जिसमें उन्होंने सन्त निरंकारी मंडल में अकाउंटेंट के रूप में मिली सेवा की पृष्ठभूमि बताई थी |

जहाँ तक मुझे याद है बाबा गुरबचन सिंह जी ने सिक्का साहब से एकाउंट्स के कुछ मूलभूत प्रश्न पूछे जैसे- किसी फर्म को नुक्सान होने के क्या कारण हैं ?उन्होंने बैलेंस शीट आदि के सम्बन्ध में व्यावहारिक प्रश्न भी पूछे |

यदि कोई मेरे जैसे साहित्यिक भाई एकाउंट्स की कामचलाऊ जानकारी लेना चाहते हैं तो जून 1981 की सन्त निरंकारी (हिंदी )में बाबा गुरबचन सिंह जी द्वारा दी गयी वह परिभाषा पढ़ सकते हैं |बाबा जी ने कहा-अकाउंटेंट मालिक के पैसे का चौकीदार होता है |उसका काम है कि वो मालिक के पैसे का सदुपयोग करे |किसी भी हालत में मालिक के पैसे का दुरूपयोग न होने दे |यही एकाउंटेंसी है वरना कागज़ काले-पीले करने का नाम एकाउंटेंसी नहीं है |

जब मैंने यह संस्मरण पढ़ा तब मैं 11  वीं या बारहवीं में पढता था  लेकिन न जाने क्यों बात याद रह गयी और अब तक याद है |इस गुरुमंत्र ने मुझे मेरी सरकारी जॉब को करने में बहुत मदद दी |इस दृष्टि से बाबा गुरबचन सिंह जी मेरे व्यवसायिक गुरु भी हैं |     

बाबा गुरबचन सिंह -फौलादी संकल्पों का नाम

रामकुमार सेवक

बाबा गुरबचन सिंह जी के बारे में भूपेंद्र बेकल जी ने लिखा था -

गुरबचन एक मिशन था जीने का इक अंदाज़ था |

तान बस उल्फत की छेड़े गुरबचन वो साज था |

वक़्त का मालिक था साहिब वक़्त की आवाज़ था |

सिर्फ था राज़दाँ वो खुद इलाही राज़ था

दिल्ली में आजकल मेरा सरकारी दफ्तर नये राजिंदर नगर में आचार्य सुशील मुनि आश्रम के पास है |आश्रम का नाम है-विश्व अहिंसा संघ,जिसका उद्घाटन पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1964में किया था |आचार्य सुशील मुनि की याद आज मुझे इसलिए आयी क्योंकि वे बाबा गुरबचन सिंह जी की क़द्र करते थे |27  वे वार्षिक समागम और उसके आस-पास के समागमों में वे सम्मिलित भी हुए थे |24  अप्रैल 1980  को जब बाबा बाबा गुरबचन सिंह जी ने शरीर छोड़ा तब आचार्य सुशील मुनि ने उनके बारे में कहा था -बाबा गुरबचन सिंह जी मानव जाति के मसीहा थे |

मेरे ख्याल से आचार्य सुशील मुनि के धार्मिक और राजनीतिक संपर्क भी काफी मजबूत थे

आचार्य सुशील मुनि की एक विशेषता यह थी कि वे सत्तर के दशक में विभिन्न धर्मो की एकता के लिए काम कर रहे थे |उनका ध्यान था -दिल्ली में विश्व धर्म सम्मेलन का आयोजन करना | इस सन्दर्भ में उनकी बाबा गुरबचन सिंह जी से भी मुलाक़ात हुई थी |उनका ध्यान था कि बाबा जी चूंकि मानव एकता के हिमायती हैं और काफी लोग उनके विचारों को अपने अनुकूल मानते हैं अर्थात वे काफी लोगों को इकठ्ठा कर सकते हैं इसलिए बाबा जी उस सम्मेलन की अध्यक्षता करें |

जहाँ तक मुझे स्मरण है 1973  की मसूरी कॉन्फ्रेंस की रिपोर्ट में बाबा गुरबचन सिंह जी के प्रवचन में मैंने यह वृतांत पढ़ा था |उस रिपोर्ट में उस कांफ्रेंस की पूरी मिनट्स दी गयी थीं |

बाबा जी ने कहा था कि मेरा काम तो दुनिया को सच का,ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने का सन्देश देना है और उस  सम्मेलन के विषय से इस काम में कोई मदद नहीं मिलती | बाबा जी तप-त्याग की असलियत और तप -त्याग के प्रस्तावों के फ़र्क़ को बहुत गहराई से महसूस करते थे |

मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि आज के निरंकारी नेतृत्व के सामने ,इस समय यदि कोई ऐसा प्रस्ताव होता तो यह उसे तेजी से लपकता क्यूंकि मिशन की आंतरिक व्यवस्था को अब राजनीति से कोई परहेज नहीं है | अनाड़ी से अनाड़ी आदमी भी इस सच्चाई को बिना चश्मे के देख सकता है कि बाबा गुरबचन सिंह जी के समय की और आज की, दृष्टि और विचारों में भारी फ़र्क़ है |मेरे कहने का आशय मात्र यह है कि बाबा जी वास्तविक काम में विश्वास करते थे,दिखावेबाजी के बजाय |

बाबा जी हर किसी से पूरे प्रेम व् सद्भावना से मिलते थे,उनकी इज़्ज़त भी करते थे लेकिन किसी के विचारों के कारण अपने आदर्शों से ज़रा भी विचलित होते थे इसलिए मेरे ख्याल से-

फौलादी संकल्पों का था नाम बाबा गुरबचन|

था शांति और एकता का काम -बाबा गुरबचन |

ज़िंदादिली से वे जिए जब तक रहे संसार में ,

 

ज़िंदा है हर इक सांस में पैगामे बाबा गुरबचन |   (22-04-2018)

निरंकार का एहसास है या नहीं ?  

रामकुमार सेवक 

25  वे (रजत जयंती )सन्त समागम (1972 ) की बात है,जब बाबा  गुरबचन सिंह जी  और निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी को दिल्ली के ऐतिहासिक रामलीला मैदान में करेंसी नोटों से तोला गया था |

उस क्षण को मैंने इन आँखों से नहीं देखा लेकिन महसूस जरूर किया है |गुरुभक्ति का वह एक श्रेष्ठ नमूना था |उस दिन उस्ताद कवि हरदेव सिंह जी नेअलमस्त  जो कविता लिखी उसमें उन्होंने कहा-गुरु ऊंचा हो गया,नोट नीचे रह गए अर्थात माया गुरु की तुलना नीची थी ,है और रहेगी |  

आदरणीय निर्मल जोशी जी ने उस इतिहास को जीवंत रूप में लिखा |उन्होंने लिखा कि बाबा गुरबचन सिंह जी ने इस अवसर पर एक बात कही कि यह माया मेरे और मेरे परिवार के लिए खर्च नहीं की जायेगी |इससे डिस्पेंसरियां बनेंगी,स्कूल-अस्पताल आदि बनेंगे |

उन दिनों समागम के दो सत्र हुआ करते थे |सांयकालीन सत्र में निर्मल जोशी जी को विचार प्रकट करने का मौका मिला |उन्होंने बाबा जी से एक ज्वलंत प्रश्न किया ,जो कि ऐतिहासिक प्रश्न था |उन्होंने कहा कि-सुबह आपने कहा कि यह माया आपके परिवार के लिए खर्च नहीं होगी |यह बात मेरी समझ से परे है | आपका परिवार सिर्फ पांच बच्चों का नहीं है |यदि सिर्फ पांच बच्चे ही आपके हैं तो हम किसके बच्चे है ?हम सब भी तो आप ही के बच्चे हैं बल्कि पूरा मानव समाज आपका परिवार है |यह सुनकर बाबा जी प्रसन्न ही हुए क्यूंकि वे पहले से ही मानव मात्र को अपना परिवार मानते थे |निर्मल जोशी जी ने सतगुरु के ऐतिहासिक और जागरूक शिष्य होने का दायित्व निभाया |  

उस समागम को हम कभी भूल नहीं सकते क्यूंकि उस समय जोश बहुत ज्यादा था लेकिन होश भी बहुत ज्यादा था |इस प्रकार निरंकारी मिशन का एक संतुलित रूप सामने आया |

निरंकार का एहसास ,निरंकार का सुमिरन ही हमें संतुलित करता है |हमारा वचन,हमारा व्यवहार प्रकट कर देता है कि निरंकार का एहसास है या नहीं ?       

एक सवाल का जवाब 
1973 में हुई मसूरी कांफ्रेंस से पहले सन्त  निरंकारी सत्संग भवनों की संख्या काफी सीमित थी |उस समय सिनेमा हॉल्स और पार्क में भी सत्संग  कार्यक्रम होते थे |एक बार कार्यक्रम किसी पार्क में हुआ और बाबा गुरबचन सिंह जी महाराज ने अपने प्रवचन में एक प्रसंग बताया कि- उनसे लोग पूछते हैं कि आप अपने कार्यक्रम पार्क या सिनेमाओं में क्यों करते हैं जबकि ये मंदिर-मस्जिद -गुरद्वारे -चर्च -आदि धार्मिक स्थल इसी काम के लिए ही तो हैं |फिर आप सत्संग वहां क्यों नहीं करते ?
बाबा जी ने कहा कि मैंने उनसे बताया कि-मंदिर   में सिर्फ हिन्दू भाई आते हैं और मस्जिद में मुसलमान भाई | गुरद्वारे में सिख भाई आते हैं और चर्च में सिर्फ ईसाई भाई |पार्क या सिनेमा में ये सब इकट्ठे जा सकते हैं और मेरा सन्देश तो हर इंसान के लिए है किसी ख़ास धर्म या वर्ग के लिए नहीं इसलिए हम अपने सत्संग कार्यक्रमों के लिए पार्क या सिनेमा हॉल्स का इस्तेमाल करते हैं ताकि हर इंसान सत्य का सन्देश सुन सके | 

 यह प्रसंग मुझे उस दिन याद आया जब मैं मयूर विहार दिल्ली के घड़ोली क्षेत्र में सत्संग करने गया हुआ था और सत्संग एक पार्क में था |कुछ लोग सत्संग को निरंकारियों का प्राइवेट कार्यक्रम समझकर संकोच के कारण बाहर खड़े होकर सुन रहे थे |
अंत में जब दास को अवसर मिला तो मैंने अपनी बात बाबा गुरबचन सिंह जी के इस प्रसंग से ही शुरू की कि निरंकारी मिशन के सिद्धांत हर मानव के लिए हैं और यह कार्यक्रम आप सब के लिए है इसलिए अंदर बैठकर सुनिए ,ये दरियां आप ही के लिए हैं |
सिद्धांत की बात चली तो मुझे बाबा गुरबचन सिंह जी की वह बात भी याद आ गयी जो उन्होंने 1980 के मानव एकता सम्मेलन (चंडीगढ़ )में कही थी कि शरीर के ख़त्म होने से मिशन ख़त्म नहीं हो सकता |शरीर नहीं सिद्धांत ही हमारा मिशन है |
2011
से पहले किसी अप्रैल अंक में मैंने एक सम्पादकीय भी लिखा था -   व्यक्ति और सिद्धांत     |यह बाबा गुरबचन सिंह जी की इसी शिक्षा पर आधारित था |

 

आईये सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी का धन्यवाद करें कि उन्होंने अपने व्यवहारिक जीवन से सत्य सिद्धांतो को ज़िंदा रखा और हमें उन सिद्धांतो पर चलने की प्रेरणा की प्रेरणा निरन्तर देते रहे |धन निरंकार जी

आदेश देने से पहले, आदेश मान लेना ऐसे ही संभव है  

रामकुमार सेवक 

शिष्य गुरु के आदेश को इसलिए सर्वोच्च स्थान पर रखता है क्यूंकि उसे पता होता है कि गुरु का आदेश मानव मात्र की भलाई के लिए ही होगा |सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज भी पिछले दिनों एक विचार में यही कह रहे थे कि गुरु का आदेश तो शिष्य को भक्ति की ऊंचाई देने के लिए होता है |उसमें पूरी मानवता का भला छिपा होता है |

जो किसी के प्रति बुरा करने का आदेश देता है वह और चाहे जो कुछ भी हो,गुरु नहीं हो सकता |गुरु तो हर किसी की भलाई ही सोचता है ,भलाई ही चाहता है |

बाबा गुरबचन सिंह जी के जीवन में भी हमने यही देखा |वे अपने सतगुरु और पिता बाबा अवतार सिंह जी के आदेश को सर्वोच्च वरीयता देते थे |पुराने बुजुर्ग महात्माओं से मैंने सुना है कि बाबा अवतार सिंह जी को प्रचार यात्रा के लिए दिल्ली से अगले दिन रवाना होना था |पहले दिन उन्होंने जाने से पूर्व भगत रामचंद जी (कपूरथला वालों )से मिलने की इच्छा प्रकट की |

बाबा गुरबचन सिंह जी ने सतगुरु की यह इच्छा सुनी और उन्हें बिना बताये कार लेकर कपूरथला रवाना हो गए |वहां जाकर भगत जी से बाबा जी की यह इच्छा बताई |भगत जी ने सतगुरु का सन्देश सुना और तुरंत बाबा जी के साथ दिल्ली रवाना हो गए |सफर लम्बा था लेकिन गुरु के दर्शनों का चाव मन में हो तो सफर की लम्बाई पर भक्ति का उत्साह हावी हो जाता है |

भगत रामचंद जी और बाबा गुरबचन सिंह जी एक साथ दिल्ली की तरफ बढ़ रहे थे |

अगले दिन बाबा अवतार सिंह जी ने भगत राम चन्द जी को अपने  सामने पाया तो बहुत प्रसन्न हुए |वे बोले-भगत जी,आप यहाँ कैसे ?भगत जी ने बाबा गुरबचन सिंह जी के समर्पण और असाधारण सेवा का पूरा किस्सा सुना दिया |

सोचने की बात यह है कि बाबा गुरबचन सिंह जी को बाबा अवतार सिंह जी ने सिर्फ अपने मन का भाव बताया था ,कपूरथला जाने का आदेश नहीं दिया था |शिष्य ने भाव को ही आदेश मान लिया और सैकड़ों किलोमीटर दूर पंजाब के कपूरथला जाकर भाव पूरा कर दिया तो गुरु भी समझ गए कि शिष्य की शिक्षा पूर्ण है |

धर्म सिंह जी शौक़ साहब कहा करते थे -तेरे फरमान नू मन्ना ,तेरे फरमान तों पहलां |फरमाने से पहले फरमान को मान लेना,यह तो सिर्फ इस प्रसंग में ही देखा है |        

सतगुरु हर हाल में सतगुरु ही होता है | 

रामकुमार सेवक  

बाबा गुरबचन सिंह जी रोज की भाँति आज भी वर्कशॉप में गए और गाड़ियों की मरम्मत करने के अपने प्रिय कार्य में व्यस्त हो गए | मिशन का फैलाव बढ़ रहा था |एक स्थान से दूसरे स्थान तक जाने के लिए गाड़ियों की बहुत आवश्यकता थी |चूंकि मिशन की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी इसलिए पेट्रोल की गाड़ियों को डीजल की गाड़ियों में परिवर्तित किया |

बाबा जी मानवता के इस अभियान में एक इंजीनियर के रूप में भी सेवा दे रहे थे |जब बाबा जी सेवा में लगते थे तो न कपड़ों का ध्यान करते थे और न भोजन का  |संयोग की बात उस दिन एक नेता बाबा जी से मिलने के लिए आये हुए थे |बाबा जी ने उन्हें दफ्तर में आदरपूर्वक बैठाने को कहा |

उस समय बाबा जी किसी गाडी को उन्नत कर रहे थे तो उनके कपड़ों पर भी धब्बे लगे हुए थे और सर पर पगड़ी भी नहीं थी |

अपना गाड़ी का काम ख़त्म करके बाबा जी दफ्तर की तरफ चल दिए |महापुरुष चाहते थे कि बाबा जी कपडे बदल लें तो उस नेता पर अच्छा प्रभाव पड़ेगा लेकिन बाबा जी का स्वभाव था कि वे दिखावेबाजी में यकीन नहीं रखते थे |वे उसी तरह उस नेता के पास बैठ गए और बात करने लगे |

उधर वो नेता सोच रहा था कि न जाने बाबा जी कब आएंगे ,समय वैसे ही कम है |

उसने किसी से कहा कि कृपा करके बाबा जी को बुला दीजिये ,मुझे कहीं और भी जाना है |

उस महात्मा ने कहा-यही तो बाबा जी हैं |

अब नेता चौंक गया कि यह मैकेनिक जैसा इंसान इतने बड़े मिशन का संचालक ,लाखों लोगों का सतगुरु कैसे हो सकता है |वह बाबा जी की सरलता और सहजता देखकर हैरान हो गया |

बाद में उसने कहा कि मैं सोच तो रहा था कि यह मैकेनिक इतना अनुभवी कैसे हो सकता है लेकिन अब पता चल गया कि बाहरी वेशभूषा चाहे जैसी भी हो सतगुरु हर हाल में सतगुरु ही होता है |        

   

जो फल आपको मिलना है,वो मुझे दे दो     

रामकुमार सेवक 

बाबा गुरबचन सिंह जी बहुत मेहनती और सरल -सहज जीवन जीते थे |सुबह उठकर मान सिंह जी को साथ लेते थे और वर्कशॉप की तरफ निकल जाते थे |

मान सिंह जी उनके समर्पित सेवादार थे |मान सिंह जी फोटोग्राफर,ड्राइवर,मोटर मैकेनिक ,राज-मिस्त्री ,बढ़ई आदि के कई काम जानते थे |रोज का साथ था,दोनों एक-दूसरे के स्वभाव से भली -भाँति परिचित थे |

मान सिंह जी के छोटे सुपुत्र गुरविंदर सिंह जी (बॉबी)मेरे पुराने मित्र हैं |अपने पिताजी द्वारा की गयी सेवाओं के बारे में गौरव के साथ बताते हैं जिससे मुझे भी प्रेरणा मिलती है |

आज सुबह संगत में भी चर्चा हो रही थी कि बाबा जी रोज सुबह पांच बजे उठ जाते थे |अपनी छड़ी लेकर निकल जाते थे |मिशन के बहुत सारे प्रबंध से सम्बंधित कामो को वे सुबह के समय ही निबटा देते थे |

1986 में जब मैं निरंकारी कॉलोनी में सेवा के लिए आया तो उस समय निरंकारी भवन की दुकानों में एक मेडिकल स्टोर हुआ करता था |एक सांवले से बुजुर्ग उसे चलाते थे |कुछ सख्त स्वभाव होने के कारण वे अकेले ज्यादा नज़र आते थे |दुकान के ऊपर लिखा था -सुधीर मेडिकोज |

बाबा जी बहुत सहज थे किसी से भी कोई भी जानकारी लेने में उन्हें संकोच नहीं होता था |

सतगुरु स्वयं परमेश्वर का रूप होता है इसलिए भूत-भविष्य -वर्तमान से भली-भाँति परिचित होता है |बाबा जी को पता था कि मेरे पास समय कम है इसलिए हमेशा जल्दी में रहते थे अर्थात कार्य के लिए तैयार रहते थे |

बाबा जी का ध्यान था एक डिस्पेंसरी बनवाने का |डिस्पेंसरी का कुछ कार्य सुधीर मेडिकोज वाले सज्जन को दिया हुआ था और उन्हें जल्दी जागने की आदत नहीं थी |

बाबा जी एक दिन मान सिंह जी के साथ इन सज्जन के पास सुबह के वक़्त चले गए क्यूंकि डिस्पेंसरी के बारे में कुछ पूछना चाहते थे |

अब ये सज्जन नींद में थे |बाबा जी पहुंचे तो उन्हें जगाया गया |वे उठ तो गए और बाबा जी को जानकारी भी दे दी लेकिन इस प्रकार जगाया जाना उन्हें कुछ अच्छा नहीं लगा |

बाबा जी के जाने के बाद उन्होंने मान सिंह जी से अपनी नाराज़गी जता भी दी कि बाबा जी इस तरह सुबह-सुबह आ गए और मैं सही तरह सो नहीं सका |

मान सिंह जी उनके स्वभाव को अच्छी तरह जानते थे लेकिन उनके मन में भक्ति का बीज तो बोना था |उन्होंने उनसे कहा-गुरु दर्शन का फल बहुत बड़ा है |आप यह सोचो कि घर बैठे आपको गुरु के दर्शन हो गए ,यह कितनी खुशकिस्मती की बात है |

इस भक्तिपूर्ण बात की गहराई वे महसूस नहीं कर सके और उनकी नाराज़गी ख़त्म नहीं हुई तो मान सिंह जी बोले -आप कुछ भी कीमत ले लो लेकिन गुरुदर्शन और सेवा का जो फल आपको मिलना है,वो मुझे दे दो |

यह बात उन सज्जन की समझ आ गयी और उन्होंने गुरु के द्वारा की जा रही सेवा और मेहनत का महत्व महसूस किया |

दो नावों की सवारी है तो फिर----

रामकुमार सेवक 

बच्चे जब सेवादल में सेवा करने जा  रहे होते हैं तो कई बार उलझन में पड़ जाते हैं कि होम वर्क भी करना है और सेवा का समय भी यही है |

सेवा भी करनी है और होमवर्क भी |दोनों के साथ तालमेल कैसे बिठाया   जाए ?

सवाल पैदा होता है कि-पहल किसे दें ?मेरे सामने जब भी यह प्रश्न बच्चों ने रखा तो समाधान यही सूझा कि-यदि मन में कोई द्वंद्व है तो सबसे पहले उसे छोड़कर एकतरफ हो जाओ |

यह याद रखो-यदि तुम सेवा में नहीं गए तब भी यह सतगुरु तुम्हें कोई श्राप नहीं देंगे क्यूंकि श्राप देना इनका स्वभाव नहीं है |

हालांकि यह भी सच है कि आशीर्वाद भी हमेशा नहीं मिलता लेकिन श्राप तो कभी भी नहीं मिलता इसलिए डरो मत |यदि सेवा में जा रहे हो तो उस समय होम वर्क भूल जाना क्यूंकि यदि ध्यान होमवर्क में ही लगा रहा तो फिर सेवा में जाकर  भी सेवा हो नहीं पाएगी |

यदि होमवर्क करने का ध्यान हो तो फिर वही करो |यह समझ लो कि इस समय यही सेवा है |पश्चाताप के भाव से नहीं बल्कि मन के चाव के साथ ,अपराधबोध से बिलकुल मुक्त होकर होमवर्क करो |

हालांकि मेरा अनुभव तो बिलकुल हटकर है |हमारे विद्यार्थी जीवन में होमवर्क का इतना भार नहीं रहता था और माता-पिता भी इतने महत्वाकांक्षी नहीं होते थे इसलिए हमें जब भी मौका मिला ,तबियत से सेवा की और मालिक ने भी हमारे लिए कोई कमी नहीं छोड़ी लेकिन मन में गुरु पर मजबूत यकीन होना चाहिए |

यदि भरोसा पक्का हो तो यह निरंकार हमारा सेवादार बनकर काम करता है लेकिन अगर दो नावों पर पैर है तो फिर पार नहीं हो सकते, डूबना तय है  इसलिए किसी उलझन में मत रहो |चलने का काम इंसान का है,पहुंचाने का काम परमात्मा का है |

परमात्मा का एहसास रहे कि यह हमारे बाहर-भीतर की  सच्चाई जानता है और यह सर्व-व्यापक व्यापक तथा सर्व-शक्तिमान है तो फिर जीवन का मार्ग सही होगा-फिर हमारी सफलता निश्चित है| 

हमारे कर्म ही हमें सौभाग्यवान् या इसके विपरीत बनाते हैं इसलिए सही कर्म करना सही दिशा में चलना है| 

सेवा -सुमिरन-सत्संग का रास्ता ऐसा रास्ता है  जो हमारे लोक को सुखी और परलोक को सुहेला करता है | सिर्फ यही है  जो आत्मा की  मुक्ति की  गारंटी सुनिश्चित करता है इसलिए आनंद से सेवा-सुमिरन सत्संग करो ,उलझनों का बोझ सर से उतार फेंको |निरंकार समर्थ है और हम जब इसका आधार ले लेते हैं तो हम भी समर्थ हो जाते हैं |

 

निरंकार अपने सन्देश के लिए

किसी भी मुख का इस्तेमाल कर सकता है

रामकुमार सेवक

एक बार सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज दूरदेशों की कल्याण यात्रा से वापस आने वाले थे |बाबा जी जिस समय वापस आने को होते थे पूरी निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों से आये महापुरुषों से भर जाती थी |हम सब में तब एक प्रकार का उत्साह हावी हो जाता था |बाबा जी का आगमन प्रायः रात के बारह बजे के आस-पास होता था लेकिन कॉलोनी में दस बजे के आस-पास ही सुखद परिवर्तन नज़र आने शुरू हो जाते थे |हम सबको लगता था जैसे हम सब बाबा जी के अपने हैं और बाबा जी हमारे अपने हैं |यह एहसास ही हमें अनूठे हर्ष से भर देता था |

ऐसे ही एक अवसर पर किसी महात्मा ने मुझसे कहा-सेवक जी,कल ,बाबा जी के स्वागत में कविता तैयार रखना |वे चूंकि कभी गंभीर नहीं होते थे इसलिए मैंने सुनी-अनसुनी कर दी |

बाबा जी के आगमन से पहले कवि सभा के हमारे अधिकारी महात्मा ने भी यह बात कह दी तो मुझे लगा कि कविता लिखनी चाहिए |अगले दिन शाम को स्वागत समारोह होना था |मैंने ईमानदारी से कविता लिखने की कोशिश की लेकिन कविता का विषय स्वागत की बजाय अफगानिस्तान -अमेरिका युद्ध पर केंद्रित हो जाता था |

कविता प्रस्तुति का यह सुनहरा अवसर था लेकिन मैं कुछ लिख ही नहीं पा रहा था |अपनी तरफ से मैंने कविता लिखने की पूरी कोशिश की लेकिन बात कुछ बन नहीं पा रही थी |बहरहाल शाम के पांच बज गए |मैंने मन ही मन मालिक से अरदास की कि मुझे जो आदेश मिले हैं यदि उनका पालन हो सके तो कृपा हो जायेगी |

उन दिनों पत्रिका विभाग का दफ्तर अस्थायी रूप से सन्त निवास में था |मैं उसमें जाकर बैठ गया और बिलकुल नयी कविता लिखी गयी -

करने स्वागत तुम्हारा ,उमड़ा संसार सारा

पर मैं अकिंचन -सोचता ही रह गया-कि-क्या भेंट करूँ स्वागत में तुम्हें ?

क्या पुष्प?

जो सुबह खिलते और शाम को मुरझा जाते हैं

आखिर में निष्कर्ष निकला-

जैसे कल रात आप दिल्ली पधारे

जाओ,जम जाओ ,बस जाओ -दिल में हमारे

ताकि-उस दिल को भेंट कर सकें,आपके स्वागत में |

उस कविता का  संगतों ने भरपूर स्वागत किया और मुझे भी भरपूर मज़ा आया जबकि वह कविता उस अरदास का परिणाम थी जो कुछ घंटे पहले सन्त निवास में की गयी थी |

आज भी मुझे उस महात्मा की कही बात ऐसे याद है जैसे यह कल की ही बात हो और जिसे मैंने दूसरे कान से बाहर निकाल दिया था लेकिन जो पूरी होकर रही | साथ ही यह भी स्पष्ट हो गया कि निरंकार अपना आदेश देने के लिए किसी भी मुख का इस्तेमाल कर सकता है इसलिए बात को गंभीरता से सुनना चाहिए जैसा कि इस घटनाक्रम में हुआ |   

 

 

इतिहास हमारा मूल्यांकन इस बात से करेगा-----

रामकुमार सेवक 

 निरंकारी मिशन के इतिहास में  दो किताबें काफी काफी खास रही हैं -युगपुरुष और शिवशक्ति |एक किताब मेरी आवाज़ भी  थी |पहली दो पुस्तकें पुराने शायर और लेखक पूर्ण प्रकाश साक़ी साहब की कलम से निकलीं | मेरी आवाज़ बाबा गुरबचन सिंह जी के नाम से छपी थी जिसका संकलन संपादन साक़ी साहब ने किया था | इन तीनो ही और उस समय की सन्त निरंकारी पत्रिका के अंक  भी पढ़ने का मौका मिला |

बाबा अवतार सिंह जी का विज़न काफी साफ़ था,साथ ही बाबा बूटा सिंह जी के प्रति उनकी निष्ठा बहुत गहरी थी |बाबा गुरबचन सिंह जी ने बहुत मेहनत से उसी विज़न को अपनाने का यत्न किया |

13  अप्रैल 1978  आज भी याद आता है |तब मैं 10 वी कक्षा में पढता था |उस कांड ने ही मुझे प्रेरित किया कि मिशन के यथार्थ को लिखूं और यह सिलसिला  जारी है | अमृतसर कांड के उन दिनों में मिशन के बारे में भ्रमित करने   के सिलसिलेवार प्रयत्न किये गए लेकिन बाबा जी अपने मार्ग पर डटे रहे |साध संगत भी करते रहे और समागम भी |धीरे -धीरे भ्रमो की धुंध हटी और बाबा जी के सबल नेतृत्व  में मिशन सुर्खरू होकर उभरा |बाबा जी मिशन को विश्व स्तर पर भी ले गए लेकिन बाबा जी के विज़न को समझने वाले बहुत कम निकले |

बाबा हरदेव सिंह जी भी उसी विज़न को समझाते रहे |बहुत मेहनत से उन्होंने निरंकारी मिशन को अध्यात्म में ही सीमित रखा लेकिन बाबा गुरबचन  सिंह जी को बाहर के विरोधियों ने निबटाया और बाबा हरदेव सिंह जी को भीतर के |

बाबा गुरबचन सिंह जी के अंतिम वर्षों में हम अपनी संगतों में यह गीत गाया करते थे-सदा से ये किस्सा पुराना रहा है,हकीकत का  दुश्मन ज़माना रहा है |

सबसे बड़ा सवाल यह है कि सतगुरु के विज़न को कैसे बचाया जाए ?बाहर के दुश्मनो से निबटना आसान है लेकिन भीतर के विरोधियों से कैसे निबटा जाए ?गुम चोट का इलाज कैसे करें ?

  अप्रैल और मई के महीने क्या इतिहास को दोहराने के माध्यम ही सिद्ध होंगे या कुछ जागरूकता के प्रमाण भी देखने को मिलेंगे ?विगत 31 मार्च को ग्राउंड न, 8(दिल्ली ) में सत्संग हो रहा था |पूज्य माता जी अपने प्रवचन शुरू ही करने वाली थी कि सामने से मंडल की बस स्टार्ट हो गयी |बस की आवाज़ माता जी आवाज़ पर भारी पड़ गयी |क्या इतनी जल्दबाजी ठीक है कि उनके प्रवचन ही दब जाएँ जिन्हें हम गुरु मानते हैं ?  यह एक बड़ा प्रश्न है क्यूंकि इतिहास हमारा मूल्यांकन इस बात से करेगा कि कर्म के स्तर पर गुरु का स्थान हमारे जीवन में कहाँ है ?  (08/04/2018)

 

कविता कहाँ से आती है ? 

रामकुमार सेवक 

प्रसिद्द अभिनेता ,सन्त-विचारक और गुरुभक्त विवेक शौक़ जी के पिता प्रसिद्द लेखक ,कवि तथा गुरुभक्त महात्मा धर्म सिंह जी शौक़ कहा करते थे कि-

गैब से आते हैं ख्याल तो आने दे शौक़ ,

तेरा क्या जाता है,उन्हें लिख लेने के सिवा |

गैब का शाब्दिक अर्थ समझने के लिए ज़रा गहरे उतरना होगा |निराकार के करीब होना होगा |

नये कवि शौक़ साहब के इस अनुभव का लाभ ले सकते है जैसा मैंने लिया |  

कभी बेदिल सरहदी साहब(उर्दू के प्रसिद्द शायर और सन्त निरंकारी के पूर्व संपादक ) ने शौक़ साहब के बारे में मुझे यह जानकारी दी थी |कवियों के लिए यह मील पत्थर जैसी बात है | 

कहने  का भाव कि  ख्याल गैब में से आते हैं |गैब अर्थात जिसे हम स्थूल आँखों से नहीं देख पाते |गैबी ताक़तों का अर्थ है-अदृश्य ताक़तें |

गैब के और करीब जाएँ तो कोई भी गंध इसके अंतर्गत आती है ,जैसे  खुशबू या बदबू है|सांस के साथ जिसे ले रहे हैं ,ऑक्सीजन है या सांस के साथ जिसे बाहर छोड़ रहे हैं , कार्बन डाइ ऑक्साइड है |ये सब चीजें हमें स्थूल आँखों से दिखाई नहीं देतीं |निराकार प्रभु भी स्थूल आँखों से दिखाई नहीं देता |

प्रश्न यह है कि इनमें से किसे गैब माने और किसे नहीं माने ?भूत ,पिशाच,जिन्न ,फ़रिश्ते ,शैतान आदि भी गैब में ही हैं |

शौक़ साहब यदि शरीर में होते तो उनसे इस सम्बन्ध में ज्यादा पूछता |उनके कुछ दोस्त थे-निर्मल जोशी जी,मान सिंह जी मान ,पूर्ण प्रकाश साक़ी जी ,अलमस्त जी ,शास्त्री जी आदि भी अब शरीर में नहीं हैं |आज महसूस हो रहा है कि किस-किस को हमने खोया है ?

बहरहाल प्रश्न गैब का है कि शौक़ साहब ने गैब किसे कहा है ,जिसमें से कविता उतरती है ?

हम देखते हैं कि कवि को ख्याल ठोस ,द्रव या गैस अर्थात पदार्थों से नहीं मिलते |भूत ,पिशाच ,जिन्न आदि से भी नहीं मिलते |इन सबके बीच यह निराकार प्रभु ऐसे ही सर्वत्र समाया हुआ है जैसे दूध में घी |

यही है जो वायुमंडल में फैली गैसों में से ऑक्सीजन को अलग करता है ताकि हम सांस के द्वारा उसे भीतर ले सकें |हम भीतर से कार्बन डाइ ऑक्साइड छोड़ते हैं मगर यह मालिक दोनों गैसों को आपस में मिलने नहीं देता अन्यथा हम जी भी न सकें |यह दोनों गैसों को अपने आप अलग-अलग कर देता है ,अपनी बनायीं प्रकृति द्वारा |

इसी को शौक़ साहब ने गैब कहा है,इसी का एहसास हर पल रहना चाहिए तब हम स्वयं को कविता को महसूस करने के लिए तैयार पाएंगे |          

ये सतगुरु के भेजे हुए हैं 

रामकुमार सेवक 

संभवतः 2010 की बात है |दिवाली का त्यौहार और वार्षिक सन्त समागम आस पास ही थे |वे दिन मेरे लिए  सबसे ज्यादा व्यस्त हुआ करते थे |प्रदर्शनी से आकर घर में बैठा ही था कि घर  की घंटी बजी |द्वार खोला तो दो महात्मा भीतर आये |दोनों बिलकुल अपरिचित लेकिन दोनों ऐसे मिले जैसे वर्षों के मित्र हों |

हमने बात शुरू की |

भीतर रसोई में भी सक्रियता शुरू हो गयी |पत्नी ने पूछा -कौन महात्मा हैं ?मैंने कहा-मैं इन्हें जानता नहीं |

मेरे साथ ऐसा बहुत होता है कि महात्मा बहुत प्रेम से मिलते हैं और मैं भी उनसे बहुत प्रेम से मिलता हूँ  लेकिन उनके बारे में मुझे रत्ती भर भी ज्ञान नहीं होता |

इतवार की संगत में भी बहुत से महापुरुष ऐसे मिलते है जिनके बारे में मैं बिलकुल अनभिज्ञ होता हूँ |पत्नी इस बारे में अक्सर मज़ाक में कहती है कि मिल तो ऐसे रहे थे जैसे चाचा के लड़के हों |इसका मेरे पास एक ही जवाब होता है कि-महात्मा इतने प्रेम से मिलते हैं और मैं उनसे नाम-गांव पूछूं तो सोचो,उन्हें कितना बुरा लगेगा ?बुरा चाहे न भी लगे क्यूंकि महात्मा उदारमना होते हैं लेकिन मेरी हिम्मत नहीं होती कि पूछ सकूं |

आज भी ऐसा ही मामला था -मैंने कहा-यह पक्की बात है कि आपने इन्हें नहीं बुलाया और मैंने भी इन्हें आमंत्रित नहीं किया |इसका मतलब है कि ये निराकार रूप में जो सतगुरु है,उसके भेजे हुए हैं और इनका स्वागत उसी मर्यादा से होना चाहिए |

पत्नी ने कोई तर्क नहीं दिया और भावपूर्ण स्वागत किया |अब मैं उन्हें अच्छी तरह जानता हूँ और यदा-कदा उनका फोन भी आ जाता है |समागम पर जब भी वे दिल्ली आते हैं तो मिलने जरूर आते हैं |मुझे लगता है कि ऐसे महात्माओं के आशीर्वाद  से ही जीवन सुखपूर्वक चल रहा है इसलिए सहज ही धन्यवाद का भाव ह्रदय से निकलता है |          

व्यक्ति का पलड़ा भारी है या सिद्धांतों का ?

रामकुमार सेवक

कोई भी सन्त-सतगुरु अथवा विचारक कभी भी अपनी पूजा करवाने की बात नहीं कहता मगर लोग उनकी बात मानने की बजाय उनकी जय-जयकार में लग जाते हैं फलतः व्यक्तिवाद का पलड़ा भारी हो जाता है |  

   व्यक्तिवाद यदि लाभदायक अथवा उपयोगी हो सकता है तो तभी जबकि व्यक्ति निष्कलंक हो |आकार में विकार अवश्यम्भावी हैं इसलिए व्यक्ति में दोष प्राय होते ही हैं इसलिए शत-प्रतिशत दोषमुक्त इंसान मिलना यदि असम्भव नहीं तो कठिन तो अवश्य ही है इसलिए दार्शनिक -विद्वान्   और विवेकीजन व्यक्ति की बजाय सिद्धांत  को ही महत्ता देते हैं |

आज सुबह एक वयोवृद्ध मित्र का फ़ोन आया |मित्र ब्रह्मज्ञानी हैं और अपने इलाके में गुरु जैसा सम्मान पाते हैं | उनके पोते की शादी होने वाली थी  |मैंने उनसे कहा कि कार्ड के साथ जो आपने इतना महँगा ड्राई फ्रूट का डिब्बा भेजा ,इतना खर्चा करने की क्या ज़रुरत थी |दरअसल मेरे दिमाग में निरंकारी बाबा गुरबचन सिंह जी की वो बात घूम रही थी जिसमे उन्होंने विवाहो में सादगी अपनाने और फिजूलखर्ची से बचने का आदेश दिया था और ये मित्र बाबा गुरबचन सिंह जी से बहुत घनिष्ठ थे |बाबा जी से उनके दोस्तों जैसे सम्बन्ध थे |इसके बावजूद उन्होंने मुझे ऐसे तर्क दिए कि स्पष्ट हो गया कि पूरा खेल अपने अहंकार को ऊंचा करने का है |

   भगवान् एक है |सब मनुष्य इसकी संताने हैं |भगवान् इस सृष्टि के कण-कण में विद्यमान हैं |इस परमेश्वर को जानकर ही इसकी उपासना सबको करनी चाहिए|मानव मात्र की सेवा ही भगवान् की सच्ची  सेवा है  -ये कुछ सिद्धांत हैं जो हम बचपन से ही सुनते आये हैं |इन सिद्धांतो में वैर-द्वेष आदि करने की  कोई गुंजाइश नहीं है |

    इन सिद्धांतो की इतनी ज्यादा महता है कि लगभग हर धर्म और सम्प्रदाय इनका प्रचार-प्रसार करता है| इसके बावजूद देखा जाता है कि प्राय धार्मिक लोग ही सबसे ज्यादा  वैर -द्वेष- हिंसा आदि से ग्रस्त हैं |ऊपर से चिन्ह बेशक शान्ति के होंगे लेकिन भीतर कहीं न कहीं ऐसा भाव मौजूद है कि  फलां धर्मस्थान की ऊंचाई हमारे धर्मस्थान से ज्यादा क्यों है ?या उनका प्रभाव हमसे ज्यादा क्यों हो गया ?यह स्पष्ट होता है -धर्म के नाम पर विभिन्न प्रकार की  बहस-मतभेद,बढे हुए अहंकार और हिंसा आदि की खबरो से | सिर्फ झंडो की ऊंचाई को लेकर धार्मिक लोगो का आपस में झगड़ पड़ना आम बात  है जबकि -

दया धर्म का मूल है |महात्मा कहते हैं कि- सत्य,करुणा और अहिंसा धर्म की बुनियाद है और इस बुनियाद पर उल्फत का घर आबाद है |निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे कि-धर्म का काम जोड़ना है,तोडना नहीं | 

इस तरह के सत्य और स्पष्ट सिद्धांतो के बावजूद धार्मिक लोगो की असहनशीलता और वैर लोगो को नास्तिकता की ओर बढ़ने को प्रेरित करते हैं |ऐसी परम्पराओं का आध्यात्मिकता में कुछ भी स्थान नहीं है | 

  मैंने उनसे बहस नहीं की क्यूंकि बाबा गुरबचन सिंह जी के उन क्रांतिकारी विचारो का दिल से समर्थन  संभवतः एक भी धनवान आदमी नहीं करेगा |क्यूंकि जिसके पास साधनो के अम्बार हैं उनमें से लगभग हर कोई अपनी शान-ओ-शोकत के सामने दूसरे को नीचा दिखाना चाहता है |यह एक शक्तिशाली परम्परा है और यह कभी रुकी नहीं है |ये संपन्न लोग महसूस करते हैं कि समय का तकाज़ा है कि दर्पण को ढककर एक कोने में रख दिया जाए |

बेशक लगभग तीन सप्ताह  बाद बाबा गुरबचन सिंह के महान बलिदान  की याद  में बड़े-बड़े  कार्यक्रम होने वाले हैं लेकिन मुझे लगता है कि आज कोई भी उनके सिद्धांतो और विचारो को मानना नहीं चाहेगा क्यूंकि उनमें अहंकार को तुष्ट करने की गुंजाइश नहीं है |इसका मतलब साफ़ है कि सिद्धांत कभी भी अपनाने के लिए नहीं चर्चा पाते बल्कि किसी धर्म या सम्प्रदाय विशेष के प्रचार -प्रसार के लिए चर्चा पाते हैं |

यदि सचमुच सिद्धांतो का दिल से सम्मान  होता तो हर धर्म एक निर्मल सरोवर का रूप बनकर सबकी प्यास बुझा रहा होता लेकिन ऐसा बिलकुल ही नहीं है |आज तो धर्म भी नेताओं के हाथों की कठपुतली बनकर रह गया है | धर्म के बारे में  यह आम धारणा है कि वहाँ सफ़ेद परदे के पीछे सारे काले काम किये जाते हैं |संभवतः  ऐसे ही खतरे को भापते हुए बाबा हरदेव सिंह जी ने स्पष्ट कहा था कि जो मिशन में अपनी महत्तवाकांक्षा पूरी करने के लिए यहाँ की पवित्रता को हानि पहुंचा रहे हैं बेहतर है कि वे उन पार्टियो-संस्थाओ का साथ पकड़ लें जो कि  इसी काम के लिए स्थापित हैं | यहाँ की पवित्रता भंग न करें | 

लेकिन स्थिति संतोषजनक नहीं है |महान बलिदानो के पीछे जो सिद्धांत रहे हैं उन्हें भूलने की कोशिश की जा रही है |माता सविंदर जी अपनी जिम्मेदारी निभाने में पूरी शक्ति से लगी हुई हैं लेकिन सिद्धांतों की चर्चा उनके प्रवचनों के अलावा बहुत कम सुनने को मिलती है ,यही विडंबना है |

आखिर मुझे महान उर्दू शायर निदा फ़ाज़ली साहब की ये  पंक्तियाँ साकार होती नज़र आ रही हैं-

अब तक जो होता आया है -वो ही होना है ,

जीवन क्या है चलता -फिरता एक खिलोना है |

 

सिर्फ आदेश को आगे सुना देना ही काफी नहीं है 

रामकुमार सेवक 

बाबा हरदेव सिंह जी का समझाने का तरीका अनूठा था |हर पैगम्बर की तरह उनका भी वही दर्द था कि लोग उनका सम्मान करते थे ,उनके प्रवचन भी सुनते थे लेकिन उस तरह सुनते थे जैसे उसे सुनना एक धार्मिक अनिवार्यता हो |इस दर्द को बाबा जी ने अनेक बार प्रकट किया |एक प्रवचन में उन्होंने कहा कि-कहा जाता है-पानी लाओ |वो आदेश को दूसरे को सुना देता है |दूसरा ,तीसरे को और तीसरा उससे आगे वाले को |बाबा जी ने कहा-कोई पानी लेकर भी तो आये |पानी मिलेगा तो ही प्यास बुझने की संभावना बनेगी अन्यथा पानी का ज़िक्र तो प्यास बुझा नहीं पायेगा |

यही सच्चाई भी है कि  दवा का ज्ञान होना एक बात है लेकिन रोग का दूर होना इस बात पर निर्भर करता है कि सिर्फ दवा के ज्ञान पर ही नहीं रुक गए बल्कि नियम के अनुसार दवा खाई भी है |इसी प्रकार सतगुरु के प्रवचन सुनना एक बात है लेकिन भक्ति का आनंद वही ले पाते हैं जो सिर्फ सुनते नहीं बल्कि उनका मर्म भी समझते हैं और उन्हें अपने व्यवहार का अंग भी बनाते हैं ,ऐसे शिष्य ही सही मंज़िल पर पहुँचते हैं और मुक्ति पद भी पाते हैं |

यह भी ध्यान रहना चाहिए कि गुरु का स्वभाव चूंकि परोपकार का है इसीलिए वे इतनी मेहनत से हमें बचने की प्रेरणा देते हैं अन्यथा हमारे मानने से उन्हें फर्क नहीं पड़ता ,लाभ हमारा अपना ही है |     

    

-------शायद इसीलिए सतगुरु को गरीबनवाज़ कहा जाता है |

रामकुमार सेवक 

सन्त निरंकारी (अंग्रेजी )के पूर्व संपादक जोगिन्दर सिंह जी ने एक बार बताया कि संभवतः रात का समय था ,मैं किंग्सवे कैंप चौक पर निरंकारी कॉलोनी (दिल्ली )जाने वाले वाहन की प्रतीक्षा कर रहा था |उधर से एक चने बेचने वाला आवाज़ लगाकर भुने चने के छोटे -छोटे पैकेट बेच रहा था |

शायद मौसम भी सर्दी का था |मुझे न जाने क्या सूझा कि चने का एक छोटा सा पैकेट खरीद लिया |सोचा कि-बाबा जी को समर्पित कर दूंगा जब उन्हें नमस्कार करूंगा |

मेरे ख्याल से यह सत्तर के दशक की बात रही होगी क्यूंकि उन्होंने बाबा गुरबचन सिंह जी का जिक्र किया था |उस समय मिशन में साधन तो चाहे कम थे लेकिन प्रेम व् आपसी लगाव बहुत ज्यादा था |बाबा गुरबचन सिंह जी की कुछ व्यक्तिगत विशेषताएं भी थीं |उन्होंने गरीबों की मुश्किलों को काफी करीब से देखा था इसलिए सबसे सहज ही घुल-मिल जाते थे |

जोगिन्दर सिंह जी जब बाबा जी को नमस्कार करने गए और छोटा सा वो पैकेट आगे बढ़ाया तो बाबा जी ने पूछ लिया -इस पैकेट में क्या है ?

जोगिन्दर सिंह जी ने कहा-बाबा जी भुने हुए चने हैं |बाबा जी ने हँसते हुए चने निकाले और कहा-बहुत दिनों से चने खाये नहीं ,इस प्रकार भक्त की श्रद्धा को भरपूर सम्मान दिया |

जोगिन्दर सिंह जी ने कृतज्ञता और विनम्र भाव से कहा-बाबा जी मैं तो कभी कुछ लेकर आता नहीं हूँ |आज चने वाला आवाज़ लगाकर बेच रहा था इसलिए लेने का ध्यान आ गया |आप तो दयालु हैं जो छोटी सी चीज को भी कृपापूर्वक स्वीकार कर लेते है |

बाबा जी ने चने खाने शुरू कर दिए और साथ खड़े महापुरुषों को भी दिए |भक्त की मन की स्थिति कितनी विनीत भाव में रही होगी,आप भली भाँति महसूस कर सकते हैं |साथ ही गुरु की कृपा भी दिल को प्रेमविभोर कर देती है |

आजतक मैं उस प्रेम की गर्माहट अपने ह्रदय में महसूस करता रहता हूँ ,धन्यवाद सतगुरु |      

अवतार बाणी में तो यह लिखा है....

रामकुमार सेवक  

महान ग्रंथों में वर्णित तथ्यों की अपनी महत्ता है |गुरसिखों अर्थात गुरु के शिष्यों की विशेषता बताते हुए युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी ने लिखा है-

गल अपणी दा पहरा देंदे,जो वी बोलण चालण वो |

मुझे यह पंक्ति वर्षों पहले अचानक ही याद आ गयी -वास्तव में मेरा टेपरिकॉर्डर ख़राब था और उसे मरम्मत के लिए मैकेनिक को दे रखा था | मैकेनिक संगत में नियमित रूप से आने वाले महात्मा थे लेकिन वे रोज अगले दिन का वादा कर देते थे और टेप रिकॉर्डर की मरम्मत नहीं हो पा रही थी |रोज-रोज कहने में शर्म भी आती थी लेकिन इसके अलावा कोई विकल्प न था |

एक दिन मैंने उनसे कहा-अवतार बाणी में तो लिखा है- 

गल अपणी दा पहरा देंदे,जो वी बोलण चालण वो | 

 इसके अलावा मैंने उनसे कुछ न कहा |वे बोले-आज शाम को आप टेपरिकॉर्डर ले लेना |

मेरी ख़ुशी की सीमा न रही जबकि शाम को उन्होंने टेपरिकॉर्डर ठीक करके दे दिया |

मैंने मन ही मन उस मैकेनिक महात्मा को तो धन्यवाद दिया ही ,साथ ही बाबा अवतार सिंह जी के प्रति भी कृतज्ञ हुआ जिनकी अमर वाणी ने मेरी समस्या हल कर दी |निश्चय ही बाबा अवतार सिंह जी ने यह बात मानव जीवन का स्तर सुधारने के लिए लिखी थी लेकिन उनकी पंक्ति आपसी व्यापारिक कार्य व्यवहार में भी सहायक हो गयी |

कहने का भाव कि गुरसिख जो बोलते हैं ज़िम्मेदारी के साथ बोलते हैं और कहे गए शब्दों या वचनो को याद रखते हैं अर्थात उन्हें निभाते हैं |सत्य वचन का अर्थ है-अपनी बात का पहरा देना|

यह साधारण सी बात इंसान को बहुत ऊंचा उठाती है क्यूंकि हम जो बोलते हैं उससे हमारी बाहरी छवि निर्मित होती है और हमारे वचन जब सत्य सिद्ध होते हैं तो यही बात छवि से ऊपर उठकर हमारे जीवन का निर्माण करती है |

मज़े की बात यह है कि इसमें यह नहीं कहा गया कि इंसान मधुर बोले क्यूंकि मधुर बोलना हर इंसान के वश की बात नहीं है क्यूंकि वाणी का पूरा उपयोग हर कोई नहीं जानता और हर एक के हालात पर्याप्त भिन्न होते  है | लेकिन सत्य बोलना हर इंसान के वश की बात है |सत्य बोलना इसलिए आसान है क्यूंकि उसे याद रखने की ज़रुरत नहीं पड़ती ,वह स्वतः ही याद रहता है इसके विपरीत बोला गया झूठ  किसी की पकड़ में ना आ जाए इसलिए उसे याद रखना ज़रूरी है अन्यथा पोल खुल सकती है |

झूठ बोलना कभी भी सहज नहीं होता लेकिन सत्य बोलना हमेशा सरल है |     

आजकल जबकि वचन अपनी गरिमा खो रहे हैं ,यह पंक्ति बहुत ही महत्वपूर्ण लगती है क्यूंकि इंसान आदतन बोलता रहता है |बोलकर उसे याद भी नहीं रहता कि कितने प्रतिशत झूठ बोला या और उस झूठ बोलने के पीछे उसकी मंशा क्या थी ?

यह बात बोले गए शब्दों की महत्ता कम करती है अर्थात शब्दों में जान नहीं रहती |ऐसी स्थिति में  इंसान जो कुछ बोलता है,अक्सर उसकी बात का बिलकुल भी यकीन नहीं होता क्यूंकि उसके कर्म उसकी बातों से मेल नहीं खाते| अक्सर बोलों के आधार पर जो वीर सिद्ध होते हैं,व्यवहार के दर्पण में उसके विपरीत नज़र आते हैं |उनके साथ हुए व्यावहारिक  अनुभवों से हम उनके कथन की निरर्थकता को भली भाँति महसूस करते हैं |

ऐसे दिखावटी वातावरण में हम बाबा अवतार सिंह जी की मंशा का अनुमान लगाते हैं कि गुरसिखों से उनकी आशाएं कितनी पवित्र थीं |

सन्तों-महात्माओं के वचन इसी प्रकार दुनियावी समस्याओं को हल करने में हमारी सहायता करते हैं,बशर्ते उनके प्रति हमारी सच्ची निष्ठां हो |

स्पष्ट हो गया कि महान ग्रंथों में लिखी बातें वहां तक प्रभावी हो सकती हैं,जहाँ तक हमने सोचा भी नहीं होता |           

ब्रह्मज्ञान जीव को मिला है या आत्मा को मिला है ?

रामकुमार सेवक 

 

लगभग बीस साल पुरानी बात है |रोज की तरह सन्त निरंकारी पत्रिका विभाग में लगभग सात बजे(शाम ) मैंने प्रवेश किया |सीट पर पहुंचकर देखा कि हरियाणा के एक गांव से पोस्ट कार्ड आया हुआ ,जिसमें लिखा हुआ था कि-आजकल हमारी संगत में चर्चा है कि ब्रह्मज्ञान किसको मिला है ,जीव को मिला है या आत्मा को मिला है ?

निश्चय ही ऐसा कोई पैमाना मेरे पास नहीं था कि ब्रह्मज्ञान वास्तव में किसे दिया गया है |

लेकिन प्रश्न रोचक था इसलिए सोचने की प्रक्रिया शुरू हो गयी |

जब ज्ञान प्रचारक महात्मा से ब्रह्मज्ञान प्राप्त करने की प्रक्रिया चल रही थी तो पूरा शरीर,पांच ज्ञानेन्द्रियाँ,पांच कर्मेन्द्रियाँ,मन,चित,बुद्धि ,अहंकार आदि सब कुछ तो मेरे पास ही था | फिर कैसे कहें कि-किसे ज्ञान मिला और किसे नहीं ?

मुल्ला की दौड़ मस्जिद तक ,मेरी दौड़ भी निरंकार तक थी |कोई सवाल ऐसा नहीं जो निरंकार के प्रभाव क्षेत्र से बाहर हो और यह अटल विराट निरंकार मेरा निकटतम है और मित्र भी है इस एहसास के बाद चिंता की गुंजाईश नहीं रहती |

सम्पूर्ण अवतार बाणी की इस पंक्ति ने समाधान तक पहुंचाया जिसमें युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी फरमाते हैं-मन-बुद्धि ते अक्लों बाहरे,तैनू लख प्रणाम करां ,इसका हिंदी अनुवाद ,जो कि मेरे ख्याल से जे.आर.डी.सत्यार्थी जी ने किया-है-मन-बुद्धि से परे है देखा कोटि-कोटि प्रणाम तुम्हें |

अर्थ स्पष्ट है कि मन-बुद्धि की क्षमता के अंतर्गत इसे देख पाना संभव नहीं है |इसका भाव है कि-मन और बुद्धि  में इतनी क्षमता नहीं है कि इस विराट को ग्रहण कर सके |

भाव यह भी है कि पांच ज्ञानेन्द्रियाँ,पांच कर्मेन्द्रियाँ ,मन-चित -बुद्धि -अहंकार तभी तक अस्तित्वमान दिखते हैं  जब तक शरीर में आत्मा है |आत्मा के शरीर छोड़ते ही शेष सब अप्रभावी हो जाते हैं इसलिए उन्हें मैंने लिखा कि अवतार बाणी कहती है -मन-बुद्धि से परे इस प्रकार यह स्पष्ट महसूस होता है कि ब्रह्मज्ञान आत्मा को हुआ है |

जिस प्रकार कैमरे से तस्वीर तब तक खींच सकते हैं जब तक उसमें रील है ,इसी प्रकार कोई भी शरीर तभी तक ब्रह्मज्ञान का पात्र है जब तक उसमें आत्मा सक्रिय है इससे सिद्ध होता है कि ब्रह्मज्ञान आत्मा को होता है |       

                 

आलोचना का सामना कैसे करें ?

रामकुमार सेवक 

सन्त निरंकारी प्रकाशन के पूर्व मुख्य संपादक निर्मल जोशी जी से एक बार किसी व्यक्ति ने पूछा -लोग आदतन किसी की भी आलोचना करते रहते हैं ,आजकल चलन ही ऐसा है |कोई किसी की भी आलोचना बेहिचक करने लगता है ,ऐसी स्थिति में बहुत क्रोध आता है,क्या करें ?

जोशी जी ने कहा कि लोग अक्सर आलोचना छिपकर करते हैं इसलिए इसकी चिंता क्या करनी है ?

लेकिन पता लगने पर गुस्सा आता है |आगंतुक ने कहा|

गुस्सा तो हमारे भीतर के अहंकार को प्रकट करता है इसलिए गुस्से से बचना बेहतर है ,जोशी जी बोले |आपके सामने भी ऐसी स्थिति आयी होगी ?आगंतुक ने पूछा |

कई बार ,जोशी जी ने कहा |

फिर आप ऐसी स्थिति में क्या करते हैं,आगंतुक ने पूछा |

जोशी जी ने कहा-पहले तो मैं आत्मनिरीक्षण करता हूँ कि वह दोष मेरे भीतर है या नहीं ?यदि वह दोष सचमुच मुझमें है तो मैं उसे दूर करने की कोशिश करता हूँ |इस अवस्था में मुझे आलोचक पर गुस्सा भी नहीं आता क्यूंकि उसकी आलोचना में सच्चाई थी |

और यदि आलोचना में सच्चाई न हो तो ,तब तो क्रोध आएगा ही ?आगंतुक बोला 

अगर उसकी बात झूठ है तो फिर उसकी क्या चिंता करनी बल्कि ख़ुशी होती है कि उसके बताये गए दोष से हम बचे हुए हैं ,जोशी जी ने हँसते-हँसते कहा |  

मेरा अनुभव तो कहता है कि आलोचक के सामने हमें संयत और मौन रहना जरूरी है अन्यथा नुकसान हो सकता है क्यूंकि क्रोध की स्थिति में बुद्धि सही काम नहीं करेगी और हम आलोचना का सामना उस कुशलता से नहीं कर पाएंगे |

अनेक बार तो यह भी होता है कि चालाक लोग हमें निराधार बातों से क्रोध दिलाकर हमसे वह सब कहलाने में सफल हो सकते हैं जो कि हमें नहीं कहना चाहिए | उस समय मौन हमारी बहुत मदद कर सकता है,बशर्ते हमें इसका अभ्यास हो अन्यथा महासागर में सिर्फ हीरे-मोती ही नहीं होते मगरमच्छ भी होते हैं इसलिए हमें अनुभवजनित बातों को रोज के व्यवहार का अंग बनाना चाहिए अन्यथा सिर्फ कुल्ला करते रहने से प्यास नहीं बुझा करती |    

सही अरदास

रामकुमार सेवक  

अरदास या प्रार्थना हमारे जीवन का अटूट अंग है |होता तो यह भी है कि हमारा सुमिरन भी प्रायः किसी न किसी मांग से जुड़ा होता है |कई बार वह मांग पूरी भी हो जाती है और कभी -कभी बार नहीं भी होती है लेकिन हमारी मांग प्रायः अपूर्ण होती है क्यूंकि हम प्रायः उसकी तह में नहीं जाते |एक माँ की तरह यह प्रभु हमारी मांग ,प्रार्थना या अरदास की पृष्ठभूमि भी जानता है और परिणाम भी |

मुझे एक रोचक प्रसंग ध्यान में आ रहा है जो कि अस्सी के दशक में सन्त निरंकारी पत्रिका में छपा था और कई वर्ष बाद मेरी इस सम्बन्ध में सन्त -साहित्यकार निर्मल जोशी जी से बात भी हुई थी ,|स्मृति के आधार पर साझा कर रहा हूँ |

पंजाब के किसी शहर की बात है |संभवतः गर्मी का मौसम था ,समय रात का था ,ग्यारह बजे के आस-पास का और तीन निरंकारी महात्माओं को किसी विवाह में अमृतसर जाना था इसलिए तीनो सड़क के किनारे खड़े वाहन की प्रतीक्षा कर रहे थे |

प्रतीक्षा का समय बहुत बोझिल होता है इसलिए बोझ को कम करने के लिए हम प्रायः आपस में वार्तालाप अथवा निरंकार से अरदास करने लगते हैं |वे महात्मा भी अरदास कर रहे थे कि-प्रभु कृपा करो,बस आ जाए |

अरदास का असर भी हुआ |बस तो आयी लेकिन रुके बिना चली गयी |

अब अरदास की -मालिक बस रुके तो सही |

थोड़ी देर बाद बस फिर आयी और रुक भी गयी लेकिन फिर नहीं चली |पता लगा कि बस यहीं तक की थी |अब अरदास की कि मालिक ऐसी बस भेजो जो रुकने के बाद चले भी |

मालिक की कृपा हुई ,बस आयी लेकिन भीड़ बहुत थी |बस तो रुकी लेकिन महात्मा उसमें चढ़ नहीं सके |

अब समर्पण कर दिया |अरदास की कि-मालिक हमें तो अमृतसर पहुंचना है,विवाह में ,आप कृपा करो,चाहे जैसे पहुंचा दो |

अब सड़क पर इक्का-दुक्का वाहन ही आ रहे थे |जैसे -जैसे रात बढ़ रही थी ,घबराहट भी बढ़ रही थी और इसी अनुपात में प्रभु का सुमिरन भी |

मालिक ने कृपा की ,एक कार आकर रुकी |उसने आवाज़ लगाई -अमृतसर,अमृतसर ---

कार चालक ने तीनो को बैठा लिया |उस समय के अनुसार बहुत वाज़िब पैसे लिये और अमृतसर पहुंचा दिया क्यूंकि उसने वहीं तक जाना था |उसका घर अमृतसर   में ही था |   

अपने पिताजी से कभी हाथ मिलाया है क्या ?

रामकुमार सेवक 

वार्षिक सन्त समागम के आस-पास की बात है,ग्राउंड न.2  में  भी सेवाएं चल रही थीं |मेरी सेवाएं पत्रिका विभाग,कवि सभा तथा प्रदर्शनी में थीं |जोर-शोर से सेवाएं चल रही थीं |प्रदर्शनी में बहुत सारे पेंटर्स,कारपेंटर्स,सेवादल के महात्मा और संगत के महात्मा  भी सेवारत थे |मेरा कार्य महात्मा सुधांशु जी के साथ था जो प्रतिष्ठित चित्रकार थे |

वे दिन भी कुछ अलग ही किस्म के थे |सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी का बहुत विकसित दौर था |बाबा जी का विजन बहुत बड़ा था |वे महापुरुषों को काफी छूट देते थे |संगत के महापुरुषों में उन्हें छूने की होड़ सी लग जाती थी और बाबा जी कृपापूर्वक सबसे हाथ मिला लेते थे |

मुझे यह कार्य कतई नापसंद था इसलिए मैं हमेशा बाबा जी के चरणों में ही ध्यान लगाता था या उनके चेहरे की दिव्यता को अपने मन में भरने की कोशिश करता था |

दिन के लगभग चार बजे थे |हम सबने बाबा जी को उनकी गाड़ी में नमस्कार की |वापस आये तो एक अति उत्साहित नौजवान को सामने पाया |वह कुछ ज्यादा ही खुश था क्योंकि बाबा जी से हाथ मिलाकर आया था |

मैं उन दिनों सन्त निरंकारी (हिंदी )का संपादक था और बहुत मुखर था |न जाने क्यों आज मेरा छिपा हुआ भाव जुबान पर आ गया ,मैंने उस नौजवान से कहा-क्या कभी अपने पिताजी से हाथ मिलाया है ?वह घबराकर बोला-जी नहीं |मैंने कहा- हाथ हमेशा बराबर वालों (दोस्तों आदि )से मिलाया जाता है |एक शिष्य को अधिकार ही नहीं है कि वह गुरु से हाथ मिलाये |

वह नौजवान शर्मिंदा सा हो गया और वहां से अपनी सेवा में चला गया |

हमारे पास जिस सेवादार की ड्यूटी थी मैंने उससे कहा-जब चाय आएगी तो इस महात्मा को बुलाकर लाना |

मैं सुधांशु जी से बोला-महात्मा जी,मैंने उस नौजवान के आनंद में बाधा डाल दी इसलिए उनसे माफी मांगनी चाहिए |

सुधांशु जी ने कहा-लेखक और संपादक के नाते आपकी ड्यूटी है कि आप सही बात लिखो या कहो |जब मालिक ने आपको क्षमता दी है तो आपको इस प्रकार की करेक्शन करनी ही चाहिए |किसी अन्य अख़बार या पत्रिका से हम यह उम्मीद नहीं कर सकते लेकिन आपको सही बात बतानी ही चाहिए इसमें कुछ भी गलत नहीं है |

थोड़ी देर में चाय आयी और उस महात्मा को मैंने बुला लिया और कोशिश की कि उनके मन में मेरे प्रति कोई असंतोष न रहे |क्षमा याचना भी की क्यूंकि गुरसिख से तो हिसाब साफ़ रखना जरूरी है अन्यथा उसने यदि कोई विपरीत कामना कर दी तो मुझे भुगतना ही पड़ेगा इसलिए क्षमा याचना जरूरी है |  

जीवन में जो ख़ुशी या दुःख के अवसर आते हैं वे ऐसी दुआओं या बद दुआओं के ही परिणाम होते हैं इसलिए गुरु से भी ज्यादा गुरसिखों से डरना पड़ता है |मालिक कृपा बनाये रखे |    

शिष्य गुरु के पद तक क्यों नहीं पहुँच पाता?

रामकुमार सेवक 

महात्मा कहते हैं-गुरु और पारस में बड़ो अन्तरो जान 

वो लोहा कंचन करे ,गुरु करे आप समान |

इसका अर्थ समझना कठिन नहीं है लेकिन मेरे जीवन में दो अवसर ऐसे आये हैं,जब हम पर गुरु की छत्रछाया नहीं थी |

पहला अवसर आया,24  अप्रैल 1980  को | 25 और 26 अप्रैल को हम पर सतगुरु की छत्रछाया नहीं थी |वर्ष 2016 में फिर ऐसा ही कठिन समय आया |उस समय सवाल आया कि क्या मुझमें गुरु की ताक़त है |भीतर से उत्तर मिला -नहीं |प्रश्न उभरा क्यों नहीं है ?क्या गुरु का आशीर्वाद हम सबको नहीं मिला ?

उत्तर आया-आशीर्वाद तो सबको दिया गया लेकिन गुरु की ताक़त किसी में नज़र नहीं आ रही ?

प्रश्न उभरा कि-ब्रह्मज्ञान यदि सबके पास है तो सबमें गुरु की शक्ति क्यों नहीं है ?क्या गुरु पारस नहीं था या दिक्कत हमारी तरफ से है ? 

आज सुबह बाबा हरदेव सिंह जी के प्रवचन (रिकॉर्डिंग )सुन रहा था -बाबा जी ने फ़रमाया कि-गुरु शिष्य को वही ज्ञान प्रदान करता है,जो उसे अपने गुरु से मिला है |यहाँ तक कि गुरु अपनी जगह भी दे देता है |गुरु के आसन पर भी शिष्य को बैठा दिया जाता है ,ऐसा आदेश दे दिया जाता है |उस आसन पर बैठने के बाद शिष्य का भी वैसा ही सत्कार होता है,जैसा गुरु का |सब उसे उसी प्रकार नमस्कार करते हैं फिर भी उसमें गुरु की ताक़त पैदा नहीं होती ,क्यों ?

बाबा जी ने कहा -गुरु को जब शिष्य नमस्कार करते हैं तो गुरु सोचता है कि ये मेरे सिर के ताज हैं |गुरु की भेद दृष्टि नहीं समदृष्टि होती है |वह किसी को छोटा-बड़ा ,अमीर-गरीब या ऊंच-नीच समझकर नहीं देखता बल्कि समझता है कि ये सब मेरे सिर के ताज हैं |

बाबा जी ने कहा-वही ज्ञान और आसन होने के बावजूद यदि भेद दृष्टि बानी रहती है तो फिर शिष्य वह ताक़त हासिल नहीं कर पाता जो गुरु में होती है |

ब्रह्मज्ञान तो कृपासाध्य है,गुरु की कृपा से यह हासिल हो जाता है लेकिन गुरु वाली दृष्टि गुरु वाली श्रवण शक्ति (सुनने की क्षमता) के लिए अर्थात भक्ति की उपलब्धि हासिल करने के लिए तो कोशिश भी चाहिए और मेहनत भी | श्रम के बिना यह संभव नहीं लगता | ब्रह्मज्ञान तो श्रमसाध्य है लेकिन पूर्ण भक्त होना तो श्रमसाध्य भी है |गुरु का काम दिशा दिखाना है,उसके अनुसार चलना तो पूर्णतः शिष्य का कर्तव्य है |          

क्या पहचान सचमुच हो गयी है ?

रामकुमार सेवक 

बुजुर्ग महात्मा श्री अमरीक सिंह जी ने 14-09-2014 को  निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में आयोजित सत्संग समारोह को सम्बोधित करते हुए बाबा अवतार सिंह जी व् निरंकारी राजमाता जी के संस्मरण सुनाये |सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी का एक प्रसंग सुनाते हुए उन्होंने कहा कि-

      दास की किताब पहचान पर कृपासागर जी के साथ काम चल रहा था |अचानक कमरे में बाबा जी ने चरण डाले |कागजो पर नज़र डालकर कहा कि  -क्या पहचान हो गयी है ?सुनकर हम सोचने लगे कि क्या पहचान सचमुच हो गयी है ?

       एक बार मन कुछ भटक सा रहा था -आदरणीय शौक़ साहब से कहा तो वे बोले कि क्या किसी के सामने ज्ञान खोला है ?अमरीक सिंह जी ने  कहा कि मेरे मामा  जी ने पूछा था तो मैंने इशारा बता दिया | मगर मन तभी से भटक रहा है |शौक़ साहब ने  कहा कि दिल्ली जाकर बाबा जी से सब बता देना |दास ने दिल्ली आकर बाबा अवतार सिंह जी से मन भटकने की बात कही |बाबा जी ने कहा कि मन तो -आपके भीतर उठने वाले विचारो का नाम है |अब यह बताईये कि मन जहाँ भटकता है वहां निरंकार है या नहीं ?अमरीक सिंह जी ने  बताया  कि निरंकार तो सब जगह है |बाबा जी ने कहा कि सुमिरन करते हो ?अमरीक सिंह जी ने  कहा कि - नहीं |बाबा जी ने कहा कि सुमिरन करो मन ठीक रहेगा |         

जब कोई शिष्य गुरु से अपने मनमाफिक आदेश ले लेता है 

रामकुमार सेवक 

सत्तर के दशक के महाराष्ट्र के वार्षिक सन्त समागम के आस-पास की बात है |वह युग बाबा गुरबचन सिंह जी का था |बाबा गुरबचन सिंह जी ने निरंकारी मिशन को व्यापक रूप दिया,गांव-गांव में संगठन स्थापित कीं |बाबा जी मानते थे कि भारत गांवों में बस्ता है ,इसलिए निरंकारी मिशन को गांव-गांव तक ले जाना है |उनकी छोटी सी टीम थी ,जो अलग -अलग प्रकार के काम करती थी |मंच सञ्चालन और वक्ता के रूप में जे.आर.डी.सत्यार्थी जी थे |ड्राइवर और फोटोग्राफर आदि की सेवा उस्ताद मान सिंह जी (मिस्त्री )की थी |गीतकार और निजी सेवादार थे-हरिमोहन शर्मा जी और निरंकारी राजमाता जी |यह चार सेवादारों की टीम कहीं भी मिशन को स्थापित करने में सक्षम थी क्योकि ये सब सतगुरु बाबा जी के समर्पित सेवादार थे,जिन्हें बाबा जी बहुत प्यार करते थे |

गुरु का अपना अनुभव और शक्ति होती है ,जो उनके वचनो के पीछे छिपी होती है |शिष्य की भलाई इसी में है कि यह उनके वचनो को पूर्ण महत्ता दे लेकिन फिर भी कहीं न  कहीं चूक हो जाती है |यह घटना मुझे हरिमोहन शर्मा जी ने बताई थी और उन दिनों संत निरंकारी पत्रिका में छपी भी थी | 

मुंबई से बाबा जी को कहीं ओर जाना था .हरिमोहन शर्मा जी को दिल्ली लौटने का आदेश था |शर्मा जी को जिस गाड़ी में जाने का आदेश था उसमें कई महापुरुषों को जाना था इसलिए जो दूसरी गाड़ी दिल्ली जा रही रही थी ,जिसे पुराने सेवादार लद्धा जी चला रहे थे ,हरिमोहन शर्मा जी उसमें जाना चाहते थे |उनका ध्यान था कि बाबा जी किसी प्रकार मुझे उस खाली गाड़ी में जाने का आदेश दे दें तो यात्रा अच्छी रहेगी |

बहुत बार ऐसा होता है कि शिष्य गुरु के दिव्य अनुभवों की महत्ता को समझ   नहीं पाता और अपने शब्द गुरु के मुख में डालना चाहता है |गुरु की निकटता जिन्हें प्राप्त होती है वे प्रायः इस प्रकार की हरकत  करते हैं |शर्मा जी ऐसी ही अवस्था को महसूस कर रहे थे उन्होंने बाबा जी से पुनः अपनी प्रार्थना दोहराई |बाबा जी ने शर्मा जी को पुनः उसी गाड़ी में जाने का आदेश दिया जिसमें अन्य कई महापुरुष जाने वाले थे |

शर्मा जी को  फिर मौका मिला और उन्होंने बाबा जी से पुनः अरदास की |बाबा जी ने कहा-जैसी तुम्हारी मर्जी हो करो |

अपनी मर्जी को बाबा जी से मनवा लेने के बाद कोई भी शिष्य उस इच्छा को बाबा जी के आदेश का नाम दे देता है |इस प्रकार परमसंतुष्ट भाव से शर्मा जी उस खाली गाड़ी में विराजमान हो गए |

मुंबई से दिल्ली की तरफ यात्रा शुरू हो गयी |

यात्रा सही चल रही थी लेकिन मथुरा के पास भयंकर दुर्घटना हो गयी |शर्मा जी को भी चोट आयी |

बाबा जी जब दिल्ली पहुँच गए तो शर्मा जी को देखा |

जो भी बाबा गुरबचन सिंह जी के निकट रहे हैं ,बताते हैं कि बाबा जी का स्वभाव बहुत हसमुख था,बड़ी -बड़ी मुश्किलों को वे हँसते-हँसते झेल लेते थे |कठिनाई के समय भी वे सहज रह लेते थे |शर्मा जी को देखकर उन्होंने कहा-शर्मा,चाँद पर से आ रहे हो क्या ?

शर्मा जी पूरा दोष गुरु पर डालते हुए,किंचित रोष के साथ बोले-बाबा जी,आपने हमारा एक्सीडेंट करवा दिया  |

बाबा जी ने एकदम सच्चाई पेश कर दी कि-मैंने तो तुम्हें कहा था कि बाकी महापुरुषों के साथ जाओ |अब एक्सीडेंट हो गया तो दोष मुझ पर डाल रहे हो |

शर्मा जी ने फ़ौरन बख्शने की प्रार्थना की |

भक्तवत्सल सतगुरु ने सहज भाव से आशीर्वाद दिया और महापुरुष एक्सीडेंट की चोटों से उबरकर पहले की तरह सेवा में लगे और वर्षों तक गुरु की सेवा में लगे रहे |        

    

आयु के वर्ष कैसे व्यतीत किये ?

रामकुमार सेवक  

हम सब कुछ वर्षों की पूंजी लेकर इस दुनिया में आये हैं |जीवन में रोज हम कुछ न कुछ करते हैं |उसमें कुछ अच्छा होता है और कुछ बुरा |हम जैसा भी करते हैं उसी के अनुसार हमारा मूल्यांकन होता है और तय होता है कि हम सफल हैं या असफल ?दुनिया अर्थात लोग हमारा मूल्यांकन चाहे जिस तरह करें सोचने की बात यह है कि जिसने हमें दुनिया में भेजा है,यह परमात्मा हमारा मूल्यांकन किस रूप में करेगा,यही प्रश्न महत्वपूर्ण है |मुझे एक कथा याद आ रही है -

एक सेठ के तीन पुत्र थे |वह उनकी सोच-समझ का मूल्यांकन करना चाहता था इसलिए उसने तीनो को पांच-पांच रूपये दिए और कहा-इन रुपयों से कोई ऐसी चीज़ खरीदो जिससे तुम्हारा  कमरा  भर  जाए |

पहला पुत्र बाजार में गया और कूड़े का ढेर खरीद लिया ताकि पूरा कमरा भर जाए |

दूसरा पुत्र एक कबाड़ी की दुकान में गया |वहां घरों का कबाड़ा पड़ा था जो उसने खरीद लिया लेकिन पूरा कमरा न भर सका इसलिए उसने उसी को इधर -उधर फैला दिया |

तीसरे ने बुद्धि का प्रयोग किया और एक दुकान से मोमबत्ती का डिब्बा खरीदकर मोमबत्तियां अपने कमरे में जला दीं |पूरा कमरा रोशनी से भर गया |

अगले दिन पिता उनके कमरे देखने गया |पहले ने तुरंत एक्शन लिया था और पिताजी की शर्त भी पूरी कर दी इस प्रकार वह सफल रहा लेकिन उसके कमरे के पास जाते-जाते उसका सर बदबू से फटने लगा इसलिए पिता अपने पुत्र से नाराज़ था |

दूसरे पुत्र के कमरे से बदबू तो नहीं आ रही थी लेकिन कमरे में जो भी चीजें थीं वे उपयोग लायक नहीं थीं |उसे दूसरा पुत्र भी इस योग्य नहीं लगा कि वह उसके व्यापार को फैला सके |

अब बारी तीसरे पुत्र की थी |पूरा कमरा रोशनी से भरा हुआ था ,पिता को देखकर अच्छा लगा और उसने मन ही मन निर्णय लिया कि यही पुत्र उसका उत्तराधिकारी होगा क्यूंकि उसने पैसे के साथ-साथ बुद्धि का भी उपयोग किया था

 उन तीनो ने अपने कमरे भरे ,हम अपना जीवन भर लेते हैं |हमारी सोच खराब हो तो हम हर किसी पर शक करते हैं |निंदा-चुगली करके अपना जीवन दुर्गन्ध से भर लेते हैं |

दूसरी प्रकार के लोग दूसरे की असफलताओं को ही अपने विचारों के इर्द-गिर्द फैला लेते हैं और स्वयं कुछ अर्थपूर्ण करने की बजाय औरों को ही दूसरों की नज़रों से गिराने में लगे रहते हैं |

सार्थक जीवन उनका है जो सकारात्मक सोच रखते हैं |औरों के अनुभवों को भी सबक बना लेते हैं और अर्थपूर्ण जीवन जीते हैं |

निश्चय ही ये लोग संतोषपूर्ण जीवन जीते हैं और औरों की भी दुआ लेते हैं और प्रभु को अपने कर्मो से प्रसन्न कर पाते है |उनके जीवन के अनुभव उनके जीवन में संतुष्टि और सफलता की रोशनी भर देते हैं

 

  

अनुभवयुक्त वचनो की रोशनी

रामकुमार सेवक

जीवन भी एक प्रकार की पहेली जैसा है ,जिसे सुलझाने में हम पूरी उम्र लगे रहते हैं और एक दिन संसार से विदा ले लेते हैं |जीवन में समस्याएं निरंतर पैदा होती रहती हैं और हम उनसे संघर्ष करते रहते हैं |इस संघर्ष में जब अनुभवी महात्माओं का मार्गदर्शन मिलता है तो हमें राहत मिलती है |पिछले दिनों सत्संग में ऐसा ही मार्गदर्शन प्राप्त हुआ |इस मार्गदर्शन को अपने शब्दों में प्रस्तुत कर रहा हूँ ताकि आप भी इसका लाभ उठा सकें | महात्मा ने कहा-    
1-मैं एक स्कूल में प्रिसिपल था |गर्मी का मौसम था ,मैं स्कूल से स्कूटर पर घर आ रहा था|एक महात्मा जिनकी आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थे ,रास्ते में खड़े दिखाई दिए और मुझे रुकने का इशारा किया |गर्मी चूंकि बहुत ज्यादा थी इसलिए मैं जल्दी से जल्दी घर पहुंचना चाहता था | 
लेकिन महात्मा ने प्रार्थना की कि स्कूटर यहीं खड़ा कर दीजिये और मेरे साथ चलिए |महात्मा का आग्रह देखकर मैंने स्कूटर वहीं खड़ा कर दिया और उनके साथ पैदल ही चल दिया |एक-ढ़ किलोमीटरडे  पैदल चलने के बाद वे मुझे एक रेस्टॉरेंट में ले गए और खूब सेवा की |मैंने उनसे कहा-महात्मा जी, यह सेवा तो आप वहां भी कर सकते थे जहाँ मेरा स्कूटर खड़ा है |वे बोले-इस रेस्टॉरेंट में मेरा उधार चलता है |अभी मेरे पास पैसे नहीं हैं |पहली तारीख को मुझे जब पेंशन मिलेगी मैं इसे पैसे दे दूंगा इसीलिए यहाँ आना पड़ा |
सम्पूर्ण अवतार बाणी में कहा गया है-हरदम याद करो इस रब दी ,खुशहाली या तंगी ,----इस प्रकार महात्मा ने तंगहाली में भी सेवा करके गुरु के वचनों का पालन किया |
2-एक बहन बस में अपने बच्चे के साथ यात्रा कर रही थी |उसने डेढ़ टिकट माँगा |कंडक्टर ने  बच्चे की उम्र पूछी ? वो बोली-सात साल |कंडक्टर ने कहा-  बच्चा इतना बड़ा लगता नहीं है, आप आराम से चार साल कह सकती थी ,फिर एक टिकट  से ही काम चल जाता |वह बोली-मैं झूठ नहीं  बोल सकती | मेरे गुरु का वचन है |कंडक्टर बोला-कौन हैं आपके गुरु ?वो बोली-सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज | उसके इस जवाब ने उस कंडक्टर के मन में मिशन की नींव दाल दी |ऐसे प्रचारकों की बहुत जरूरत है |
3-एक सज्जन की गाड़ी किसी सेवादार महात्मा के स्कूटर को छू गयी |जिसकी गाड़ी स्कूटर को नुक्सान पहुँचा सकती थी वह सेवादार महात्मा को घूर रहा था |महात्मा सोच रहे थे कि गलती भी इसी की है,और घूर भी रहा है |वे मुस्कुराकर बोले- देखो  मगर प्यार से|यह सुनकर वह सज्जन बोला,रात को सही तरह सो नहीं पाया, रात से ही टेंशन में हूँ |  घर में भी समस्या और जहाँ जा रहा हूँ,वहां भी समस्या लेकिन आपकी मुस्कराहट की ,प्यार की कुछ बूंदो ने राहत दी है |
देखो,मगर प्यार से, इन चार शब्दों ने उसे उस व्यक्ति के प्रति शुभ भाव से भर दिया जिसे थोड़ी देर पहले वह क्रोध से घूर रहा था |ये होते है,अनुयायी यही गुरु का वास्तविक काम करते है और गुरु भी उनका पूरा ध्यान करता है |पावन ग्रंथों की व्याख्या करनी सरल है लेकिन पावन जीवन जीना कठिन |जो अपने व्यवहारिक जीवन से ऐसे उदाहरण  प्रस्तुत करते हैं वे तो जैसे पावन ग्रन्थ लिख देते हैं |

 

 

सर्वोच्च जिम्मेदारी 

रामकुमार सेवक 

आज देश ,समाज व् विश्व में सहनशीलता की भारी कमी है |हैरानी तो इस बात पर हो रही है कि मूर्तियां तक सुरक्षित नहीं हैं |जीव -जंतु और मनुष्यों पर तो जानलेवा आक्रमण हो ही रहे हैं ,सदैव मौन रहने वाली मूर्तियां भी आक्रमण की शिकार हो रही हैं |मूर्तियां तो प्रतीक मात्र हैं मन में वैर है तो इंसानो के प्रति है|ऐसे विषैले वातावरण में ह्रदय से धन्यवाद निकलता है अपने महान सत्गुरुओं के प्रति,जिन्होंने सदैव कहा-अमन-चैन से रहना है तो सहनशील हो जाएँ सारे |

काश इस पैगाम को पूरी दुनिया ने अपनाया होता तो देश-दुनिया जन्नत बनी होती लेकिन हम जो उनके अनुयाई हैं क्या उनके पैगाम को पूरी तरह अपना सके हैं ,यह सोचने की बात है |

मेरे ध्यान में लगभग 40 साल पुराना वक़्त आ रहा है,जब मैं विद्यार्थी था |वह बाबा गुरबचन सिंह जी का युग था और जीवन के सिद्धांत मुझे पहले -पहल उन्हीं के श्रीमुख से सुनने को मिले |

      बाबा गुरबचन सिंह जी फौलादी संकल्पों का नाम था |उन पर 24  अप्रैल 1980  से पहले  भी अनेक बार आक्रमण हुए थे |मैं चौथे आक्रमण की बात करना चाहता हूँ जो कि दुर्ग (तब मध्य प्रदेश )में हुआ था |

वहां किये गए प्रवचन में बाबा गुरबचन सिंह जी ने बताया था कि उस दिन दो-तीन महापुरुषों ने कहा कि-आप सफ़ेद कार में बैठिये |वे लोग जानते हैं कि -आप काली गाड़ी में बैठते हैं |कई प्रबंधकों ने भी यह बात कही लेकिन मैंने कहा कि मैं तो अपनी ही गाड़ी में यानी काली कार में बैठूंगा |

बाबा जी निर्भय थे इसलिए उन्होंने उसी निर्भीकता को अपने व्यवहार का आधार बनाया और सफ़ेद कार में बैठी बहन सुदेश नीलम (दिल्ली )उस वीभत्स आक्रमण की शिकार हुई |

उस समय एक नज़र साप्ताहिक रूप में प्रकाशित होता था ,जिसके संपादक और प्रकाशक निरंकारी मिशन के महान प्रचारक वासुदेव राय जी थे |एक नज़र में उन दिनों बाबा गुरबचन सिंह जी के कई इंटरव्यू छपे थे |उनमें से एक में यह प्रश्न पूछा गया था कि आपके ऊपर अनेक आक्रमण हुए हैं तो क्या उसके लिए अपनी सुरक्षा के उपाय नहीं करेंगे ?बाबा जी ने कहा-हमारे उसूल हमें हिंसा की इजाजत नहीं देते |सुरक्षा करनी सरकार की जिम्मेदारी है और हमें उम्मीद है कि वह अपना काम करेगी |

पत्रकार ने पूछा -यदि सरकार कुछ न कर पायी तो आप क्या करेंगे ?बाबा जी ने कहा -हम सहन करेंगे और क्या करें ?

बाबा जी से पूछा गया कि -यदि सत्संग में ही आक्रमण हो जाए तो ?बाबा जी ने कहा -मनुष्य होने के नाते अपना बचाव करने की कोशिश तो करूंगा ही लेकिन सहिष्णुता का दामन मैं छोड़ना नहीं चाहता |

मेरे कहने का तात्पर्य है कि जान का खतरा होने के बावजूद अहिंसा और सहनशीलता के सिद्धांतो पर वे दृढ थे लेकिन यहाँ मुझे बाबा हरदेव सिंह जी का एक प्रवचन याद आ रहा है-बाबा जी कहा करते थे-अहले दानिश को इसी बात की हैरानी है 

शहर कागज़ का है,शोलों की निगेहबानी है |

यह भी विडंबना ही है कि अहिंसा और सहनशीलता के सिद्धांत जिस शरीर में बसे होते है उन शरीरों के साथ विश्वासघात हो जाते हैं अर्थात कागज़ के शहर की सुरक्षा की जिम्मेदारी जिन पर होती है वे प्रायः शोले ही सिद्ध होते हैं |

मेजर जे.डी.शर्मा की पुस्तक -गुरुभक्त जगदत्त में बिलकुल स्पष्ट लिखा है कि किस प्रकार उन्हें बाबा गुरबचन सिंह जी की अपने अनुसार सुरक्षा नहीं करने दी गयी और विरोध करने वाले सफल हो गए |

यह चूंकि व्यवस्था का प्रश्न है इसलिए इस मामले पर मैं कुछ भी लिखना नहीं चाहता क्यूंकि मेरा विषय अध्यात्म और भक्ति हैं और देखा गया है कि दुर्लभ व्यक्तित्व भी कभी लौटकर नहीं आते इसलिए इतिहास को कुरेदने का उस रूप में कोई लाभ नहीं लेकिन इतिहास को हम कभी भूलते नहीं क्यूंकि उस से हमें सीखना होता है तभी गलतियां दोहराने से बच पाते हैं |

बाबा हरदेव सिंह जी ने बिलकुल स्पष्ट संकेत दे दिए थे कि -

शहर कागज़ का है,शोलों की निगेहबानी है और वही हुआ-कागज़ के शहर को शोले निगल गए |

सिद्धांत के साइनबोर्ड और भी ऊंचे होते गए और यथार्थ में दुर्लभ सिद्धांत गायब होते गए |यह बात सिर्फ देश-दुनिया के ही सन्दर्भ में सच नहीं है बल्कि हमारे परमप्रिय मिशन के बारे में भी सच है |

सिर्फ निरंकार है जो अब भी वही है -सर्वव्यापक और सर्वशक्तिमान और इसके न्याय से कोई भी बच नहीं सकता |

शुभ आशा का दीप अब भी जल रहा है |शाश्वत सिद्धांतों को हमें मन-बुद्धि-ह्रदय में जीवित रखना है |यह हम सहजता से कर सकते हैं |यह हमारी सामूहिक ही नहीं व्यक्तिगत और बहुत पवित्र जिम्मेदावी है |इसके माध्यम से ही वह शीर्षक मूर्त रूप ले पायेगा ,जिसे हमने 70 वे संत समागम के अंतिम दिन पूरे विश्व के सामने दोहराया था -निरंकार का लें आधार --- |                       

 

सिर्फ मनुष्य का भविष्य परमात्मा होना है 

रामकुमार सेवक 

कल किसी विचारक के प्रवचन में u-tube  पर सुन रहा था |महात्मा कह रहे थे कि मनुष्य का भविष्य परमात्मा होना है और सिर्फ मनुष्य का ही भविष्य यह है अन्यथा पत्थर का भविष्य मिट्टी होना है |मिट्टी का भविष्य पेड़-पौधे होना है |पेड़ -पौधों का भविष्य पशु-पक्षी होना है |पशु -पक्षियों का भविष्य मनुष्य होना है और मनुष्यों का भविष्य निरंकार होना है |

मुझे बाबा हरदेव सिंह जी एक प्रवचन याद हो गए जिसमें उन्होंने कहा कि-अहंकार से बच और विनम्र बन जा,जैसे रास्ते का रोड़ा | आगे इसे अपडेट करते हुए कहा-रोड़ा तो हर किसी को ठोकर देता है तो रोड़ा नहीं धूल बनना है |आगे अपडेट किया - धूल तो आते-जाते की आँख में लगती है तो कहा-पानी बन जा |आगे अपडेट किया -पानी तो मौसम के अनुसार बदल जाता है - कभी ठंडा तो कभी गर्म इसलिए निष्कर्ष दिया -हरजन ऐसा चाहिए ,हर ही जैसा होय |

निष्कर्ष तो निकल गया लेकिन हरजन हरि जैसा कैसे होगा ,प्रश्न यह है |हम लोग निष्कर्ष तो पढ़-सुन लेते हैं ,जब मौका मिलता है तो उसे सुना भी देते हैं ताकि लोग हमारी प्रशंसा करें |फिर हम उसे लिख भी देते हैं ताकि दूर-दूर से प्रशंसा मिले ,लेकिन निष्कर्ष को जीवन में अपनाने की सोचते भी नहीं इसलिए अहंकार बढाकर दुनिया से चले जाते हैं और फिर -पुनरपि जन्मम,पुनरपि मरणम |

हममें से बड़ी संख्या ऐसी भी है जो मानती है न नर्क है,ना स्वर्ग है और न चौरासी लाख योनियां हैं |

प्रगतिशील साहित्य के मार्च अंक में प्रकाशित करने हेतु बाबा जी के प्रवचन लिख रहा था जिनमें महाराज फरमा रहे थे कि इंसान गुरु-पीर-पैगम्बरों की बातों पर ध्यान देने की बजाय उलटे -सीधे कर्म करता है |रावण- कंस और हिरण्यकश्यप को भी मात कर देता है क्यूंकि उसे पता नहीं है कि आत्मा को क्या -क्या भुगतना पड़ेगा ,इसका उसे अनुमान भी नहीं है |

हम गुरु की बातों को सुना-अनसुना करते रहे और उन्हें अपने अनुसार कहते सुनते रहे अपना अहंकार बढ़ाते रहे ,भूल गए उस निष्कर्ष को -हरजन हर ही जैसा होय |

निष्कर्ष तो यह भी है-ब्रह्मज्ञानी आप निराकार |यह असम्भव नहीं है |यदि गुरु ऐसा हो सकता है तो शिष्य भी ऐसा हो सकता है |ऐसे शिष्य हुए भी हैं,जिन्होंने दावा किया -अब तो जाय चढ़े सिंघासन ---

जैसा कि मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि ब्रह्मज्ञान हमें बिलकुल सही मिला है लेकिन इसका अपने व्यावहारिक जीवन में विकास करना जरूरी है|फिर अनुभव कहेगा कि वे विचारक भी सही हैं जो कहते हैं कि इंसान का भविष्य परमात्मा होना है और बाबा जी ने भी सत्य कहा-हरजन हर ही जैसा होय | निष्कर्ष तो यह भी निकलता है हमारा वर्तमान भी परमात्मा ही होना है बशर्ते परमात्मा का पता हो |   

तत्वदर्शी सतगुरु ही सर्वोच्च है 

रामकुमार सेवक 

प्रोफ़ेसर राजन सचदेवा जी (शिकागो)के प्रवचन भी मुझे बहुत प्रभावित करते हैं |एक बार निरंकारी कॉलोनी दिल्ली में सत्संग में बाबा गुरबचन सिंह जी महाराज के समय का एक प्रसंग बता रहे थे |  बाबा जी पंजाब में किसी स्थान पर सत्संग करने गए |आयोजकों का अनुमान था कि बारिश होगी इसलिए वे टेंट आदि का उसी के अनुसार प्रबंध करना चाहते थे |दूसरी तरफ बाबा जी आश्वस्त थे कि बारिश नहीं 

होगी |यह बात उन्होंने साफ़ बता भी दी लेकिन आने वाली संगतें भी बारिश का प्रबंध करके अर्थात छाते -रेनकोट आदि लेकर आयी थीं |बाबा जी के रोकने के बावजूद आयोजकों ने वर्षा की स्थिति से बचने के लिए स्टेज के ऊपर छत बनायीं |

सत्संग का पूरा कार्यक्रम संपन्न हो गया |बाबा जी के प्रवचन हुए तो बारिश शुरू हो गयी |प्रबंधक सोचने लगे कि उनका आकलन सही था जबकि बाबा जी के वचन असत्य सिद्ध हो रहे थे |बाबा जी ने अपने प्रवचन में कहा कि बारिश होनी ही नहीं थी |बारिश हुई तो केवल इसलिए क्यूंकि महापुरुष वर्षा से बचने का पूरा इंतजाम करके आये थे |

महात्मा कहते हैं कि गुरु बीस होता है और साध संगत इक्कीस ,इस प्रकार संगत का स्थान गुरु से भी ऊंचा है |बाबा हरदेव सिंह जी कहा करते थे -निरंकार और साध संगत ही मेरे सिर का ताज है |

मान सिंह जी मान गुरु को ही सर्वोच्च मानते थे इसीलिए अपने सम्पादकीय में लिखा कि-साध संगत इक्कीस है तो सिर्फ इसलिए क्यूंकि गुरु (बीस) इसमें शामिल होता है |गुरु यदि शामिल न हो तो संगत की  महत्ता इक्कीस की बजाय केवल एक ही है |       

पावन बाणी में महात्मा कहते हैं-गुरु परमेश्वर एको जान ,प्रश्न यह है कि गुरु और परमेश्वर एक ही हैं तो नाम दो क्यों हैं ?प्रश्न यह भी उठता है कि -हर शरीर विनाश होने वाला है फिर कौन से शरीर को गुरु माना जाए जबकि इस समय वातावरण गुरुओं के विपरीत है ?

गहराई से विचार करने पर पाते हैं कि जिस शरीर में विकार नहीं हैं,जिसमें ब्रह्मज्ञान को पूरी तरह विकसित किया गया है ,ऐसे शरीर में निरंकार का वास निरंतर रहता है वही वास्तव में गुरु है |

शरीर में रहकर भी जो निरंकार को पूर्णतः धारण कर ले ऐसी सत्ता शरीर में रहकर भी शरीर में सीमित नहीं रहती |उस अवस्था में ही गुरु और निरंकार एक हो पाते हैं |

ऐसा गुरु जब शीश पर हाथ रखता है तो वह एहसास हमें स्वयं के ऊर्जित (Energised ) होने का एहसास करवाता है |

ऐसे महामानव को ह्रदय कहता है - मेरा गुरु परमेश्वर से कम नहीं है |ऐसे गुरु पर ही अन्धविश्वास किया जा सकता है जो कि शिष्य को जीते जी सर्वोच्च एहसास का पात्र बना देता है |

निष्कर्षतः यही कहना सही होगा कि निरंकार यदि जल है तो गुरु हिम अर्थात बर्फ है |

तत्वतःदोनों एक ही हैं इसलिए - ऐसे गुरु को कोटिशः नमन |          

निरंकार के तत्व का पता कैसे चला ?

रामकुमार सेवक 

निरंकार के हर स्थान पर मौजूद होने के बावजूद बड़े-बड़े अनर्थ हो जाते हैं अर्थात निरंकार किसी को कुछ उल्टा-सीधा करने से रोकता नहीं |इस आधार हमारे एक बुजुर्ग निरंकार को सर्वव्यापक तो मानते थे लेकिन सर्वशक्तिमान नहीं मानते थे |

इस द्वंद्व ने मुझे भी उलझाया ,मुझे लगा कि यथार्थ का पता चलना चाहिए |मालिक ने कृपा की ,उपनिषद पढ़ने का मौका मिला |उसमें एक प्रसंग यह  था-

उस समय परमात्मा का ज्ञान अर्थात ब्रह्मज्ञान प्राप्त करना हर किसी के लिए अनिवार्य था |एक ऋषि ने अपने पुत्र को किसी अन्य ऋषि के आश्रम में भेजा ताकि वह ब्रह्म का ज्ञान प्राप्त कर सके |ऋषि इस ज्ञान को अपने ही ढंग से प्रदान करते थे |परिणाम यह हुआ कि वह बच्चा इस परमज्ञान को समझ नहीं सका इसलिए उन ऋषि ने उस बच्चे को यह कहकर वापस भेज दिया कि आपका बेटा कम बुद्धि वाला होने के कारण इस सर्वोच्च ज्ञान को हासिल करने में सक्षम नहीं है |

ऋषि को यह सुनकर लगा कि यदि बच्चा बिना ब्रह्मज्ञान के रहा तो कुल का कलंक साबित हो सकता है इसलिए कुछ न कुछ ऐसा करना होगा कि बच्चा इस तत्वज्ञान को समझ सके |उन्होंने परमात्मा का ज्ञान अपने तरीके से प्रदान किया |  

उनके आश्रम में एक वृक्ष (जहाँ तक मुझे स्मरण है)अमरुद का था |ऋषि ने अपने बच्चे को पेड़ का फल तोड़कर लाने का आदेश दिया |बेटा फल तोड़कर ले आया तो पिता ने कहा-इसे तोड़ो |बेटे ने फल तोडा तो उसके भीतर से अनेक बीज निकले |पिता ने उनमें से एक बीज को तोड़ने का आदेश दिया |जिस प्रकार स्थूल दृष्टि सूक्ष्म को देखना कठिन है उसी प्रकार छोटे से बीज को तोडना कठिन था लेकिन बेटे ने किसी प्रकार तोडा |

पिता ने कहा-इसके भीतर क्या है ?बेटे का उत्तर था- कुछ नहीं |

पिता ने कहा-ज़रा समझने की कोशिश करो |यह बीज जब धरती के भीतर बो दिया जाता है तो पूरा पेड़ धरती से बाहर निकल आता है ,जिस पर कितने ही फल और और फलों में से हज़ारों बीज निकलते हैं |बीज में जो पेड़ उगाने की शक्ति है,क्या वह कुछ भी नहीं है ?बेटे को समझ आ गया कि जिसे वह कह रहा है -कुछ भी नहीं ,वह असीम ऊर्जा से युक्त है |

मैंने उस क्षण को याद किया जब मुझे सतगुरु ने यह दिव्य ज्ञान दिया था ,जिसे मैं कई वर्ष बाद समझ पाया था |

अंततः इसी निष्कर्ष पर पहुंचा कि -यह सत्ता सर्व व्यापक भी है और सर्वशक्तिमान भी |बेशक यह तुरंत  प्रतिक्रिया नहीं करती लेकिन तब भी सर्वशक्तिमान है क्यूंकि प्रतिक्रिया करने की पूरी क्षमता तो मौजूद है |यह वैसे ही है जैसे बिजलीघर से सम्बंधित होने की स्थिति में बल्ब में विद्युत् प्रवाहित होती रहती है बिलकुल शांत भाव से |

बाबा हरदेव सिंह जी ने एक बार अपने प्रवचन में समझाया था कि-कोई इंसान गलत काम करके भी तरक्की करता रहता है यह देखकर स्वयं भी बुरे काम करने शुरू नहीं कर देने चाहिए |

सही -गलत का निर्णय प्रभु करता है जबकि तरक्की करने या न कर पाने का निर्णय हम स्वयं करते हैं |बाबा जी ने कहा कि कोई बीज तुरंत वृक्ष नहीं बन जाता इसी प्रकार किये हुए कर्मो के परिणाम भी अपने नियत समय पर मिलते हैं |

प्रभु वास्तविक न्यायकारी है इसलिए न्याय अवश्य करेगा इसलिए जहाँ यह सर्वव्यापक है वहीं सर्वशक्तिमान भी है |                       

सबसे बड़ी मूर्खता है-निरंकार को खाली समझना 

रामकुमार सेवक 

उस दिन किसी बहन ने प्रश्न पूछा कि-निरंकार के प्रति मन को कठिन से कठिन परिस्थिति में भी मजबूत रखने का उपाय क्या है ?यह निरंकार सचमुच बिगड़े काम बनाता है या बस मन को समझाना होता है ?क्या निरंकार हर घट की सुनता है ?

प्रश्न वास्तविक थे और इनका सही जवाब खोजने जरूरी थे |मेरा अनुभव कहता है कि प्रश्न चाहे दुनिया में कहीं से भी आते दिखाई दें लेकिन वास्तव में निरंकार में से आते हैं और उत्तर भी निरंकार में ही होते है और मुझे वे वहीं मिलेंगे यदि मैं निरंकार के जवाब सुनने की अवस्था में होऊं ?

whats  app  पर किसी सज्जन ने उससे एक दिन पहले बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के एक प्रवचन  की  क्लिप भेजी थी ,जो अंग्रेजी भाषा में थी लेकिन उसे मैंने सुना था इसलिए ध्यान सीधे वहीं गया |   

बाबा जी ने फ़रमाया कि-यह सिर्फ रटन या जप मात्र  नहीं है बल्कि निरंकार का एहसास करना होता है जैसे माता चाहे रसोई में हो लेकिन सब काम करने के बावजूद उसे इस बात का एहसास होता है कि बैडरूम में मेरा बच्चा सोया है और वो उसका पूरा ख्याल करती है|

बाहरी तौर पर देखें तो वह बच्चे से दूर है,शारीरिक रूप से रसोई में है लेकिन भीतरी अर्थात ध्यान के स्तर पर अपने सोये बच्चे के पास है |वो रसोई के काम को भी पूरी निष्ठां और  जिम्मेदारी से करती है इसके साथ-साथ  बच्चे के प्रति उसका समर्पण भी उतना ही गहरा होता है |

निरंकार के साथ मेरा सम्बन्ध भी उतना ही मजबूत होना चाहिए जितना कि एक माँ का अपने बच्चे के साथ होता है |इस अवस्था में यह निरंकार हमारा उतना ही बड़ा सेवादार होता है जितनी कि एक माँ अपने बच्चे की |इस अवस्था में यह हमारा सिर्फ ख्याल ही नहीं करता बल्कि हमारा हर काम भी करता है बशर्ते उस काम के होने में हमारी भलाई निहित हो|कोई इंसान यदि हमारी कोई मदद करे तो वह अपनी देन को जता भी देता है |इसके विपरीत निरंकार हमारे सब कार्य करके भी एहसान नहीं जताता इसलिए मुझे इसके अस्तित्व और सर्वशक्तिमान होने का एहसास भी होना चाहिए और विश्वास भी |

जब हम महात्मा से निरंकार का ज्ञान लेते हैं तो समझाने के लिए कह दिया जाता है कि यह जो ख़ाली है लेकिन सत्य यह है कि इसका कण-कण ऊर्जा से भरपूर है |

एक कवि ने कहा है-तू रूप है किरण में |सौंदर्य है सुमन में |तू वेग है पवन में |विस्तार है गगन में | 

 मेरा अनुभव कहता है-सबसे बड़ी मूर्खता है-निरंकार को खाली समझना क्योंकि ऑक्सीजन ,जो हम सांस में लेते हैं ,इसी में तो है और कार्बन डाइ ऑक्साइड ,जो हम सांस के साथ छोड़ते हैं ,भी इस निरंकार में ही है |अब तो इसका एहसास पहले से भी ज्यादा गहराई से महसूस होता है,मालिक कृपा बनाये रखे |धन निरंकार जी-   

निरंकार का स्थान हमारे जीवन में कहाँ है ?  

रामकुमार सेवक

कल अर्थात 25 -02 -2018  को भी साप्ताहिक सत्संग में जाने का अवसर मिला |सतगुरु के मंच से विचार प्रकट करते हुए बहन राजरानी जी ने कई सूत्र दिए ,उन्हें बाद में लिखूंगा |

अभी तो ध्यान में लगभग 35  साल पुरानी बात आ रही है |मुज़फ्फर नगर में गुरदयाल सेठी जी हुआ करते थे ,जो सत्संग में मंच संचालन किया करते थे |हर महीने की पहली तारीख को उनके निवास स्थान पर सत्संग होता था मुझे भी वहां जाने का मौका मिलता था |

सेठी जी अक्सर अपने घर में कम संगत आने की शिकायत करते थे | एक दिन मंच संचालन की सेवा मुझे मिली हुई थी |मैंने सेठी जी से निवेदन किया कि वे सामने रखे दरे को भी बिछा दें |

सेठी जी के परिजनों ने दरा बिछा दिया |मालिक की कृपा से कुछ और परिवार आ गए और वह दरा भी ख़ाली न रहा |मैंने सेठी जी से कहा कि आप एक ही दरा बिछाते हैं और दूसरे की तह भी नहीं खोलते क्यूंकि आपकी बुद्धि कहती है

महापुरुष 15 -20   ही आएंगे तो दूसरे को यहीं रखा रहने दो |एक ही दरा बिछाना काफी है |

यानि वही मिसाल जिसमें पादरी लोगों से कहता है कि बारिश नहीं आएगी क्यूंकि आपको परमात्मा पर यकीन नहीं है |लोगों ने पूछा-आप ऐसा कैसे कह सकते हैं ?

पादरी ने कहा क्यूंकि आप छाते तो लाये नहीं |इसी प्रकार सेठी जी को परमात्मा से यह आशा ही नहीं होती थी कि यह ज्यादा संगत भी भेज सकता है अन्यथा दूसरा दरा भी बिछाते |     

कल (25 -02 -2018  को )मैंने सोचा कि विचार दरे पर बैठकर सुनी जाए लेकिन बिछायत बहुत कम थी |आधे दरे वहां तह किये हुए रखे थे |बस वो दरे ही भरे ,जो बिछे हुए थे ,बाकी संगत बाहर थी |सत्संग पंडाल आधा भी नहीं भरा था क्यों?

90 % महात्मा कहेंगे कि पंडाल इसलिए नहीं भरा क्यूंकि सत्संग में सत्गुरु माता जी नहीं थी |

यह जवाब बहुत ही शर्मनाक है कि सत्संग में आने के लिए हम चाहें कि वहां माता जी हों जबकि इतने वर्षों से हम सत्संग में आ रहे हैं| हम सत्संग में संत-महापुरुषों के अनुभव सुनने के लिए जाते हैं ताकि वहां जाकर अपनी मनोवृत्ति निरंकार से जोड़ सकें |सत्य का एहसास कर सकें |

यदि मन में यह सात्विक भाव नहीं है तो हम ऐसे इकट्ठ को सभा या जनसभा आदि तो कह सकते हैं लेकिन उसे सत्संग नहीं कह सकते ,जिसमें निरंकार का आधार न लेकर पूरा ध्यान शरीरों के इर्द-गिर्द घूम रहा है | |

 

यदि अब भी सत्संग में आने के लिए शरीर विशेष की दरकार है तो यह सहज ही समझा जा सकता है कि निरंकार का स्थान हमारे जीवन में कहाँ है ?   

अब भी है उम्मीद 

रामकुमार सेवक

समझ नहीं पा रहा हूँ कि बात कहाँ से शुरू करूँ क्यूंकि निरंकार का एहसास जिस गहराई से बढ़ रहा है आनंद का भाव भी बढ़ रहा है |उस अनहद की अवस्था को लिखना चाहता हूँ लेकिन सही शब्द नहीं मिल रहे |   

आज 24 फरवरी है,बिलकुल वैसा ही दिन जैसा कि कल(23फरवरी या 22 फरवरी को)था |मगर समय कभी ठहरता नहीं |समय के बारे में सोचते हैं तो निरंकार में पहुँच जाते हैं |कल बाबा हरदेव सिंह जी का जन्म दिवस था |कल मैंने बाबा जी के पचासवें जन्मदिवस की वीडियो रिपोर्ट देखी |उसमें मान जी की लिखी एक ग़ज़ल देव दिलदार जी के मुख से सुनी-मैं वो लिख्या ए गैब से जो है आया|आगे वो कहते हैं-

मैं तां बन्दा हाँ ,बंदगी तूं ए |

इससे पहले धर्म सिंह जी शौक़ का एक शेअर बेदिल सरहदी साहब से कभी सुना था -

गैब से आते हैं ख़याल तो आने दे शौक़ ,तेरा क्या जाता है इन्हें लिख देने के सिवा |

बाबा हरदेव सिंह जी पहले शरीर में थे ,अब गैब में हैं अर्थात निरंकार में हैं |

निरंकार में जो मिल जाता है वो निरंकार ही हो जाता है |मुझे इस सत्य का एहसास तब हुआ जब 

बाबा जी का शरीर हमसे छीन लिया गया |वह बहुत दर्दनाक दौर था जिससे बाहर नहीं निकल पा रहा था लेकिन दफ्तर भी जाना था |बेटे की बाइक पर था |जब भी मैं बेटे के पीछे बैठता हूँ तो उसे साथ लेकर सुमिरन करता हूँ अर्थात बोलकर |उस दिन जब सुमिरन किया तो मुझे स्पष्ट हो गया-सुमिरन में अब भी वही स्वाद है जो पहले था |तब उस दर्द से उबर पाया |

23 फ़रवरी का दिन आज विशेष लगा |मुझे 2005 याद आ गया | वह दिन भी याद आया जिस दिन मैंने एक सम्पादकीय लिखा था -दर्पण झूठ न बोले |एक लेखक या संपादक के तौर पर उसे लिखना और फिर उसे छापना बहुत बड़ी बात थी क्योंकि उस समय उसे लिखने का मतलब था-प्रबंध तंत्र से खुला टकराव |केवल वह सम्पादकीय था जिसके लिए मेरे उस समय के साथियों ने मुझे चेताया भी था कि इसे लिखने में सारे खतरे हैं और कुछ भी हासिल नहीं होना है लेकिन मेरा प्रश्न था कि-बाबा जी इसे पढ़कर खुश होंगे या नाराज़ ?साथियों ने कहा-जो तुमने लिखा है,बिलकुल सच है और बाबा जी इसे पढ़कर खुश भी होंगे लेकिन भविष्य में तुम्हारा कहीं अता-पता भी नहीं रहेगा |रहने की जगह छीन ली जायेगी,संपादक के  पद से छुट्टी और मंच पर कविता पढ़ना बंद |

मेरे साथियों का आकलन बिलकुल ठीक था लेकिन न जाने क्यों ,मेरी आदत बहाव के विरुद्ध तैरने की है यदि वह सत्य के समर्थन में हो |

निरंकार ने उस आंधी को मुझे स्पर्श तक नहीं होने दिया और मुझे ऐसे बचाया जैसे बुलेटप्रूफ जैकेट गोली लगने से बचाती है |सब साथी हैरान थे और मैं बिलकुल सुरक्षित |

वो आंधी आयी और चली गयी |

2011में कोई आंधी नहीं थी लेकिन प्रबंध तंत्र और भी गैर-आध्यात्मिक हो गया था इसलिए टकराव चलता रहता था | 23 फ़रवरी (अजन्मे के जन्म दिवस को ) को मैं गुरु-निरंकार की इच्छा मानकर स्वीकार कर चुका था लेकिन मुझे ऐसे हटाया गया जैसे मैं कुछ कभी था ही नहीं |

इसके बावजूद निरंकार मेरे साथ रहा और अब भी है |एक लेखक के तौर पर मुझे पाठकों का बहुत प्यार मिल रहा है,उस समय से भी ज्यादा जब मैं संपादक के तौर पर निरंकारी मिशन में अपनी सेवा निभा रहा था |

उस समय अर्थात जुलाई 2011 में आंधी का एहसास तो हुआ लेकिन निरंकार ने मुझे ख़त्म नहीं होने दिया |असली आंधी तो आयी(2014 में निरंकारी राजमाता जी के शरीर त्याग के बाद अर्थात ) मई 2016 में जब हमारा रत्न हमसे छीन लिया गया -बाबा हरदेव सिंह जी शरीर छोड़ गए और यह सबक स्पष्ट हो गया कि-निरंकार कितना निर्मोही है |

आज मुझे 23 फ़रवरी बहुत अपनी लगती है क्यूंकि वह रत्न हमारे पास नहीं है जिसकी चमक ही हमें चौंधिया देने के लिए काफी थी |

माता सविंदर जी बेशक हमारे साथ हैं और सतगुरु के रूप में अपनी भूमिका निभाने का प्रयास पूरी हिम्मत और मेहनत से कर रही हैं लेकिन बाबा हरदेव सिंह जी के शरीर में होने का कुछ अर्थ था ,उस  अर्थ का पूरा एहसास उनके सामने नहीं हुआ और लगता है कि उनके विजन का पूरा पता चलने की गुंजाइश अब बची ही नहीं |अब बिलकुल अनुमान नहीं हो पा रहा कि निरंकार क्या करने वाला है |

बहरहाल जिस 23 फ़रवरी ने 1954 में एक रत्न हमें दिया था ,उसके स्वागत की इच्छा होती है और एक उम्मीद अब भी है क्यूंकि निरंकार अब भी वैसे का वैसा है जैसा तब था जब यह सृष्टि शुरू हुई थी |         

      

मैं पंजाबी भाषा जानता ही नहीं 

रामकुमार सेवक 

1978 के आस-पास की घटना है |पंजाब में हालात इतने ख़राब थे कि कुछ बड़े शहरों में जिन दुकानों पर निरंकारी स्पेयर पार्ट्स आदि लिखा हुआ था उन लोगों ने निरंकारी के स्थान पर मानवता अथवा सत्कार मोटर पार्ट्स आदि कुछ लिखवा लिया था ताकि अतिवादियों के हमलों से अपनी कड़ी  मेहनत से कमाई गयी संपत्ति को बचाया जा सके |इस आशय का पत्र मुझे किसी सज्जन ने भेजा था ,जोगिन्दर सिंह शांत जी ने मुझे बताया |

ऐसे हालात देखकर मेरे सामने प्रश्न उभरा कि यह मानसिकता निरंकार के प्रति विश्वास की कमी की प्रतीक है या व्यावसायिक चेतना की या दोनों की ?  

एक दिन बाबा गुरबचन सिंह जी शहर में आये |शाम के समय मैं बाबा जी के साथ शाम की सैर कर रहा था |

मैंने कहा-बाबा जी लोगों ने दुकान के साइन बोर्ड्स के ऊपर से भी निरंकारी शब्द हटा दिया है |बाबा जी ने बात सुनी और शांत रहे |

मैंने चिठ्ठी बाबा जी की और बढ़ा दीं |बाबा जी ने चिट्ठी बिना पढ़े लौटते हुए कहा-मैं पंजाबी भाषा नहीं जानता |

यह सुनकर मैं हैरान हो गया क्यूंकि मुझे अच्छी तरह मालूम था कि बाबा जी पंजाबी भाषा जानते हैं लेकिन शायद बाबा जी कोई नकारात्मक बात पढ़ना नहीं चाहते थे इसीलिए शायद उन्होंने पंजाबी भाषा नहीं जानने की बात कही |

बाद में मुझे यह भी ध्यान आया कि गुरु तो निराकार का साकार रूप है -जिसे कहते है-सतगुरु आप नारायण है |नारायण से कौन सी भाषा अज्ञात हो सकती है लेकिन यह किसी के दोष नहीं देखना चाहता इसलिए ज्ञानी होकर भी अज्ञानी बन जाता है | 

दूसरी ओर हम हैं कि नकारात्मक  चीजों पर इतना ज्यादा ध्यान देते हैं कि वो कभी निकलतीं नहीं |बाबा हरदेव सिंह जी ने एक विचार में बताया कि किसी ने विचार में कह दिया कि-ऊंचो नीच करे मेरा गोविन्द कहु ते न डरै|किसी ने कहा-यह किसे बोलने का टाइम दे दिया इसे बोलना भी नहीं आता ?बाबा जी ने उससे कहा-यह वो गलती से बोल गए लेकिन इसके अलावा जितनी भी बातें उन्होंने कहीं ,वे गुरु और निरंकार के प्रति विश्वास मजबूत करने वाली थीं |

यह सुनकर सामने वाला शांत हो गया लेकिन यह तो स्पष्ट हो ही गया कि गुरु और शिष्य की आदत में कितना भारी फर्क है |गुरसिख होने के लिए हमें ऐसी नकारात्मक बातों से बचना ही होगा |

बाबा अवतार सिंह जी कहा करते थे कि सोना यदि नाली में भी पड़ा है तो उसे इंसान उठा लेता है इसी प्रकार अच्छी बातें चाहे जहाँ से भी मिलें उन्हें ले लेना चाहिए |

गुरु तो गुरु है लेकिन गुरसिख को भी वैसा ही होना चाहिए अन्यथा गुरु की प्रतिष्ठा को हानि होती है |सोचने की बात यह है कि हम गुरु का नाम रोशन करने वाले हैं या उसे धूमिल करने वाले ?             

          

जहाँ तर्क साथ नहीं देते 

रामकुमार सेवक 

मान सिंह जी मान निरंकारी मिशन के प्रगतिशील लेखकों ,कवियों,बुद्धिजीवियों में रहे हैं |वे आडम्बर और पदार्थवाद के सख्त खिलाफ थे |स्वतंत्रता के तुरंत बाद वे राजनीतिज्ञों के संपर्क में भी रहे लेकिन वे स्वयं राजनीति नहीं करते थे हालांकि राजनीति की बहुत गहरी समझ उन्हें थी |इस विषय पर फिर कभी बात करेंगे |

चमत्कार के चक्करों के वे सख्त खिलाफ थे तथा इसे लोगों को उल्लू बनाने का एक साधन मानते थे |इसके बावजूद उन्होंने एक बार बताया कि उनकी पत्नी प्रकाश कौर जी ज्यादा बीमार थीं |मान सिंह जी उस समय संत निरंकारी मंडल के मकान में रहते थे अर्थात यह उनके देहांत से  काफी पहले की घटना है |

एक रात उनकी पत्नी को लगा कि अब अंतिम समय आ गया है |उन्होंने चरणामृत माँगा लेकिन घर में उस समय चरणामृत नहीं था |उन्होंने मान जी से ही कहा-अपना चरणामृत बनाकर दे दो |रात के उस समय कोठी से भी चरणामृत नहीं ला सकते थे और किसी महात्मा को बुलाना भी संभव नहीं था इसलिए उस्ताद मान जी ने बताया कि उन्होंने खुद का चरणामृत बनाया और उन्हें पिला दिया |

उस्ताद जी से मैंने पूछा -फिर ?उन्होंने बताया कि उसके बाद उसे अच्छी नींद आयी और कितने ही साल बाद तक वे शरीर में रहीं |

मैंने पहली बार उनके मुँह से ऐसे चमत्कार की बात सुनी थी इसलिए चरणामृत पर मेरा यकीन और भी दृढ हो गया |मैंने स्वयं चरणामृत के कितने ही चमत्कार जीवन में देखे हैं और माता कान्ता जी (उरई )ने एक बार निरंकारी कॉलोनी (दिल्ली )में आयोजित प्रातःकालीन सत्संग में बताया था कि किस प्रकार एक बहन का कैंसर भी चरणामृत से ठीक हो गया था |ऐसे प्रसंग आपके पास भी होंगे और मेरे पास भी हैं लेकिन मान सिंह जी इन चमत्कारों की चर्चा मैं कभी नहीं करता था क्यूंकि वे बहुत अलग किस्म के व्यक्ति थे और प्रमाण को बहुत महत्व देते थे लेकिन जो सत्य है वह छिपता नहीं है और मानव जीवन में अनेकों ऐसे क्षण आते हैं जब तर्क मदद नहीं करते सिर्फ आस्था ही काम करती है |

उन्होंने अपनी पत्नी की आस्था का सम्मान किया और आस्था की उस रोशनी ने स्वयं मान जी को भी नया अनुभव दे दिया | 

         

तर्क बहुत शक्तिशाली हैं लेकिन ---------

रामकुमार सेवक

मालिक की कृपा है कि कम उम्र में ही मुझे दुनिया के अच्छे लेखकों को पढ़ने का मौका मिला |हालांकि उनकी कृतियों को समझ पाने में तब मैंने स्वयं को अक्षम महसूस किया |समय के साथ उनका आनंद महसूस हुआ |लिओ टॉलस्टॉय ,सआदत हसन मंटो,खुशवंत सिंह ,प्रेमचंद ,अलक्सन्देर पुश्किन,गुलजार व् भगत सिंह  आदि ऐसे ही लेखक हैं | निरंकारी मिशन में पूर्ण प्रकाश साक़ी जी,निर्मल जोशी जी ,जे.आर.डी.सत्यार्थी जी और मान सिंह जी मान आदि भी मेरे प्रिय लेखकों में सम्मिलित हैं | बाद में इनमें एक नाम और जुड़ा-ओशो |

ओशो बहुत विवादस्पद लेखक थे इसलिए उन्हें पढ़ना बहुत जरूरी था इसलिए उन्हें भी पढ़ा |लोग कहते थे कि ओशो को पढोगे तो फिर विचार भी बदलेंगे और आस्था के केंद्र भी ,इस खतरे के बावजूद मैंने उन्हें पढ़ा और पढ़कर मुझे लगा कि ओशो को पढ़कर यदि कोई हिलता है तो इसमें ओशो का दोष नहीं बल्कि उस व्यक्ति की अपनी कमजोरी प्रमाणित होती है |ओशो की पहली पुस्तक मुझे आदरणीय सत्यार्थी जी से मिली -शून्य की नाव |तब 1986 था और संत निरंकारी प्रकाशन विभाग में मैं नया-नया आया था और स्वभाव से काफी दब्बू किस्म का था |बाद में ओशो की बहुत सी और भी पुस्तकें पड़ने को मिलीं और मुझे उनसे बहुत कुछ नया सीखने को मिला |साथ ही यह भी हुआ कि जैसे -जैसे स्वाध्याय का सिलसिला बढ़ा निरंकार के अस्तित्व और सतगुरु की भूमिका के प्रति मेरी आस्था और भी मजबूत होती गयी क्यूंकि एक स्वतंत्र लेखक होने के नाते मैं किसी की भी नक़ल नहीं कर सकता ,हाँ प्रभाव जरूर होता है लेकिन वह स्वयं पर निर्भर होता है कि हम उसे कितना स्वीकार करते हैं |

बहरहाल एक मित्र ने पंद्रह दिन पहले ओशो की एक विडिओ मुझे भेजी |दो दिन बाद मैंने उसे तसल्ली से सुना |विचार बहुत ज़बरदस्त थे और असर डालते थे लेकिन वे सिर्फ बुद्धि के तल तक गए, आस्था को प्रभावित नहीं कर सके |

मित्र मिशन के पुराने श्रद्धालु हैं और बाबा गुरबचन सिंह जी के समय से ही काफी सक्रिय रहे हैं |बाबा गुरबचन सिंह जी के साथ विदेश भी गए थे |सिख परम्पराओं और श्री गुरुग्रंथ साहिब का भी बहुत अभ्यास उन्हें है लेकिन मिशन की वर्तमान परिस्थितियों से आहत हैं | भीतर से वे मुझसे ज्यादा निरंकार से जुड़े हैं इसलिए बिलकुल भी दुखी नहीं हैं |

बहरहाल उन्होंने मुझसे प्रतिक्रिया पूछी |जैसी कि उन्हें आशा रही होगी मैंने ओशो के तर्कों की भरपूर प्रशंसा की लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया कि वे मुझे बौद्धिक स्तर तक प्रभावित करते है और रूहानी स्तर पर वे प्रभावहीन हैं |

यह बात मैंने स्वयं पहली बार महसूस की थी इसलिए मालिक ने मुझे अपनी बात सिद्ध करने की शक्ति भी प्रदान की |मैंने कहा-मैंने निजी जीवन में चरणामृत के बहुत असर महसूस किये हैं,आपने भी किये होंगे उन असर को ओशो कहीं महसूस कर पाए क्या ?

मुझे लगा कि ओशो में बौद्धिकता तो है ,तर्क बहुत शक्तिशाली हैं लेकिन आध्यात्मिक अनुभूति का अभाव है और मालिक की कृपा से मैंने उसे बहुत गहराई से महसूस किया है |धन्यवाद सतगुरु-निरंकार |                                                                         

नमस्कार - भाव का विषय है....का नहीं |

- रामकुमार सेवक  

बाबा हरदेव सिंह जी में रत्ती भर भी अभिमान नहीं था ,यही कारण है कि परमात्मा का उनमें सहज निवास था |मैं ऐसा इस कारण कह पा रहा हूँ क्यूंकि निरंकारी कॉलोनी (दिल्ली )में रहने के कारण अनेकों ऐसे अवसर मिले हैं जब दूरदेशों की यात्रा से वे लौटते थे और उनके आगमन मात्र से वातावरण में एक विशिष्ट प्रकार की पावनता उत्पन्न हो जाती थी और पावन बाणी की  वह पंक्ति सजीव हो उठती थी कि-गुरु परमेश्वर एको जान |

वह एक ऐसा दिव्य एहसास होता था कि हम जैसे अपने होश-हवस खो बैठते थे |रूहानी इश्क़ का वह निराला ही एहसास होता था |मैं आत्मविश्लेषण की कोशिश कर रहा हूँ -इसका कोई बाहरी कारण नहीं बल्कि नितांत भीतरी कारण था |

एक बार निरंकारी कॉलोनी (दिल्ली )स्थित उनके निवास स्थल के बीचोबीच प्रांगण में शिष्यगण बाबा जी को नमस्कार करने हेतु पंक्तियों में लगे थे |बाबा जी बरामदे के फर्श पर खड़े थे |शाम को 6 बजे के आस-पास यह सिलसिला शुरू हुआ |

मेरे पास ऐसे अवसर थे कि मैं बाबा जी तक सीधे पहुँच सकता था लेकिन मेरा ह्रदय कह रहा था कि जब मैं अपने आपको सेवक समझता हूँ तो मुझे एक आम अनुयाई की तरह होना चाहिए तभी मैं बाबा जी से उनकी कृपा हासिल करने का अधिकारी हो सकूंगा |

लगभग 11 बजे मुझे उनके चरण स्पर्श करने का मौका मिला |

होता यह था कि जब भी मस्तक उनके चरणों से स्पर्श होता था तो लगता था जैसे शरीर में काफी ऊर्जा आ गयी है |शब्द ख़त्म हो जाते थे उस दिव्यता के प्रभाव में लेकिन आज ऐसा नहीं हुआ |मेरे साथ दो महात्मा और भी थे जिन्होंने मेरे साथ ही आगे-पीछे नमस्कार अर्थात चरण स्पर्श किये थे -वे भाव विभोर थे लेकिन मैं सोच रहा था कि आज वो दिव्य एहसास क्यों नहीं हुआ ?

कोठी से मैं घर आया तो बेटी ने कहा-मुझे भी नमस्कार करनी थी |

समय बहुत अधिक हो चुका था लेकिन भक्ति में तो भावों की ही महत्ता होती है -मुझे लगा कि हो सकता है ,बेटी को भी नमस्कार हो ही जाए |

कोठी के गेट पर सेवादार महात्माओं ने मुझे पहचानकर कहा-आप तो नमस्कार कर चुके हैं ?

मैंने कहा-बेटी के लिए आया हूँ |उन्होंने कहा-10-12 महात्मा हैं बस |

मैंने बेटी से कहा-आओ |

उसने नमस्कार की और मुझे वही दिव्य एहसास हुआ जो अब से पहले ऐसे मौकों पर होता आया था |

हम दोनों ख़ुशी-ख़ुशी घर लौटे |

इस प्रसंग से मैंने यह निष्कर्ष निकला कि-सतगुरु के चरणों की त्वचा से मेरे मस्तक की त्वचा का स्पर्श दिव्य ऊर्जा के एहसास की गारंटी नहीं है बल्कि किसी अन्य शिष्य के भाव पूरे करके भी सतगुरु मुझे वह दिव्य एहसास बख्श सकते हैं क्यूंकि यह भाव का विषय है स्पर्श का नहीं |

शिव का अर्थ है-कल्याणकारी 

रामकुमार सेवक 

परमात्मा एक निराकार तत्व है |इसी में एक ऐसे देवता की कल्पना की गयी जो गले में सर्प की माला पहनता है |जिसके सिर पर चन्द्रमा शोभित है तो गंगा भी है |जो भोला भंडारी है |हाथ में त्रिशूल रखता है|इतना कल्याणकारी और परोपकारी है कि अमृत औरों के लिए छोड़ देता है और ज़हर को खुद पी लेता है और इतना सक्षम है कि उसे कंठ से नीचे नहीं उतरने देता |

इतना शक्तिशाली और महत्वपूर्ण होने के कारण उसे महादेव कहते हैं |नृत्य करने के कारण तथा हाथ में डमरू रखने के कारण जिसे नटराज भी कहते हैं |कल्याणकारी होने के कारण उसे शिव कहते हैं |उसे  महाक्रोधी भी माना गया है जो कुपित होने पर तांडव कर देता है जिसे रोकना किसी के लिए संभव नहीं है |

जिसने भी पहली बार की ,यह कल्पना बहुत सुन्दर की |शिव में एक -दूसरे के विपरीत गुण हैं |सिर में शीतलता है त्रिशूल रूप में विनाश भी है |वे आदर्श प्रेमी और पति हैं ,अपनी पत्नी के शव को भी आसानी से नहीं त्यागते और उनके सम्मान की सुरक्षा के लिए किसी को भी दण्डित कर सकते हैं |डमरू बजाते हैं ,नृत्य करते हैं इसलिए नटराज भी कहलाते हैं लेकिन गुरुगीता को प्रकट करते हैं तो परमज्ञानी भी हैं |इसके बावजूद भोले भाले हैं क्यूंकि राक्षसों की नकारात्मक प्रवृत्ति जानने के बावजूद उन्हें उनकी मर्जी के वरदान प्रदान कर देते हैं इस प्रकार खतरे ले लेते हैं और उनका रस लेते हैं शायद इसीलिए उन्हें अर्धनारीश्वर भी माना गया है |

शिवजी जनमानस के बहुत करीब हैं और गुणी-अवगुणी दोनों को अपने मतलब के लगते हैं इसलिए बहुत लोकप्रिय हैं |उनके भक्तों की संख्या लाखों में है |  

इन सब चीजों की कल्पना का आनंद उठा लेने के बाद इसी निष्कर्ष पर पहुँचते हैं यह तो निराकार ही है |इसे चाहे जिस रूप में देखें यह उसी रूप में नज़र आता है |

बचपन में महादेवी वर्मा जी ने उनके लिए लिखा-

माँ के ठाकुर जी भोले हैं -

रोली -चन्दन उन्हें लगतीं

ठन्डे पानी से नहलातीं  

उनका भोग हमें दे जातीं 

फिर भी कभी नहीं बोले हैं -- माँ के ठाकुर जी भोले हैं - 

शिव पत्नी पार्वती को गुरु गीता का उपदेश देते हुए  स्कन्धपुराण में कहते हैं-

गुरुर्ब्रह्मा ,गुरुर्विष्णु ,गुरुर्देवो महेश्वरः 

गुरु साक्षात् परब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः |

इस मन्त्र के अर्थ गुरु को सर्वोच्च स्थान पर प्रतिष्ठित करते हैं |यह तत्व की बात कहने वाले भी शिव ही हैं |  

हिंदुत्व कहता है कि इस सृष्टि के  निर्माण ,संचालन और ध्वंस की जिम्मेदारी त्रिदेव की है ,इनमें शिवजी भी हैं |त्रिदेव भी एक बहुत सुन्दर कल्पना है |सोचकर ही बहुत ख़ुशी होती है |त्रिदेव- तीनो एकसमान हैं |तीनो एकसमान होने के बावजूद एक-दूसरे का सम्मान करते है ,आपस में प्रतिदवंद्विता नहीं है |रामचरित मानस में एक बहुत सुन्दर प्रसंग है जिसमें वनवास के दौरान शिवजी राम जी को प्रणाम करते हैं तथा अपनी पत्नी का बताते हैं कि वे स्वयं प्रभु ही हैं |दूसरी और राम जी लंका में प्रवेश के पूर्व शिवजी की उपासना ,प्रतीक रूप में करते हैं |इसमें यह शिक्षा छिपी हुई है कि वैर-भाव अथवा प्रतिद्वंद्विता की बजाय एक-दूसरे का सम्मान करना बेहतर है |

हिन्दू धर्म ही नहीं बल्कि बाकी प्रचलित धर्म भी इश्वर को एक निराकार ही मानते हैं |एकोहम बहुस्याम अर्थात एक से बहुत हो जाने की कल्पना भी बहुत रोचक है |इस कल्पना से ही अठारह पुराणों की रचना हुई |सार तो वेदों और गीता में है और विस्तार पुराणों में है |सर्वोच्च शक्ति एक ही है निराकार है |

सतगुरु का बहुत ही धन्यवाद है जिन्होंने इस सर्वोच्च शक्ति का ज्ञान प्रदान किया जिससे हर धर्म अपना लगता है और हर पैगम्बर अथवा अवतार  भी |मालिक कृपा करे कि हम इन दैवी व्यक्तित्वों से कल्याणकारी प्रेरणा ग्रहण कर सकें |           

सुमिरन आँख खोलकर किया जाए या आँख बंद करके ?

रामकुमार सेवक 

भक्ति जगत में प्रारम्भ से ही सुमिरन को महत्व दिया जाता रहा  है |सन्त कबीर कहते हैं-

सुमिरन की सुधि यूँ करो ज्यूँ गागर पनिहारी 

हाले डोले सुरत में कहे कबीर विचारी |

कहते हैं कि जैसे पानी भरने वाली स्त्रियां कुँए में से अपनी गागर या घड़े में पानी भरती हैं और उसे ध्यान से अपने घर तक ले जाती हैं इसी प्रकार भक्त वैसा ही ध्यान प्रभु का करते हैं अर्थात सब काम करते हुए सर्वव्यापी प्रभु का ध्यान करना |

 निरंकारी बाबा हरदेव सिंह जी बहुत सहज-सरल लेकिन सजग तत्वदर्शी सतगुरु थे |बड़ी -बड़ी समस्याओं का सहज समाधान कर देते थे |सहज समाधान इसलिए कर देते थे क्यूंकि भीतर से बिलकुल स्पष्ट थे |

वे सिर्फ माया की नश्वरता का उपदेश ही नहीं देते थे बल्कि खुद भी माया जाल में कभी नहीं फंसे बल्कि निर्लिप्त भाव से इस मायावी संसार के बीच विचरण करते रहे |उनका कहना था कि न आसक्ति अनुकरणीय है,न ही विरक्ति अनुकरणीय है क्यूंकि संसार में माया के बिना गुजारा नहीं है |शरीर स्वयं एक माया है इसलिए सन्त-महात्माओं ने माया से किनारा नहीं किया बल्कि अनासक्त भाव से इसका उपयोग किया और अंत में इस निराकार ब्रह्म में विलीन हुए और सदा-सदा के लिए इसी प्रभु के अंग हो गए |जिस प्रकार एक बूँद एक बार सागर में मिल जाए तो उसे अलग नहीं किया जा सकता इसी प्रकार मुक्तात्मा परमात्मा से अलग नहीं हो सकती |ऐसे परमात्मा को जीवन का आधार बनाने का उपदेश बाबा जी ने दिया |

एक बार एक विशाल मीटिंग हो रही थी |प्रबंध से जुड़े किसी महात्मा ने एक प्रश्न बाबा जी के पास लिखकर भेजा कि-बाबा जी सुमिरन आँख खोलकर किया जाए या आँख बंद करके ?

जवाब में बाबा जी ने कहा -सांस लेने के लिए आँख खुली होनी चाहिए या बंद होनी चाहिए ?अर्थ एकदम स्पष्ट हो गया कि सुमिरन का सम्बन्ध परमात्मा के स्मरण से है ,परमात्मा को याद करने से है,आँख खोलने या बंद करने से सुमिरन का कोई सम्बन्ध नहीं है |इस प्रकार बाबा जी की सहज बात ने हमें आडम्बर और दिखावेबाजी से बचा लिया |

इस प्रकार के सहज-सरल सिद्धांतों के कारण अध्यात्म बड़ी -बड़ी समस्याओं का सरल समाधान बना हुआ है |अध्यात्म हर समस्या का समाधान है बशर्ते हम सत्य को पहचानते भी हों और स्वीकार भी करते हों |  

आदेशपालन की कसौटी पर स्वयं की परख  

रामकुमार सेवक 

जीत सिंह जी समर्पित बुजुर्ग महात्मा हैं ,कुछ वर्ष पहले तक वे निरंकारी वर्कशॉप में बढ़ई के रूप में  सेवा किया करते थे |

एक बार उन्होंने बताया - मसूरी की बात हैं ,बाबा गुरबचन सिंह जी का समय था |मेरे ख्याल से सत्तर के दशक की बात है जब मसूरी के भवन का निर्माण कार्य चल रहा था |निरंकारी वर्कशॉप के ज्यादातर सेवादार मसूरी में ही थे |प्रधान लाभ सिंह जी को कार्य का दायित्व सौंपकर बाबा जी दिल्ली वापस आ रहे थे |बाबा जी ने प्रधान जी से कहा-इन्हें रोज शाम को संगत(सत्संग) करवानी है |

प्रधान जी ने बाबा जी का आदेश सुना और बोले-मैं इन सबको बुला लेता हूँ ,आपका आदेश खुद सुनेंगे तो अच्छा रहेगा |

प्रधान जी ने सबको बाबा जी के पास बुला लिया |बाबा जी ने साफ़-साफ़ कहा-तुम सबने प्रधान जी की हुजूरी में रोज शाम को सेवा के बाद संगत करनी है |

बाबा जी दिल्ली चले गए |सब सेवादार अपनी-अपनी सेवा में लगे थे |एक-दिन -दो दिन ऐसे ही गुजर गए |तीसरे दिन एक सेवादार दलीप सिंह जी  ने कहा-भाई लोगों ,हमें बाबा जी ने रोज शाम को संगत करने को कहा था ,हम भूल गए हैं जबकि प्रधान जी रोज शाम सात बजे स्टेज पर विराजमान हो जाते हैं |

यह सुना तो सब सेवादार भवन की तरफ दौड़े और फिर रोजाना भवन में संगत होने लगी |जब तक मसूरी में सेवा चली संगत भी चली | 

इस प्रकार के निष्ठावान भक्त थे प्रधान जी, जो आदेश पालन के वक़्त स्वयं को देखते थे जबकि हम लोग अक्सर दूसरों को ही देखते रहते हैं कि उसने आदेश का पालन किया या नहीं ? आत्मनिरीक्षण की आदत भक्त को कभी दोषों में लिप्त नहीं होने देती |वे सदैव बेदाग़ और कर्मठ जीवन व्यतीत करते हैं |प्रधान लाभ सिंह जी ने अपने व्यवहार से इसी का उदहारण पेश किया कि सतगुरु के आदेश को कभी भी हलके में नहीं लेना चाहिए क्यूंकि सतगुरु हमेशा ऐसे आदेश देते हैं जिनमें मानव मात्र की अर्थात हम सबकी भलाई छिपी होती है |  

आप स्वयं उसके चरण स्पर्श करना शुरू कीजिये 

रामकुमार सेवक 

बच्चों का अपना स्वभाव होता है |वे जो कुछ कहना चाहते हैं वह समझना सबके वश की बात नहीं है |हंसती दुनिया के संपादक विनय जोशी जी इस लाइन के मास्टर थे |मैं जब 6th कक्षा में पढता था तब हंसती दुनिया नयी-नयी शुरू हुई थी और मैं उसका केवल पाठक था और वे उसके संपादक थे |

1986  में मुझे सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी ने संत निरंकारी (हिंदी )के संपादन की सेवा दी तो विनय जी से सम्बन्ध और भी प्रगाढ़ हो गए |उससे पहले मैंने बच्चों की कवितायेँ लिखनी शुरू कर दी थीं और उनमें से दो हंसती दुनिया में प्रकाशित भी हुई थीं बल्कि मनीआर्डर भी आया था | 

असली  मुद्दे पर आता हूँ|

मेरा बेटा कुणाल 1993  में पैदा हुआ |बच्चे का अपना मनोविज्ञान होता है |वह भी बचपन से ही सत्संग में जाने लगा लेकिन न जाने क्यों वह अपने आप किसी को धन निरंकार नहीं करता था |उससे धन निरंकार करवाने के लिए ज़ोर लगाना पड़ता था |एक दिन मैंने विनय जी से यह समस्या बतायी |वे बोले -आप स्वयं उसे चरण छूकर धन निरंकार करनी शुरू करो |

मैंने वैसा ही किया और बच्चा भी फिर शुरू हो गया |

विनय जी एक अध्यापक थे और बालकों के मनोविज्ञान को भली भांति जानते थे |निरंकारी मिशन में बाल साहित्य पर जब भी खोज होगी विनय जी को जरूर याद किया जाएगा |उन्होंने बाल सत्संग भी शुरू किये और निरंकारी यूथ फोरम के माध्यम से युवा सत्संग भी शुरू किये |निरंकारी प्रदर्शनी की शुरूआत भी उन्हीं के प्रयत्नों से शुरू हुई |बाबा गुरबचन सिंह जी के समय में वे काफी सक्रिय थे |बाद में हंसती दुनिया में ही सीमित होकर रह गए | 

मेरा सम्बन्ध उनसे काफी बाद में जुड़ा और हम बहुत कुछ कर नहीं सके | 1990 के आस-पास हमने उनकी अध्यक्षता में एक समिति बनायीं थी-प्रगतिशील शिक्षा प्रसार समिति |यदि हम सफल होते तो निश्चय ही समाज के लिए वह एक बड़ा योगदान होता |अब विनय जी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी प्रेरणाएं तो अब भी हैं जिन्हें मौका मिलने पर भविष्य में भी लिखूंगा -धन निरंकार जी- |      

बेटी को कुछ उल्टा-सीधा नहीं सुनना पड़ेगा 

रामकुमार सेवक 

जे.एस.शांत अर्थात जोगिन्दर सिंह जी शांत अमृतसर के निवासी थे |1978 के दिनों में अमृतसर में आतंकवादियों ने उन पर खतरनाक आक्रमण किया था लेकिन मालिक की कृपा से वे जीवित रहे और 1980 के आस-पास दिल्ली आकर बस गए और प्रॉपर्टी का काम करने लगे |

जीवन में उन्होंने बहुत उतार-चढ़ाव देखे |उनकी आयु मेरे पिताजी की आयु से मिलती थी लेकिन मेरी -उनकी पटरी अच्छी बैठती थी |उन्होंने तीन-चार घटनाएं ऐसी बताई थीं जो सदैव याद रहेंगी मालिक मेरी याददाश्त सलामत रखे |उनमें से एक आज लिख रहा हूँ |

एक बार उन्होंने बताया-मेरी बेटी का विवाह अजायब सिंह जी की हुजूरी में हुआ था |उन दिनों मेरी आर्थिक स्थिति बेहद कमजोर थी और मैं बारातियों का उचित सत्कार करने में समर्थ नहीं था |

उन्होंने बात यहाँ से शुरू की कि-मेरे समधी शराब पीते थे लेकिन आदमी बहुत ही अच्छे थे |

मेरी यह धारणा पहले से ही थी कि हालांकि शराब पीना अच्छी बात नहीं है और सतगुरु के आदेश के विपरीत है लेकिन शराब पीने वाला आदमी भी एक बहुत अच्छा इंसान हो सकता है इसलिए मैंने उनकी बात पर पूरा ध्यान दिया |

उन्होंने कहा कि विवाह के बाद एक दिन वे मेरे पास आये और बोले-भाई साहब ,औरतें न जाने क्या -क्या बोलती रहती हैं |

मैं उनकी बात का आशय समझकर बोला -मैंने आपसे पहले ही अपनी आर्थिक अवस्था के बारे में बता दिया था |मेरी बात सुनो तो,...वो बीच में ही बोले |

उन्होंने मुझे 150/-दिये  और बोले- ऐसा करना ,आप एक स्टील की आलमारी (जिसे आजकल सेफ कहते हैं)एक रिक्शे में रखवाकर हमारे घर ले जाना ,इससे औरतों की तसल्ली हो जायेगी और बेटी को कुछ सुनना नहीं पड़ेगा |

मैं उनकी चारित्रिक दृढ़ता देखकर दंग हो गया |हालांकि मैं शारीरिक रूप में उन महात्मा के कभी दर्शन नहीं कर सका  लेकिन मेरी नज़र में  उनकी महत्ता आज भी बहुत ज्यादा है |ऐसा दूसरा इंसान मैंने कभी नहीं देखा जो अपने रिश्तेदार का इतना ज्यादा ख्याल करता हो |  

यह प्रसंग मुझे इतना बढ़िया लगा था कि तब भी मैंने इसे लिखा था और सन्त निरंकारी पत्रिका में छापा  भी था और आज फिर दोबारा लिखा है |  

 

जे आर डी सत्यार्थी जी को श्रद्धांजलि -कविता 

अध्यात्म  के महारथी -जे.आर.डी.सत्यार्थी

रामकुमार सेवक

कुछ लोगों के कद बड़े होते हैं

और-कुछ के पद बड़े होते हैं |

जो बड़े कद के होते हैं ,उन्हें बड़ा पद मिलने पर 

पद के लेवल में लाने के लिए -काटना नहीं पड़ता

क्यूंकि उनमें लालसाएं नहीं होतीं,इसलिए उन्हें छांटना नहीं पड़ता

सन्तों-महापुरुषों के कद बड़े होते हैं, क्यूंकि वो निराकार से जुड़े होते हैं

तभी वो किसी भी आकार में ढल जाते हैं ,संसार में रहते हैं तो संसारके अनुसार चल जाते हैं

लेकिन

वे व्यापार नहीं करते -इसलिए निरंकार में लींन रहकर

मुक्ति का अनमोल और अनूठा  फल पाते हैं |

जब उन्हें संसार का पद मिलता है ,तब भी वे अपनी नज़र -चौथे पद की तरफ टिकाते  हैं -

और जैसे कुर्सी मिलने से पहले थे ,कुर्सी पर विराजमान होकर भी

वैसा ही निर्लिप्त  जीवन बिताते हैं |

भक्ति की उनकी जड़ों को उखाड़ नहीं पाता

इसलिए-संसार उनका कुछ नहीं बिगाड़ पाता

वे जिस शान से आते हैं ,

उसी शान से - निर्मल और बेदाग़, लौट भी जाते हैं

क्योंकि -गाड़ियां तो आती-जाती रहती हैं

लेकिन- स्टेशन वहीं बना रहता है -निर्विकार -निराकार