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FEBRUARY 2019 - PRAGATISHEEL SAHITYA (1)
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सम्पादकीय

हिंदी भाषा को चलन से बाहर करने की कोशिश

- रामकुमार सेवक

 

पिछले दिनों एक शब्द पढ़ने में आया-मॉब लिंचिंग | शब्द किसी अंग्रेजी के अखबार में नहीं बल्कि हिंदी के अखबार में छपा था |मैंने बेटे से पूछना चाहा लेकिन झिझक हुई कि वह क्या सोचेगा ?

मैं रुक गया ,पहली बार हिंदी के अखबार में छपी को खबर को पढ़ने के लिए बाहरी सहायता की ज़रुरत पडी थी |

मैं सोच रहा था कि क्या अखबार के पत्रकार इतने लापरवाह हो गए हैं कि पाठकों के लिए इस शब्द का हिंदी में अनुवाद नहीं कर सकते थे या वे समझते हैं कि हिंदी में इस शब्द का समानार्थी शब्द नहीं है या हिंदी के सब पाठक अंग्रेजी भी अच्छी तरह जानते हैं ?

नए शब्दों को स्मृति में लेने की पुरानी आदत रही है तो उस शब्द के अर्थ तक पहुंचा |

शब्द जरूर मेरे लिए नया था लेकिन अर्थ नया नहीं था |भीड़  द्वारा हिंसा कोई नयी बात नहीं है फिर उसके लिए अंग्रेजी शब्द हिंदी के अखबार में ,बात कुछ हज़म नहीं हुई |       

भाषा अलग चीज है और लिपि अलग |अब हम यह भिन्नता हम  पहचान चुके हैं लेकिन हमारी राष्ट्रभाषा को ख़त्म करने का सुनियोजित षड़यंत्र चल रहा है,ऐसा लगता है क्यूंकि कुछ वर्ष पहले जो अख़बार हिंदी लिपि के साथ हिंदी शब्दों का ही इस्तेमाल करते थे अब धड़ल्ले से अंग्रेजी शब्दों का प्रयोग करते हैं |

वर्षों पहले ही हमारे भाषा वैज्ञानिकों ने इस समस्या को भांप लिया था कि धीरे -धीरे हमारी सांस्कृतिक श्रेष्ठता को नष्ट करने के प्रयास किये जा रहे हैं |प्रश्न यह है कि जब हिंदी भाषा में उपयुक्त शब्द उपलब्ध है तो सही शब्द से बचने का क्या कारण   है?

एक कारण तो यह हो सकता है पत्रकार को अंग्रेजी के शब्द का तो ज्ञान हो लेकिन समानार्थी हिंदी शब्द का ज्ञान न हो |

यदि ऐसा हो तो शब्दकोष की सहायता ली जा सकती है लेकिन जो शब्द प्रचलित नहीं हो और अख़बार की भाषा का भी न हो तो उसका उपयोग नहीं करना चाहिए |लेकिन इस गलती को लगातार और सोच-समझकर किया जा रहा है|धीरे- धीरे ऐसा लगने लगा कि या तो हिंदी भाषा में शब्दों का अभाव है या हम हिंदुस्तानी अपनी भाषा के प्रति कुंठित हो गए हैं कि हमारी भाषा अंग्रेजी भाषा से कमतर है इसलिए हमारे रिपोर्टर्स हमारी राष्ट्रभाषा से  अनभिज्ञ हो गए हैं |

लगभग बीस वर्ष पहले अखबारों में हिंदी लिपि के साथ हिंदी भाषा का ही  उपयोग  होता  था  |उन दिनों जमानत के लिए जमानत ही लिखा जाता था न कि बेल |इसी प्रकार कोई अगर गिरफ्तार होता था तो उसके लिए अरेस्ट शब्द का उपयोग नहीं किया जाता था |

उस समय जब अखबार पढ़ते थे तो पाठकों की भाषा समृद्ध होती थी लेकिन अंग्रेजी भाषा

के बढ़ते वर्चस्व ने अखबारों की शब्दावली बिगाड़ दी है |

एक मित्र से जब यह बात कही तो वे बोले -अंग्रेजी शब्दावली तो बढ़ रही है |

सुनने में यह बात बहुत सकारात्मक लगती है कि भाषाई नुक्सान का सकारात्मक प्रभाव भी है लेकिन यथार्थ इतना मधुर नहीं है |

यथार्थ के धरातल पर उतरकर देखें |

देश में निकलने वाले अखबारों में हिंदी की पाठक संख्या सर्वाधिक है |हो भी क्यों न आखिर हिंदी बोलने वाले लोगों की संख्या भी तो सर्वाधिक है |

यथार्थ यह है कि जो पहले जमानत बोलता  था,अब भी ज़मानत ही बोलता है लेकिन अख़बार में पढता है-लालू यादव को बेल |अब वह उलझ जाता है कि यह तोरई की बेल है या सेम की बेल है ?इस प्रकार पाठक उलझन में पद जाता है |   

इस उलझन को बढ़ाने में जिन पत्रकारों का योगदान है उन्हें पाठकों को उलझन से बचाना चाहिए और अपने कर्तव्य को सही प्रकार निभाना चाहिए अन्यथा हिंन्दी भाषा को चलन से बाहर करने में उनका भी दोष होगा इसलिए इस आदत से जितनी जल्दी बचा जाए उतना ही बेहतर है | 


सम्पादकीय - विकास क्या इसको कहते हैं ?

लगभग 15  दिन हो गए हैं, नववर्ष का ज़िक्र इंटरनेट पर कहीं न कहीं पढ़ने को मिल ही जाता है |20-22 साल की उम्र तक मैं भी इसे एक ख़ास दिन मानता था लेकिन उन दिनों जबकि दूरदर्शन पर ही नववर्ष कार्यक्रम का आयोजन होता था और हम दर्शक के रूप में उससे जुड़े थे |टी.वी. देखकर रात को किसी  दोस्त के घर से बाहर निकल रहा था तो ज़हन में प्रश्न गूंजा कि-जिसे हम नया वर्ष कह रहे हैं वह कहाँ है .कैसा है ?रात वही है,सड़क वही है,इमारतें वही हैं |घड़ी की दोनों सुइयां बेशक मिल गयी हैं लेकिन आपसी मिलवर्तन कहाँ है ?

मैं खोजना चाहता था वर्ष में नया क्या है ?नए होते थे सपने और सपनो की नियति ही टूटना है |कुछ अच्छा ,कुछ बुरा ,इसी प्रकार के मिश्रित परिणाम,हर वर्ष में |विशेष परिवर्तन कभी कुछ भी नहीं दिखा आज तक  लेकिन उन दिनों  नियम बना रखा था कि 15-20 शुभकामना कार्ड दोस्तों,सम्बन्धियों को भेजने का |  वह सिलसिला तब तक चला जब तक कि इंटरनेट नहीं आया  |अब कार्ड्स की बात कोई नहीं करता ,फेसबुक और whats app  के द्वारा ही ज्यादातर दोस्तों से संपर्क है |प्रत्यक्ष मिलन होता ही नहीं है क्यूंकि हम बहुत विकसित हो गए हैं |

कोई वक़्त था हम अतिथि को भगवान मानते थे क्यूंकि अतिथि देवो भव का भाव हमारे दिलों में ज़िंदा था |तब हमारे घरों पर लिखा रहता था -स्वागतम |हम धीरे-धीरे व्यावहारिक और बहुत सीमित होते गए और घरों के द्वार पर लिख दिया गया -कुत्तों से सावधान (Beware of dogs )

 नव वर्ष आते गए और 365 दिन बाद जाते रहे |चाचा-चाची  ,ताऊ-ताई ,मामा-मामी ,बुवा-फूफा आदि संबंधों के स्थान पर दो-नए शब्द आ गए-अंकल और आंटी |इससे बहुत सुविधा हो गयी ,बहुत सारे संबंधों के नाम याद रखने से बच गए |इस प्रकार हम विकसित हो गए लेकिन चाचा -चाची या बाकी संबंधों का अपना एक इतिहास था ,कुछ परम्पराएं थीं ,जो कि उस देश में होती ही नहीं जहाँ से अंकल और आंटी शब्द पैदा हुए हैं | 

मैं उस देश को निम्न या हलके में नहीं लेना चाहता लेकिन मातृभूमि की अपनी विशेषता होती है |मेरा जन्म मुराद नगर (उत्तर प्रदेश )में हुआ था |कुछ दोस्तों की कृपा से पिछले रविवार मुझे वहां जाने का अवसर मिला |सामने लहलहाते खेत देखकर मुझे याद आ गया-

जननी -जन्मभूमि स्वर्गादपि गरीयसी अर्थात जननी और जन्मभूमि स्वर्ग से भी बढ़कर है |

यह सोचकर दिल को बहुत सुकून मिला |

पाठक कहेंगे कि मैं पुराने रिश्तों और परम्परों की बातें क्यों दोहरा रहा हूँ ?जहाँ हम हैं क्या उससे पीछे जाना जरूरी है और क्या ऐसा होना संभव है ?क्या यह पिछड़ापन नहीं होगा ?

मेरा कहना मात्र इतना सा है कि वसुधैव कुटुंबकम अर्थात पूरी पृथ्वी हमारा परिवार  है हमारे बुनियादी जीवन मूल्यों में से हैं |मातृ देवो भव ,पितृ देवो भव,राष्ट्र देवो भव ,अतिथि देवो भव हमारे बुनियादी जीवन मूल्य हैं जो कि भारत को विश्वगुरु की श्रेणी में लाते हैं |

कभी ह्वेनसांग और मेगस्थनीज़ भारत से सीखते थे अब यहाँ विदेशी(विशेषकर महिलायें ) खुद को सुरक्षित महसूस नहीं करतीं |गाँधी ,बुद्ध और राम-कृष्ण के उपदेश हमारे जान-जीवन से लुप्त हो चुके हैं | अब भारत में गुरु ही गुरु हैं लेकिन ऐसा गुरु कहीं दिखाई नहीं देता जो हमारे शाश्वत जीवन मूल्यों की प्रासंगिकता अथवा उपयोगिता हमें समझा सके | 

हमें विकास की अपनी परिभाषा पर ठन्डे दिमाग से विचार करना चाहिए |बुनियादी जीवन मूल्यों और अपनी पारिवारिक अथवा सांस्कृतिक विरासत को त्यागकर कोई भी विकास पूर्ण नहीं हो सकता |

विकास का अर्थ है दिल का बड़ा होना ,मिलवर्तन बढ़ना ,विजन बड़ा होना ,होटलों में पार्टियों में पैसा खर्च करते समय उनके बारे में भी सोचें जो एक-एक रोटी की तरफ ललचायी नज़र से देखते हैं |यदि ऐसा हो तो तभी देश -दुनिया का भला होगा |किसी ने लिखा है-

किसी की मुस्कराहट पे हो निसार 

किसी का दर्द मिल सके तो ले उधार 

किसी  के वास्ते हो तेरे दिल में प्यार 

जीना इसी का नाम है -----

आईए इस वर्ष में कुछ ऐसी सार्थक पहल करें जिससे मानवता का भला हो और देश,समाज व् विश्व के  विकास में हमारा कोई वास्तविक योगदान हो सके |

रामकुमार सेवक  


समपादकीय - धर्म में कट्टरता और कट्टरता में धर्म (नवम्बर 2017)