समपादकीय - धर्म और अपराध (सितंबर 2017)

प्रसाद आखिर किस तत्व का नाम है ?

रामकुमार सेवक  

सुबह उठकर सच्चे बादशाह को याद करके चार गिलास पानी पीता हूँ इसलिए उसके बाद कुछ सावधानी रखनी पड़ती है |शनिवार को छुट्टी होने के कारण उस दिन सुबह कोशिश करता हूँ कि सत्संग में जरूर जाऊं |

उस दिन नमस्कार करके नीचे आकर सत्संग सुनने लगा क्योंकि चार गिलास पानी पीने के बाद बीच में उठना पड़ता है तो मैंने सोचा कि नीचे खड़े होकर सुनने से अन्य महापुरुषों के श्रवण में बाधा नहीं आएगी |

कई और महापुरुष भी वहां खड़े  थे |

थोड़ी देर बाद सत्संग संपन्न हो गया और महापुरुष प्रसाद बांटने लगे |महापुरुष जी ने सबको प्रसाद दिया लेकिन मुझे छोड़ दिया | अब मेरे मन में तरह-तरह के ख्याल आने लगे |उनके प्रति दुर्भावना आने लगी जिन्होंने मुझे प्रसाद नहीं दिया था |

मेरे विवेक ने कहा -सावधान ,तू थोड़े से हलवे के लालच में असली प्रसाद को छोड़ रहा है |

सत्संग का प्रसाद है ज्ञान जो कि सतगुरु जी पहले ही दे चुकले हैं और अभी संतो-महात्माओं के श्रीमुख से जो प्रसारित हुआ है ,वह है इस सत्संग का प्रसाद |

मुझे याद आ गया ,पावन बाणी का यह महावाक्य -

एक ओमकार सतनाम,करतापुरख ,निरभउ,निर्वैर, अकालमूरत ,अजूनी ,सैभं -सतगुरु प्रसाद

परमेश्वर के बारे में महात्मा कहते हैं  -यह एक है |इसका नाम ही सत्य है |यही सब कुछ का कर्ता है |यह निर्भय है,इसको किसी का भय नहीं ,यह ऐसी मूरत है जो कालातीत है यानी समय सीमा से परे है |यह योनियो के चक्र के अधीन नहीं है |यह स्वयंभू है अर्थात स्वयं उत्पन्न हुआ है -ऐसा परमात्मा सतगुरु का ही प्रसाद है अर्थात जो ऐसे परमात्मा को प्रसाद में दे वही सतगुरु है |

मामला साफ़ हो गया और मैं फिसलने से बच गया |

विचारों का प्रवाह आगे बढ़ चला |उन दिनों मैं संत निरंकारी मंडल द्वारा दिए एक कमरे में रहता था | सँयोग की बात है कि वहां मेरी तरह के पांच परिवार वैसे ही कमरों में रहते थे |वहां एक बहुत बड़ा आँगन था जिसके बीच में एक पेड़ भी था |प्रसाद रोजाना उसी आँगन में बनता था |रोज मैं उसे बनते हुए देखता था |

महापुरुष रोज सूजी,चीनी,घी आदि लेकर आते थे और उसे बनाते थे |मैंने एक बात नोट की कि बनने के बाद कढ़ाई उतारने से पहले वे सब सुमिरन करते थे और फिर हलवे को बर्तन में करके उसे सत्संग स्थल पर ले जाते थे |जिन महात्माओं की और से उस दिन प्रसाद की व्यवस्था होती थी उनमें से एक उस  हलवे को लेकर सतगुरु के आसन तक पहुंचता था और वहां आसीन महापुरुषों को प्रस्तुत करता था |महापुरुष उसमें से थोड़ा सा ले लेते थे और प्लेट उन्हें लौटा देते थे और अब वह प्रसाद बन जाता था |

निष्कर्ष यह निकला कि हलवा बनने के बावजूद वह तब तक प्रसाद नहीं बनता जब तक कि महापुरुष ह्रदय से सुमिरन न करें और मंच पर विराजमान सतगुरु के प्रतिनिधि महात्मा  उसे स्वीकार न करें |अब हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे सुमिरन भक्ति का अंग है और मंच पर विराजमान सतगुरु के प्रतिनिधि महात्मा आशीर्वाद के माध्यम हैं |भक्ति और आशीर्वाद ,खाद्य पदार्थ को प्रसाद का रूप दे देते हैं अन्यथा घर या होटल में बनाया गया हलवा प्रसाद नहीं कहलाता |

इसी प्रसाद का विस्तार लंगर या भंडारे  आदि के रूप में हुआ है |देखा तो यह भी जाता है कि लंगर या भोजन या स्वाद के लालच में भी इंसान सत्संग में चला आता है |इससे सत्संग में आने वालों की संख्या बढ़ जाती है |

बचपन में हम सतनारायण जी की कथा सुनने जाते थे |उन दिनों कथा तो थोड़ी -बहुत ही समझ पाते थे लेकिन अंत में मिलने वाला प्रसाद हमें अनुशासित कर देता था | बचपन में प्रसाद का यह लालच किसी को भी नागवार नहीं लगता था लेकिन पचास - साठ की उम्र  तक इसी लालच का प्रबल रहना यह सोचने को विवश करता है कि-जीवन तो जिया लेकिन उपलब्धि क्या रही |इन्द्रियों की तृप्ति  में ही लगे हैं तो ब्रह्मज्ञान तो विकसित ही नहीं हुआ फिर कैसी भक्ति और कैसी मुक्ति ?

मुझे याद आता है कि किसी समय इतवार की सत्संग दिल्ली में बुराड़ी रोड पर ग्राउंड न.२ में होती थी |उन दिनों हर इतवार को लंगर होता था |बाबा हरदेव सिंह जी ने एक दिन अपने विचारों में कहा कि-हर इतवार को सत्संग के शुरू के कुछ घंटो में   सत्संग का पंडाल लगभग खाली होता है और लंगर में लाइने लगी होती हैं |

मुझे इस स्थिति में कबीरदास जी का यह दोहा याद आ रहा है -

                 आये थे हरिभजन को .ओटन लगे कपास

यानी कि आये तो थे सत्संग करने और लगे है लंगर की लाइनों में और साथ ही यह अभिमान   भी पाल  लिया जाए कि हम बड़े सत्संगी है तो उस हालात में सत्संग भी किसी का क्या संवारेगा इसलिए उन दिनों इतवार की सत्संग में होने वाले लंगर बन्द कर दिए गए थे और अब तक बन्द हैं |लेकिन कैंटीन में अब भी काफी भीड़ होती है |वास्तव में खाने की तरफ दौड़ने की मानसिकता को बदलने की ज़रुरत है -