इतिहास के पदचिन्ह

(पूज्य माता सविंदर हरदेव जी के देहावसान पर विशेष)

 

तुमको न भूल पाएंगे

- रामकुमार सेवक

  किसी शायर की ये पंक्तियाँ आज  बहुत याद आ रही हैं-

जाने के बाद जिनको ढूंढता रहता है फिर ज़माना 

ऐसे भी ज़माने में कुछ इंसान हुए हैं |

  पूज्य माता सविंदर हरदेव जी आज हमसे दूर हो गयीं, यह कहते हुए दिल भर आता है,आँख नम हो जाती है |

  अध्यात्म कहता है कि शरीर नाशवान है |ज्ञानी इस तथ्य को जानते और मानते हैं इसलिए वे मृत्यु का शोक नहीं करते लेकिन इसके बावजूद शोक होता है |शरीर विशेष में जो आत्मा निवास करती थी उनसे हमारा सम्बन्ध था ,उस सम्बन्ध की अपनी यादें हैं जिन्हें हम भूल नहीं सकते |  

  माता जी की संकल्पशक्ति बहुत प्रबल थी |1980 में जब बाबा गुरबचन सिंह जी ने शरीर छोड़ा तो वह निरंकारी मिशन पर बहुत सख्त आघात था |बाबा जी के शरीर छोड़ने के बाद निरंकारी मिशन को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी उनके पति (और बाबा गुरबचन सिंह जी और निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी के सुपुत्र)बाबा हरदेव सिंह जी पर आ गयी |बाबा हरदेव सिंह जी ने निरंकारी मिशन को कठिनाईयों से उबारा |माता सविंदर जी ने न सिर्फ परिवार को संभाला बल्कि अपने पति और सतगुरु के साथ अपनी प्रेरक भूमिका निभाई |जब उनके बच्चे सक्षम हो गए तो माता जी ने अपनी भूमिका को विस्तार दिया और मिशन के प्रचार-प्रसार हेतु लम्बी-लम्बी असुविधापूर्ण यात्राएं भी कीं |

  अपने माता -पिता की वे इकलौती संतान थीं इसके बावजूद समय के अनुसार अपने आपको बदला और अपनी हर भूमिका के साथ न्याय करने की कोशिश की |  

  अपने पति और सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी के 2016  में देहावसान के बाद उनकी जिम्मेदारी माता सविंदर जी जी को ही सम्भालनि पडी |माता जी इस जिम्मेदारी के प्रति बहुत सजग थीं |उन्होंने संगतों को आश्वश्त किया कि मेरे साथ कंधे से कन्धा मिलकर मिशन को आगे ले जाएँ |कुछ ही महीने बाद उन्होंने स्पष्ट कहा कि जो श्रद्धालु किसी कारणवश साध संगत से दूर हो रहे हैं  उनके पास जाकर उनके शक -शुब्हे दूर करके उन्हें दुबारा साध संगत में लेकर आएं | 

  69वे और 70वे वार्षिक सन्त  समागम का आयोजन उन्हीं की छत्रछाया में हुआ था |इन दोनों बड़े समागमों और महाराष्ट्र के दो समागमों के आयोजन में उनकी क्षमता खूब दिखी |यद्यपि इस दौरान उनका शरीर पूरी तरह से दुरुस्त नहीं था इसके बावजूद उनमें काम करने की अद्भुत क्षमता थी |

  मुझे उनकी कृपा प्राप्त करने के अनेक अवसर मिले हैं जो मुझे प्रेरित कर रहे हैं कि उनके बारे में अपने विचार लिखूं |

  रामकुमार सेवक के रूप में मैंने अपनी पहली किताब निर्झर (1985) में लिखी और प्रकाशित भी की |चूंकि यह किताब मैंने उन्हें ही समर्पित की थी इसलिए पंजीकृत डाक से उन्हें भेजा  |मुझे बिलकुल भी आशा नहीं थी कि यह किताब उन तक पहुंचेगी लेकिन किताब उन तक पहुँची और माता जी ने मुझे भरपूर आशीर्वाद प्रदान किया |यह नेरा उनसे पहला संपर्क था |

  वर्ष 2003 में मुझे बाबा जी -माता जी के साथ कुछ दिन कल्याण यात्रा में बिताने को मिले थे |वे बहुत हर्षपूर्ण दिन थे |जब हम कलकत्ता से लौट रहे थे तो मेरा पेट ख़राब था |माता जी ने मुझे एक आयुर्वेदिक गोली दी और मुझे राहत मिली | उस दिन मैंने अपने आपको एक बच्चे के रूप में महसूस किया |   

  1976 की बात है - सन्त निरंकारी कॉलोनी स्थित अवतार पार्क में अखिल भारतीय निरंकारी युवा सम्मेलन हुआ था ,जिसके चित्र (उस समय की )सन्त निरंकारी मासिक पत्रिका में छपे थे | वह बाबा गुरबचन सिंह जी महाराज का युग था |1973  की मसूरी कांफ्रेंस के बाद नौजवानो में नया जोश था | निरंकारी युथ फोरम भी अस्तित्व में आयी जिसके संचालक हरदेव सिंह जी सेठ थे |अवतार पार्क में जो युवा सम्मेलन हुआ ,जिसके फोटो सन्त निरंकारी पत्रिका में छपे थे उनमें श्रीमती सविंदर कौर (सुपत्नी -हरदेव सिंह जी सेठ )का फोटो भी था |पूज्य माता सविंदर जी से यह मेरा पहला परिचय था ,तब मैं आठवीं कक्षा का विद्यार्थी था |

  1986  में जब मुझे सन्त निरंकारी (हिंदी )में सेवा मिली तो युग बदल चुका था | निरंकारी यूथ फोरम का वह रूप मेरी नज़रों में तब भी ज़िंदा था |डॉ.हरभजन सिंह जी के नेतृत्व सन्त निरंकारी सत्संग भवन अर्थात ऊपर के हॉल में हर शनिवार को हम युवा सत्संग किया करते थे |

  उस दिन सत्संग में हमने एक प्रतियोगिता का आयोजन किया था जिसके पुरस्कार हम माता जी से वितरित करवाना चाहते थे |मैं और डॉ.हरभजन सिंह जी माता जी को आमंत्रित करने के लिए गए |उनकी तीनो बच्चियां तब बहुत छोटी थीं और माता जी अपनी उस (बच्चियों की माता की अपनी भूमिका में व्यस्त थे लेकिन) हम दोनों से वे बहुत बेतकल्लुफी से मिली |

  वह एक सामान्य ज्ञान प्रतियोगिता थी ,जिसमें स्थानीय नौजवानो ने बहुत उत्साह दिखाया था |वह प्रश्नपत्र निर्धारित करने की सेवा मुझे मिली थी तो माता जी ने प्रश्न पत्र के हर प्रश्न मुझसे चर्चा की लेकिन उस कार्यक्रम में वे नहीं आ सकीं | भविष्य में किसी कार्यक्रम में आने का उन्होंने वादा किया |उस दिन मैंने देखा कि माता जी किसी के साथ भी इतनी सहज हो जाती हैं कि डर नहीं लगता |

  उन्हीं दिनों एक बार फिर डॉ. हरभजन सिंह जी के साथ माता जी के चरणों में बैठने का मौका मिला |युवा सत्संग के संचालन के सिलसिले में माता जी ने हमें मार्गदर्शन व् आशीर्वाद प्रदान किया था |उस समय मैंने माता जी से उस फोटो के बारे में पूछा, जो वर्ष 1976 की सन्त निरंकारी पत्रिका में छपा था |माता जी की दृष्टि में उसकी कुछ भी महत्ता नहीं थी क्यूंकि औपचारिकता के तौर पर बोलने अर्थात भाषण देने में उनकी रूचि नहीं थी |

  मेरा विवाह 2 दिसम्बर 1987 को होना तय हुआ था |विवाह का कार्ड सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज को देने के लिए मेरी बड़ी बहन और पिताजी निरंकारी कोठी में आये |तब मैं कोठी के प्रांगण में स्थित कमरा  न .२  में रहता था |क्यूंकि प्रकाशन विभाग में मुझे नियमित सेवा मिली हुई थी और जनवरी 1987 अंक से मेरा नाम भी सन्त निरंकारी,हिंदी में छपने लगा था तो महान साहित्यकारों की भी कृपा प्राप्त होने लगी थी |आदरणीय निर्मल जोशी जी और जे,आर,डी सत्यार्थी जी के साथ हम गुरबचन निवास के सामने बाबा जी के समक्ष हाज़िर हुए |मैंने अपने मन का भाव बाबा जी के सामने रखा |महाराज ने विदेश यात्रा पर जाना था तो मेरे मन का भाव उस समय पूरा हो पाना संभव नहीं था |माता जी ने हमें ठहरने को कहा |उस दिन माता जी ने मेरे और मेरी भावी पत्नी के लिए बहुत सारे उपहार दिए |इस प्रकार व्यक्तिगत रूप से मुझे अनुग्रहित किया |इस प्रकार सेवादारों के प्रति उनके दिल में ममतापूर्ण दया थी |

  माता जी का स्वभाव बिलकुल सहज था |वे सिर्फ प्रेम ही नहीं करती थीं बल्कि हम लोगों के दोष भी स्पष्ट बता देती थीं |उस दोष के सुधार के बाद माता जी उस व्यक्ति के प्रति कोई दुराव नहीं रखती थीं |इस प्रकार उनका मन दर्पण बिलकुल साफ़ था |

  माता सविंदर जी के लगभग इकसठ वर्षों के जीवनकाल में बहुत उतार-चढ़ाव आये जिनका उन्होंने हिम्मत से सामना किया |जब तक माताओं के मन में ममता है और नदियों में जल है उनकी याद बनी रहेगी | उनकी स्मृति को ह्रदय से प्रणाम करता हूँ |