इतिहास के पदचिन्ह

(सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज के देहत्याग पर विशेष)

 

तस्मै श्री गुरवे नमः

- रामकुमार सेवक

   ऐसा लगता है जैसे शब्द साथ छोड़ गए हो आसमान पर सूरज चमक रहा है फिर भी सामने घोर अन्धकार है जबकि आँखें भी ठीक हैं |असल में ताक़त का स्रोत बीच से चला गया है |मेरी मुराद सतगुरु की कृपा से है जो कि बाबा हरदेव सिंह जी के ब्रह्म में विलीन होने के कारण जैसे लुप्त हो गयी है |

   संत-महात्मा कहते हैं-चाहे एक की बजाय आकाश में सैकड़ों चन्द्रमा हो या हज़ारों सूरज हों लेकिन गुरु के अभाव में विवेक साथ छोड़ जाता है |इस प्रकार गुरु के बिना इस विश्व में जैसे घोर अन्धकार ही है |

   अंग्रेजी के प्रसिद्द लेखक डॉ. मुलकराज आनंद ने एक कहानी लिखी है- A lost child |कहानी में एक बच्चा अपने पिता  के साथ मेला  देखने जाता है |मेले में वह अपने पिता से विभिन्न चीज़ें खरीदकर देने की मांग करता है |पिता उसे कुछ दिला नहीं रहे थे |बच्चा अपनी धुन में पिता की ऊँगली छोड़ बैठता है और फिर रोता है |जिन चीज़ों की वह मांग कर रहा था वे आस-पास के लोगों की दया के कारण  उसे मिल जाती हैं लेकिन पिता के बिना वह उनका आनंद नहीं ले पाता और रोता है |हमारी भी वैसी ही अवस्था है क्यूंकि हम अपने सतगुरु से बहुत पीछे रह गए है  |उन्होंने हमें चेताया बहुत लेकिन हम अपनी आदतों में उतना बदलाव नहीं ला पाये जितना वे चाहते थे |संत निरंकारी कॉलोनी दिल्ली के संत निरंकारी सी.से.स्कूल में लगभग बीस वर्ष पहले उन्होंने कहा था कि-कहा तो यह गया है कि-वो ही कर्म कमावे गुरसिख जो-जो सतगुरु कहता है लेकिन हालात देखकर तो लगता है जैसे-वो-वो कर्म कमावे सतगुरु जो-जो गुरसिख कहता है ,इसका अर्थ है कि हम जो उनके शिष्य थे उनकी बात मानने को तैयार नहीं थे बल्कि इस बात पर जोर देते थे कि बाबा जी हमारा चाहा गया काम करें |

   वास्तविकता यह है कि आदेश देने का काम सतगुरु का होता है और उन्हें मानना सतगुरु के शिष्यों का |यदि आदेश देने का काम शिष्य करने लगे तो फिर विकार पैदा हो जाएगा |जिसका काम उसी को साजे की पुरानी कहावत के अनुसार भी गुरु का आज्ञापालन करना ही उचित है लेकिन गुरु या सतगुरु के साथ यही विडंबना वर्षों से चलती रही है कि उनकी पूजा तो होती है लेकिन अनुकरण नहीं हो पाता जिसके कारण नए-नए सम्प्रदाय तो अस्तित्व में जाते हैं लेकिन दुनिया की हालत में सुधार नहीं आता |बाबा जी ने लगातार हमें सहनशीलता और विशालता की शिक्षा दी ताकि मानवता ही धर्म का शाश्वत रूप ले सके |

   बाबा जी  के 36 वर्षों के कार्यकाल पर दृष्टि डालने पर पाते हैं कि बाबा जी ने शुरू के लगभग 10 साल बाबा गुरबचन सिंह जी की दर्दनाक ह्त्या से हताश-निराश-दुखी निरंकारी भक्तो में नयी आशा ,चेतना और उत्साह का संचार किया |शिष्यों को संभालने के लिए उनसे गहरा तालमेल स्थापित किया साथ ही विवाद की जड़ों को भी ख़त्म किया जिससे विरोधी पक्ष में भी उनके प्रति सद्भावना बननी शुरू हुई और एक सुखद वातावरण बना |उन्होंने जता दिया कि वे खून का बदला खूनदान से देंगे |इस प्रकार उनका एक विशाल रूप जन-मानस के सामने आया |

  अगले 10 साल उन्होंने अपने शिष्यों को आध्यात्मिक दृढ़ता देने और मिशन को विकास की और ले जाने के लिए व्यय किये |लगभग हर राज्य में विशाल संत समागम आयोजित होने लगे |महाराष्ट्र और उत्तर प्रदेश में भी दिल्ली के वार्षिक समागम जैसा ही विशाल संत समागम आयोजित होने लगा |यह हरियाली और खुशहाली का दौर था |सगतें उन्हें खुलकर प्यार करती थीं और वे संगतों को |मिशन निरन्तर विकास कर रहा था क्यूंकि सबको पता था कि-सर पर बाबा जी का साया है |

   अगले 10 साल में उन्होंने मिशन की उदारता और खुशहाली को दुनिया तक पहुंचाया और समाज सुधार के कार्यक्रमों के द्वारा आम जनता में यह सन्देश पहुंचाया कि वे सबके अपने हैं और सब मानव उनके |देश,समाज,धर्म,जात ,गरीब-अमीर आदि के बंधन उनके लिए बेमानी थे |

   लेकिन बहुत ज्यादा समझाने के बावजूद उनका विज़न हम लोग आत्मसात नहीं कर  पा रहे थे इसलिए बाबा जी ने बाहर के देशों को अपनी कर्मभूमि के रूप में देखा और पिछले 6 वर्षों से वे भारत और अन्य देशों को मानवीय आधार पर एक-दुसरे के करीब लाने में लगे थे और सफल भी हो रहे थे लेकिन उन्हें लग रहा था कि वो उतना काम नहीं कर पा रहे हैं जितना कि करना चाहते हैं|  

   दिल्ली में 24 अप्रैल को उन्होंने कहा था--शादियां तो सामूहिक विवाहों में सुबह के वक़्त कर ली जाती हैं लेकिन बाकी सब काम रात को होते हैं जबकि बाबा गुरबचन सिंह जी ने सादा शादियों का जो आदेश दिया था वो बच्चों के विवाहों के दबावों को कम करने के लिए था |सुबह के समय शादियों में लाइट का भी खर्चा नहीं होता इसलिए खर्चे का उतना दबाव नहीं होता |

-बाबा गुरबचन सिंह जी का यह भी ध्यान था कि दहेज़ की मांग नहीं की जानी चाहिए |

-नशाबंदी भी पूरी तरह होनी चाहिए |

   उन्होंने जो बहुत ख़ास बात कही वह यह थी कि ब्रह्मज्ञान देने से पहले जातियों आदि के बंधन ख़त्म करने का प्रण लिया था लेकिन किसी ना किसी ढंग से ये सिलसिले अब भी चल रहे हैं |बाबा जी ने कहा कि यदि इस प्रण को नकार दिया तो समझो ब्रह्मज्ञान को भी नकार दिया क्यूंकि यदि यह प्रण नहीं लेते तो ब्रह्मज्ञान मिलना ही नहीं था |यदि ब्रह्ज्ञान को ही नकार दिया तो कैसी भक्ति और कैसी मुक्ति ?

   उन्होंने यह भी कहा कि-बाबा बूटा सिंह जी ने मात्र 14 वर्षों में,बाबा अवतार सिंह जी ने कुल 20 वर्षों में और बाबा गुरबचन सिंह जी ने मात्र 17 वर्षों में जितना काम किया पिछले 36 वर्षों में वे उतना काम नहीं कर पाये हैं जबकि यह उनकी मात्र विनम्रता थी |उन्होंने जितना काम हर क्षेत्र में किया वह 50 साल तक लगातार काम करके भी हो जाए तो बहुत बड़ी उपलब्धि होगी |

   मुझे लगता है कि हम एक योग्य सतगुरु के योग्य शिष्य सिद्ध नहीं हो सके और बाबा जी ने अपनी जीवन लीला समेटने का निर्णय कर लिया |कारण तो कुछ भी हो सकता है करने-कराने वाले स्वयं वही थे क्यूंकि -गुरु साक्षात्पारब्रह्म तस्मै श्री गुरवे नमः |

   उन्होंने हममें जिस ज्ञान,भक्ति और चेतना का संचार किया है वह आज जैसे ठिठक चुकी है क्यूंकि भविष्य पूरी तरह अज्ञात है |1980 में सम्बल थे सम्भावनाएं भी थीं लेकिन आज घोर अन्धकार है क्यूंकि वह शरीर हमारे बीच नहीं है जिसमें सतगुरु विराजते थेउनकी शक्ति जब तक किसी शरीर का चयन करके उसके माध्यम से हमें वही आशीर्वाद प्रदान नहीं करती यह अन्धकार बना रहेगा |निरंकार प्रभु हम सबको फिर उसी दिव्य रौशनी से रोशन करे यही कामना है |