इतिहास के पदचिन्ह

 

निरंकारी मिशन और अगस्त माह

- रामकुमार सेवक

   रोज की तरह आज भी मेरे सामने यह दयालु पेड़ है |उसके हिलते पत्ते देखकर मुझे रोज यह ख्याल आता है कि यह पेड़ अपने ढंग से इस प्रकार प्रभु का सुमिरन कर रहा और मैं भी उसका साथी बन जाता हूँ |हम दोनों मिलकर प्रभु की वंदना करते हैं |

   आज 8 अगस्त है |कुछ ही घंटों के बाद पूज्य माता जी का पार्थिव शरीर पंचतत्व में मिल जाएगा |एक वह भी अगस्त था जिस दिन जगतमाता बुद्धवंती जी ने शरीर त्यागा था |वे युगपुरुष बाबा अवतार सिंह जी की धर्मपत्नी थीं |उन्होंने 15  अगस्त  1964 को शरीर छोड़ा था |वे सेवा की जीवंत स्वरूप थीं |उनके बारे में आदरणीय निर्मल जोशी जी बताते थे कि वे बाबा अवतार सिंह जी के चरणों में बैठती थीं |बाबा अवतार सिंह जी की इच्छा ही उनकी इच्छा थी |उन्होंने जो सेवाकार्य किये ,जो मैंने अपने बुजुर्गों से सुने, वे सब मुझे आज ध्यान में आ रहे हैं लेकिन उन्हें फिर कभी लिखूंगा |उनके बारे सिर्फ इतना ही कहना पर्याप्त है कि जोगिन्दर सिंह जी (नूर निरंकारी )उन्हीं के पुत्र थे ,एक माता बाबा बूटा सिंह जी से अरदास किया करती थी कि वरदान दें कि उन्हें पुत्र खिलाने का गौरव प्राप्त हो | माता अपनी अरदास कई बार दोहरा चुकी थी |बाबा बूटा सिंह जी ने अपनी मौज में जगतमाता जी की गोद में से बच्चा उठाया और उस माता की गोद में डाल दिया |

   जगतमाता जी के दिल पर क्या गुजरी होगी ,हम सोच सकते हैं,लेकिन माता जी ने अपने निजी भावों को दबा दिया और सत्गुरु बाबा बूटा सिंह जी की भक्तवत्सलता को स्वीकार किया -इतना बड़ा दिल था उनका |

   उन्हीं की स्मृति में 15  अगस्त को समागम होना शुरू हुआ |तब इस समागम का नाम था-जगतमाता दिवस ,जो आज मुक्ति पर्व के रूप में मनाया जाता है | 

   15  अगस्त 1979  को महान गुरुभक्त और सात सितारों में से एक लाभ सिंह जी (प्रधान )ने अल्मोड़ा(अब उत्तराखंड में ) अपना शरीर छोड़ा |वे हाज़िरजवाब महात्मा थे और बड़े-बड़े मसले चुटकियों में हल कर देते थे |उनका सत्गुरु के प्रति समर्पण इतना प्रबल था कि उसके बीच में किसी भी बाधा को वे स्वीकार नहीं करते थे |

   उनके बारे में यह घटनाक्रम  बहुत बार सुना है कि बाबा अवतार सिंह जी संगत के लिए पहाड़गंज जा रहे थे |रास्ते में बाबा जी ने किसी अन्य महात्मा को साथ बिठाया और प्रधान लाभ सिंह जी को वापस भेज दिया |प्रधान जी वापस निरंकारी कॉलोनी आ गये |

   वहां प्रधान जी को किसी ने कहा-प्रधान जी,बाबा जी किसी अन्य महापुरुष को अपने साथ आगे ले गये जबकि आपको वापस भेज दिया ,यह बात मुझे कुछ अच्छी नहीं लगी |आप मंडल के प्रधान हैं तो आपके पद का सम्मान होना चाहिए था |

   प्रधान जी उस सज्जन से बोले कि बाबा जी ने मुझ पर इतना यकीन किया कि यह मेरी बात मान लेगा-यह मेरे लिए बहुत है |उन्होंने मुझे अपना समझा यह बहुत है और तू गुरु में दोष देख रहा है ,अपनी आदत बदल ले नहीं तो बहुत नुक्सान उठाएगा |

   ऐसे दृढ़निश्चयी थे प्रधान लाभ सिंह जी ,जिन्होंने उसी तारीख को शरीर त्यागा,जिस तारीख को हमारे देश का स्वतंत्रता दिवस था |संयोगवश जगतमाता बुद्धवंती जी की आत्मा भी इसी दिन शरीर के बंधन से स्वतंत्र हुई थी |

   निरंकारी राजमाता कुलवंत कौर जी बाबा अवतार सिंह जी और जगतमाता बुद्धवंती जी की पुत्रवधु थीं | निरंकारी मिशन के दूसरे सतगुरु युगप्रवर्तक  बाबा गुरबचन सिंह जी की वे धर्मपत्नी थीं |

   निरंकारी मिशन के चौथे सत्गुरु बाबा हरदेव सिंह जी की वे माता भी थीं और मार्गदर्शक भी |उन्होंने 29  अगस्त 2014  को शरीर छोड़ा | जहाँ तक मुझे स्मरण है उनका श्रद्धांजलि समारोह 1 सितम्बर  2014  को  ग्राउंड न.8 के विशाल हॉल में आयोजित किया था ,जिसमें सतगुरु बाबा हरदेव सिंह जी महाराज ने भरे ह्रदय लेकिन गौरव से कहा-माँ तुझे सलाम |

   वे बहुत मर्यादा के साथ मर्यादा के सबक हमें समझाती थीं |उनका जीवन गुरु के समान ऊंचाई लिये  हुए था |मुझे उनका लम्बा इंटरव्यू लेने का सौभाग्य मिला है |उन दिनों उन पर मैं एक किताब लिख रहा था जिसे मैंने दिल से लिखा लेकिन किताब छप नहीं सकी |निरंकारी राजमाता जी एक रोशनमीनार हैं जो गुरमत के विद्यार्थियों को हमेशा सबक सिखाती रहेंगी |उनका लोकप्रिय कथन पंजाबी भाषा में है जिसे आज तक निरंकारी अनुयाई अक्सर दोहराते हैं -

सुख सारी दुनिया दे पादे मेरी झोली विच 

फिर वी मिलाई रखीं संतान दी टोली विच |

   आज 08 अगस्त 2018  (बुधवार ) को पूज्य माता सविंदर हरदेव देव जी का पार्थिव शरीर भी  अग्नि को समर्पित किया जा चुका है |कल (07 /08 /2018 )सुबह और रात को मैं उनके प्रति श्रद्धा प्रकट करने ग्राउंड न.8 में गया था |  

   वहां उनका पार्थिव शरीर तो था लेकिन मूल तत्व आत्मा उस शरीर का साथ छोड़ चुका था या उनके शरीर ने मूल तत्व को संभाले रखने की क्षमता खो दी थी |हमारे धर्मग्रंथों में ऋषियों -मनीषियों ने इस सम्बन्ध में सारगर्भित निष्कर्ष तक पहुँचाने की कोशिश की है |गीता में भगवान श्रीकृष्ण कहते हैं - 

न जायते म्रियते वा कदाचि- न्नायं भूत्वा भविता वा न भूयः ।

 अजो नित्यः शाश्वतोऽयं पुराणो- न हन्यते हन्यमाने शरीरे ॥

   कहते हैं कि -  यह आत्मा किसी काल में भी न तो जन्मता है और न मरता ही है तथा न यह उत्पन्न होकर फिर होने वाला ही है क्योंकि यह अजन्मा, नित्य, सनातन और पुरातन है, शरीर के मारे जाने पर भी यह नहीं मारा जाता॥2/20॥

   सुबह जब वहां से निकल रहा था तो दो-चार सेवादल के जवानो से मुलाक़ात हुई |उनमें से एक ने ,जो वहां ड्यूटी पर मौजूद थे ,ने एक नाज़ुक सवाल हाज़िर कर दिया कि-सतगुरु के शरीर को मृत्यु के बाद क्या नमस्कार करनी ठीक है ?मैं स्वयं उस समय भावना में बह रहा था तो मैंने उन महात्मा से विनम्रतापूर्वक निवेदन किया -बाद में कभी बात करेंगे |

   महात्मा बोले-अभी क्यों नहीं ?

   मैंने कहा-आपका प्रश्न ज्ञान से सम्बंधित है जबकि मैं स्वयं अभी भावना के नियंत्रण में हूँ और वहां नमस्कार करके आ रहा हूँ |

   उन्होंने कहा-पूज्य   माता जी पर आपने अपनी(प्रगतिशील साहित्य की ) वेबसाइट पर बहुत अच्छा लेख लिखा है,मैंने उसे पढ़ा है इसीलिए आपसे पूछ रहा हूँ कि पार्थिव शरीर को नमस्कार करनी कहाँ तक ठीक है ?

   मैंने कहा -माता जी ने इस शरीर के माध्यम से हम पर और व्यक्तिगत रूप से मुझ पर भी अनेक उपकार किये हैं |वे उपकार मुझे पार्थिव शरीर के सामने झुकने को प्रेरित करते है |वास्तव में उन्होंने एक श्रद्धा अर्जित की है |उस श्रद्धा के अधीन होकर दास अपनी उन स्मृतियों को प्रणाम करके आया है ,जो कि मैंने अपने लेख में भी स्पष्ट किया है |

   महात्मा संतुष्ट हो गए |मूल तत्व है-निराकार ,जिसका उल्लेख गीता में विस्तार से किया गया है  |सतगुरु की कृपा से हमें इस मूल तत्व का बोध हुआ है |यह बोध सदैव जाग्रत रहे,इसी की ज़रुरत है |

   यह बात तो सिद्ध हो चुकी है कि निरंकारी मिशन के इतिहास में अगस्त माह ने इतिहास के वक्ष पर एक चिन्ह और अंकित कर दिया है |